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अटलांटिक महासागर के साथ
December 26, 2018 • डा. कीर्ति केसर

अटलांटिक महासागर के साथ

 

न्यूजर्सी का प्लेनफील्ड अटलांटिक

महासागर का तट

हिलोरे मारता अनंत जलराशि से संपन्न

महासागर अटलांटिक

कभी सोचा नहीं था

न कोई चाह जगी थी

मेरी ज़िदगी तो रोटी-कपड़ा-मकान, और

बेटियों के भविष्य से बंधी थी

अनेक वर्जनाओं वाले पुरुष-प्रधान समाज की

रास्ता रोकू रूढ़िवादी व्यवस्थाओं

से ही दो चार होने में कटी थी

आसमां से नियामतें बरसती हैं

भली नीयत को मुराद मिलती है

आज कहावतें सच हो गईं

कुछ यकीन होता है

कुछ नहीं भी होता

 

 

देखती हूँ न्यूजर्सी के सागर तट से

न्यूयार्क की स्काईलाइन तक

अटलांटिक सागर का विस्तार

नापती हूँ मैं अपनी नज़र का विस्तार

नज़रिए की गहराई और ऊँचाई नापती हूँ

अथाह गहराई में उतर कर

लहरों के चढ़ने उतरने के

मायनें तलाशती हूँ

छूकर उन्हें महसूस करती हूँ

वर्षों से जमीं अपनी तरलता को

बहता हुआ सा महसूस करती हूँ

मेरी चेतना, संवेदना, विचार-बोध को

धड़कता सा महसूस करती हूँ

 

लहरों की चंचल-चपल अठखेलियों में

अपनी वर्जनाओं की गांठें

धीरे-धीेरे खोलती हूँ

दूर-दूर से लहराती-झूमती

नाचती-गाती किनारों तक आती

फिर उल्टें पांव लौटती

लहरों की हलचल में

अपने जीवित होने का अहसास

अंगड़ाई लेकर परख लेती हूँ

अटलांटिक के भीतर का रहस्य

सीपियाँ, घोंघे, शंख, तलछट

और रंग-बिरंगे, छोटे-छोटे

तराशें हुए गोल, तिकोने, सीधे-तिरछे

पत्थरों में तलाशती हूँ

यादों की निशानियां बटोर भी लेती हूँ

 

महासागर के अल्प सहवास में

चेतना का विस्तार इतना हो गया कि

भीतर का शून्य भर गया तृप्ति से

अपने पराए के भेद मिटने लगे

पाप-पुण्य, भले बुरे होने का रहस्य

समझ में आने लगा

एक चमक ने बुद्धि में विस्फोट किया

काल चक्र में ‘अपनी जगह’

सब कुछ ‘अपनी वजह’ से

सार्थक लगने लगा

कहना-सुनना, गिले-शिकवे, वचन-प्रवचन

कुछ नहीं बचा, कुछ भी नहीं

शायद यही मनःस्थिति है-मुक्तावस्था

अनन्त के साथ एकाकार होने की

पंचतत्व के किले में बैठकर

अनंत की अनंत तृप्ति को

महसूस करने की बेशक - मुक्तावस्था

 

हे राम! मुक्तावस्था

जिसके नाम पर ज्ञान-ध्यान-मोक्ष

बेचने का विशाल आस्था उद्योग खड़ा है

आलीशान आश्रम-अखाड़े

क्रूज-विहार सजे हैं

महंतों-साधु-सन्यासी-बाबाओं

ठगों-ठगनियों के मजे़ ही मज़े हैं-

और मेरे देश के लोग

ठगे जाने को हर दिर-हर पल

समर्पित भाव से तैयार खड़े हैं

तर्कहीन अंधविश्वास

अज्ञातमय के विकट जाल में फंसे हंै।

राजनीति-अर्थव्यवस्था-वोटमाफिया

इस जाल को पक्का करने में लगे हैं

हे राम! तू असहाय बेचारा! हे राम...