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कविता
January 7, 2019 • सीमा जैन

कविता

अनन्त में खो जाऊँ

सारा जीवन तुमने की।

सब की सेवा-

पति, बच्चे, घर-परिवार, रिश्तेदार,

निभाती रही दुनियादारी,

मगर अन्त में माँ

तू अपने ही अंश से हारी ।।

 

पति के जाते ही,

सब हो गए लीन बच्चों में, काम धंधे में ।

तू जहाँ थी, वहीं रही,

तेरी सुध किसी को न रही ।

समय कहाँ था किसी के पास तेरे लिए ।

 

हाथों की अकड़ाती उँगलियों, बढ़े नाखून, उलझी लटें,

बहुएँ सोचतीं देख-देख, कैसे हाल बिगाड़े रहती हैं,

लोग क्या कहेंगे ?

कभी नहीं पूछा- साड़ी बदलवा दें या उसे धुलवा दूँ?

पोपले मुँह से, बिन दाँत,

जब तुम कुछ न खा पाती, भूखी रह जाती,

फ्रिज में बंद फल, जूस देख सोचती रह जाती ।

तब तुम, जो कभी कुछ न कहा करती थी किसी से

नम आँखों से, हताश सांसों से, कहे बिन रह न पातीं -

‘‘हे प्रभु- एक ही प्रार्थना है, बस इतनी कृपा करना

अपने ही घर में, चोरी से खाऊँ, इससे पहले बस

तुझमें लीन हो जाऊँ, बस तेरी गोद में सो जाऊँ

अनन्त में खो जाऊँ, अनन्त में खो जाऊँ ।‘

नदी और समंदर

आज के युग में

चाहे बदल रहे हैं समीकरण

रिश्तों के,

मगर फिर भी

नदी की रवानी को

आज भी

मृगतृष्णा है

समंदर में विलय की ।

 

समंदर सा दिखता

पानी

कहीं बरसात में

लबालब भरा

तालाब तो नहीं ?

जो रुत बदलने पर

गर्म हवाओं के

थपेड़ों से

सूखकर

चिटख जाता है ।

 

तालाब कैसे हो पाए

नदी की मंजिल

उसे लेना होगा विस्तार

समंदर सा

अन्यथा

नदी का उफान

बहा ले जाएगा

उसके साहिल।

 

ढलती उम्र

उम्र जब ढलने लगती है,

जिन्दगी छलने लगती है ।

कतरा-कतरा पिघलने लगती है,

साँस फिर थमने लगती है ।

दर्द का खौफनाक मंजर

रूह भी काँप उठती है ।

उखड़ती सांस में हर पल

मौत की दस्तक सुनती है ।

कहाँ वो बचपन की मस्ती

लड़कपन को वो बाँकापन,

जवानी को वो मदहोशी

जिसमें खोया सा था तन-मन ।

कहाँ वो जोश दुनियाँ भर

को कदमों में झुकाने का,

तड़प, कोशिश, जुनूं, ख्वाहिश,

ख्वाब कुछ कर दिखाने का ।।

 

कदम आगे यूँ बढ़ते हैं

कि बस अब रुक नहीं सकते

जब तलक मंजिल न पाएँ।

कभी ये थक नहीं सकते ।

पहुँचें शोहरत की चोटी पर

बुलन्दी के शिखर पर जब,

राहें तब पीछे दिखतीं हैं,

जिन्दगी जग-मग लगती है।

मगर अब आगे क्या देखें

शिखर पर कब तलक ठहरें,

कदम फिर वापिस मुड़ते हैं

रास्ते फिर पलटते हैं ।

अर्श से फर्श तक का ये

सफर कितना दुःखदायी है,

जोश, उत्साह चुक जाते

कैसी दारुण सच्चाई है ?

रोग जब काया को घेरे

और कर डाले जब बेबस,

कैसी लाचारी होती तब

अंग सब जब हो जाएँ अवश

कटु-संताप तब जीवन

यातना-त्रस्त तब जीवन,

हर आती साँस इक बन्धन,

हर जाती साँस इस क्रन्दन ।

पीले पत्तों के गिरने पर

होते वीरान वन-उपवन,

अगर न हो वसंत की आस

निरर्थक हो जाए जीवन ।