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एटीकेट
April 22, 2019 • पंकज मालवीय

जोर की बारिश और छुट्टी के दिन टी. वी पर मुझे ऐसे कार्यक्रम की तलाश थी जिससे मेरा स्वस्थ मनोरंजन हो सके। इसी उहापोह में मैने रिमोट के सहारे कई चैनलों की यात्रा की और इस दौरान विज्ञापनों के जरिए आधुनिक जीवन शैली के मेरे सामान्य ज्ञान में थोड़ी वृद्धि भी हुई। प्रादेशिक चैनलों की कतार में अचानक मेरा धयान एक चैनल पर गया जहां हिन्दी में किसी विषय पर गंभीर चर्चा हो रही थी। चर्चा का विषय था “प्रवासी भारतीय अपनी संस्कृति से कितने दूर और कितने पास।” अमरीका में पिछले चालीस वर्षो से रह रहे डाक्टर अनिल जिन्दल का कहना था कि वह भारत को बहुत याद करते हैं, विशेष कर तीज त्यौहार के अवसर पर। विदेशी धरती पर अपनी संस्कृति और परंपराओं के निर्वाह में उन्हें अजीब सी शान्ति मिलती है। अपने बच्चों को भारतीय संस्कृति से परिचित करवाना वह आवश्यक समझते हैं। उनका मानना है कि इससे बच्चे अधिक विवेकशील और अपने परिवार के प्रति ज्यादा जिम्मेदार बनते हैं। पर शिकागो यूनिवर्सिटी में भौतिक शास्त्र के प्रोफेसर रामानुज मिश्रा इस गम्भीर चर्चा के व्यवहारिक पक्ष की ओर ध्यान देते हुए कहते हैं कि यह कार्य इतना आसान नहीं है। प्रवासी बच्चों का उठना-बैठना, खाना-पीना, बोलना-चालना, पढ़ना-लिखना, पहनना-ओढ़ना आदि सभी क्रियाएं तो विदेशी धरती के वातावरण में होती हैं। इन क्रियाओं में अलगाव या बदलाव उन्हें उस देश की

मुख्यधारा से अलग करता है और उनके अन्दर आइसोलेशन का भाव जागृत होता है जिससे उनका न केवल शारीरिक एवं मानसिक विकास अवरूध्द होता है बल्कि वे हमेशा एक उहापोह की स्थिति में रहते हैं जो उनकी निर्णय शक्ति को प्रभावित करता है और वे अवसाद के शिकार हो सकते हैं। संस्कृति और परंपरा के संरक्षण में माहौल या वातावरण की अहं भूमिका होती है जिसमें व्यक्ति पैदा होकर बड़ा होता है। प्रवासी भारतियों के जीवन में संस्कृति और परंपराओं को लेकर हमेशा कश्मकश रहती हैं और कभी कभी न चाहते हुए भी दो विभिन्न संस्कृतियों के बीच तनाव मुक्त जीवन बिताने के लिए समझौता करना पड़ता है। जीवन के प्रति विभिन्न दृष्टिकोणों के बीच अपना रास्ता खोज कर निकालना ही श्रेयस्कर होता है।

इस चर्चा को सुनते हुए मुझे अपने मित्र डाक्टर कुमार की याद  गई जो पिछले 35 वर्षों से मास्को स्टेट यूनिवर्सिटी, मास्को में भाषा विज्ञान पढ़ा रहे हैं।

कोई तीन साल पहले मुझे किसी अन्तर्राष्ट्रीय गोष्ठी के सिलसिले में साइबेरिया के शहर नवसिबिर्स्की जाना पड़ा। मेरी यह दिली ख्वाहिश थी कि मैं ट्रान्स साइबेरियन ट्रेन से वहां जाऊं। हालाकि मुझे हवाई यात्रा की भी सुविधा थी पर मैं बर्फ से ढके देवदार के घने, अन्धेरे जंगलों के सीने को चीरती रेलगाड़ी के सफर का रोमांच अनुभव करना चाहता था। मास्को में मैं डाक्टर कुमार का मेहमान था। डाक्टर कुमार ने बेलारूस स्टेशन पर स्थित रिसर्वेशन काउन्टर से नवसिबिर्स्की आने जाने का मेरा टिकट आरक्षित करवाया। टिकट आरक्षित करवाकर हम मेट्रो से घर लौट रहे थे। पूश्किन स्क्वाइर के मेट्रो स्टेशन पर ट्रेन में भारी भीड़ घुसी। जब ट्रेन चली तो डाक्टर कुमार ने मुझे कोहनी मारते हुए कहा कि सामने जो लड़का खड़ा है उसे जरा देखो। मैने पूछा “कौन है वह?” उन्होने कहा “मेरा दामाद।” “काफी स्मार्ट है।” मैने अपनी प्रतिक्रिया जताई। वह आगे कुछ न बोले। पर मेरे जेहन में एक सवाल कौंध गया कि डाक्टर कुमार ने उससे बात क्यों नहीं की जबकि दोनों कि आंखें चार हुई थीं। वह लड़का डाक्टर कुमार पर बार बार निगाहें डालते हुए नजरे फेर लेता था। मैं यह सवाल उनसे पूछना चाहता था पर अचानक डाक्टर कुमार के मौन हो जाने पर हिम्मत न कर पाया। मैं उन्हें पेशोपेश में नहीं डालना चाहता था। उनकी बेटी ने एक रूसी लड़के से प्रेम विवाह किया था।

यह घटना रेलवे स्टेशन के एक प्लेटफार्म की तरह गुजर गई।

तीन दिन बाद, रविवार की सुबह हम उठे ही थे कि डाक्टर कुमार के फ्लैट की घंटी बज उठी। मिसेज कुमार ने दरवाजा खोला और बड़े उत्साह के साथ आंगन्तुकों का स्वागत किया। उन्हें गले लगाया और चूमा। आवाज सुनकर डाक्टर कुमार भी दरवाजे तक गए और उन्होंने भी बड़े जोश के साथ आए मेहमानों का अभिनन्दन किया, ओवरकोट और हैट उतारकर हैंगर में टांगा और उन्हें घर की स्लीपर दिया। जब मेहमान ड्राइंग रूम में आए तो डाक्टर कुमार ने उनका मुझसे परिचय कराया कि यह मेरे लड़की दामाद हैं। औपचारिक परिचय के बाद जब वे बैठे तो मुझे तीन दिन पहले मेट्रो में घटित वह घटना सहसा याद आ गई। उस लड़के का चेहरा अचानक मेरे सामने आ गया। यह वही लड़का था। मैं थोड़ा हतप्रभ था और समझने की कोशिश कर रहा था। आज डाक्टर कुमार का व्यवहार बिल्कुल अलग था। उन्होंने अपने दामाद का स्वागत बड़े गर्म जोशी के साथ किया था, उसे गले लगाया था और उसके माथे को चूमा था। उसका ओवरकोट उतार कर बड़े अदब से उसे ड्राइंग रूम में बैठाया था जबकि तीन दिन पहले मेट्रो में उसे पहचानने से इन्कार कर दिया था। यह रहस्य मुझे और उद्वेलित कर रहा था। इस पर पड़ा पर्दा मेरी उत्कंठा बढ़ा रहा था। आत्ममंथन करके मैं अपना निष्कर्ष निकालने की कोशिश कर रहा था पर किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रहा था।

शाम को उनके जाने के बाद रसोई में ही बैठ कर मैं और डाक्टर कुमार चाय पी रहे थे। डाक्टर कुमार रसोई की बड़ी खिड़की पर नजर जमाए अनन्त आकाश में देखते हुए कुछ गंभीरता से सोचे जा रहे थे। मेरे मन में बार बार वह रहस्य दस्तक दे रहा था। संकोच और उत्कंठा के बीच मैं झूल रहा था। पूछूं कि न पूछूं। रहस्य का बोझ मुझसे सहन न हुआ और अंततोगत्वा बिना किसी भूमिका के सीधे सीधे मैने पूछ ही लिया। तीन दिन पहले जब आपने मेट्रो में अपने दामाद को देखा था तो आपने उससे बात तक नहीं की थी और आज घर पर उसके स्वागत में कोई कमी नहीं छोड़ी। इसके पीछे क्या रहस्य है? डाक्टर कुमार थोड़ा मुस्कराए और फिर चिन्तामग्न होकर बोले तुम्हारी समझ में नहीं आएगा। यह एटीकेट का मामला है।

“एटीकेट!” मैं कुछ समझा नहीं। आश्चर्य के साथ मैने कहा। “हां, एटीकेट!” उस दिन मेट्रो में मेरे दामाद ने मुझसे नजरें मिलाई थीं और फिर तुरंत फेर ली थी क्योंकि वह उस समय अपनी गर्ल फ्रेंड के साथ था। उससे बात करके मैं उसे इम्बैरेस नहीं करना चाहता था। और वह भी हमारी मौजूदगी की वजह से हमारा ख्याल रखते हुए अगले स्टेशन पर ही उतर गया था जबकि उसे वहां से काफी आगे जाना था। आज वह मेरी बेटी के साथ घर आया था इसलिए मेरे लिए यह लाजमी था कि मैं उसका स्वागत करूं। यहां का यही एटीकेट है। डाक्टर कुमार के लहजे में सहजता थी और माथे पर शिकन। शिकन की अंकित रेखाओं में समझौते के उभरे भाव मैं साफ साफ पढ़ रहा था।