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कविता
July 5, 2019 • सुरेश सेठ

तुम्हारी कीचड़ से सने हैं ये पांव

वे फिर हार गये

आसमानी मसीहे जमीन पर उतर

उन पर वायदों की बरसात करते रहे

उनकी जिंदगी के खुशनुमा हो जाने का

बखान करते रहे

इस बखान में उनकी जीत के चर्चे थे

और वे जीत कर भी हार गये

ऊंचे दरीचों की बंद खिड़कियां

उन्हें मुंह चिढ़ाती रहीं

उनके पांव नंगे थे

सनसनीखेज खबरों के कीचड़ से लथपथ

कीचड़ जो वाकयुद्ध से बना था

आरोपों की बरसात से भीगा था

वे उन्हें बताते हैं, तेरी कमीज पहले से उजली हो गयी

लोग परेशान हैं बदन पर कमीज तो है ही नहीं

नंगे बदन पर जुमलों के निशान अवश्य उभर आये हैं

वे बताते हैं, तुम हारे नहीं जीते हो

जीत का एहसास लाशें गिन रहा है

धान की फसल खेतों में खड़ी-खड़ी सूख गयी

गन्ना बीजने वाले, धूसर हो,

जवां फसल बेचते हैं

दाम के नाम पर बकाये की पर्ची देते हैं।

इसका इंतजार उन महलों के बाहर खड़ा है

जहां इनके पुरखों ने राजदण्ड चलाया था

आज महलों के निवासी झाड़ उठा वहां

स्वच्छता अभियान का श्रीगणेश कर रहे हैं

समाज सेवक कहलाते हैं।

गंदगी बढ़ रही है, धूल उड़ रही है

आदमी का दम घुट रहा है

लेकिन रचनाकारों की कलम अधेड़ प्रेम

का आसमान रच

उसे देशप्रेम बता रही हैं

बूढ़ी औरतों के प्रेम में कोर्निश बजा रहे हैं।

मुंह ढंकी जवान लड़कियां

मोमबत्तियां जला

होश संभालती बच्चियों से दुष्कर्म

का मातम मनाती हैं।

देश में शौचगृह बने थे

उन लोगों ने रैन बसेरे के नाम से

किराये पर उठा दिए

उधर मुखर अभिव्यक्ति

खुले में वमन कर रही है

बेपरवाह देश कमेन्ट्री सुन रहा है

विराट कोहली के खेल के बावजूद हार रहा है

इन कलाकारों ने पुरुस्कार लौटाने के बाद

वापस ले लिये।

दुखी लोग मतदान के लिए कतार में बैठे हैं।

जुमले सिर चढ़कर बोल रहे हैं

मादरे-वतन की अर्चना कर रहे हैं

झूठ चमकीली नकाब ओढ़ कर

सच की तरह नाच रहा है

वे जीत कर भी हार जाते हैं

एक भूखे आदमी की यंत्रणा की तरह

चमकीली नकाब भी हार जाती है,

महलों की विरासत की तरह।