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केफे में कत्ल
September 19, 2019 • रमेश दवे

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। इसका किसी घटना से कोई संबंध नहीं है। लेखक दायित्व मुक्त है। कहानी में हिन्दी-अंग्रेजी के तकनीकी शब्दों का प्रयोग किया गया है)

 

जैसे ही मोबाइल पर रिंगटोन बजी, मैं लपका मोबाइल उठा कर स्विच आन करते करते घंटी बंद हो गई और मोबाइल स्क्रीन पर मिस्डकाल लिखा आ गया साथ ही मोबाइल नम्बर भी। मैंने मिस्ड काल के बावजूद रिप्लाय काल नहीं किया। मैं जानता हूं कुछ लोग जानबूझकर मिस्डकाल देकर मोबाइल बंद कर देते हैं ताकि बातचीत का पैसा रिप्लाय काल करने वाले को देना पड़े।

धीरज मेरा दोस्त है। उसकी एक गर्ल-फ्रेण्ड है। नाम है उसका ग्रेसिया। एक क्रिश्चन गर्ल। क्वाइट स्मार्ट एंड गुड लुकिंग। धीरज अक्सर उसकी तारीफ किया करता। वाट्स एप पर लंबी-लंबी बातें लिखता और ग्रेसिया भी उसी लंबाई में रिप्लाय भी करती। कई बार दोनों जब वेबसाइट से कोई किताब स्क्रीन पर पढ़ते तो किताब के अनुभव आपस में शेअर करते। वे नेट पर भी घण्टों चेट करते। कई तरह की जानकारी लेकर एक दूसरे को बताते। किसका ई-मेल कब, कैसे हैक हुआ। हैक करने वाले तक पासवर्ड कैसे पहुंचा। कुछ रोमेण्टिक संबंध कैसे वायरल हुए। फेस बुक पर दोनों ने क्या क्या देखा। टू जी, थ्री जी, फोरजी के आने से फ्रीक्वेन्सी किस कदर बढ़ गई। फिर वे कहते कब, कहां मिलेंगे? ट्विटर और ब्लाग भी दोनों के बीच होने लगे।

दोस्ती का यह सिलसिला कभी मोबाइल पर कभी वाट्सएप पर तो कभी फेसबुक पर चलता रहा। ई-मेल चैट तो रात दस बजे बाद होती और दोनों का मन ही नहीं होता था कि चैट बंद कर लेपटाॅप स्विच आफ कर दिया जाए। ग्रेसिया जिस शहर में नौकरी करती है, वहां का सायबर केफे शहर का सबसे बड़ा केफे है। उनके पास काॅल सेण्टर भी है और मेसेज को अपलोड-डाउनलोड करने का काम भी। फाण्ट की समस्या अब नहीं। यूनि-कोड आ जाने से किसी भी भाषा में लिखना और मेसेज देना संभव हो गया है। धीरज का शहर करीब सौ किलोमीटर दूर है। दोनों के बीच प्रेम कहानी का आदान-प्रदान ज्यादातर वाट्स एप या फेस बुक से दिन में दोपहर था और रात में तो ई-चैट से ही होता।

एक दिन अचानक धीरज के आफिस में खबर आई। धीरज शाॅक्ड, दंग और घबराया हुआ। ग्रेसिया का मर्डर! धीरज शाक में अपनी आवाज ही खो बैठा। सोचने लगा कैसे हुआ, क्यों हुआ, इतनी जल्दी खबर वायरल कैसे हुई? क्या यह खबर सही है या किसी ने कोई फीलर छोड़ा है?

ग्रेसिया का मर्डर एक रोमांचक मिस्ट्री बन गया। पुलिस ने ग्रेसिया का मोबाइल जब्त किया। उसके तमाम फोनों की काल-लिस्ट ली। साइबर केफे और कालसेंटर के डीटेल्ज लिए। ई-मेल अकाउण्ट से चेट्स के डीटेल्स लिए। वाट्सएप और फेस बुक अकाउंट खंगाला। सब जगह की तफतीश पर इतना पता लगा कि सर्वाधिक बातचीत और काल्स धीरज के ही थे। मर्डर की शाम धीरज सौ किलोमीटर दूर दूसरे शहर में था मगर पुलिस को बार-बार शक हो रहा था कि हो न हो इस मर्डर में कहीं न कहीं कुछ इन्वाल्वमेंट धीरज का हो सकता है। सायबर केफे के मालिक से पूछताछ की गई। ग्रेसिया के साथ काम करने वालों से तरह तरह की जानकारी ली गई। केफे के मालिक और ग्रेसिया के संबंधों की पड़ताल की गई। उधर शहर के तमाम केफे संचालकों ने पुलिस से मामले की सी.आई.डी या सीबीआई जांच की मांग के लिए प्रदर्शन कर कलेक्टर को मेमोरेंडम सौंपा। सायबर क्राइम तो दुनियाभर में आम हैं मगर सायबर केफे में क्राइम यह एक ऐसी घटना है जो सायबर केफे वालों के लिए चिन्ता की बात है। काल सेण्टर्स भी क्या क्या कारनामे करते हैं। एस. एम. एस, एम. एस. एस. से विज्ञापनों के अलावा सेक्स मेसेजेस, गल्र्स के उपलब्ध होने के मेसेज, नौकरियां ही नौकरियां के मेसेज, बैंकों, इन्वेस्टेमेंट कंपनियों के मेसेज, रियल इस्टेट और विल्डिरों के मेसेज और फेसबुक, वाट्सअप पर पोर्न वीडियो ये सब ही तो हैं आज की टेक्नालाजी के आविष्कार चिटिठयां शहीद हो गईं। पोस्ट आफिस की मृत्यु हो गई। बैंको के मेन्युअल काम आन लाइन या डेबिट क्रेडिट कार्ड एवं वीजा कार्ड से चलने लगे, गोया मनुष्य का स्थान मशीन ने ले लिया। कार्ड ने ले लिया, मनुष्य की मौत हो गई और मशीन ने मनुष्य को निरस्त कर दिया। तरह तरह के कार्डों से ट्रांजेक्शन,इनकम टेक्स, आॅनलाइन से भुगतान या प्राप्ति, एटीएम, पे टीएम, फोनपे आदि का नया यांत्रिक आफिस मनुष्य के मुंह में खुल गया।

सोशल मीडिया पर ग्रेसिया की मौत की खबर इस कदर वायरल हुई कि ट्वीट पर-ट्वीट ध्ाीरज के पास आने लगे, ग्रेसिया के घर उसके पेरेण्टस के पास भी ट्वीटस का ढेर लग गया। केफे में हर दस बीस सेकण्ड में ट्वीट ही ट्वीट। ट्विटरों की चहक से लोग भूल गए कि ट्विटर किसी चिड़िया की आवाज है। हमारे समाज के बच्चे तो बस इतना जानते हैं कि ट्विटर तो कम्प्यूटर, फेसबुक, वाट्स एप करते हैं। वे नहीं जानते यह तो पक्षियों की आवाज है जिसकी नकल आदमी की आवाज या लिखावट में सोशल मीडिया कर रहा है। ग्रेसिया की मौत का आखिर क्या राज है?

पुलिस एक दिन सुबह-सुबह धीरज के पास पहुंची। पूछताछ शुरू हुई। पुलिस की भाषा में नम्रता शब्द तो होता ही नहीं। इसलिए हर प्रश्न सख्त लहजे में, कभी कभी गालियों के तकिया कलाम से शुरू होता और उत्तर जो धीरज देता उसे पुलिस अपनी भाषा में अपने ढंग से अपनी मर्जी का बना लेती। धीरज ने मांग की कि पूछताछ वीडियो रिकार्डिंग के साथ हो। मगर पुलिस ने इससे इंकार करते हुए कह दिया क्या पुलिस तेरे बाप की है जो तेरी बात मान कर जो तू कहेगा वह करेगी?

धीरज चुप हो गया। सवाल थे -

- क्या ग्रेसिया से तुम्हारा अफेयर था?

- जी हां!

- क्या तुम साथ-साथ रहते हो?

- जी हां, सिर्फ वीक एंड पर!

- क्या तुम लिवइन रिलेशन में हो?

- जी हां!

- क्या ग्रेसिया गर्भवती थी?

- जी नहीं!

- यह तुम्हें कैसे पता?

- ग्रेसिया ने ऐसा कभी नहीं बताया!

- क्या ग्रेसिया का कोई अन्य मित्र या प्रेमी था?

- शायद नहीं। हो भी तो पता नहीं।

- इसका क्या मतलब?

- मैं तो मानता हूं कि मैं अकेला ही प्रेमी था।

- ग्रेसिया के अपने केफे के मालिक से संबंध कैसे थे?

- जैसे बास और मातहत के होते हैं।

- क्या उनमें कोई सेक्स रिलेशन था?

- शायद नहीं। हो भी तो पता नहीं।

- क्या ग्रेसिया बास द्वारा हेरेस की जाती थी?

- पता नहीं।

- क्या वह बास द्वारा देह शोषण की शिकार होने से उसे एक्सप्लाइट तो नहीं कर रही थी?

- ऐसा नहीं था। ग्रेसिया मेरे प्रति वफादर थी। उसने बाॅस के बिहेवियर पर कभी कुछ मुझसे नहीं कहा!

- तो फिर उसके मर्डर का क्या कारण हो सकता है?

- मैं क्या जानूं! आप पता लगाइए।

पुलिस की पहले दिन की पूछताछ खत्म हुई। पुलिस धीरज और केफे मालिक के बीच शक के झूले में झूल रही थी। सही सुराग तक पहुंचने के लिए वह धीरज को ही टारगेट कर रही थी। उधर केफे मालिक घबराया हुआ था। उसे पुलिस परेशान नहीं करे इसलिए उसने पुलिस को खुश करने का भी इंतजाम कर दिया था।

पुलिस ने जाते जाते धीरज से कहा सायबर केफे में तो सीसी केमरे हैं। वहां कुछ भी लफड़ा होता तो पता चल जाता। साइबर केफे के मालिक वीरूमल धनवानी के चेम्बर में, रिटायरिंग रूम में भी केमरे लगे हैं। वहां तो कोई एवीडंस मिला नहीं। अब हम तो यही मानते हैं कि इसमें ग्रेसिया के किसी घनिष्ट मित्र का ही हाथ है और वह मित्र तुम हो। तुम गुनाह कुबूल लो वरना हम तुम्हारे खिलाफ एफ आई.आर. दायर कर तुम्हें रिमांड पर ले लेंगे और रिमाण्ड रूम में तो तुमसे सच्चाई उगलवा ही लेंगे वरना नारकोटिक टेस्ट भी करवाएंगे। धीरज जानता था कि पुलिस का रिमाण्ड रूम वास्तव में टार्चर-रूम या एट्रासिटी रूम होता है। धीरज ने पुलिस को लिख कर दिया कि जिस दिन ग्रेसिया का मर्डर हुआ, वह वीक एंड डे नहीं था। उस दिन तो वह सौ ही नहीं लगभग पाॅंच सौ कि.मी. दूर कंपनी के काम से गया था जिसके डीटेल्स कंपनी के रोस्टर और टूरिंग रजिस्टर में मिलेंगे। पुलिस ने पढ़ा और सोचा कि अगर यह नहीं तो फिर कौन?

धीरज गुस्से से लाल हो गया था सोचने लगा कुछ तो करना होगा। बोला- ऐसा कैसे हो सकता है? मैं एक पढ़ा लिखा जिम्मेदार नागरिक हूं। आपको यह साबित करना होगा। क्या मेरे खिलाफ एफ आई.आर. लिख लेने से क्या जुर्म साबित हो जाता है? आप अपनी डयूटी न करके मुझे हेरेस कर रहे हैं। मैं कोर्ट में शिकायत करूंगा। मीडिया पर यह खबर वायरल कर दूंगा। आप तफतीश कीजिए। सबूत एकत्रित कीजिए। ग्रेसिया के केफे वाले और घर के लोगों से चर्चा कीजिए। केवल मुझे टारगेट करने से क्या होगा। आखिर में एक साफ्टवेयर इंजीनियर हूं। मेरे पिता जज की पोस्ट से रिटायर हुए हैं और अब मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष हैं। आप मेरे चाल-चलन के बारे में उनसे पूछिये। मेरी कंपनी के सीईओ से पूछिये। केवल मेरा ग्रेसिया से अफेयर होने को सबूत मानकर मुझे टार्चर करना कहां तक ठीक है? धीरज ने यह लिखकर पुलिस के टीआई और आला अफसरों को भेज दिया और वाट्सएप पर पत्र वायरल कर दिया।

अब पुलिस करे तो क्या करे। इधर धीरज बड़े बाप का बेटा उधर ग्रेसिया चर्च के बिशप की भतीजी। अफेयर में आनर किलिंग जैसी घटनाएं तो होती हैं और फिर हिन्दू-क्रिश्चन अफेयर से दोनों धर्म वालों का नाराज होना स्वाभाविक है। पुलिस ने धीरज को तो छोड़ दिया। अब उसने तफतीश का नया रास्ता चुना। उसे शक था कि -

- कहीं बिशप के भाई ने ग्रेसिया के अफेयर को नान क्रिश्चन मान कर तो यह मर्डर नहीं करवाया हो,

- कहीं बिशप को यह बात ठीक न लगी हो शायद वह भी यह मर्डर करवा सकता है।

- यह भी हो सकता है कि धीरज का परिवार या स्वयं उसका पिता इसमें शामिल हो। जज हुआ तो क्या हुआ।

पुलिस ने अपने एरिया के एस.पी., डीआईजी से भी चर्चा की। टी.आई. डी.जी.पी.और गृहमंत्री के पास भी पहुंचे और कहा साहब अब क्या करें? आप कहें तो धीरज, बिशप, ग्रेसिया के भाई और पिता को भी इन्ट्रागेट करें।

नहीं ऐसा कुछ मत कीजिए। जरा दो चार दिन मीडिया चैनलों को वाच करें, वहां के पेनल डिस्कशन गौर से सुनें। अखबारों और सोशल मीडिया के वाट्सएप पर भी ध्यान दें। शायद उनसे कोई सुराग मिल जाए। कुछ मामले देर से उजागर होते हैं। अगर फिर भी कुछ नहीं हुआ तो फिर सी.आई.डी या सी.बी. आई जांच करवा लेंगे।

इस पर टी.आई बोले। सर इसकी जरूरत नहीं। हम खुद सक्षम हैं। एक न एक दिन पता लगा ही लेंगे। पुलिस की कोशिश आकाश पाताल से भी अपराधी को खोज लेती है। थोड़ा वक्त जरूर लगेगा।

उधर बिशप ने मानव अधिकार आयोग को लिखकर दिया कि उनकी भतीजी जो क्रिश्चन है का मर्डर शायद एक सोची-समझी साम्प्रदायिक साजिश हो सकती है। यह क्रिश्चन अल्प संख्यकों के प्रति नफरत का परिणाम भी हो सकता है। इस एंगल से भी केस की इन्वेस्टिगेशन करना उचित होगा।

मानव अधिकार के अध्यक्ष तो धीरज के पिता ही थे। उन्होंने पुलिस को इस एंगल से तफतीश का निर्देश दिया।

पुलिस ने तो पहले ही इस एंगल से तफतीश शुरू कर दी थी। कोई सबूत मिला ही नहीं। अब पुलिस करे तो क्या करे।

पुलिस साइबर केफे में गई। जिस जगह ग्रेसिया मारी गई उस स्पाट को गौर से देखा। उसकी डेस्क के ड्रावर्स खोले। केफे के पीजन-होल कबड़ में रखा ग्रेसिया का वेनिटी बेग खंगाला। न कोई चिटठी न कोई अस्त्र-शस्त्र, न केफे के सहकर्मियों से या मालिक से किसी प्रकार के विवाद के सबूत। अब पुलिस का तनाव बढ़ा। पुलिस सोचने लगी ग्रेसिया का खून में लथपथ शरीर उसकी डेस्क चेयर पर कैसे पहूंचा? क्या मर्डर के बाद किसी ने रख दिया ताकि यह लगे कि मर्डर केफे मंे कुर्सी पर ही हुआ।

पुलिस ने इन्वेस्टिगेशन का रूख बदला। उसने पूछा केफे में लंच ब्रेक कब होता है। मालिक ने बताया दोपहर दो बजे से तीन बजे तक। दूसरा सवाल था लंच अपना अपना लाते हैं या केफे के केण्टीन में? मालिक ने कहा यह उनकी च्वाइस है। हम इसमें इण्टरफीयर नहीं करते। अगला सवाल यह था कि आपके केफे क वर्किंग आवर्स कब से कब तक के हैं? मालिक ने कहा केफे तो सुबह आठ बजे खुल जाता है। हर एम्प्लाई का अलग-अलग शेड्यूल है। ग्रेसिया का शेड्यूल उस दिन कब का था? देखकर बताता हूं सर। उसने पूरा रोस्टर छान मारा मगर ग्रेसिया के शेड्यूल की एंट्री नहीं मिली। मालिक ने अपने उस इन-चार्ज को बुलाया जो हर एम्प्लाई की बायोमेट्रिक एंट्री नोट करता था। बायोएंट्री में भी ग्रेसिया के आने जाने की उस दिन की एंट्री नहीं थी। पुलिस ने अब सोचा, न रोस्टर में न बायोमेट्रिक एंट्री में कहीं ग्रेसिया के शेड्यूल या आने जाने के टाइम की एंट्री है तो फिर ग्रेसिया केफे में अपनी सीट तक पहुंची कैसे? क्या पहले से किसी ने सीट पर उसकी मृत देह रख तो नहीं दी?

अब पुलिस के इन्वेस्टिगेशन में एक और टर्न आया उसने मालिक से पूछा केफे में क्या विजिटर्स आते हैं? जी हां, मालिक ने कहा। क्या वे आपकी परमिशन से एम्प्लाई से मिलते हैं या रिसेप्शन पर से एंट्री कार्ड ले लेते हैं? सर रिसेप्शन कार्ड देने के पहले उनका आई डी चेक कर उसका फोटोग्राफ लेता है, नाम-पता,मोबाइल नंबर लेता है, मिलने का कारण पूछता है, फिर सेक्शन इन चार्ज को इण्टरकाम से इन्फार्म करता है।

पुलिस ने कहा अच्छा ठीक है। पुलिस ने उन सबकी डीटेल्ज की फोटो कापी मांगी। कहीं कोई एंट्री न होने से निल-रिपोर्ट दी गई।

अब पुलिस का यह शक पक्का हो गया कि यह मर्डर मिस्ट्री है और हो न हो यह मर्डर किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया हो जो ग्रेसिया के रिलेशंस से खफा हो और स्वयं ग्रेसिया से अफेयर चाहता हो। मगर इसका भी सबूत क्या?

चलते चलते पुलिस ने गे्रसिया की डेस्क के नीचे रखी डस्टबिन भी खंगाली। उसमें एक कागज गुड़ी-मुड़ी हालत में मिला। पुलिस ने उसे उठाया, खोला, देखा तो वह एक लव-लेटर था, जो धीरज का था ही नहीं। वह चिटठी बिशप या ग्रेसिया के भाई की भी नहीं थीं? फिर क्या था उस पत्र में?पुलिस ने पूरा पढ़ा। वह अंग्रेजी में था। उसका फिंगर प्रिंट तो फारेंजिक टेस्ट पर नहीं भेजा जा सकता था मगर व कम्प्यूटर पर टाइप्ड होने से पुलिस को लगा हो कि इस पत्र का टेक्स्ट वाट्सएप या कम्प्यूटर पर हो सकता है।

पुलिस ने अब इन्वेस्टिगेशन का नया टर्न लिया। तमाम वाट्सएप और मेल डीटेल्ज चेक किए मगर या तो टेक्स्ट इरेज कर दिया गया था या केफे या आसपास के कम्प्यूटर पर टाइप किया हुआ नहीं था। पुलिस को शक हुआ कि आखिर ग्रेसिया की लाश उसकी डेस्क-चेयर पर पहुंची तो कैसे पहुंची? पुलिस ने गार्डस को बुलाया। पूछा, क्या उस दिन ग्रेसिया केण्टीन में लंच पर गई थी। हां सर मैंने देखा था, वह केण्टीन में गई थी। पुलिस ने पूछा क्या केण्टीन में एम्प्लाइज के अलावा, विजिटर्स भी ब्रेकफस्ट, लंच या डिनर करते हैं? जी हां, मगर केण्टीन मालिक की परमिशन से। क्या उस दिन केण्टीन मालिक उसका कोई बेटा, बेटी, रिश्तेदार या एम्प्लाइ पे-काउण्टर पर था? देखा नहीं सर! मगर कोई न कोई तो रहता जरूर है। अब यह बताओ क्या ग्रेसिया बहुत ब्यूटीफुल थी? जी हां! क्या उसे देखकर एम्प्लाइज या विजिटर्स में से कोई छेड़-छाड़ या कोई कमेण्ट करता था। पता नहीं सर, यह तो केण्टीन के मालिक, काउण्टर इनचार्ज, वेटर्स ही बता सकते हैं। अच्छा यह बताओ उस दिन केण्टीन में कोई बड़े जोर का शोर हुआ था, गन चलने की आवाज आई थी! शोर तो हुआ था, मगर गन की आवाज नहीं सुनी! क्या केण्टीन में भगदड़ मची थी? जी हां, लोग जल्दी जल्दी, बिना पेमेण्ट किये केण्टीन से बाहर भागने लगे थे।

एक प्रकार के पेनिक का अंदाजा लगाकर पुलिस ने सोचा कि केण्टीन में कोई न कोई सबूत जरूर होना चाहिए। पुलिस को बार-बार यह लगता था ग्रेसिया का मर्डर तो केण्टीन में न होकर बाहर किया गया होगा और लाश यहां रख दी गई। इसमें जरूर केण्टीन, मालिक, केफे मालिक और रिसेप्शन इन चार्ज का इन्वाल्वमेण्ट होना चाहिए।

पुलिस ने केण्टीन मालिक को इन्ट्रोगेट किया। पूछा उस दिन केण्टीन में पेनिक क्यों हुआ। मालिक बोला गन चली थी, सर/ गन कितने बजे चली थी? यही कोई दो ढाई बजे दिन के वक्त! किस तरफ से चली थी? यह नहीं देखा, मगर गन की आवाज सुनकर मैं खुद घबरा कर केण्टीन में दौड़ कर गया। मेरे पहुंचते पहुंचते केण्टीन खाली हो गया, यहां तक कि शेफ, वेटर्स, सफाई वाले सब भाग गए। मैं शाक में आ गया। सुनसान केण्टीन में ग्रेसिया मेम की लाश उनकी चेयर पर झूल रही थी, नीचे खून पसरा हुआ था। मैंने खून साफ करवाया! फर्श

धुलवाया। और मैंने पुलिस को सूचना दी।

अब यह बताइये पुलिस के आने के पहले, आपने फर्श क्यों धुलवाया? गन चलते ही, पेनिक होते ही पुलिस को खबर क्यों नहीं दी?

सर क्या बताऊॅं? मैं बहुत डर गया था। मैं भागा और केण्टीन से लगे टायलेट में ईजी होने के लिए घुसा। घुसता हूं तो मैं दंग रह गया। वहां भी एक लाश पड़ी थी, सर! और वह कांपते-कांपते, रोते-रोते बोला, सर... यह लाश थी ना... मेरे .... मेरे .... मेरे बेटे की थी।