कहानी पर मन की बात
September 27, 2019 • नरेन्द्र नागदेव

एक कहानीकार होने के नाते, कहानी लिखना मेरे लिए स्वाभाविक है, लेकिन कहानी पर बात करना उतना सहज नहीं है। यहाँ मैं अपने जो विचार रखूँगा, वे कहानी के एक सामान्य पाठक के रूप में ही अधिक है। हालाँकि लेखन के क्षेत्र में अपने अनुभव का समावेश भी इसमें अवश्य होगा।

हम सब एक वक्त के बहुत मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं, यह तो सर्वमान्य है। यह भी कहा जाता है कि हम एक 'भयावह' समय से गुजर रहे हैं। यह ठीक भी है, क्योंकि हम एक ऐसे दौर के साक्षी हैं, जिसमें मानवीय संवेदनाएँ ही छिन्न-भिन्न होती जा रही है।

विशेष कर गत कुछ दशकों से आए औद्योगीकरण और सायबर क्रांति से लेकर उदारीकरण और बाजारीकरण का ऐसा अंधड़ सा बह निकला है कि इसमें मानवीय मूल्य छिन्न-भिन्न हो गए हैं, तथा हर सफलता का पैमाना महज भौतिक

उपलब्धियों पर आ कर ठहर गया है। हम अपने आसपास हिंसा,

अपराधीकरण, आतंक इत्यादि वे तमाम भयद् स्थितियाँ देखते हैं, जो नहीं होना चाहिए, लेकिन होती चली जा रही हैं।

यह तो स्वाभाविक है कि इस स्थिति में कहानी की आवश्यकता और बढ़ जाती है, क्योंकि कहानी मूलतः मानवता को खत्म होने से बचाने का प्रयास है और एक बेहतर दुनियाँ की तलाश भी। लेकिन क्या इस मुश्किल समय के समक्ष खड़े होने के लिए कहानी का पारम्परिक ढाँचा पर्याप्त है? यह तय है कि कहानी का आधार तो यथार्थ ही रहेगा। एक यथार्थ, जिसे आँखों से देखा जा सके, और घटनाएँ जिन्हें प्रमाणित किया जा सके। लेकिन वे उनका महज भौतिक विवरण नहीं हो सकती। उसके लिए टेलिविजन जैसा सशक्त माध्यम भी है, और अखबारों की खबरें भी। कहानी वहाँ से आरम्भ होती है, जहाँ इनकी सीमाएँ खतम हो जाती है।

कहानी पात्रों की जटिल मनःस्थितियों को खंगालती चलती है। वह महज इतना नहीं देखती कि किसी पात्र ने क्या काम किया है ? वरन् वह साथ साथ विश्लेषण भी करती चलती है कि वैसा करने के लिए उसे किन परिस्थितियों ने, और किन मानसिक स्थितियों ने प्रेरित किया ?

वे कौन से सामाजिक यथार्थ थे, जो इसका कारण बने? कौन-सी सामयिक पृष्ठभूमियाँ अथवा बाध्यताएँ थी, जिनके चलते उसने वैसा किया ? कहानी का ध्येय उसकी भौतिक क्रिया नहीं, बल्कि उसकी भावनाएँ होती है, उसका मन होता है, जिसके

अंधेरे कोनों में वह भटकती है। वह भटकाव उसके सृजन का कारक बनता है।

कहानीकार घटनाओं को दूर से देखकर उन्हें लिख देने वाला तटस्थ दर्शक नहीं हो सकता। वरन् उस घटना की तमाम संवेदना, विडम्बना और दर्द उसकी अपनी संवेदना की छलनी से छन कर ही कागज पर उतरती है, और तभी वह उस स्थिति में पहुँचती है कि पाठक भी अपने  आप को उनके साथ एकात्म अनुभव करता है। वही संवेदनाएँ अनुभव करता है जो लेखका का ध्येय होती है।

इसके लिए प्रस्तुतिकरण में उसे यथार्थ से आगे भी बढ़ना पड़ता है। अतियथार्थ की सीमाओं में प्रवेश भी करना पड़ सकता है। इन्हीं परिस्थितियों में मार्खेज के जादुई यथार्थ का जन्म होता है, जिससे यहाँ का साहित्य भी अछूता नहीं रह पाता। लेखक प्रतीकों का सहारा ले सकता है। उसके कथ्य में वास्तविकता सपने में, और सपने वास्तविकता की दुनियाँ में आवाजाही कर सकते हैं। चलता फिरता मनुष्य मूत्र्ति बन सकता है, और मूत्र्तियाँ चलने फिरने लग सकती है। फ्रैंज काफ्का ने बहुत पहले ही अपने पात्र की निरीहता प्रदर्शित करने के लिए उसे काक्रोच में तब्दील कर दिया था अपनी प्रसिद्ध कहानी 'मेटामोरफोसिस' में।

कहानी अपने प्रस्तुतिकरण में पृष्ठभूमि की प्रामाणिकता के लिए उस अंचल विशेष की बोली, रहन-सहन, मान्यताएँ, संस्कार इत्यादि को सूक्ष्मता के साथ पकड़कर अत्यंत विश्वसनीय वातावरण की सृष्टि करती है, जिसे आंचलिक कहानी अथवा उपन्यास की मान्यता मिली है।

कहानी यथार्थ का आधार ले कर भी, जहाँ पूरी तरह से मात्र देखा हुआ भौतिक यथार्थ नहीं हो सकती, तो वहीं दूसरी ओर वह मात्र एक बिम्ब भी नहीं हो सकती। मात्र बिम्ब होने की सुविधा कविता को उपलब्ध है, लेकिन कहानी को नहीं। क्योंकि कहानी के लिए कथानक की उपस्थिति अनिवार्य है। वह अमूर्त नहीं हो सकती।

कहानी यथार्थवादी भी हो सकती है और कलावादी भी। गत काफी अर्से से यह बहस का विषय रहा है और दुर्भाग्य से यथार्थवादी और कलावादी कहानियों को दो बिलकुल भिन्न कम्पार्टमेंट्स में रख कर परखा जा रहा है। जब कि वे एक दूसरे की प्रतिपक्षी नहीं, बल्कि पूरक हंै। एक जटिल यथार्थ को प्रस्तुत करने के लिए उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति तो आवश्यक है ही। जैसे चित्रकार अपने चित्र के लिए जो विषय चुनता है, वह यथार्थ है। लेकिन उसे केनवास पर प्रस्तुत करने की कला व उपयुक्त आकृतियों तथा रंग संयोजन की दक्षता ही तो उसे सार्थक कृति बनाएगी। बिना कलात्मक अभिव्यक्ति के लिखी गई कहानियाँ न तो विषय का सार्थक निर्वाह कर पाती हैं, न पाठक के मन पर अपनी स्थायी उपस्थिति ही दर्ज कर पाती है। फिर कहानी को इन सीमाओं में बाँधा ही क्यों जाए, मेरे विचार में तो महायुद्ध पर लिखा गया टाल्सटाय का उपन्यास 'वार एण्ड पीस' उतना ही महत्वपूर्ण है, जितनी अकेलेपन और उदासी की सृष्टि करती फ्रैंज काफ्का की रचनाएँ। बाहरी दुनियाँ में घटी घटना उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितना मन के भीतर कहीं कुछ टूट जाना।

विचारधारा को आधार बना कर साहित्य रचना कोई नई बात नहीं है। ऐसा साहित्य विपुल मात्रा में लिखा जाता है। मेरा विचार है कि ऐसे साहित्य की दशा, दिशा और अंत सब पहले से ही तय होने के कारण वे प्रयोजित से लगते हैं। पहले से ही एक बंँधे-बँधाए साँचे में ढली होने की बाध्यता के चलते सैंकड़ों इकहरी, एक जैसे कथानकों वाली ठंडी, प्रभावहीन कहानियों की बाढ़ आ जाती है। मै ंसमझता हूँ कि कहानीकार को किसी

पूर्वनिर्धारित सीमा में स्वयं को बाँध कर रचना नहीं करनी चाहिए। सृजन का आकाश सीमा हीन होना चाहिए। उसमें रचनात्मक स्वतंत्रता होना चाहिए। संशय की अंधेरी सुरंगों में भटकने की इच्छा होना चाहिए। व्यवस्था के बरक्स खड़े हो कर प्रश्न करने की आकुलता होना चाहिए। नई राहों का अन्वेषण वहीं सम्भव है। वहीं पर सम्भव होती है सृजनात्मकता की उर्वरक जमीन। और फिर एक बात तो तय है कि सही साहित्य मानवीय मूल्यों के पक्ष में खड़ा होता है। यह एक स्वाभाविक विचारधारा तो उसकी हमेशा होती ही है।

कहानी का एक पक्ष बाहरी होता है, और एक मन का भीतरी। लेकिन रचना में ये दोनों अलग-अलग दो धाराओं की तरह नहीं चलते। वरन् एक-दूसरे के पूरक बन कर, एक दूसरे में गुँथे हुए ही ये कहानी को उसके निर्दिष्ट मुकाम तक पहुँचाते हैं।

मैं तो उसी पुरानी परिभाषा को मानता हूँ कि साहित्य समाज का दर्पण है। जो साहित्य जिस समय लिखा जाता है, वह उसी समय को प्रतिबिम्बित करता है। सौ वर्ष पहले लिखा साहित्य आज का नहीं हो सकता। आज के साहित्य में आज की त्रासदियाँ उभर कर आएँगी। एक समय था, जब पूरा मोहल्ला अपना घर लगता था। अब परिवार भी एक नहीं रह पाता। भौतिकतावाद के अंधड़ में अब बेटे अलग और माँ-बाप अलग रह जाते हैं। दाम्पत्य जीवन के अर्थ बदल गए हैं। जुड़ते-टूटते परिवारिक सम्बन्धों पर प्रचुर मात्रा में साहित्य आया है।

बदले हुए वक्त के साथ अनेक पुरानी कुरीतियाँ टूटी हैं। सदियों से दबी-कुचली, अपमानित और अस्पृष्यता की शिकार दलित जातियों में अन्याय और शोषण के खिलाफ खड़े होने की नव चेतना जाग्रत हुई है। यह चेतना दलित साहित्य के रूप में कहानी-उपन्यासों में प्रतिबिम्बित हुई है। उसमें अपने भोगे हुए यथार्थ को इतनी निर्मम सचाई के साथ उद्घाटित किया गया है, कि उसके लिए आलोचना के मौजूदा प्रतिमान अपर्याप्त लगने लगे हैं। स्त्री की एक सर्वथा नई शख्सियत उभर कर आई है। अब वह पुरुषों की दया पर आश्रित दीन-हीन महिला न होकर अपने स्वतंत्र, सशक्त और स्वावलम्बी व्यक्तित्व के साथ प्रकट हुई है। उसके इस नए अवतार के साथ ही पारिवारिक जीवन में बदले और जुड़ते-टूटते सम्बन्धों को रेखांकित करती कहानियों का दौर आ गया है।

और अब अगर सिर्फ लेखक की बात करें, तो लिखना उसके लिए कोई एक उल्लास मय प्रक्रिया नहीं है। बल्कि एक यातना है। क्योंकि लिखते समय वह उस पीड़ा से स्वयं रुबरू होता है, जिसे वह कहानी के माध्यम से प्रस्तुत कर रहा होता है। एक लेखक ही यह समझ सकता है कि मनचाहा लिख लेने की क्रिया में वह किस त्रासदी से गुजरता है, और लिख लेने के बाद उसे किस मुक्ति का एहसास होता है। उसके भीतर कहीं लगातार अपने आप को पा लेने की बेचैनी होती है। मुश्किल यह है कि इस बेचैनी का मुकम्मिल अंत उसे मिलता ही नहीं। जो अधूरा रह जाता है, वह हर बार दूसरी और फिर तीसरी रचना तक स्थगित होता चला जाता है।

अपने लेखन में स्वयं लेखक का आत्म, कहानी के एक या एकाधिक पात्रों के माध्यम से प्रकट होता है। कहानी में कई बार वह स्वयं को ही प्रकट करता है। वह स्वयं अपने भीतर के गुस्से और पाप, कुंठा और उल्लास, सब कुछ कहानी के माध्यम से प्रकट कर के उस घुटन से मुक्ति पा लेना चाहता है। कहानी कई बार उसके लिए सिर्फ संघर्ष ही नहीं, बल्कि 'कन्फेशन' भी होती है। माध्यम होती है स्वयं अपने से मुक्त होने का।

हर सामान्य व्यक्ति की तरह ही लेखक का संघर्ष भी इस दुनियाँ में एक साथ दो धरातलों पर जारी रहता है। एक संघर्ष होता है उसका स्वयं अपने और अपने बीच, जब कि दूसरा होता है उसके तथा बाहरी दुनियाँ के बीच। इन दोनों संघर्षों में जो चिंगारियाँ फूटती हैं, वे उसकी कहानियों का 'फ्लेश पाइंट' होती हंै। बाहरी दुनियाँ से उसका जो संघर्ष चलता है, भले ही वह अपने अस्तित्व का संघर्ष हो, अथवा व्यावसायिक संघर्ष ही क्यों न हो, उसके अक्स लगातार उसके मन पर किसी न किसी रूप में अंकित होते ही हैं। इसलिए जो कहानी जन्म लेती है, वह बाहरी और भीतरी, दोनों ही स्थितियों को समेट कर एक

सम्पूर्ण कहानी बनती है।

ये तो स्थितियाँ है, जब घटनाओं में उसकी सीधी भागीदारी होती है। सम्भवतः ऐसी स्थितियों से उत्पन्न कहानी उसके

सीधे अनुभव किए गए यथार्थ से उत्पन्न होती है। इसलिए प्रामाणिक भी होती है। तथापि इसके आगे एक बहुत बड़ी दुनियाँ है, जहाँ भले ही उसका सीधा हस्तक्षेप नहीं भी हो, लेकिन संवेदना के स्तर पर वह उसके विराट दुःख-दर्द से जुड़ा तो होता ही है। भले ही वह युद्ध हो, विभाजन हो, अन्याय हो, दंगे हों, अत्याचार हो, जो कुछ भी हो। ये पूरी दुनियाँ कभी न कभी उसकी विषयवस्तु बन जाती है। क्योंकि अंततः लेखन की परिधि में वह सब आता है जो मानवीय मूल्यों की परिधि में हो।

उसके लेखन की परिधि में यथार्थ भी आता है, और सपने भी आते हैं। क्योंकि ज़िन्दा रहने के लिए बेहद जरूरी होता है सपनों का होना। और बहुत बड़ी त्रासदी होती है सपनों का मर जाना। उसकी रचना यथार्थ और कल्पना के बीच झूलती हुई चलती है। झूलती चलती है वर्तमान और अतीत के बीच। क्योंकि हम स्मृतियों के बिना जी नहीं सकते। स्मृतियाँ अभिन्न अंग होती हैं हमारे वत्र्तमान का। वे रची-बसी होती हैं हमारी साँसों में।

लेकिन अंत में मैं एक छोटी-सी बात यह अवश्य कहना चाहूँगा कि आज के इस वक्त को देखते हुए ऐसा लगता है कि अभी हमारे साहित्य में विषय वस्तु के विस्तार की बहुत गुंजाइश है। हम अभी भी कुछ परम्परागत विषय वस्तुओं के इर्द-गिर्द ही घूम रहे हैं, तथा उन्हीं को केन्द्रिय महत्व भी दे रहे हैं। विज्ञान-टेक्नोलाॅजी से लेकर कला-संगीत जैसे तमाम विषय हैं, जिन पर या तो साहित्य आ नहीं रहा, या आ रहा है, तो उसे उतना सम्माननीय स्थान नहीं दिया जा रहा है। साहित्य के चैतरफा विकास के लिए यह स्थिति बदलनी चाहिए। बच्चों के लिए भी साहित्य की रचना नहीं के बराबर हो रही है। उसका प्रकाशन-प्रसारण भी खास किसी प्राथमिकता में नहीं है। उसी तरह अनूदित साहित्य की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। हम अपनी भारतीय भाषाओं रचे गए महत्वपूर्ण साहित्य से भी सामान्यतः परिचित नहीं हो पाते। विदेशी साहित्य भी, कुछेक पुरस्कृत पुस्तकों को छोड दें, तो कम ही भारतीय भाषाओं में आ पाता है। हमारा साहित्य तो उधर अनूदित हो कर और भी कम जाता है। समस्याएँ तो और भी हैं। बेहिसाब हैं। लेकिन वक्त अंततः हरेक समस्या का समाधान कर देता है। फिलहाल यह क्या कम है कि हम अपने वक्त में एक जीवन्त साहित्य की गहमागहमी के प्रत्यक्ष गवाह हैं।