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कलश और कंगूरे - कहानी
July 12, 2019 • धनंजय वर्मा

कलश और कंगूरे 

दवाइयों की एक लम्बी फेहरिस्त और ढेर सारी हिदायतें देकर डाक्टर चला गया तो हाथ में पर्ची लिए वह शून्य में  तांकता खड़ा रहा। पत्नी का स्वास्थ्य इधर कई दिनों से टूट रहा है। बड़ी-बड़ी गिल्टियों की एक कतार दोनों कानों के नीचे से शुरू होकर कालर- बोन तक चली गई है जो सूज-सूज कर उसका खाना- पीना भी बन्द कर देती है। इधर उनका असर दोनों भुजाओं के नीचे, काँख में भी उभर रहा है। रह-रह कर उसे चक्कर आते हैं और रात दिन ताप बना रहता है...। वह लौटा। पत्नी ज्यों-की-त्यों लेटी हुई थी। बाँया हाथ दर्द से ऐंठते पेट पर गहरा दबाव डाले था। उल्टा हुआ दाहिना हाथ कोहिनी से मुड़कर दोनों आँखों के आर- पार ढँका था। थोड़ी-थोड़ी देर में सूखी खांसी से पसलियों का उभार हिल हिल उठता था... वह अनिमेष उसे देखता रहा। एक भयावह आशंका से वह भीतर-ही-भीतर सिहर उठा। उस सिहरन को झुठलाता हुआ वह पत्नी के करीब हो आया। उसके दाहिने हाथ को सरकाकर उसने अपनी हथेली उसके माथे पर रखी। ताप महसूस किया। फिर चलकर भीतर लेटने का अनुरोध करता हुआ मुड़ गया...

भीतर पलंग पर माँ यथावत मौन लेटी थीं, आंखें बंद! काँख में अपनी नातिन का सर रखे। एक फिसलती नजर उसने माँ के पूरे शरीर पर डाली।

है तो कितनी छोटी सी बात, मगर सोचो तो कितनी गहरी भी। माँ आखिर डाक्टर के आने पर भी नहीं उठीं। सारी शिकायतें उसे ही समझानी पड़ीं। औरतों की शिकायतें हैं, एक मर्द कहाँ तक साफगोई बरत सकता है? ऐसा तो है नहीं कि माँ उठकर डाक्टर को कोई सलाह-मशविरा दे देतीं या उससे पत्नी की बीमारी में कुछ घट-बढ़ जाता लेकिन बात की बात है.... उनकी बेटी होती तो क्या वे इसी तरह मौन, निर्लिप्त भाव में लेटी रहतीं ?

इसके आगे वह सोचना नहीं चाहता। सोचता है तो दुख होता है। अपने प्रति एक अनाम ग्लानि भीतर तक उतरती चली जाती है। जैसे कहीं कुछ अवांछित हो रहा है। कुछ निषिद्ध। कुछ वर्जनीय। जिसे न चाहने के बावजूद वह रोक नहीं पा रहा है। जैसे कोई लिजलिजी चीज़ उसके भीतर फैल सिकुड़ रही है। जैसे वह कोई अभिशाप अपने भीतर लिये डोल रहा है...

घर के सारे दरवाजे और खिड़कियाँ खुली थीं। तपती हवा का एक झोंका हल्की चीजें उड़ाता, पर्दो को फरफराता कमरे में दाखिल हुआ। इधर इस जगह इस तरह तेज गरम अंधड़ नये थे। पहले ऐसा नहीं होता था। गर्मियों में भी यह शहर किसी पहाड़ी जगह की तरह ठंडा हुआ करता था।

वह सोचे न तो करे भी क्या? सोचना, न सोचना, क्या अपने बस में होता है? और नही सोचकर ही तो उसने इतना अपराध बोध अपने ऊपर लाद लिया है। घुटन की इतनी सारी परतें ओढ़ ली हैं...

कॉलेज की पढ़ाई के पहिले ही साल, आँखें मूंदने के पहले बहू का सुख भोगने की इच्छा जब बार-बार जाहिर की जाती रही और बहन के ब्याह के लिये जब उसका ब्याह टाला नहीं जा सका तो उसने न चाहते हुये भी ब्याह कर लिया वह तो संयोग ही था कि शादी के बाद भी उसकी पढ़ाई में कोई अड़चन नहीं आई। उसने अच्छी- से- अच्छी डिगरी ऊंचे-से-ऊंचे स्थान के साथ हासिल की। नौकरियों में सबसे आराम की नौकरी भी मिल गई। पहिले ही साल उसने अपने छोटे से परिवार के साथ रिश्ते के भाई-बहन को भी समेट लिया और गृहस्थी के सुखद सपनों की शुरूआत कर दी..... लेकिन इसे शुरूआत में ही जैसे उन सबका अन्त भी होना था... और वह आज अपने सारे सपनों की राख समेटता जी रहा है... कुछ भी हो, वह एक सामाजिक प्रतिष्ठा वाला आदमी है। अपनी पद- गरिमा के अनुकूल सभ्यता के कितने सारे व्यवहार नहीं करने पड़ते? प्रोफसर मिश्रा अपनी पत्नी को लेकर कहाँ-कहाँ नहीं जाते? आधुनिक समाज में पुरूष की आधी प्रतिष्ठा, उसकी पत्नी के ''फार्वर्ड” होने पर निर्भर करती है। उसकी क्या साध नहीं है कि अपनी पत्नी के साथ वह भी अपने साथियों में उठे-बैठे, सिनेमा या क्लब जाय! लेकिन माँ के पुरातन संस्कारों का ख्याल करके, उनकी भावनाओं को सम्मान देकर ही, उसने नयी सभ्यता के इन चोंचलों को नही पाला। उसकी पत्नी अपने घर की चार दीवारों में ही कैद, अपनी गृहस्थी में ही खटती, अपनी सवा- एक साल की बच्ची में ही मगन रहती है और माँ की आज्ञा बजा लाने में अपनी सारी कामनाओं को बेजुबाँ ही रहने देती है। और उसने पत्नी से घर पर बैठकर बाते करने की तो दूर, उसे आज तक एक ब्लाउज पीस लाकर भेंट तक नहीं किया है। आज भी उसकी पत्नी अपने मायके के कपड़ों और आभूषणों में संतुष्ट है। कभी कोई फरमाइश नहीं करती और माँ को यहाँ की चीज वहाँ रखने तक नहीं देती। इसके बावजूद जब तानों- तिश्नों का अंत न हो सयानों की मर्यादा का ख्याल न रखने का इल्जाम ही और कभी स्वास्थ्य टूटने के लक्षण को भी बहाना समझा जाय तो वह क्या करे...? बन्दूक की नली कितनी गोलियों का विस्फोट झेलती है? लेकिन उसके भी फट पड़ने की स्थिति को कौन समझ सकता है...? यह सही है कि उसकी पत्नी बहुत पढ़ी-लिखी नहीं है। सीधी सादी 'गिरस्तन' होकर वह इस परिवार में चली आई है। इस पर भी वह अपने भाग्य को सराहता ही है। कहीं उसकी पत्नी भी कोई पढ़ी-लिखी 'आधुनिका' होती तो...? इसके आगे की भाषा में सिर्फ आशंका की ही स्वर-लिपियाँ हैं...और क्या एक बेटी और एक बहू में इतना अन्तर होता है? क्या इसे कभी नहीं मिटाया जा सकता? शायद इसीलिए माँ की नजरों में वह अपनी पत्नी के लिए न कुछ करता हुआ भी उसी के प्रति समर्पित है, उसका 'गुलाम' है और उनकी इकलौती बेटी उपेक्षित! हालांकि उस तकलीफ को वही जानता है कि कैसे उन दो-दो डिलीवरीज के मौकों पर पैसा पानी की तरह बहा है, कैसे बहन की बिदाई पर उसने कितना कर्ज लिया जिसे, आज दो साल बाद तक भी, वह चुका रहा है.....

पत्नी ने मेटरनिटि होम से आने के दस दिन बाद ही घर का सारा काम समेट लिया। दिसम्बर की सर्दियों में भी वह मुँह अंधेरे उठकर घर का सारा काम सहेजती। दिन भर खटती रहती। नतीजा यह हुआ कि उसकी और बच्ची की सेहत भी टूट गई। उस पर भी शिकायत का एक लफ्ज तक उसके मुँह पर नहीं आया। थक कर जब चूर हो जाती तो उसके सिरहाने खड़े होकर फैली- फैली आँखों से उसे देखती और छलछलाते आंसुओं को ठोड़ी के नीचे हथेली दबाकर चारों ऊंगलियों की पोरों से पोंछ कर मुस्कुरा देती...। वह मुस्कान उसके बहुत भीतर तक उतर कर देर तक मथती रहती। उस मंथन को चुपचाप झेलता हुआ वह अपने आप पर झुंझलाता और अपने नपुंसक क्रोध में ऐंठ-ऐंठे जाता। यह तो अच्छा हुआ कि उसके बाद बच्ची को लेकर पत्नी अपने मायके चली गई। उस पर भी खासी खटपट हुई। माँ ने कई दिनों तक मौन व्रत धारण कर लिया... खैर! लेकिन फिर कुछ ही दिनों में अपनी बेटी को बुलवा लिया और बेटी और नातिन में मगन होकर हँसने-बोलने लगी...। ठीक है, माँ की खुशी के आगे कौन सी चीज महत्वपूर्ण है? उसने पत्नी को दवाईयाँ दीं। ताप लिया। सांत्वना का हाथ फेरा तो पत्नी की आँखें छलछला आईं। मौन। कुछ पीड़ा, कुछ घुटन और कुछ ग्लानि की मिली-जुली अनुभूति से उसे लगा कि कलेजा बाहर निकल आयेगा। पत्नी ने उसके पैरों को बाँहों में कस लिया और सिसक-सिसक कर रो उठी। अपने पंजों पर आंसुओं की बूंदों को उसने महसूस किया और झुक कर उसके सिर पर हाथ फेरता हुआ बोला- 'पागल हो गई हो।'... फिर लगभग पैर छुड़ाता हुआ बाहर आ गया। बाहर आकर उसने अपनी आँखों की नमी को पोंछा। धुंध साफ हो गई। बनर्जी महाशय की माताजी अपने तीन-चार नाती-नातिनों से घिरी घर के सामने से गुजर रहीं थीं। यह उनका नित्य का क्रम हैं। दस-ग्यारह बजे तक वह छुट्टी पा लेता है और दिन में कई बार इस दृश्य की पुनरावृत्ति वह देखता रहता है। बनर्जी को शिकायत है कि उसकी माँ उससे ज्यादा अपनी बेटी से प्यार करती हैं और चैबीस घंटों में बीस घंटे वहीं बनी रहती है। उसका अपना चाहे कितना ही बड़ा दुख क्यों न हो, चाहे उसके बच्चे, पत्नी की व्यस्तता के कारण गला फाड़-फाड़ कर ही क्यों न रोते रहें.....। उसने नासा पुटों में से एक लम्बी गहरी साँस भर कर एक झटके से बाहर उछाली और घर से बाहर चला गया। ओठों पर एक अजब- सा कोण बना था।

यहाँ आने से पहले जिस शहर में वह था, वहां माँ ने अपनी बेटी को दूसरी बार बुलवा लिया और लगातार तीन-चार महिने तक रखा। उसके पति की नौकरी छूटने का अंदेशा था और बेटी के दुख की आशंका भी क्या आखिर कोई माँ सहन कर सकती है?उसकी पत्नी को गये हालांकि साल भर से अधिक हो गया था, लेकिन इस बीच माँ को बहू की एक बार भी याद नहीं आई। उसको बुलवाने का प्रस्ताव भी नहीं आया. ....। यहाँ आने के बाद एक बार कुछ दिनों के लिए उसे फिर पुराने शहर जाना पड़ा था। तब बहन भी वहीं थी। कितनी सुखी और खुश थीं माँ ....।। वह ऐसे किसी विचार को ही अपने से दूर ही रखता है। जब भी इस तरह की कोई भावना उसके मन में आती है तो लगता है। वह चोरी- छिपे कोई अपराध कर रहा है। माँ की इतनी पवित्र संज्ञा को वह अपनी कलुषित दृष्टि का कपट घोलकर क्या कलंकित नहीं कर रहा है?.... किसी देवी प्रतिमा को। खंडित करने के मानिन्द। उनका इतना लम्बा वैधव्य, इतने अभावों और दुखों का जीवन, फिर सहारे के नाम पर उनका और है ही कौन ? वो उसे प्यार न करती हों, यह मुमकिन कैसे है? अभी तक कपूत तो बहुत सुने हैं, लेकिन किसी ने कुमाता का नाम भी सुना है? वो सौतेली होती, तब भी कोई बात थी! जरूर उसकी ही दृष्टि में कहीं कोई खोट है....। लेकिन वह चाहकर भी जैसे भरोसा नहीं कर पाता। प्यार का मतलब और क्या होता है? अपने इकलौते बेटे के साथ उसकी पत्नी और बच्ची को भी वह उतना ही चाहतीं। बुढ़ापा आ चुका है। घर- गृहस्थी के जंजाल से मुक्त हो कर पूजा- पाठ में मन लगाती, परलोक सुधारतीं। लेकिन नहीं, आज भी वो चाहती है कि उनकी मर्जी के खिलाफ घर में पत्ता तक न हिले। पति-पत्नी ने जोर से हँस- बोल लिया तो सयानों की मर्यादा भंग होती है। मुहल्ले भर में घूम-घूम कर अपने वय की औरतों की बैठकें होती है और बहू-पुराण में जैसे -जैसे, नये-नये अध्याय जुड़ते हैं, उनको सुन-सुन कर तो अवाक ही रह जाना पड़ता है। फिर भी उसने हर बार खुद को जब्त किया है। सारा गुस्सा और गुबार पत्नी पर ही टूटा है!

और बेटी क्या अकेली उन्हीं की है? कि उसके जाने के बाद वो दुख मनाती हुई आठ-आठ दिनों तक पलंग से लगी रही, न बोलीं, न चालीं। उसने अपने ही हाथ चूल्हे में जलाये। रोज मनुहारें कीं। प्यार क्या यही होता है? कि उसकी दो-तीन महीनों की बेकारी के बाद, तीन-तीन माह से रूकी हुई तनख्वाह के बावजूद बेटी की बिदा के लिए रूपयों की फरमाइश हर हफ्ते की चिट्ठी में होती जबकि वह खुद अपने एक दोस्त के यहां रूका हुआ था।

नीले आकाश में बादलों के भव्य आकारों का वैभव कैसे और कितनी जल्दी मिट जाता है। दूर से आती हुई किसी शहनाई, टिमकी या मांदल की मधुर आवाज ऐन कानो के पास आकर इतनी कर्कश क्यों लगती है? आसमान में तिरते हुए इस खूबसूरत चाँद की धरती क्या वाकई इतनी ही ऊबड़-खाबड़ और धूल-ओ- गर्द से अटी पड़ी है? नहीं..... नहीं..... सत्य यदि इतना ही हुआ है तो भी क्या जरूरी है कि उसे कहा ही जाय....?

वह दूध के डिब्बे की सील को चाबी में फंसाकर घुमाता रहा। जब सील टूटने को आयी तो एक जोर की आवाज हुई और डिब्बे का ढक्कन उछलकर दूर जा गिरा।... अरे, इसे इतनी सी-बच्ची को अपने-पराये के दुराव की समझ कहाँ से आई कि दादी की गोद में डालने की चेष्टा करो तो रोने लगती है? घर पर रहा तो मन और खराब हो जायेगा। यह सोच कर वह निरूद्देश्य बाहर निकल आया। देर तक यों ही भटकता रहा। इस भटकाव से जब तन और मन दोनों ही थककर क्लान्त हो गए तो ऐसे ऐसे लोगों से मिलता रहा जिनसे और दिनों वह दूर से ही कतराता था।

शाम को डॉक्टर के यहाँ से लौट रहा था कि मनोहर से मुलाकात हो गई। दोनों टहलते-टहलते नदी की ओर निकल गये। सैर की भी वह अजब जगह थी- नदी का निर्जन तट। एक तरफ राज परिवार के स्मारकों वाला श्मशान और दूसरी ओर एक बहुत पुराना मन्दिर। एक बोझिल वातावरण जैसे आकाश के इस छोर से उस छोर तक तना रहा। आसपास की घनी अमराई से आती हुई निःशब्द उदासी को झेलते दोनों बैठे रहे। नदी की शान्त सतह पर होने वाली एक सी गति को चुपचाप देखते जाना- तक निर्विकल्प सी शान्ति ... एक छोटी-सी लहर भी नहीं कि अचानक कोई बड़ी मछली छपाक् की आवाज करती हुई एक पल के लिए उछलती - चमकती है और लहरों के कई-कई वृत्त बनते और फैलते हैं फिर विलीन हो जाते हैं...। माँ की तबियत कैसी है,.. मनोहर ने अचानक सवाल किया,.. ''कल घर आई थी...” सवाल और उसके बाद की सूचनादोनों के संकेत साफ है, जिन्हें वह अरसे से जानता है। तबियत तो जैसी है, होती ही है, लेकिन बीमारी की बात के सहारे अपनी उपेक्षा और उसकी उदासीनता का चर्चा तो आम होता है! यह सब क्यों होता है?.... क्या वह कहीं किसी पिछली बात का बदला ले रहा है? बचपन से अब तक होने वाली अनगिनत कड़वी यादें क्या उसे अब भी घेरे है?....... मनोहर ने नदी की सतह पर उछली मछली का स्वर थमते ही फिर कहा- तुम्हारी माँ है, यही क्या कम है?मैं तो इस नाम को ही तरस गया हूं।....... उसने फिर कोई जवाब नहीं दिया। सामने उस मंदिर और उसके पास की उजाड़ ढलवाँ जमीन की ओर देखता रहा। आंखें मंदिर के कलश और कंगूरों पर जम गईं जो सूरज की आखिरी किरनों में चमक रहे थे। मंदिर तो अब भी है, उसके कलश और कंगूरे भी चमक रहे हैं, किसी देवी या देवता की प्रतिमा भी उसमें शायद होगी, लेकिन वहाँ पूजा नहीं होती..... क्यों नहीं होती.... उसने सोचा।

(रचनाः फरवरी-मार्च 1961) मई 1961 में प्रकाशन ''कहानी” (इलाहाबाद)