कटु अनुभव
April 22, 2019 • उषा निगम

स्मृति-दंश

भारत-पाक युद्ध के दिन थे। पूर्ण ब्लैक आउट की रातें। चारों ओर धुप

अंधेरा था। प्रकाश के नाम पर कहीं-कहीं मोमबत्ती की रोशनी खिड़की, दरवाजों की दराजों से छुन कर हल्के से जाले का अहसास दिला जाती थी। शाम गहराते ही शहर की हलचल शांत होने लगती थी और लोग अपने-अपने घरों में सुरक्षा का अहसास लिए बंद हो जाते।

रात को साढ़े आठ बजा होगा। हम खाना खा चुके थे और मैं अपने घर जाने की सोच रही थी। वो सामने बैठे थे और मैं उनकी उपस्थिति में एकदम सुरक्षित महसूस कर रही थी। जब उन्हें मुझको छोड़ने जाना ही था, तो मैं डरती भी क्यों। तभी ये अचाानक अपनी कुर्सी से उठे, धीरे से मेरी ओर आये। मुझे कुछ समझ में आता उससे पहले ही उनके चुंबन ........... और फिर 'चटाक' की आवाज। वे चुंबन प्रक्रिया के पूर्ण होने से पहले ही हत् प्रभ से सीधे खड़े हो गये। मैं उठी, बाहर आई-अपने घर की ओर मेरे कदम थे। उस अंधेरी सन्नाट-रात में सदा की तरह वो मेरे साथ थे किंतु उन कुछ पलों में बहुत कुछ बदल गया था। दस मिनट के उस रास्ते में हम एकदम खामोश रहे - कोई संवाद नहीं। हमारे बीच वार्तालाप की एक लंबा सिलसिला जकरा रहता था, पर आज एक लंबा मौन पसर गया था। मेरे घर के बाहर से वे लौट गये। एक छोटी सी घटना मेरे लिए बहुत बड़ी थी। यह एक ऐसा सदमा था जिससे मैं महीनों नहीं निकल पाई।

'वो' मेरे पापा के बचपन के मित्र थे। उन्हें मैं अंकल कहती थी। अंकल बड़े तेज-तर्रार, चुस्त-दुरूस्त, स्वस्थ व्यक्ति थे। आज से अस्सी वर्ष पूर्व उन्होनें अन्तरजातीय विवाह किया था। उस समय विरले ऐसा करने का साहस कर पाते थे। जब भी वो मेरे पापा के पास आते, हमारे घर का वातावरण ठहाकों से गूंज उठता था। बचपन के दो मित्र फिर से अपने बचपन में लौट जाते थे। अंकल खाने के बहुत शौकीन थे। मेरी मां के हाथ का बना खाना उन्हें बड़ा पसंद था। प्रायः हमारे परिवार एक दूसरे के घर खाते पीते। कभी आइसक्रीम बनती, कभी दही बड़े। मुझे बड़ा मजा आता क्योंकि मेरे एकाकी, शांत बचपन में कुछ हलचल मच जाती थी।

समय बीता संपर्क बना रहा, किंतु जीवन की दिशाएं बदल गई। मेरी व्यवस्तता बढ़ी। अपना शहर छूट गया। नये शहर में नयी नौकरी, नई उमंग, नया जोश। लीक से हटकर कुछ नया कर पाने का उत्साह। नये जीवन की नई जीवन शैली में व्यवस्थित होने की प्रक्रिया में एक वर्ष बीत गया। अब धीरे-

धीरे इस जीवन के एकाकीपन से घबराहट होने लगी थी। दिन बीत जाता था किंतु शामें बीतनी कठिन होती थी। आज की भांति तब पुरूष अथवा महिला मित्रों के साथ देर शाम तक घूमना फिरना मध्यम वर्गीय जीवन-शैली का अंग नहीं था और तभी एक दिन शाम सात बजे मेरे दरवाजे पर दस्तक हुई। बड़ी हैरानी हुई क्योंकि उस समय मेरे पास आने वाला कोई नहीं होता था। दरवाजा खोला तो देखा कि अंकल खड़े थे। उन्हें देखा तो लगा जैसे पापा आ गये । अंकल का तबादला यहीं हो गया था और उनका मकान मेरे फ्लैट से केवल एक फर्लाग की दूरी पर था। पापा से पता लेकर वो मुझसे मिलने आये थे।

फिर मिलने का यह सिलसिला चलता रहा। खाना बनाना अंकल का शौक था। मैं खाना बनाने से सदा बचना चाहती थी। कभी फल, कभी दूध ब्रेड खाकर मेरा काम चल जाता था। सप्ताह में एक दो बार अंकल बड़े स्नेह से कुछ बना कर मुझे खिलाते तो मुझे भी संकोचवश पूरा सहयोग करना पड़ता। इस किचेन बिजनेस में कभी मेरा किचेन केन्द्र बनता, कभी अंकल का। अंत में फटाफट बर्तनों की साफ-सफाई की जाती।

उस पूरे समय हम बहुत सारी बातें करते। मेरे हौसले बुलंद थे। वे मुझे मेरे पापा की ही भांति प्रोत्साहित करते। मेरे पास अपने भविष्य को लेकर ढेर सारे सपने थे और उनके पास ढलती उम्र में अपने लंबे अतीत के तमाम अधखुले पृष्ठ, जिनमें प्रेम विवाह के बावजूद परस्पर वैमनस्यता का लंबा इतिहास था। मुझे तो कुछ भी पता नहीं था। छः प्यारे प्यारे बच्चों के पिता, लेक्चरर पत्नी के पति, आर्थिक स्थायित्व, चेहरे पर स्थायी मुस्कान, ढोटी-छोटी किंतु चमकती हुई जीवंत आंखें। उनके जीवन में, व्यक्तित्व में कहीं भी तो असंतोष, पीड़ा, दुःख या व्याकुलता का कोई चिन्ह नहीं था। मुझे तो विश्वास ही नहीं हुआ।

एक बार जब आवरण उठने लगता है तो संभवतः अनावृत होने का संकोच समाप्त हो जाता है। कुछ फंदे खुल जायें तो तनिक सी ऊन खींचते ही आगे के सारे फंदे उधड़ते चले जाते हैं। वैसा ही कुछ हुआ होगा। मैं तो उनके बच्चों जैसी थी, उनके सामने छोटे से बड़ी हुई। हमारे बीच समान स्तर का कोई रिश्ता नहीं था, जहां ठहर कर हम इन सारी बातों को करते। विवाह और वैवाहिक जीवन - मेरे लिए तो एक सोच था, एक कल्पना एक सपना। मैनें उसमें न जाने कितने रंग भरे थे। जहां न झगड़े थे, न टकराव था, था तो सिर्फ प्रेम और समर्पण। ख्यालों की रूमानी दुनिया में जब मन उड़ने लगता था तो जिंदगी एक पथरीली जमीन होगी इसका ख्याल किसे रहता था।

फिर भी मैं अंकल की न केवल श्रोता बनीं वरन् सलाहकार भी बनी। साधारणतः जीवन में जो होता रहता है, वह होता रहता है, उस ओर हमारा ध्यान नहीं जाता। उसकी एकरसता में जहां अवरोध आता है- कोई घटना, दुर्घटना, व्यवधान - कुछ भी, तभी हम कुछ सोचने को या यूं कहिए कि विश्लेषण करने को विवश होते हैं। मैं और अंकल बैठते थे, बातें करते थे, पेट पूजा भी चलती रहती थी । इधर-उधर की बातें कब व्यक्तिगत स्तर पर आ गई और कब उन्होंने गंभीर स्वरूप ले लिया, पता ही नहीं चला। मैं सुनती रहीं सिर्फ सुनती रही। बरसों का बोझ लिए एक इंसान कभी कहीं तो हल्का होना चाहता है।

25-30 वर्षों के कलह पूर्ण गृहस्थ जीवन का बोझा कोई कहाँ उतारे, किस वृक्ष की छाँव में तनिक देर विश्राम कर ले और फिर बोझ उठा कर अगली यात्रा के लिए चल पड़े। बड़ा कठिन है यह। पचास-पचपन की उम्र में कोई किसी से कहे भी तो क्या? किसी के पास समाधान भी क्या है ? पुरूष के लिए कहना भी कठिन होता है, अन्यथा अपने बाल सखा से तो अंकल शेयर कर ही सकते थे। परन्तु ऐसा भी कभी नहीं हुआ। फिर मैं ही क्यों पात्र बनी ?

उनके मित्र की बेटी, आयु में उनसे आधी से भी कम। संभवतः उन शामों का दोष था जिनका गहरा सन्नाटा मुझे और अंकल को एक दूसरे के निकट-ला रहा था। मैं तो अपने पापा के भी बहुत करीब थी। मैनें वैसा ही कुछ उनके साथ महसूस किया था। परन्तु वहां भीतर कुछ बदल रहा था। मुझे पहली बार ज्ञात हुआ था कि उनका दांपत्य जीवन सुखी नहीं है। दो दबंग व्यक्तित्व परस्पर सदैव टकराते रहते थे। स्थानांतरण की वजह से अंकल को प्रायः पत्नी से दूर रहना पड़ता था। बच्चों का पूरा दायित्व, घर की देखभाल, अतिथियों का सत्कार सारा कुछ आंटी पर ही था। मुझे तो उन्हें देख कर सदैव यही प्रतीत हुआ कि वे एक सफल महिला हैं। हो सकता है अंकल को उनके सफल व्यक्तित्व से परेशानी होती हो, या जो भी कारण रहा हो। मुझे तो केवल आंटी की कमियों का विवरण मिलता रहा। अंकल मुझे बड़े बेचारे से लगने लगे थे। हट्टा-कट्टा पहलवान सा दिखने वाला व्यक्ति मुझे परिस्थितियों के सम्मुख बड़ा निरीह और विवश सा लगने लगा था। ''पत्नी के द्वारा पीड़ित बेचारे अंकल' मेरे हृदय की सारी ममता उनके लिए क्रन्दन करने लगती थी। मैनें जाने कितनी नसीहतें, कितने आश्वासन दे डाले थे। और फिर उस एक दिन ..........।

उस दिन पिता समान अंकल की आंखों में नेह के स्थान पर वहशी प्रणयी के प्रणय निवेदन की आतुरता और उसी भावावेश में मेरी ओर बढ़ते हुए उनके ओंठ ... फिर मेरी प्रतिक्रिया। मैं तब भी हतप्रभ थी और आज भी। जब कभी अतीत का यह अंश मेरी यादों में उभरता है तो मैं हतप्रभ हो जाती हूंँ।

आज न पापा हैं, न अंकल, न आंटी । बच्चे भी भारत के अलग-अलग हिस्सों में बिखर गये हैं। मेरे जीवन के इस छोटे से टुकड़े का आज कोई साक्षी नहीं है, फिर भी इसकी काड़वाहट आज भी मेरी स्मृतियों में शेष है। हमें जीने के लिए दूसरों पर विश्वास करना पड़ता है। किस पर विश्वास किया जाये और किस पर नहीं ? बड़ा कठिन प्रश्न है यह। वर्षों बीत गए पर उसके बाद मैं किसी पर विश्वास नहीं कर पाई। मैने अपनी बेटियों को हमारे पुरूष मित्रों के साथ, चाहे वह कितना अंतरंग क्यों न हो, कभी कहीं नहीं जाने दिया। उस नीरव की रात्रि के अंधकार में मेरा विश्वास कहीं खो गया। मेरे लिए सामाजिक रिश्तों के नाम अर्थहीन हो गये। उनमें अर्थ केवल इतना ही रह गया कि एकांत के क्षणों में स्त्री-पुरूष मात्र स्त्री-पुरुष रह जाते हैं। वहां कुछ और शेष नहीं रहता।