काव्य कला में गुरु की आवश्यकता
May 10, 2019 • विजय अरुण

बड़ी ही प्रसिद्ध उक्ति है- 'गुरु बिन गत नहीं, शाह बिन पत नहीं।' अर्थात गुरु के बिना गति अर्थात ज्ञान और साहूकार के बिना प्रतिष्ठा नहीं। यहां बात क्यों कि काव्य कला और गुरु की है, सो चर्चा इन्हीं दो बिंदुओं पर की जाएगी।

यहां मुंबई में फिल्म और कला जगत के कलाकारों की एक संस्था 'चैपाल' है, जो कि मास में एक बार गोष्ठी करती है। एक गोष्ठी में हिंदी और डोगरी की प्रसिद्ध कहानीकार और कवयित्री पद्मा सचदेव का काव्यपाठ था। अंत में मैं ने पद्मा सचदेव से पूछा कि क्या उन्होंने काव्य-कला में किसी से परामर्श लिया है। पास ही बैठे गुलजार साहिब झट से बोल उठे- 'क्या मुहब्बत किसी से सीखी जाती है?' मैं अवाक रह गया। उसके बाद 'चैपाल' की किसी अन्य गोष्ठी में जब मुझे कविता के बारे में बोलने का अवसर मिला तो मैं ने उपरोक्त घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि काव्यकला एक कला है और प्रत्येक कला की भांति इसे भी सीखना पड़ता है। जब कि मुहब्बत एक मानसिक चित्तवृति है, जिसे कि सीखना नहीं पड़ता।

काव्यकला पांच ललितकलाओं में से एक है। पांच ललितकलाएं हैं वास्तुकला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीतकला और काव्यकला। इस में काव्यकला को सर्वश्रेष्ठ कला माना गया है। इस का कारण यह है कि सौंदर्य उत्पन्न करने के लिए काव्य कला में उपकरण अर्थात सामग्री के नाम पर केवल शब्द हैं। सबसे स्थूल ललितकला वास्तुकला अर्थात भवन निर्माण कला है। इस में सौंदर्य उत्पन्न करने के लिए पत्थर, ईंट, लकड़ी, लोहा इत्यादि कितने ही उपकरणों का प्रयोग करना पड़ता है। सो काव्यकला, जो कि सब से सूक्ष्म कला है क्या बिना गुरु से सीखे ही आ जाएगी!

खेद का विषय है कि हिंदी कविता में तीन पीढ़ियों से गुरु-शिष्य परंपरा लुप्त है। जब कोई गुरु ही नहीं है तो कोई सीखेगा किस से! वृहत हिंदी कोष में कविता का अर्थ 'रसात्मक छंदोबद्ध रचना' किया गया है। काव्य के दो पक्ष हैं- भाव पक्ष और शिल्प पक्ष। दोनों पक्षों को समान रूप से सुदृढ़ होना चाहिए। अर्थात जितना अच्छा विचार हो, उतने ही अच्छे ढंग से कहा जाए। भाव पक्ष तो वह भाव या विचार हैं जो कि कवि के मन में आ गया है। अब उस भाव या विचार को कैसे कहना है अर्थात उसके लिए कौन सा छंद उपयुक्त रहेगा, कौन से शब्द और अलंकार उपयुक्त रहेंगे, यह सब शिल्प पक्ष के अंतर्गत आता हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि कवि कलाकार भी है और शिल्पकार भी। भावपक्ष के परिपेक्ष्य में वह कलाकार है और शिल्प पक्ष के परिपेक्ष्य में वह शिल्पकार।

 किंतु आज की अधिकांश कविताएं पूर्णतया गद्य हैं। हिंदी कविता स्वछंद छंद से ग्द्यात्मक होती हुई अब गद्य हो गई है। यही कारण है कि आज हिंदी में सर्वाधिक कविताएं लिखी जाने के बावजूद कविता ही है जो सबसे कम पढ़ी जाती है। दशकों पहले स्वच्छंद छंद को भी, जो कि पाश्चात्य से आया था एक छंद मान लिया गया था। इसके बारे में यह कहा गया था कि इस में लय होती है और कहीं कहीं तुक का मिल जाना इस में सौंदर्य उत्पन्न करता है। किंतु शनै शनै यह अपने उपरोक्त दोनों गुणों से शून्य होती गई और अब नितांत गद्य है।

 कवि होने के लिए काव्यात्मक हृदय और मस्तिष्क लेकर उत्पन्न होना आवश्यक है। कवि भावुक और संवेदनशील होता है। उसका हृदय उद्वेलित होने पर कविता अनायास ही उसके मुंह से फूट पड़ती है। जैसा कि बाल्मीकि के साथ हुआ। कथा प्रसिद्ध है कि एक दिन जब वह स्नान करने के लिए तमसा नदी के किनारे जा रहे थे तो एक क्रौंच पक्षी को व्याध द्वारा निहत और क्रौंची को व्याकुल देख कर भावावेश में उन के मुख से निम्नलिखित काव्य पंक्तियां  अनुष्टुप छंद में निकल आयींः- मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्र्वतीः समाः।/यत्क्रौंचमिथुनादेकम-वधीः काममोहितम्

(हे निषाद! तू ने इस कामोन्मत्त पक्षी को मारा है अतः तुझे बहुकाल पर्यंत सुख और शांति प्राप्त न हो) ।

छंदोबद्ध कविता करने वाले कवि जब कविता का सृजन करते हैं तो निर्धारित छंद में पंक्तियां अपने आप ढल कर उनके सम्मुख उपस्थित हो जाती हैं। गद्य कविता का सृजन करने वालों के लिए मेरा निम्नलिखित मुक्तक मनोरंजन और आत्मरंजन का विषय होना चाहिएः- गद्य को पद्य समझने वाले/कल तू मूली को भी गाजर कहना।/कान छिदवा के जो तिनका डालें/क्या कहायेगा वह तिनका गहना!! यह बात भी रोचक है कि कई बार किसी विशेष परिस्थिति में कविहृदय-शून्य व्यक्ति भी कोई काव्यात्मक पंक्ति कह देता है। एक आख्यान इस प्रकार है कि जब कुख्यात आक्रमणकारी नादिरशाह के सम्मुख मुगल शहनशाह मोहम्मद शाह रंगीला ने एक प्रसिद्ध हीरा प्रस्तुत किया, तो उसे देखते ही भावावेश में नादिरशाह के मुंह से निकला- 'वल्लाह! ईं कोहे नूर अस्त (ईश्वर की शपथ यह तो नूर का पहाड़ है) तब से उस प्रसिद्ध हीरे का नाम कोहिनूर पड़।

 गुरु की उपादेयता के विषय में एक शिक्षाप्रद घटना का उल्लेख कर के मैं इस लेख को विराम दूंगा। उर्दू के प्रसिद्ध कवि रियाज खैराबादी को उनके गुरु अमीर मीनाई ने बहुत जल्दी ही फारिगुलिइस्लाह अर्थात संशोधनमुक्त कर दिया था और वे गुरु के आदेशानुसार अमीर मीनाई के अन्य शिष्यों का काव्य संशोधन किया करते थे। किंतु जब तक अमीर मीनाई जीवित रहे रियाज खैराबादी ने उन्हें दिखाए बगैर किसी जगह भी अपनी कोई रचना नहीं सुनाई। वे बड़े मनोभाव से यह बात बताया करते थे कि गुरु ने उनके एक शे'र में केवल एक शब्द बदलकर शे'र को जमीन से आसमान कर दिया।

रियाज खैराबादी ने शे'र कहा था-सबा जो आई है शम-ए-मजार गुल करने/वो उस के आने से पहले ही जल बुझी होगी। अमीर मीनाई ने इस शे'र को यूं कर दिया-सबा अब आई है शम-ए-मजार गुल करने/वो उस के आने से पहले ही जल बुझी होगी।