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कहानी
April 22, 2019 • सीताराम पाण्डेय

आज का दुष्यन्त

''रथ को क्षिप्र गति से चलाओ सारथि! ......हिरण आगे निकल कर अदृश्य होता जा रहा है।'' राजा ने सारथि से कहा-

''अधिक ऊँच-नीच मार्ग होने के कारण रथ संचालन की तीव्रता में

व्यवधान हो रहा था। परन्तु, अब समतल पथ पर रथ तेज गति से गमन करेगा। एतदर्थ मैंने घोड़े के दोनों रास ढीले कर दिये है। अब मृग को पकडना असंभव नहीं है। यह कहकर सारथि, राजा का शिकार मृग को बाण से बेघने लायक दूरी के करीब वायुवेग से रथ को पहुँचा दिया।

राजा के वाण के भय से भागकर हिरण, ऋषि-मुनियों के आवासीय वन में, कण्व-ऋषि के आश्रम के आस-पास पहुँच चुका था। उस कमनीय कानन के एक छोर पर राजा रथ को रोक कर, मृग को मारने हेतु ज्योंहि वाण का संधान साधना चाहा, पीछे से ऊँचे स्वर में संवाद सुनाई पड़ा......... मत मारिए इसे .......यह आश्रम का हिरण है। राजा ने मुड़कर देखा........ कोई ऋष्याकृति व्यक्ति आ रहा है।

ऋषि वैखानस ने राजा के समीप आकर कहा-यह वन-मृग नहीं, महर्षि कण्व के आश्रम में पालित-पोषित हिरण है। अतः इसे मत मारिये!'' धनुष पर चढ़ाये अपने वाण को शीघ्र उतार लिजिये!

''क्योंकि वीरों की वीरता और उनके अस्त्र-शस्त्र, पीडितों, दुर्बलों और असहायों की रक्षा करने के लिए होते हैं। निरपराध, निर्बल, प्राणियों पर प्रहार करने के लिए नहीं।'' ।

यह सुनकर राजा अपने वाण को वापस कर लिया और उसने महर्षि कण्व के दर्शन करने की इच्छा जतायी।

वैखानस ने कहा.......... कण्व ऋषि तो अपनी पुत्री शकुन्तला के प्रतिकूल भाग्य को शान्त करने के निमित्त अभी सोमतीर्थ गये हुए हैं। परन्तु, आश्रम में आये अतिथियों के आदर-सत्कार करने का आदेश अपनी पुत्री को देकर गये हैं। अगर, आपको अन्य कोई अत्यावश्यक कार्य नहीं हो, तो उस आश्रम का समुचित-आतिथ्य स्वीकार कर, गन्तव्य स्थान की ओर जा सकते हैं।

राजा ने कहा-आपने ठीक ही कहा है ....... जब, यहाँ तक आ ही गये हैं, तो आध्यात्मिक अनुष्ठानों से अभिभूत उस आश्रम का आशीर्वाद प्राप्त करने के पश्चात् ही वापस जाना उचित होगा। किन्तु, मैं उनके आश्रम से अनभिज्ञ हूँ। अगर, आप मेरे साथ चल सके, तो कृपा होगी।

ऋषि वैखानस ......हे राजन! हमलोग यज्ञार्थ समिधा लाने जा रहे हैं। वह सामने ही मालिनी नदी के किनारे कण्व ऋषि का आश्रम दिखाई पड़ रहा है। आपको वहाँ तक जाने में कोई कठिनाई नहीं होगी।

राजा रथ को वही छोड, उसकी सुरक्षा का प्रभार सारथि पर सौंप कर, वहाँ से अकेले आश्रम की ओर प्रकृति-सौन्दर्यावलोकन करते हुए चल पड़े।

इस विशिष्ट वन-प्रान्त में पक्षियों के सुमधुर स्वर सुनकर मेरे श्रोत संतुष्ट हो रहे हैं। क्यारियों में केवला-कुसुम की कमनीय कोमल एवं कमसीन कलियाँ, शीतल-मंद-सुगन्ध समीर के आलिंग्न से आनन्दाभिभूत हो, हसनोन्मुख दिखाई पड़ रही है। इस वन की विविध वृक्षावलियाँ विशेष रूप से विभूषित हो रही हैं। इस रमणीय स्थल के प्राकृतिक सौन्दर्यावलोकन से लगता है कि प्रकृति ने इस वनप्रान्त पर पूर्णाधिकार प्राप्त कर लिया हो।

स्वगत संवाद करते राजा शनैः शनैः वन प्रान्त में बढ़ते गये और महर्षि कण्व-कुटीर के करीब पहुँच गये।

राजा दुष्यन्त की दृष्टि अकस्मात् अनुपम सौन्दर्य शालिनी शकुन्तला पर पड़ गयी, जो साखियों के साथ सुशोभित कमल सदृश अपने कोमल करों से पुष्प-वृक्षों का अभिसिंचन कर रही थी। उस अलौकिक पग पत्री को देख, दुष्यन्त का हृदय कामोद्दीपन भाव से भर गया और उसके अद्वितीय सौन्दर्य-शालिनता पर समर्पित हो स्वगत कहने लगे

''इसके अनुपम अलौकिक ऐश्वर्य को देख, ऐसा प्रतीत होता है कि ''संसार के सम्पूर्ण सुन्दरतम सामग्री को सहेज कर, सृष्टिकर्ता ने इस अपूर्व सुन्दरी का सृजन किया हो।''

यह चिन्तनोपरान्त धीरे-धीरे उन वन कन्याओं के निकट पहुँच कर उनका परिचय पूछा-'सहेलियों में श्रेष्ठ अनसूया ने कहा ...... ये षोडश वर्षीया सुन्दरी कण्व-पुत्री शकुन्तला है और हम दोनों तपस्वी पुत्रियाँ...। किन्तु, आप कौन हैं? और इस आध्यात्मिक आवासीय वन में विहार करने का क्या उद्देश्य है?''

मैं क्षत्रीय कुलोत्पन्न दिल्ली का राजा दुष्यन्त हूँ। धर्मानुकुल वन जंतुओं के शिकार के क्रम में इस आश्रम के मृग को अपना शिकार समझ, उसका पीछा करते यहाँ तक आ गया हूँ।

राजा की विनम्रता को देखते हुए अनसूया ने उपवेशनार्थ बने चैकोर चबूतरे पर आसीन होने के लिए आग्रह किया तथा सहेलियों के साथ स्वयं भी बैठ गयी।

''मैं महर्षि कण्व के पुण्याश्रम को प्रणाम कर, अपने गन्तव्य स्थान की ओर वापस जाना चाहता हूँ।'' राजा ने औपचारिकता का निर्वाह करने हेतु उन कानन कामनियों से कहा ....

''आप अतिथि हैं और अतिथियों का समुचित सत्कार किए बिना लौटाना धर्म के प्रतिकूल है'' क्योंकि सांस्कृतिक और पारंपरिक प्रावधान में अतिथियों का स्थान देवताओं के सदृश समझा जाता है। उसे उचित आतिथ्य किए बिना वापस कर देने पर वह पूर्वार्जित समस्तपुण्यों को परोक्ष रूप से प्राप्त कर चला जाता है। यह शास्त्रीय सत्य है।'' अतः आप आदर-आतिथ्य हेतु आश्रम में चलें। ऋषि कन्याओं के द्वारा आग्रहोपरान्त राजा आश्रम में प्रवेश कर सुन्दरी शकुन्तला को देख स्वगत सोचने लगे .......।

मेरे जैसे बदकिस्मत व्यक्ति के लिए इस बहुमूल्य रत्न की उपलब्धि अनुकूल नहीं लगती। इसलिए कि महर्षि कण्व तनया शकुन्तला ब्राह्मणोत्पन्ना है और मैं क्षात्र धर्मानुपालक दूरस्थ दुष्यन्त। मनु के अनुसार ब्राह्मण कन्याओं के साथ क्षत्रियों का विवाह अविहित माना जाता है। अतः शकुन्तला के साथ मेरा पारस्परिक-परिणय हेतु प्रेमोन्मीलन का कोई शाश्वत औचित्य नहीं दिखाई पड़ता।

''क्योंकि मानवीय जीवनोत्कर्ष हेतु षोडश संस्कारों में विवाह प्रमुख संस्कार माना जाता है। इसमें सामाजिक,

सांस्कृतिक संदर्भो का संवाद समाहित है। अतः वैवाहिक-संस्कार की शाश्वतत्ता के लिए वर्षों (ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य, शुद्र) की

वैधानिकता, सांस्कृतिक समानता, वैचारिक समता और वंशानुगत विवशता का होना अत्यावश्यक है।

''यद्यपि आज के आयाम में अन्र्तवर्णीय अविहित वैवाहिक प्रचलन प्रभूत संख्या में परिदृश्य है। जिसके कारण आये दिन देश में अधिकांश दाम्पत्य इस द्वन्द्व के दावानल में दहकते दिखाई पड़ते हैं। क्योंकि ऐसे पाश्चात्य संस्कृति सम्मत आधुनिक विवाहों में स्थायित्व एवं चिरन्तनता नहीं होते।''

राजा ने शकुन्तला की ओर संकेत कर पूछा ..........मुझे वैखानस ऋषि से ज्ञात हुआ था कि महर्षि कण्व, बाल ब्रह्मचर्य हैं। तो फिर ये पुत्री कैसी?.... इस पर प्रियंवदा ने कहा

''कण्व ऋषि की शकुन्तला उनकी जन्म जाया नहीं। वह तो उनकी पालिता पुत्री है।''

दुष्यन्त को निराशा रूपी अंधकार में आशा की एक किरण विकीर्ण होती दिखाई पड़ी और वे पुनः पूछ बैठे-यह कैसे......?

इस पर वह कहने लगी-गौतमी नदी के किनारे एक बहुत बड़ा वन है। जिसमें राजर्षि विश्वामित्र घोर तपस्या में तल्लीन थे। देवराज इन्द्र अपने इन्द्रासन की अपदस्थता के भय से भयभीत होकर उनकी तपस्या को भंग करने हेतु स्वर्ग से भूतल पर अलौकिक सुन्दरी मेनका नामक अप्सरा को भेजा।

क्योंकि स्त्रियाँ, पुरुषों की कमजोरी होती है। आध्यात्मिक मार्ग में नारी-सौन्दर्य पुरुषों के लिए प्रतिरोधक होता है।'' उसके हृदय में उच्चतम विचारों के साथ-साथ निकृष्टतम् भावनाएँ भी अधिकतम रूप से अन्तर्निहित रहती है। जो समयानुसार पुरुषों को प्रतिष्ठा भी प्रदान करती है और कभी-कभी उसे पतितोन्मुख बनाने में भी पीछे नहीं रहती।''

अतएव अनुपम सौन्दर्य शालिनी मेनका, अपनी सुन्दरता का जलवा बिखेड़ कर, राजर्षि विश्वामित्र तपस्या को भंग करने में सफल हो गयी और उसके साथ स्वार्थपरक सम्बन्धात्मक संधि के आधार प्रेमालिंगन करने लगी। जिसके प्रतिफल एक पुत्री पैदा हो गयी। जिसे मेनका लोक-लाज के भय से कटकाकीर्ण कानन के किसी कोने में फेंक कर पुनः इन्द्र के पास वापस चली गयी। विश्वामित्र भी अपने गन्तव्य स्थान की ओर चले गये।

कण्व ऋषि नदी से स्नान कर लौट रहे थे। उस नवजात विलखते बच्ची को देख, कारुणिक भाव से अंकारूढ़ कर उसे अपने आश्रम में ले आये। कण्व ऋषि द्वारा पालित यह शकुन्तला उनकी पुत्री के रूप में प्रख्यात है। राजा ने पुनः प्रश्न किया ........।

महर्षि कण्व आपकी सहेली शकुन्तला को आजीवन अविवाहित ही रखना चाहते हैं या तपोवन में संवद्धित किसी आध्यात्मिक व्यक्ति के साथ परिणय-सूत्र में बाँधना चाहते हैं .........?

अनसूया ने कहा........ नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। चूंकि कूशक वंशीय कौशिक (विश्वामित्र) क्षत्रीय वंशोद्भव थे। एतदर्थ किसी क्षत्रीय वंश के धीर-वीर धर्मानुपालक विशिष्ट व्यक्ति के साथ ही इसका वैवाहिक संस्कार सम्पन्न होना चाहिए, ऐसा कण्व ऋषि का चिन्तन है।

राजा भी अब इस शंका से पूर्णतः संतुष्ट हो गये कि शंकुन्तला के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने में उन्हें अब कोई धार्मिक व्यवधान नहीं होगा। अतः शनैः शनैः शकुन्तला की सन्निकटता प्राप्त करने का प्रयास करने लगे।

इधर शकुन्तला भी हस्तिनापुर सम्राट दुष्यन्त को क्षत्रीय वंशज जान कर, उनकी ओर मुखातिब होने लगी।

अब इस पुण्याश्रम में दो जवान अतृप्त आत्माओं के बीच प्रेमोन्मीलन प्रारंभ हो गया। आध्यात्मिक वेद ध्वनि की जगह, सांसारिक प्रेम की शहनाई के स्वर मुखरित होने लगे। दोनों प्रेमियों के प्रेम इतने परवान चढ़ गये कि पिता कण्व की अनुपस्थिति में ही वनवासियों के द्वारा शास्त्रानुकूल गांधर्वरीति से इन दोनों का वैवाहिक संस्कार सम्पन्न करा दिया गया। सरस दाम्पत्य के दहलीज पर बैठे हुए अब अचानक दुष्यन्त की दुनिया दूसरी हो गयी।

एक दिन राजा शिकार के विचार से जंगल की ओर चले गये। प्रियंवदा और अनसूया भी अनुपस्थित हो गयी। इसी बीच महाक्रोधी ऋषि दुर्वासा (केवल दुर्वा ही जिनका भोजन है) अचानक वहाँ आ गये और कुछ देर तक चुपचाप खड़े रहे। लेकिन, शकुन्तला अपने पति के ध्यान में मग्न रहने के कारण उन्हें नहीं देख सकी। तब दुर्वासा क्रोध में आकर उसे शाप दे दिये-'तुम जिसके ध्यान में मग्न होकर मेरा अपमान किया है, वह तुम्हें भूल जायेगा।''

इसी बीच अनसूया और प्रियवंदा वहाँ पहुँच गयी और विनम्र तथा शान्त भाव से ऋषि को समझाने लगी-''महाराज! आप तपस्वियों को, देवताओं के द्वारा प्रदत्त आध्यात्मिक शक्ति, सृजन, सुरक्षा और शुभ के लिए होती है। विनाश, विघ्न और अनिष्ट के लिए नहीं।'' अतः आपको निर्दोष शकुन्तला को शाप नहीं देना चाहिए।

दुर्वासा (शकुन्तला की ओर संकेत कर) इसने मेरा अपमान किया है। बहुत देर तक इसके समक्ष मैं खड़ा रहा। लेकिन यह अहंकारी लड़की ने मुझे बैठने तक के लिए नहीं कहा-

ऋषिवर! आप महान तपस्वी के साथ-साथ शीर्ष शास्त्रज्ञ भी है। अतः आप जानते ही है कि

भारतीय नारियों के लिए पति ही उसका सर्वस्व होता है। जीवन के सामाजिक, सांस्कृतिक आदि सभी क्षेत्रों में पति के बिना पत्नी का जीवन अधूरा माना जाता है। शास्त्रों में भी पत्नी के लिए पति को परमेश्वर बताया गया है। अतः भारतीय स्त्रियों को पातिव्रत्य धर्म पालन हेतु पूजा, अर्चना, ध्यान और सम्मान के द्वारा पति को प्रसन्न करना स्त्रियोचित धर्म को शास्त्रीय

धर्म माना गया है।

शकुन्तला भी लौकिक लोक में आँखें बन्द कर अन्तर्दृष्टि से अपने आराध्य का अवलोकन कर रही थी। यदि उसके ध्यान में एकाग्रता ही थी, तो इसमें उसकी क्या गलती हो सकती है?'' क्योंकि नारियों के लिए पातिव्रत्य धर्म से बढ़कर दूसरा कोई

धर्म नहीं होता।''

प्रियवंदा और शकुन्तला भी शाप से मुक्त करने की प्रार्थना करने लगी। दुर्वासा का क्रोध जब शान्त हुआ तब उन्होंने कहा .........''ब्रह्मर्षियों के मुँह से निकली हुई वाणी कभी वृथा नहीं होती। ....... लेकिन इसमें संशोधन संभव है। दुष्यन्त अपने शरीर में धारित कोई वस्तु पत्नी के पास देखेगा, तो शाप का प्रभाव नहीं पड़ेगा। यह कहकर दुर्वासा यथा स्थान प्रस्थान कर गये।

अनसूया और प्रियवंदा के सहयोग से शाप को निष्प्रभावी बनाने हेतु दुष्यन्त, शकुन्तला की ऊँगली में अपनी नामांकित अंगूठी पहना दी और उसे वहाँ शीघ्र बुला लेने का भरोसा दिलाकर हस्तिनापुर चले गये।

इधर महर्षि कण्व भी तीर्थाटन कर आश्रम में वापस आ गये। उन तमाम विगत बातों को जानकर उन्हें दुखद आश्चर्य अवश्य हुआ। परन्तु, अपनी पुत्री की इच्छा और विवशता को देखते हुए इस प्रेम परिणय को मान्यता देने में आना-कानी नहीं की। क्योंकि पिता अपनी संतान को सुखी-सम्पन्न रखने के लिए संसार की सर्वोत्तम वस्तु का परित्याग कर सकता है।

विवाहोपरान्त पत्नियों को अपने पति के साथ ही रहना उचित है। क्योंकि पति ही उसके यौवन भार को वहन करने में समर्थ हो सकता है, पिता नहीं।'' शकुन्तला के पेट में दुष्यन्त का प्यार पलने के अभिज्ञान के पश्चात, कण्व ने उसके पति के पास प्रेषण हेतु गौतमी और एक शिष्य को आदेशित कर दिया।

आज शकुन्तला अपनी ससुराल जा रही है। वनवासियों से लेकर वन जन्तुओं तक के हृदय, उसकी विदाई के समय विरह वेदना से व्यथित हो रहा है। प्रियंवदा, अनसूया आदि सहेलियाँ शकुन्तला को अपने से अलग होते देख, सिसक-सिसक कर रो रही है। बेटी की विदाई के विरह से व्यथित पिता कण्व। लिखते हुए कहने लगे-

“मैंने शकुन्तला को जन्म नहीं दिया। केवल पालन-पोषण ही किया है। फिर भी उसके विवाहोपरान्त विदाई का वियोग बर्दाश्त नहीं हो पा रहा है। लेकिन, जिस गृहस्थ के घर में बेटियाँ जन्म भी लेती है और जवान भी होती हैं वहाँ उनके माता-पिता के हृदय पर उसकी विदाई के वक्त क्या बीतता होगा........? आहत हृदय से कण्व, पुत्री को आशीर्वाद देकर विदा कर दिये।

भारतीय लड़कियाँ जन्म से लेकर जवानी तक अपने माता-पिता के घर को ही अपना स्थाई घर समझती है। परन्तु, प्रकृति का कैसा प्रावधान है कि एक दिन वे ही बेटियाँ अपने पैतृक घर को छोडकर वैवाहिक-विश्वास के बंधन में बंधकर, बिना जाने पहचाने ठौर-ठिकाना जाने किसी अन्जाने अजनवी के साथ उसके परिसदन में प्रवास हेतु मजबूर हो जाती है। जहाँ उस समय उसका अपना कोई नहीं दिखाई पड़ता।''

दूरस्थ की यात्रा से श्रान्त-क्लांत शकुन्तला किसी सरोवर में स्नान करने चली गयी। उस सरोवर के सलील में पति द्वारा प्रदत्त स्वर्ण अंगूठी अन्जाने में उसकी ऊँगली से खिसक गयी। स्नानोपरान्त शकुन्तला अपने सहयोगियों के साथ हस्तिनापुर के लिए प्रस्थान कर गयी।

वहाँ पहुँच कर नव परिणीता पत्नी शकुन्तला को अपने प्रिय पति दुष्यन्त के साथ शीघ्र ही साक्षात्कार हो गया। दुष्यन्त की अंगूठी खो जाने के कारण शाप का प्रभाव समाप्त नहीं हो सका। अतः बार-बार स्मारित करने पर भी पुरुवंशीय पराक्रमी पति ने शापित शकुन्तला को अपनी पत्नी के रूप में नहीं पहचान पाया? क्योंकि आध्यात्मिक शक्ति के समक्ष लौकिक बल कमजोर होता है। ''गर्भावस्था में पति के द्वारा पत्नी का परित्याग, नारियों के लिए दुनियाँ में सबसे बड़ा दुख है।''

अतः विवश, बेसहारा शकुन्तला अपनी जिन्दगी को निराशा के अंधकार में भटकते रहने की अपेक्षा मृत्यु को वरण करना

अधिक उपयुक्त समझने लगी। इसी दरम्यान अपनी पुत्री को विषम परिस्थिति में देख, मेनका अकस्मात् वहाँ आ गयी और शकुन्तला को अपने साथ लेकर हेमकूट पर्वत पर चली गयी, जहाँ महर्षि मारीच अपनी पत्नियों के साथ तपस्या में तल्लीन थे।

शकुन्तला द्वारा खो दी गयी दुष्यन्त की नामांकित मुद्रिका एक माँझी को मछली के पेट से प्राप्त हुई और वह उसे लाकर राजा को समर्पित कर दिया। उस अंगूठी को देखते ही राजा पर शाप का प्रभाव समाप्त हो गया और बीती सारी वैवाहिक घटनाएँ स्मरण हो आयी। तब राजा शकुन्तला से मिलने के लिए विशेष बेचैन हो गये।

इन्द्र और दानवों की लड़ाई में राजा दानवों पर विजय प्राप्त कर लौट रहे थे। रास्ते में ही हेमकूट पर्वत पर मारीच ऋषि का आश्रम देख, उनके दर्शनार्थ रथ को नीचे उतार लिए और सारथि को उनके निर्धारित दर्शनोचित समय की जानकारी हेतु आश्रम की ओर भेज दिया।

इसी अन्तराल में राजा एक अद्भुत प्रतिभाशाली बालक को देखा, जो शेर के बच्चे के साथ उसके दाँत गिनने हेत संघर्ष कर रहा था। इसी बीच उसकी बाँह में बँधा यंत्र टूट कर नीचे गिर गया। जिसे राजा ने उठाकर रख लिया।

तद्पश्चात एक तापसी उस वीरबहादुर बालक की खोज में वहाँ आयी और उसकी बाह में यन्त्र नहीं देख, इधर-उधर अनुसंधान करने लगी।

राजा-(यंत्र को देते हुए) संघर्ष के क्रम में टूट कर नीचे गिरा देख, मैने सुरक्षित रख लिया था। परन्तु, अब आप इसे स्वीकार करें।

तापसी-आश्चर्य! घोर आश्चर्य!'' ......? अभी तक यह यंत्र, साँप बनकर आपको नहीं काटा? राजा-यह क्यों.......?

महर्षि मारीच ने अपराजिता नामक औषधि को मंत्राभिसिंचित कर इसकी बायी बाँह में बाँध दिया था। जिसे असली पिता को छोडकर, दूसरा कोई व्यक्ति छुयेगा, तो वह उसे साँप बनकर काट लेगा....?

क्या आपने साँप बनकर काटते किसी को देखा है।

हाँ, कई लोगों को। इसका अर्थ है कि आप ही इसके असली पिता हो सकते हैं?

क्यों.......? इसके असली पिता कहाँ चले गये हैं......?

तापसी-किसी पुरुवंशी राजा ने अपनी पत्नी शकुन्तला को गर्भावस्था में निर्दयता पूर्वक परित्याग कर दिया। परन्तु, उसकी माता मेनका उसे यहाँ ले आयी। जहाँ उसने एक बहादुर पुत्र को जन्म दिया। वही बालक सर्वदमन' आपके समक्ष समुपस्थित है।'

राजा ने कहा-शकुन्तला मेरी ही पत्नी है। शापवश मैंने उसका परित्याग कर दिया था। अतः उससे मैं शीघ्र मिलना चाहता हूँ।

यह शुभ संदेश सुनते ही शकुन्तला वहाँ आ पहुँची और अपने पति दुष्यन्त को पहचान लिया। लेकिन शापवश बड़ी-से-बड़ी भूल के करण दुष्यन्त की नजर नीचे की ओर झुकी रही और इसके लिए क्षमा-याचना करने हेतु शकुन्तला के पैर छूना चाहे......? किन्तु, उसने उन्हें रोकते हुए कहा......

''भारतीय पति, अपनी पत्नी के साथ भयंकर भूल करने के पश्चात भी उसके पैर नहीं छूते, बल्कि असीम प्यार प्रदान कर, हार्दिक पश्चाताप करते हैं। शास्त्रानुसार चरण स्पर्श करने का अधिकार तो अर्धागिंनियों के लिए ही होता है।''

यह कहकर ज्योंहि वह अपने पति दुष्यन्त के चरण स्पर्श करने हेतु झुकना चाही। दुष्यन्त ने उसे अपने प्रेम-पाश में आबद्ध कर कलेजे से लगा लिया। शकुन्तला भी दुष्यन्त की देह में लता की तरह लिपटकर हर्षातिरेक से सिसक-सिसक कर रोने लगी।

शाप के प्रभाव से दुष्यन्त भले ही अपनी पत्नी को पहचानने में पिछड़ गये और दोनों दो दिशा में चले गये। लेकिन, वर्षों से बिछुड़े दो किनारों के बीच पारस्परिक विश्वास के सुदृढ़ सेतु का सृजन और दरकते दाम्पत्य में सरसता का संचार कर, उन्होंने शकुन्तला के पवित्र प्रेम को न केवल परवान चढ़ाया अपितु, भारतीय धारातल पर सांस्कृतिक समुन्नत सम्वाद को सम्मान करने के लिए संदेश भी संप्रेषित किया है।

लेकिन आज ....... सीधी-सादी, सरल स्वभाव वाली बालाओं को प्रेम-परिणय का प्रलोभन देकर उसके सतीत्व का शोषण और प्रताड़ित स्वयं तो करता ही है, दूसरे से भी करवाता है और उसे अन्त में सड़कों पर भटकने या मौत को गले लगाने के लिए मजबूर कर, भारतीय संस्कृति और समाज को शर्मसार कर रहा है आज का दुष्यन्त........?