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असहमति
June 22, 2020 • राजेन्द्र सिंह गहलौत • साहित्य नंदनी


राजेन्द्र सिंह गहलौत, बुढार 484110, जिला शहडोल (म.प्र.)

मोबाइल: 9329562110

 

स्त्री यौन स्वातांत्र्य के नाम पर नौटंकी कब तक जारी रहेगी ?

स्त्री यौन स्वातांत्र्य समर्थक लेखन क्या स्त्री हितो के अनुकूल है ?

(सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 497 की समाप्ति के बाद विवाहेतर यौन सबंध अपराध मुक्त हो गये है, उसके कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक अन्य फैसले में भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को समाप्त कर समलैंगिक यौन सबंधो को अपराध मुक्त कर दिया था। इन फैसलों का क्या दुष्परिणाम होगा या किस भांति इस यौन स्वातांत्र्य से समाज लाभान्वित होगा इन सब पर समाज के हर वर्ग में चर्चा व्याप्त है। लेकिन वर्तमान साहित्य में सर्वोच्च न्यायालय के इन फैसलों के बहुत पहले से ही साहित्यकारो के एक वर्ग  द्वारा स्त्री यौन स्वातांत्र्य एवं समलैगिंकता के समर्थन का परचम लहराया जा रहा था। स्त्री विमर्श के नाम पर स्त्री यौन स्वातांत्र्य समर्थक एक से एक अजूबी रचनायें यदाकदा उछलती कूंदती एवं सप्रयास चर्चित की जाती हुई दिखलाई पड़ती रहीं। अब सर्वोच्च न्यायालय के इन फैसलों की शह पर लगता है कुछ विशेष विचारधारा की पत्रिकाओं में इस तरह की रचनाओं का शैलाब ही उमड़ पड़ेगा जिनके की औचित्य पर चर्चा भविष्य करेगा फिलहाल इस तेवर की कुछ रचनाओं से असहमति व्यक्त करते हुये यह आलेख प्रस्तुत है -लेखक)

विमर्श शब्द से आशय किसी विशेष संदर्भ में परामर्श, विवेचना आदि से लगाया जाता है। सामान्यतः यह शब्द विचार के साथ प्रयुक्त होता है विचार विमर्श, लेकिन वर्तमान साहित्य में यह शब्द विभिन्न वर्गो के साथ जुड कर अधिक प्रयुक्त हो रहा है, मसलन दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श आदि। जब किसी वर्ग के संदर्भ में विचार विमर्श किया जाता है तो उसका प्रमुख उद्देश्य होता है उस वर्ग की वर्तमान स्थिति का विश्लेषण कर उसका हित चिन्तन, परन्तु वर्तमान साहित्य में विमर्शवादी लेखन अपने वर्ग के हितचिन्तन के मूल मुद्दे से भटका हुआ आंदोलनों के नारे लगाता हुआ इस भांति नयें नये प्रयोगवादी लेखन में व्यस्त है कि चकित रह जाना पडता है। दलित विमर्शवादी लेखन जहां विमर्श के नाम पर अतीतजीवी होकर सवर्ण वर्ग से प्रतिशोधात्मक रुख अपनाये हुये है वहीं अधिकांश प्रगतिशील स्त्री विमर्शवादी लेखन स्त्री यौन स्वातांत्र्य का परचम लहराते हुये आत्मरति के चटखारे लेते हुये नये नये प्रयोगवादी लेखन को कर स्त्री अस्मिता के ही खिलाफ जाते प्रतीत हो रहे है।

वर्तमान समय में यदि स्त्री हित की बात की जाये तो सर्वप्रथम जरुरी है कि स्त्री को सिर्फ एक देह न समझा जाये। वह भोग की सामग्री नहीं है, उसके प्रति आदिम युग से चले आ रहे भोगवादी नज़रिये को बदलने की जरुरत है। उसे समाज में सुरक्षा और सुरक्षित माहौल देने की जरुरत है, उसे हर क्षेत्र में आत्मर्निभर बनाने की जरुरत है। हर कहीं कर्म क्षेत्र में उसकी सहभागिता को ससम्मान स्वीकारे जाने की जरुरत है। हर कहीं उसे पुरुष के बराबर अधिकार दिये जाने की जरुरत है। स्वतंत्र भारत में कानून (सर्वोच्च न्यायालय के इन फैसलों को छोड कर), संविधान, सरकारी नीतियों, शिक्षा आदि में इस दिशा में लगातार आशाप्रद प्रयास किये भी जा रहे हैं। लेकिन समाज में प्रगति की मशाल ले कर आगे चलने का दावा करने वाले वर्तमान साहित्य (विशेष तौर पर प्रगतिशील साहित्य) में किये जा रहे लेखन में एक नज़र डालते हैं तो उसमें नये नये प्रयोगों, नये नये आंदोलनों में स्त्री हित को दरकिनार कर नूतन, आश्चर्यचकित कर देने वाले, नैतिकता को लताड़ने वाले, स्त्री स्वातांत्र्य के नाम पर स्त्री यौन स्वातांत्र्य का परचम लहराने वाले तथा अश्लील गालियों तथा अश्लील दृश्य चित्रण करने वाले, विवाहेतर एवं अप्राकृतिक यौन सबंधो की वकालत करनें वाले लेखन की बाढ़ आ गई जिसमें पुरुष लेखन ही नहीं महिला लेखन ने भी बढ चढ कर भाग लिया है

(इस तरह के लेखन को सर्वोच्च न्यायालय के इन फैसलों ने और भी अधिक महिमामंडित कर दिया है )। यह सब देख कर क्या ऐसा प्रतीत नहीं होता कि इस तरह के लेखन से इन स्त्री विमर्शवादियों द्वारा स्त्री स्वातांत्र्य और उनके अधिकारो को रेखांकित करने की जगह ‘‘स्त्री सिर्फ एक देह है ’’ के पुरातन सिद्धांत को ही नये कलेवर में प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है। हाँ ! ‘‘स्त्री सिर्फ एक देह है’’ अब नूतन स्वर में यौन स्वातांत्र्य की मांग कर यह आवाज़ जरुर बुलंद कर रही है कि ‘‘यह शरीर मेरा है मै इसे कीचड में डुबो दूं या सिर की शोभा बनाऊँ इसका फैसला सिर्फ मै करुंगी - तस्लीमा नसरीन’’ तथा यौन स्वातांत्र्य के बाद चमत्कारिक ढंग से कुछ नया कहने के प्रयास में ’’कोख मेरी है मै जिससे चाहूंगी उससे गर्भवती होऊंगी, यह कोख का अधिकार मुझे मिलना चाहिये (शिवमूर्ति की कहानी कुच्ची का कानून तदभव -32)। तस्लीमा नसरीन के यौन स्वातांत्र्य समर्थक उक्त कथन तथा शिवमूर्ति की कहानी ‘‘कुच्ची का कानून’’ में कोख के अधिकार से लेकर स्त्री की माहवारी, सिनेटरी पैड, प्रसव काल आदि पर प्रगतिशील लेखन में परिलक्षित ‘‘स्त्री विमर्श’’ स्त्री हित चिन्तन करता नजर नहीं आता बल्कि बोल्डनेस, कहानी कविता में चमत्कार, कुछ नया आश्चर्यजनक जो कि पूर्व में न कहा गया हो कह कर चौंकाने वाले प्रयोगों की श्रृंखला को ही अधिक प्रस्तुत करता नजर आता है। जिसका उद्देश्य चर्चित होना विवादित होना तो है लेकिन वर्तमान समय के समाज में स्त्री की दशा का विश्लेषण कर उनके हित चिन्तन, उनकी समस्याओं के समाधान करने की दिशा में कुछ कारगर होता नज़र नहीं आ रहा है।

तस्लीमा नसरीन के देह के स्वातांत्र्य के उक्त कथन तथा उनकी आत्मकथा ‘‘द्विखंडिता’’ में मर्द भी भोग की सामग्री हो सकते हैं के विस्फोटक कथन जिसमें मर्दो को भोगने की आत्मस्वीकृति खुल कर दर्ज की गई है - ‘‘मैंने एकाधिक मर्दो से शारीरिक सम्पर्क स्थापित किया है जानकर अनगिनत मर्द मेरे तनबदन की तरफ टुकुर टुकुर देखते रहते है, मानो यह शरीर आसानी से सुलभ है हाथ बढ़ाते ही उपलब्ध हो जायेगा .........उन लोगों को कभी यह ख्याल नहीं आता कि मर्द भी भोग की सामग्री हो सकता है, औरत भी मर्द का भोग कर सकती है..........।’’ (द्विखंडिता पृष्ठ 213, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली) के चर्चित विवादित होने के बाद महिला रचनाकारों में इसी भांति के बोल्ड, चर्चित होने वाले कथनों, संवादों के प्रयोग की होड़ लग गई। अपनी आत्मकथाओं में कई महिला साहित्यकारों ने विवाह के पूर्व तथा विवाह के बाद भी पति के अलावा कई अन्य पुरुषों से देह सबंध की बात खुल कर स्वीकारी। रही सही कसर ‘‘हंस’’ ने अगस्त 2005 एवं सितम्बर 2005 के अंक ‘‘नैतिकता से टकराव विशेषांक’’ के रुप में प्रकाशित कर पूरी कर दी। जिसमें नैतिकता को लताड़ते हुये पुरुष रचनाकारों ने ही नहीं महिला कहानीकारों ने भी खुल कर कहा -‘‘देह किसी ब्राम्हण की रसोई नहीं है कि जूठी हो जायेगी। इसमें नैतिकता का थर्मामीटर मत लगाइये। ............................. हो सकता था कि चार पुरुषों के साथ प्यार करती या सोती तो शायद सेक्स का असली सुख जान पाती।’’ (स्त्री ही स्त्री पर पहरा बैठाती है - गीताश्री हंस सितंबर 2005 पृष्ठ 72-73)। यदि यह माना जाये कि किसी भी साहित्यकार की आत्मकथा एवं आत्मकथन उसका निजी मामला है वह अपनी जिन्दगी के किसी भी हिस्से को किसी भी हद तक अपनी आत्मकथा में साहस के साथ खोल कर रख सकता है तथा आत्मकथन में अपने बाबत अपने विचार खुल कर व्यक्त कर सकता है तो पाठकीय नज़रिये से प्रश्न यह खड़ा होता है कि किसी भी साहित्यकार द्वारा आत्मकथा लिखी क्यों जाती है ? यदि वह स्वांन्तः सुखाय लिखी जाती है तो फिर सार्वजनिक रुप से सभी आम और खास पाठकों के लिये उसे प्रस्तुत क्यों किया जाता है ? संभवतः पाठक अपने प्रिय रचनाकार एवं साहित्यकार की आत्मकथा में उनके सृजन के संघर्ष के बारे में जानना चाहेगा ना कि उनकी लतों चरित्र एवं देहसबंधो की गाथाओं को जानना चाहेगा। यह सब उनके निजी मामले है इन सब के लिये साहित्यकार तमाम उम्रं स्वयं ही ज़िम्मेदार रहते हैं पाठकों को उससे कुछ लेना देना नहीं होता। पाठक का तो सीधा सबंध सिर्फ उनकी लिखी रचनाओं से होता है फिर भी यदि आत्मकथा लेखन लेखक का निजी मामला है तो इस संदर्भ में आत्मकथाओं की बात न कर कहानी, कविता, उपन्यासों की बात करते हैं। इन सब विधाओं में लिखी रचना का सीधा सबंध पाठको से होता है, वे पाठको के लिये ही लिखी जाती हैं। अतः उन विधाओं पर किये गये लेखन के औचित्य एवं उपयोग पर अपना अभिमत देने का पूरा अधिकार भी पाठक को तो मिलना ही चाहिये।

जो रचनाये पाठको के लिये लिखी जा रही है स्वाभाविक है उनमें पाठकों के लिये एक संदेश भी होता है, लेकिन विचित्र बात है कि स्त्री यौन स्वातांत्र्य के कलेवरवादी स्त्री विमर्शवादी कहानियो के कथानक और संवादों से जो संदेश उभर कर सामने आता है वह यौन स्वेच्छाचारिता एवं समलैंगिंकता का खुल कर हिमायत ही करता नज़र आता है  क्या यौन स्वेच्छाचारिता एवं समलैंगिंकता मानव समाज हेतु हितकारी है ? प्रस्तुत है कुछ प्रगतिशील कहानियों के संवादो के उदाहरण -

 -‘‘शुद्ध दैहिक व्यापार के लिये क्या प्यार की रसीद कटाना जरुरी है’’

- ‘‘मैने जीवन में अनेक पुरुष देखे है एक तुम भी सही’’    

(मर्दाना कमजोरी:लता शर्मा हंस फरवरी 2002)

-‘‘मेरा मन रुई सा हल्का था.............मैने एक पुरुष को जो मेरा पति नहीं है भोगा था ....’’ (हंस जुलाई 2001 पृष्ठ 32, कालिन्दी सिंह: एक अपनी जगह)

- ‘‘जवान को चुनो उसके इशारे पर नाचो गर्भ ठहरने का खतरा अलग मडराये यहां शान्ति से बिना किसी टेंशन के आनन्द मिलता है, किसी को भनक भी नही।’’ (हंस मार्च 2000 पृष्ठ 26, कृष्णा अग्निीहोत्री: अपने अपने कुरुक्षेत्र)

- ‘‘पुरुष यदि औरत को भोगे तो परमानन्द और इसके विपरीत औरत यदि भोग्या की श्रेणी से निकल कर पुरुष को भोगने का दावा करे तो उसे ग्लानि होनी ही चाहिये ये एक तरफा फंडा दरअसल मोहनी को भेदभाव लगता है ’’ (रजनी मोरावल, महुआ, हंस नवम्बर 2017 पृष्ठ 35)

जो बात आज सुप्रीम कोर्ट द्वारा धारा 497 के समाप्त कर देने के बाद स्त्री यौन स्वतंत्रता को लेकर उठ रही है उसके हिमायत की बात तो बहुत पहले ही प्रगतिशील साहित्यिक पत्रिका ‘‘हंस’’ ने जोर शोर से अपने कलेवर में प्रकाशित होने वाली रचनाओं में कर दी थी और वह भी महिला कहानीकारों की एक जमात ने। हां न पहले और न अभी इस बात पर गंभीरता से चर्चा की जरुरत समझी जा रही है कि इस भांति की स्वेच्छाचारिता से विवाह संस्था के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह तो नहीं लग जायेगा ? कहीं र्निबाध स्वच्छंद यौन सबंधो से जन्मी नाजायज़ संतान अपने वारिस और परवरिश के लिये तो नहीं तरस जायेगी ? एक खतरा और है एक ओर तो बालात्कार की रोक के लिये कड़े कानून बनाये जा रहे हैं दूसरी ओर यौन स्वच्छंदता को बढ़ावा देने के लिये उन्हे अपराध मुक्त किया जा रहा है। जब किसी औरत या लड़की के बारे में यह जानकारी दूषित प्रवृति वालों को होती है कि वह कईयों से स्वछंद यौन सबंध बना रही है तो उसे आसानी से हासिल होने वाली मान कर सहमत न होने पर क्या बालात्कार से हासिल नहीं करेंगे ? उस समय क्या धारा 497 समाप्त करने वाली सुप्रीम कोर्ट एवं यौन स्वातांत्र्य समर्थक प्रगतिशील साहित्यकार समझाने आयेगे कि नहीं भाई पहले सहमत करो फिर हासिल करो। स्त्री की गरिमा और सुरक्षा, लज्जा एवं विवाह के पूर्व यौन सबंध न बनाये जाने की मर्यादा में ही सुरक्षित है यह मर्यादा का कवच ही सामान्यतः उसका रक्षक होता है। जब कानून आधुनिकता और प्रगतिशील साहित्यकार इस मर्यादा को ही तोड़ने पर अमादा हैं तो क्या कहा जा सकता है जबकि नारी स्वातांत्र्य अपने अस्मत की रक्षा करते हुये भी पुरुष के कंधे से कंधा मिला कर कर्मक्षेत्र में कार्यरत होने में है ना कि यौन स्वातांत्र्य में।

इसी भांति सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 को आज समाप्त कर अप्राकृतिक यौन सबंधों केा अपराध मुक्त किया है जबकि प्रगतिशील साहित्यिक पत्रिकाओं में एक अर्से सें अप्राकृतिक यौन सबंधों के हिमायत के गीत गाये जा रहे हैं उग्र जी की चाकलेट तो चर्चित और विवादित हुई लेकिन वर्तमान तक आते आते स्वाभाविक रुप से साहित्य के पन्नो में आये दिन समलैगिंक सबंधों की कहानियां प्रकाशित होती रही है। सिर्फ पुरुष पुरुष ही नहीं स्त्री स्त्री के मध्य भी समलैंगिंक सबंधो को लेकर ढेरो कहानियां सिर्फ लिखी ही नहीं गई बल्कि उनके समर्थन के सुर भी अलापे गये। राजेन्द्र यादव की कहानी ‘‘प्रतीक्षा’’ तथा महावीर राजी की कहानी ‘‘हासिल’’ में स्त्री स्त्री के मध्य समलैंगिक सबंधो के दृश्य चित्रित है जबकि नवनिकष मार्च 2018 में प्रकाशित डा. लवलेश दत्त की कहानी ‘‘स्पर्श’’ में स्त्री समलैंगिकता के दृश्य ही चित्रित नहीं है बल्कि उसके समर्थन में तर्क देकर उसे स्थापित करने का प्रयास भी किया गया है - ‘‘नारी के कोमल अंग को कोमलता का स्पर्श चाहिये होता है कठोरता का नहीं ’’ के संवाद से कहानी स्त्री स्त्री के मध्य समलैंगिंक सबंध के औचित्य की बात करती हुई जब कहानी के समापन पर कहानीकार दीप्ति की मां साक्षी (जो पुरुषो से धोका खा चुकी है) से यह आत्मकथ्य करवाता है कि  ‘‘दीप्ति सही कहती है, नारी की साथी तो नारी ही हो सकती है, और फिर नारी से किसी प्रकार की असुरक्षा और खतरा नहीं है’’ तथा दीप्ति अपनी सहेली के साथ कमरा बंद कर लेती है तो साक्षी के चेहरे पर चिन्ता का कोई भाव नहीं था। यह दृश्य जहां स्त्री समलैगिंकता का समर्थन करते है, वहीं ‘‘कोमल अंग को कोमलता का स्पर्श चाहिये’’ पुरुष स्त्री के स्वाभविक प्राकृतिक सबंधो को ठुकराते हुये स्त्री स्त्री के परस्पर कोमल स्पर्श वाले समलैगिंक सबंधो कों स्थापित करने का तर्क देते है।

स्त्री यौन स्वातांत्र्यवादी स्त्री विमर्श के तहत कुछ नया, अनोखा, चौंकाने वाला, चर्चा में बने रहने वाला तथा विवादित होने वाला कहने के प्रयास में अभी कुछ समय पूर्व  ही प्रतिष्ठित कहानीकार शिवमूर्ति ने कहानी ‘‘कुच्ची का कानून’’ लिखी है जो कि प्रगतिशील साहित्यिक पत्रिका ‘‘तदभव’’ के अंक 32 में प्रकाशित हुई है। प्रगतिशील पत्रिका में प्रकाशित होने के बाद कुछ प्रगतिशीलों की नीतियों के तहत कुछ अपने कथानक, संवादों एवं बहसों के तहत वह कहानी चर्चित हुई या कहा जाये कि चर्चित की गई। यूं तो कहानी के कथानक में एक विधवा के किसी के भी द्वारा पुत्रवती होने के अधिकार (कोख का अधिकार) को स्थापित करने के संघर्ष तथा पूरे पुरुष समाज को अपने तर्को से पराजित कर पलायन करने पर विवश कर देने की बात कर कुछ नया विस्फोटक कहने की वाह वाही में कहानीकार खुद अपनी पीठ ठोकता नज़र आता है लेकिन पूरे कथानक में स्त्री विमर्श की खाल ओढ़ कर वह आत्मरति के चटखारे भी लेता नज़र आता है। यह बात कहानी की नायिका के नाम कुचवती से ही झलकने लगता है। ग्रामीण परिवेश में महिलाओं के नाम रामवती, श्यामवती, रधिया आदि तो सुने थे लेकिन कुचवती जिसमें कुच का अर्थ स्तन होता है यानि कि विशाल स्तन वाली नामकरण आत्मरति के चटखारे के तहत ही रखा प्रतीत होता है इतना ही नहीं पुरुष पात्र मथुरा जिसका नाम लडकों ने महालिंगम रखा है तथा गाँव की बड़ी बुढ़िया तक उनके अमोघ हथियार की चर्चा करती नज़र आती हैं भी इसी आत्मरति के तहत ही रचा गया पात्र है उसकी कहानी के कथानक में कोई महत्वपूर्ण उपस्थिति दिखलाई नहीं पड़ती। इन सबके बावजूद प्रश्न यह खड़ा होता है कि क्या कहानीकार ने कहानी के कथानक में कुछ नया कहा है ? यदि इस प्रश्न पर गौर किया जाये तो प्रगतिशील एवं स्त्री विमर्शवादी जिस हिन्दू धर्म एवं उनके धर्म ग्रंथों का विरोध करते है उसी हिन्दू धर्म ग्रंथों के एक धर्म ग्रंथ मनुस्मृति में वर्णित ‘‘नियोग प्रथा’’ की ओर ध्यान जाता है जिसमें विधवा होना ही नहीं यदि लंबे समय तक पति युद्ध भूमि में युद्धरत है या परदेश में है तो पत्नी किसी दूसरे पुरुष से गर्भ धारण कर सकती है। उस युग में स्त्री को भूमि तथा पुरुष को उस भूमि में बीज डालने वाला बता कर किसी भी हालत में भूमि को उपजरहित नहीं होना चाहिये का सिद्धांत जनसंख्या वृद्धि के उद्देश्य से धर्मग्रंथो द्वारा र्निधारित किया गया था। शिवमूर्ति जी ने भी अपनी कहानी में कुछ नया न कह कर उसी पुरानी मान्यता को नये कथानक में प्रस्तुत किया है बीच बीच में त्रेता युग के कुछ उदाहरण भी देने का प्रयास किया है। हां उन्होंने अपनी कहानी में यह नया तर्क देने का जरुर प्रयास किया है कि फसल खेत की होती है उसमें बीज कहीं से भी लेकर डाला गया हो लेकिन यह तर्क देते समय वे भूल जाते है कि फसल खेत की नहीं खेत के मालिक की होती है। फसल पर अधिकार का दावा खेत नहीं करता खेत का मालिक करता है। खेत यदि स्त्री है तो उसका मालिक कृषक उसका पति है तथा फसल (पुत्र) पर उसका ही हक है तथा उसी के नाम से वह जाना जाता है। कहानी में मूक खेत(पत्नी) को मुखर होकर बिना भू स्वामी (पति) के किसी के भी बीज से फसल पैदा करने (पुत्रवती) के अधिकार पर कहानी में कई पृष्ठो तक नायिका को बहस करते हुये चित्रित कर कोख के अधिकार के तहत कुछ नया कहने का प्रयास किया गया है जबकि कोख का अधिकार यह है कि वह स्वेच्छा से अपने पसंद के पुरुष का वरण कर तथा विधवा होने पर पुर्नविवाह कर देहसबंध बना कर अपनी इच्छानुसार उससे पुत्रवती हो ना कि स्वेच्छाचारिता अपना कर बिन विवाह किये ही किसी से भी गुप्तदान लेकर पुत्रवती हो और उस पुत्र को जायज़ ठहरा कर उसके अधिकार की मांग करे। यदि कहानी चमत्कारिक ढंग से भारतीय कानून में इस संशोधन की मांग करती है कि एक विधवा को यह हक दिया जाये कि वह किसी से भी पुत्रवती होकर उस पुत्र को अपने पति की संपत्ति पर हक दिला सके तो क्या वह संशोधन स्वेच्छाचारिता को संपत्ति के सबंध में कानूनी अधिकार दिये जाने की मांग नहीं करता ? काफी अर्से पहले ‘’हंस’’ में इसी कथानक से मिलते जुलते कथानक की कहानी प्रकाशित हुई थी फर्क यही था कि उसमें नायिका अपने पति के अलावा भी उसके तीन अविवाहित भइयों से यौन सबंध स्थापित कर सभी से पुत्रवती होने के फलस्वरुप बंटवारे के वक्त सभी की संपत्ति से अपने पुत्र के हिस्से की संपत्ति की मांग करती है। धारा 497 की समाप्ति के बाद स्वेच्छा चारी देह सबंधो से जन्मे पुत्र के अधिकारों पर ये कहानियां बहस आमंत्रित करती है।

‘‘कुच्ची का कानून’’ को सप्रयास चर्चित करने के प्रयास में ‘‘हंस’’ नवम्बर 2016 में चर्चित कहानीकार संजीव का आलेख ‘‘बाबा जी का आशीर्वाद बेटा ही होगा’’ तथा शालीनी माथुर का आलेख ‘‘ सावधान ! यह जमीन सिर्फ मर्दो की है: बदलती सदियां बदलती स्त्रियां और हिन्दी लेखन’’ ‘‘कथादेश’’ मार्च 2018 के अंक में प्रकाशित हुआ जिसमें कहानी के पक्ष विपक्ष में बातें की गईं। लेकिन संजीव जब इस कहानी के समर्थन में अपने आलेख में इसकी तुलना महाश्वेता देवी की कहानी ‘‘द्रौपदी’’ से करते है तो ताज्जुब होता है ‘द्रौपदी’’ की नायिका द्रौपदी माझिन को नक्सलाइट समझ कर रात भर सैनिको द्वारा बालात्कार करने के बाद सुबह जब नायिका कपड़े पहनने से इंकार कर नग्न हालत में ही सेना के अफसर के सामने जा खड़ी होती है तो कहानी में मार्मिकता के साथ पुरुषों के यौन शोषण, दमन के खिलाफ स्त्री के तीव्र प्रतिरोध का विस्फोटक चित्रण प्रस्तुत होता है जो मर्दो को शर्मसार कर देता है। उस विचारोत्तजक कहानी का ‘‘कुच्ची का कानून’’ जैसी बनावटी कथानक वाली कहानी से क्या और क्यों तुलना संजीव जी कर रहे है समझ में नहीं आता ? इसी कहानी की हिमायत करते हुये वे औरतों की सुन्नत की कुप्रथा पर जयश्री राय के उपन्यास ‘‘दर्दजा’’ का ज़िक्र करते है जिसका कोई भी तारतम्य इस कहानी से नहीं जुड़ता हां संजीव जी के गहन अध्ययन का प्रमाण जरुर प्रस्तुत होता है लेकिन इतनी मेहनत करने की क्या जरुरत थी पाठक तो पहलें से ही उनके अध्ययन और विद्वता का लोहा मानते आ रहे है।

संजीव अपने आलेख में ‘‘कुच्ची का कानून’’ की वकालत करते हुये कहते है ‘‘चार बीघा ज़मीन जिसका बाज़ार मूल्य पांच से छः लाख रुपये है इसी की रक्षा के लिये कुच्ची संतति के रुप में एक सहारा ढूँढ रही है और वह सहारा बेटा ही हो सकता है ’’ (हंस नवंबर 2016, पृष्ठ 61), जिसे पढ़ कर ताज्जुब होता है कि नाजायज़ संतान  उसके मृत पति की संम्पति का वारिस कैसे होगा ? फिर क्या जरुरी है कि उसके गर्भ से बेटा ही हो, हो सकता है उसके गर्भ से गांव के लम्पट पुरुषों के यौन शोषण का शिकार होने के लिये दूसरी कुच्ची जन्म ले, फिर यह भी गौरतलब है कि नवजात शिशु होता है जवा मर्द नहीं जो कि पैदा होते ही कुच्ची का सहारा बन जाये और उसकी मृत पति की सम्पति की रक्षा के लिये ताल ठोक कर खड़ा हो जाये। कुल मिला कर कहानी स्त्री विमर्श के नाम पर  स्त्री यौन स्वातांत्र्य का परचम लहराते हुये कुछ नया विस्फोटक कहने का प्रयास कर रही है लेकिन वर्तमान समय की स्त्रियों की दशाओं तथा उनकी समस्याओं का किंचित मात्र भी न तो अध्ययन विश्लेषण कर रही है और न ही कोई स्त्री हित चिन्तन ही कर रही है। स्त्री विमर्श के नाम पर स्त्री यौन स्वातांत्र्य की ऐसी नौटंकियां आये दिन वर्तमान साहित्य में की जा रही है जो कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा धारा 497 एवं 377 के समाप्तीकरण के बाद और भी नये नये जलवो के साथ पेश होती नज़र आयेंगी लेकिन इनका औचित्य क्या है ?