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क्यी फिर कुढती मुहब्बत पनपेगी यहाँ
August 27, 2018 • नासिरा शर्मा

लेख

कोई सभ्यता कोई धर्म आदम और हव्वा की कहानी के बिना नहीं है चाहे उस कहानी की रूपरेखा और कथावस्तु जो भी हो, सेब की जगह गेहूँ हो, तो भी कहानी अपनी जगह रहेगी। मुझे तो इस बात से बेहद खुशी मिलती है कि जन्नत से आदम और हव्वा को जब निकाला गया तो वह सीधे जन्नत से आकर उन पहाड़ियों पर गिरे जो श्रीलंका में मौजूद है और श्रीलंका कभी हिन्दुस्तान का हिस्सा रहा है तभी तो आदम की लम्बी चौड़ी कब्र फैजाबाद में है यानी कि आदम हव्वा ने धरती पर अपनी आबादी की शुरुआत हिन्दुस्तान से की है तभी मध्य पूर्वी देशों में भारतवर्ष वफा की धरती कहलाता है जहाँ रिश्तों की गरिमा है। एक बार गठबंधन बंध जाता है तो सात पुश्तों तक सात जन्म तक चलता है आखिर मर्द की बाई पसली से पैदा की गयी औरत खुदा की बनायी जन्नत में आदम को गेहूँ चखने पर उकसा दे और आदम की निष्ठा खुदा से ज्यादा हव्वा के प्रति हो जाये कि वह हर सजा उसके साथ झेलना स्वीकार कर ले। इस कहानी से यह तो जाहिर हो ही जाता है कि आदम और हव्वा में पहले दिन से आकर्षण का खमीर गूंथा गया था। जो आज बरसहा बरस गुजरने के बाद भी मौजूद है। पहली नजर का आकर्षण चाहे वह बाद में महाभारत का रूप धर ले वह अलग बात है मगर मूल गुण का करिश्मा तो आज भी मर्द औरत को हैरत में डाल देता है। कि हजारों-लाखों के बीच में आपको एक औरत या मर्द एकाएक इतना लुभावना कैसे लगने लगता है कि आप न सिर्फ तन, मन, धन, समर्पित कर बैठते हैं बल्कि अपनी जान भी कुर्बान कर बैठते हैं अपवाद को छोड़ते हैं कि प्रेमी जान भी ले लेते हैं या प्रेमिका प्रेम की चाशनी में जहर भी पिला देती है। इस डगर पर ऊंच-नीच हो जाती है। आखिर इन्सान इन्सान है फरिश्ता तो नहीं है।

औरत मर्द का यह रिश्ता तारीख में अपना नाम बराबर दर्ज करता रहा है चाहे वह लैला मजनु हों, शीरिन फरहाद हों, ससी पुन्नू हों, हीर रांझा हों, बकताश व राबे हों। समय के साथ तब्दीली आना लाज़मी है। आज के दौर में खालिस चीजें जिस तरह नज़र नहीं आती हैं उसी तरह असली मुहब्बतें भी आंखों में सुरमा लगाने की तरह नज़र नहीं आती हैं। यहाँ पर कहने का यह मतलब कतई नहीं है कि आज के आदम हव्वा के बीच आकर्षण लुप्त हो गया या फिर दिल धड़कना बन्द हो चुका है। वह सब मौजूद है मगर उसका जुनून, जोश, जायका बदल गया है। वक्त इसका सबसे बड़ा साक्षी भी है और कारण भी। जन्म जन्म तक निभाने वालामामला अब नहीं रहा खास कर तब जब हम एक दूसरे की महक, एक दूसरे पदचाप के वजूद को उस गहराई से महसूस नहीं कर पाते हैं क्योंकि बाजार में पलक झपकते ही जैसे नया प्रोडक्ट अपने पूरे तामझाम के साथ आता है और लोग रिप्लेसमेण्ट फौरन कर लेते हैं उसी तरह आज हम मर्द औरत का रिश्ता बाज़ार में आये इत्र, फर्नीचर, कार और कपड़ों से तय करते हैं और संवेदना को चुटकियों में धता बता देते हैं। मोबाइल के हर रोज बदलते नम्बर और पेमेण्ट की सस्ती दरों ने टिकाना बन्द कर दिया और आज का एक बहुत बड़ा तबका किसी भी इन्सान या चीज या वचन के लिए ठहरना अपनी सबसे बड़ी मूर्खता समझता है। चाहे बाद में संध्या बेला के अन्तिम पड़ाव में वह इसके लिए जितना भी दुखी और पछतावे की आग में झुलसे मगर कहीं एक स्थिति में खड़े रह कर सुख की कल्पना या सुख प्राप्त कर लेने के आत्मविश्वास को स्वयं से धोखा करना ही समझता है।

इस सच में दो राय नहीं है कि यह दुनिया आज प्रेम करने वालों के कन्धों पर ही टिकी हुई है सतही तौर पर जो भी शोर हंगामा और मर्द औरत की बदली भूमिकाएँ नज़र आ रही हैं वह अपनी जगह सच होने के बावजूद देरपा नहीं है।

आज एक फिजा और बन गयी है कि रिश्ता एक समय के बाद गले या सूख कर टपके या अपनी मौत मरे। उससे पहले ही मर्द औरत के इस रिश्ते को पाप, मानकर जड़ सोच वाले नये फूटते, खिलते प्रेमियों को मौत के घाट उतार देते हैं। भाषा, जाति, धर्म, वर्ग यह सारी बातें सहज संवेदनाओं के आड़े आते हैं। यह एक भयानक परम्परा देश में रही है जो चुपचुपाते चिता जला, कब्र खोद जवानों को गाड़ देते थे। मगर अब मीडिया उन । चीजों को सामने लाता है और हम समझते हैं कि यह आज का नया शोशा है मगर मुहब्बत के नाम पर पहरे हमेशा से लगते रहे। हैं जो जब तब हिंसक भी हो उठते हैं।

आज मर्द औरत के रिश्ते में एक दूसरे को पछाड़ने की प्रवृत्ति वजूद में आ गयी है वह एक गम्भीर समस्या का रूप ले चुकी है। प्रतिस्पर्धा का यह खेल हम स्वयं बच्चों से शुरू करवाते हैं कि कक्षा में सबसे अव्वल नम्बर पर रहो फिर नौकरी की जगह पर। ससुराल में बाकी रिश्तों के बीच साबित करो तुम बेहतर हो तुम लायक हो वरना जीने का क्या मकसद? अब जब पति पत्नी दोनों काम कर रहे हैं तो उन की कम्पनी का नाम, स्टेटस, तनख्वाह और ढेरों चीजें धीरे-धीरे करके दोनों को मुकाबले में लाकर खड़ा कर देते हैं और जो ब्याह यह देख कर हुआ था कि दोनों सुखी रहेंगे, कन्धे से कन्धा मिलाकर चलेंगे स्वामी और दास की जगह वह एक नजरिये से घर को सँभालेंगे सारी बातें अन्त में ईर्षा के धरातल पर पहुँच रिश्तों को दीमक की तरह चाटने लगती हैं। अफसोस है कि हम औरत के विकास की बात करते हैं मगर यह भूल जाते हैं कि औरत के व्यक्तित्व के पूरे बदलाव । के साथ जो नयी समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं उससे औरत खुद, उसका परिवार कैसे निबटे? केवल उन्नति करने से हर कष्ट का निर्वाण नहीं होता है। सुख-सुविधा अपने साथ तरह-तरह की नई उलझने भी लाती हैं। हर घर में मौजूद टेलीविजन को बतौर मिसाल हम उठाते हैं और उस पर दिखाये मनोरंजन प्रोग्राम में हिंसा, चालाकी, तिरस्कार कितने तरह के दण्ड फण्ड हम लाते हैं। और उसे जीतते दिखाते हैं। ऐसे प्रोग्राम को देखकर हर किशोर और किशोरी न केवल जीतना चाहेगी बल्कि अपने माता-पिता को सबसे बड़ा दब्बू और नाकाम इन्सान समझेगी जो सिर्फ और सिर्फ जीवन मूल्यों की बात समझते हुए केवल नेकी करना सिखाते हैं जो असल जिन्दगी में हमेशा हारती है। उन लोगों का जिक्र करना आज के वर्तमान सम्बन्ध में बहुत जरूरी हो जाता है जो गलत शादी, गलत जीवन साथी को पाने में धोखा उठाते हैं। उसका कारण परिवार को न देखकर केवल लड़के की नौकरी और तनख्वाह को देखना या फिर सजी-सजाई मीठा बोलने वाली लड़की को देखकर यह भूल जाना कि इस औपचारिकता के पीछे का रहस्य क्या है? जब हकीकृतें खुलती । हैं तो जीना हराम हो जाता है और बात तलाक तक पहुँचती है। जायदाद और घर का बंटवारा फिर बच्चों को लेकर रस्साकशी बिना यह सोचे समझे कि उनकी अपनी लड़ाई में बच्चों की गत क्यों बनायी जा रही है। यह मसला बहुत अहम है। आज मानव अधिकार चेतना बढ़ रही है। कदम-कदम पर कानून का पहरा है। चालाकी और धोखा है। समाज बनावटी चीजों से इतना सज चुका है कि वह अपनी गन्दगी को छुपाने में लगा है परिवार सिकुड़ चुके हैं। संवेदनाएँ या एक तरफा है या शुष्क हो रही है। ऐसी हालत में तरक्की की दिशा जा किधर रही है? ऐसे माहौल से निकलने वाले बच्चे कामयाब आफिसर, बिजनेसमैन और बहुत कुछ बन जायेंगे मगर क्या बन पायेंगे? अच्छे शौहर, बाप और भाई या फिर दोस्त। यही हाल औरतों का है। वह आकर्षण जरूर घरेलू जीवन के प्रति महसूस करती हैं मगर बड़ी नौकरी की कीमत पर नहीं। हर एक को अपना व्यक्तित्व अपनी पहचान चाहिए और जिसे बच्चों से प्यार है वह आराम से गोद ले ले वैसे भी बच्चों की परवरिश के लिए किसके पास टाइम है? आख़िर में पूछा जा सकता है कि यह सब जैसे-तैसे चल तो रहा है खट्टा-मीठा! तो जवाब होगा चलने दें और यह सवाल लेकर परेशान होना बन्द कर दें कि आज की आदम हव्वा का आपसी रिश्ता बिगड़ता जा रहा है पहले वह उसकी जुदाई में लैला...कैस... पुकारते थे अब एक दूसरे को बुरा-भला कहने में एक दूसरे के सिर पर ठीकरा फोड़ते हैं।