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धुएं की लकीर कहानी
February 18, 2019 • वीणा विज

धुएं की लकीर

(यह कहानी अमेरिकन पृष्ठभूमि पर लिखी गई है)

दोपहर से उसका पार्थिव शरीर कमरे के बीचों-बीच कालीन पर पड़ा है। घर में कोई भी नहीं है। उसकी आत्मा अभी वहीं मंडरा रही है। मानो शरीर पर से कपड़े उतारने की तरह उसने शरीर को छोड़ा हो। उसे कोई नहीं देख पाएगा, लेकिन वह देखेगा सब के रंग-ढंग। कहते हैं न कि शरीर को त्यागने के बाद आत्मा वहीं मँडराती रहती है एक-दो दिन तक। अब वह केवल दृष्टेता है, सब की सच्चाई को परखेगा।

साँझ ढले दरवाजे में बाहर से चाबी घुमाने और बातें करने की मिली-जुली आवाजें आईं। वह समझ गया कैली आॅफीस से रौबिन को साथ लेकर आई है। एक ही कंपनी में काम करने से दोनों में गहरी छनती थी। जब तक हकीकत से दो-चार नहीं हुआ था, अबीर उन दोनो के संबंध को सदा संदेह से ही देखता रहा था। कुछ साल पहले की बात है, इंडिया से भाभी आई हुई थीं। एक दिन कैली आॅफिस जाते हुए बोली कि ‘धरा’ ने कुछ सामान मँगवाया है, शाम को रॉबिन के घर ‘धरा’का बैग देने जाना है, रॉबिन सैनफ्रान्सिसको जा रहा है, उसे होस्टल में पहुँचा देगा। अबीर ने सामान बैग में डालकर अपनी कार की डिकी में रख लिया और भाभी को भी बोला कि वे तैयार हो जाएं, इसी बहाने थोड़ा घूमना हो जाएगा। शाम को जब कैली आई तो बैग का पूछकर, उसने बैग अबीर की कार से निकालकर अपनी कार में रखा। इसपर अबीर ने कहा कि हम भी चल रहे हैं, भाभी को थोड़ा घुमा लाएंगे। इसी कार में चलते हैं न! तो अपनी कार में बैठते हुए बोली क्या करेंगे आप सब वहाँ जाकर ? भाभी को फिर घुमा देंगे। और कार घुमा कर ये गई कि वो गई। वे दोनो एक-दूसरे का मुँह ताकते रह गए थे। तभी अपमान का कड़ुआ घूँट पीता अबीर गुस्से से चीखा था, “हरामजादी ! यार के घर जा रही है। हमें कैसे साथ ले जाती ? हमें उसका ‘‘एड्रेस मालूम हो जाता।” भाभी तो कमाऊ पत्नी का रुआब समझ रहीं थीं।  पर अबीर की बात सुनकर तो उनका मन कैलाश उर्फ कैली के लिए कड़ुआहट से भर उठा। (अमेरिका में नाम को छोटा करके बुलाने का भी चलन है ) फिर तो वो जब तक रहीं, उनका स्वाद कसैला ही बना रहा। लेकिन आज अबीर को लग रहा है कि कितना गलत था वो-!

खैर,भीतर आते ही अबीर को जमीन पर गिरे देखकर दोनो चैंक गए। कैली चीखी, ‘‘बी! उसने मुँह के करीब हो देखा कि साँस नहीं आ रही थी। वो जैसे ही अबीर को पकड़कर झिंझोड़ने लगी थी कि रॉबिन ने उसे एकदम पकड़ लिया और बोला कि पहले ‘नाइन-वन-वन‘ को सूचित करो। (अमेरिका में आपातकालीन सेवा के लिए सरकारी गाड़ी का नम्बर) फिर बच्चों और दोस्तों, रिश्तेदारों को फोन करो। पर कैली वहीं घुटनों के बल बैठकर जोर-जोर से रोनो लगी। अप्रत्याशित घटा देखकर वो भयभीत हो गई थी। रॉबिन ने उसे बेटे ‘शान’ का फोन न मिलाकर दिया तो वो काँपती आवाज में बोली,” शान! जल्दी आजा बेटे! तुम्हारे डैड नहीं रहे” शान ‘सैनडिएगो’ में पढता था, वो उसी वक्त वहाँ से चल पड़ा। धरा भी हवाई जहाज से चल पड़ी थी। इस बीच स्थानीय दोस्तों को भी सूचित कर दिया गया। तभी सायरन बजाती नाइन-वन-वन की गाड़ी आ गई सबसे पहले। नीली यूनिफार्म में कोई चार-पाँच लोगों का मैडिकल स्टाफ धड़-धड़ करता पहुँच गया। अपने-अपने अपरेटस ले कर वे मेन गेट की तरफ फुर्ती से लपके। किन्तु कैली ने उन्हें वहीं रोक दिया। टूटने की कगार पर खड़े उनके रिश्ते जैसी हालत में वो बेटे के पहुँचने तक अबीर के मृत-शरीर को बिन छेड़े, उसी तरह पड़े रहने देना चाहती थी। लेकिन अबीर की आत्मा जानती थी सच्चाई। वह वहीं कोने में खड़ा मुस्कुरा कर सोच रहा था कि कितनी घाघ है यह औरत ! बहुत सफाई से बचा गई है अपना दामन कि कहीं बच्चे उस पर शक न करें। क्योंकि एक वही जानती थी अबीर की मौत का कारण। उसका पीला जर्द पड़ा चेहरा बता रहा था कि वह भीतर ही भीतर भयभीत थी कि कहीं उस पर कोई लाँछन न लगे।

तभी आंटी ने आकर कैली को रोते हुए गले लगा लिया। सब मगरमच्छ के आँसू हैं, अबीर समझ रहा है। अभी शाम थी, लोगबाग घर पहुँचकर सपर कर रहे थे। खबर मिलती गई और लोग कैली के पास पहुँचते गए। मिसेस रेड़डी ने तो आते ही जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया। “हाय-हाय क्या हो गया अबीर को, भला-चंगा था, अभी उमर ही क्या थी ?” सबको आते देख सुधा और नीला ने अल्मारी से चादरें निकालकर बिछानी शुरू कर दीं व लाँबी के सोफे पीछे कर दिए। भारतीय माहौल बनाया जा रहा था। (अमेरिका में जब दिल करे भारतवासी अमेरिकन बन जाते हैं, और जब चाहे भारतीय बन जाते हैं। अपनी जड़ो से तो जुड़े हैं न, सब मौके पर निर्भर करता है )।

असल में अबीर और कैली के रिश्ते में कुछ सालों से दरार पड़ चुकी थी-जो बच्चों से छिपी नहीं थी। वे कई बार तलाक लेने की बात करते लेकिन बच्चों की शादी तक गाड़ी किसी तरह खॉंचनी ही पड़ेगी, इतना विचार कर रुके हुए थे। बच्चे जब भी छुट्टियों में घर आते इन दोनो की बहस से तंग आकर घर से बाहर दोस्तों के साथ समय बिताते और फिर चले जाते थे। शाम के समय अबीर ए. एम. सी (अमेरिकन मूवी चैनल) पर मूवी देखने का शौकीन था। ’’ऐसे में कैली भी आँफिस से आ जाती और बुरा सा मुँह बनाकर ” ऊँह!” के साथ कोई न कोई तिरस्कार भरे वाक्य बोल जाती। अबीर अपने कान के पर्दों के फाटक आपस में खुले रखता -जिससे वो वाक्य एक कान से दूसरे कान में होते हुए बाहर निकल जाते। अलबत्ता, क्रोध से उसकी टाँगे कुछ देर जोर-जोर से हिलतीं पर विवश हो शनैः-शनैः रुक जातीं। आखीर आफिस से घर आने पर उसके पास टी. वी.के अलावा होता भी क्या था वक्त बिताने को?

तभी अबीर की आत्मा ने देखा कि कैली ने भीतर जाकर सल्वार-कमीज-चुन्नी पहनी। शायद पाश्चात्य परिधान में रोने का प्रभाव ठीक नहीं रहना था। “हाय कैली! ये क्या हो गया तेरे साथ ? कहती लाली ने आते ही कैली को’’ ऐसे अपनी बाँहों में समेट लिया कि कैली उसके कंधे पर सिर रखकर सुबकने लग गई।उसके सारे दोस्त बैठे उसी की बातें कर रहे थे कि इन दिनों अबीर चुप-चुप हो गया था। (सब सुन अबीर की आत्मा कोने में ठहरी हुई मुस्कुरा रही थी।) रात घिर आई थी।इंडिया भी खबर कर दी गई थी। टन न टन-टन बीच-बीच में टेलिफोन की घंटियाँ बज रही थीं। 9-1-1 के स्टाँफ ने लाश के पास किसी को नहीं जाने दिया। दवाई की अल्मारी के सामने नीचे ठेरों दवाई की गोलियाँ बिखरी पड़ी थीं। एक दवाई की शीशी भी लुढकी पड़ी थी,जिसे नोटिस करते हुए उमाजी ने साथ बैठी लेडिस से कहा, ”लगता है अबीर को घबराहट हुई होगी तो ‘ट्म्स’ खाने लगा होगा, और कुछ खा नहीं सका बेचारा!” तभी सब से उम्र में बड़ी इन्द्रा आँटी तरस खाती बोलीं, ‘अरे कोई कैली को पानी तो पिला ओ। रो-रो कर इसका गला सूख रहा होगा।’ एक कोने में दरवाजे से सटी आधी भीतर-आधी बाहर मुँह में चुन्नी का कोना दबाए खड़ी थी ‘मीरू’-कैली की जान,उसकी अपनी। जो कैली को रोता देख कर आँसू नहीं रोक पा रही थी। उसका अबीर की मौत से कोई लेना-देना नहीं था। इस बात को अबीर के अलावा कोई नहीं जानता था।

असल में कैली और मीरू की बहुत गहरी दोस्ती थी। मीरू नाजुक सी, छोटे कद की, बेहद सीधी दिखती थी। उसका पति काम के सिलसिले में कभी-कभी महीनों बाहर गया रहता था। एकदम अकेली होने से, पीछे सुख-दुख में उसे कैली का ही सहारा रहता था।अबीर इस बात को समझता था। क्योंकि उस की बेटी भी दूर न्यूयार्क में पढती थी। मीरू के पास बेशुमार दौलत थी। आए दिन एक से एक बेनायाब विदेशी सामान से उसका घर सजता था। धरा के फ्लैट के लिए उसी का फर्नीचर भेजा था कैली ने। सारा का सारा सामान सैकण्ड हैंड किन्तु विशेष आधुनिक था। धरा बेहद खुश थी। कैली अधिकतर आफिस से घर आ कर साँझ ढले मीरू के घर चली जाती थी, फिर न जाने कब वापिस आती थी। (वहाँ सब के पास घर के मेन दरवाजे की अपनी-अपनी चाबी होती है ) किसी-किसी शनिवार को जब बच्चों का प्रोग्राम नहीं होता घर आने का, तो ये वहाँ रात भी रह जाती थी। अबीर को इन सब बातों की आदत सी हो गई थी। वह एकान्त में ही अपने को सहेज लेता था। शुरु-शुरु में वो जब कभी रात को कैली के पास जाता तो वो उसे गुस्से से परे धकेल देती थी। एक रात सोई हुई को पहले की तरह प्यार करने लगा तो, उसने खड़े होकर उसे गुस्से से देखा जैसे अबीर ने कोई पाप कर दिया हो। और उस दिन से उसने अलग कमरे में सोना शुरु कर दिया।

शान आ पहुँचा था। बाहर खड़े सारे मर्द उसके साथ-साथ भीतर आए। ’नाइन-वन-वन’ का स्टाफ कार्यशील हो उठा। उन्होंने लाश का मुआइना शुरू करने के लिए शान के द्स्तखत करवाए, और सब कुछ टैस्ट कर के बताया कि मानसिक-तनाव बहुत अधिक बढ जाने से हार्ट-फेल हुआ है। इसके पश्चात वे बाहर निकल गए क्योंकि ‘धरा’ रोती-बिलखती आ कर अपने डैड की बौडी से लिपट गई थी। ”डैड आई नीड यू, वेअर आर यू डैड? गैट अप -गैट अप।” और अबीर को झिंझोड़ने लग गई। वहाँ जितने लोग थे सब की आँखें नम हो गईं। ( अपनी लाडली को बिलखता देख कर अबीर की आत्मा भी बिलख उठी,किन्तु किसी को क्या पता।) शान भी बहन के साथ हिचकियाँ लेकर रो रहा था। कैली ने रोते हुए धरा को सँभालना चाहा तो माँ को तिरस्कृत नजरों से देखते हुए धरा ने उसका हाथ परे झटक दिया। (यहाँ अबीर की आत्मा को बेहद शान्ति मिली ) रोते-रोते धरा भीतर जाकर कमरे में बने छोटे से घरेलू मंदिर के समक्ष बैठकर सुबकने लगी। नीतू, शोभा और लाली आंटी उसके पीछे-पीछे भीतर आईं, पर कुछ कह नहीं पा रही थीं। बेटी का पिता के लिए। ऐसे रोना स्वभाविक था -वो कहतीं भी तो क्या? लाली ने उसे कंधे से पकड़ा व उसकी पीठ पर धीरे-धीरे हाथ फेरती रही। ऐसे में शब्दों से अधिक ‘स्पर्श’ और चेहरे के भाव असल सान्त्वना देते हैं।

डैड की जगह शान आज घर का मर्द बन गया था। डा. दिनकर, अभय व गिरीश अंकल ने उसे सँभाला,और नाइन-वन-वन को उनकी अगली कार्यवाही करने दी। वे अबीर की लाश को ‘मार्चुरी‘ (मुर्दाघर) में रखने के लिए ले जा रहे थे। आज वीरवार था, लेकिन संस्कार शनिवार को 12 बजे होगा (क्योंकि शनिवार को सब की छुट्टी होती है,सब आसानी से पहुँच सकते हैं ) वहीं इकट्ठे होंगे -उन्होंने बताया। अबीर के नए कपड़े उसे तैयार करने के लिए भिजवा दें। ( हाँ मृत व्यक्ति को पूरे मेक-अप से तैयार करते हैं, जिससे उसकी आखरी छवि सब के स्मृति पटल पर सुंदर बनी रहे ) साथ ही बतादें कि ताबूत किस लकड़ी का बनवाना है। (जो जितना पैसा खर्च करना चाहता है उसके अनुसार ही चंदन, रोजवुड, देवदार या चीड़ की लकड़ी का बनवाता है,उसी में मृत शरीर को रख कर बिजली की भट्टी में जलाते हैं।) उसके पश्चात बताया कि इतवार को चैथे पर उठाला करेंगे।

अबीर का मृत शरीर तो जा चुका था लेकिन उस की आत्मा उन सब के बीच ही घूम रही थी। कैली सब के बीच में मुँह ढापे बैठी थी, मानो उसका सब कुछ उजड़ गया हो। उजड़ा तो अबीर था, जो अपने घर की इज्जत बचाने की खातिर किसी को कुछ नहीं बताना चाहता था। कभी-कभी अपनी दैहिक प्यास बुझाने वह ’कसीनो’ जाता लेकिन उसका मन नहीं मानता और वह दो पैग व्हिस्की पीकर मायूस हो, घर आ सो जाता। वह हैरान- परेशान था कि कैली उससे नफरत क्यों करने लग गई है। किसी की नफरत या उदासीनता के संत्रास को झेलना अति पीड़ादायी व दुष्कर है। पर, अपने घर की इज्जत बनी रहे इसलिए वो कभी किसी को बता भी नहीं सका था। सब प्रहार स्वंय ही झेलता रहा। और मानसिक तनाव को अकेले झेलता जहान से चलता कर गया था।

हुआ यूँ कि एक रात अचानक धरा आ पहुँची, जबकि इस सप्ताहान्त पर उसने नहीं आना था। और कैली मीरू के घर दो दिनों के लिए रहने चली गई थी। अबीर ने सोचा कैली को बुला लिया जाए; इसलिए उसने कैली को तीन बार फोन मिलाया। उसने उठाया नहीं। मीरू ने भी नहीं उठाया। इस पर अबीर के मन में संदेह उठा कि हो न हो कुछ गड़बड़ है। उसने कार निकाली और स्वयं ही वहाँ के लिए निकल पड़ा। मीरू के घर के कुछ पहले ही उसने कार पार्क की, और पैदल ही उसके बैडरूम की खिड़की की ओर मुड़ गया। उसे शक था कि जरूर रौबिन वहाँ आया होगा। रात अपने यौवन पर थी,अर्थात बैडरूम में ही जवानी की खिलवाड़ हो रही होगी- यह सोच उसने करीब से देखा। हल्की-हल्की रोशनी पर्दों से छनकर बाहर आ रही थी। उसने कान को खिड़की से सटा दिया। उसने दो औरतों की आवाजें सुनी -साथ ही सुनी उनकी बातें। अप्रत्याशित वार्तालाप! अविश्वसनीय !!

जैसे सैक्स करते समय पति-पत्नी के बीच होती हैं। जब अपने कानो पर भरोसा न हुआ तो उसने भीतर झाँकने का भरसक यत्न किया। कुछ देख पाने पर उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। वह बेहद घबरा गया। अपनी पत्नी और ऐसी-? वह तो क्या, कोई भी ख्वाब में भी इस घिनौनी हरकत के विषय में नहीं सोच सकता था। उसे उबकाई आ रही थी। वह वापिस जाकर कार में आँखें बंद करके बैठ गया।उसे लगा वो गधा है, उल्लू है, बेवकूफ है। न मालूम ये सब कुछ कितने समय से चल रहा था !!! उसे याद आने लगा-

कैली का बराबरी का लड़ना कि वह भय खा जाता था। मीरू के पति का कई-कई दिनों तक न होना और इस पर कैली का उसे पुचकारना व प्यार भरी नजरों से देखना। कैली का आधी रात के बाद घर के दरवाजे में चाबी घुमाना। चुपके से आकर सो जाना। वह जब कभी कैली के पास गया, उसने दुत्कार दिया था। धरा के जन्म के बाद से वो अबीर से धीरे-धीरे दूर होती चली गई थी। कैली की बेरुखी, उस पर ताने कसना,साथ ही मर्दों जैसा रुआब झाड़ना, उसके हाथों की उँगलियों का गुस्से में ज्यादा लम्बा लगना, हाथ में पकड़ा हुआ कोक का कैन ही फेंक देना आदि ढेरों बातें। उससे सह नहीं हो रहा था कैली का यह रूप ! स्वयं की पत्नी को परपुरुष के साथ देखना तो प्रकृति के अनुकूल है किन्तु कल्पना से भी परे परस्त्री संग अप्राकृतिक क्रीड़ाओं में लिप्त देखना-और उसने खिड़की का काँच नीचे खिसका कर वहीं बाहर उल्टी करी थी। फिर कार स्टार्ट कर घर वापिस आ गया। धरा तो कब की सो चुकी थी, वह भी जाकर लेट गया। सालों से उसका बैडरूम किसी ने नहीं बाँटा था। वहाँ व्याप्त था विकराल अकेलापन ! इस एकान्त में शारीरिक भूख की गंदी सच्चाई ने उसे हिला दिया था। उसके सीने में हल्का-हल्का दर्द उठ रहा था- उसे अपनी पहले वाली कैली याद आ रही थी। जो केवल उसकी थी। एक बार खाने की टेबल पर खाना खाते समय किसी बात पर अबीर ने अपना हाथ कैली की जांघ पर रखा तो उसने उसी पल झटके से उसका हाथ परे झटक दिया था। यह तिरस्कार अबीर को भीतर तक गाल गया था। वह नामर्द नहीं था, पत्नी के रहते भी कुछ लोग अन्य स्त्रियों से सम्बंध रखते हैं। लेकिन उसमें संयम था। हाँ, जब कभी मूड खराब होता, मन के अँधेरे कोने में व्याप्त पीड़ा की वेदना उफान मारती तो वह व्हिस्की के दो पैग ले कर सो जाता था। रात के सन्नाटे में दीवार की घड़ी की टिक-टिक से उसकी दिमाग की नसें फटने को थीं। उस की नस-नस में एक खालीपन पसर रहा था कि उसे बाहर के दरवाजे में चाबी घुमाने की आवाज लगी। शायद कैली ने फोन का मैसेज सुन लिया था धरा के आने का -तभी आ गई थी। उसका दिल किया कि जाकर उसे खूब पीटे, लेकिन वह अमेरिका में था -इंडिया में नहीं। धरा भी थी घर में,सो अभी चुप्पी भली थी।

दो दिन रह कर धरा होस्टल वापिस चली गई। इस बीच अबीर मुँह ढाँपे कमरे में ही पड़ा रहा। वह हाँ-हूँ के अलावा कुछ भी बात नहीं कर रहा था। कैली के ऑफिस से लौटने पर उसने उसे आवाज देकर अपने कमरे में बुलाया। वो आकर उसके सिरहाने खड़ी हो गई। अबीर ने एकदम से सीधा प्रहार किया। बोला, ”मीरू के साथ तुम्हारा संबंध अनैतिक और घृणास्पद है-मैं सब जान गया हूँ। तुम मुझे दुत्कारती रही, पर मैंने कभी पराई स्त्री से संबंध नहीं बनाए, मैं तुम्हे ही प्यार करता रहा। धोखेबाज! यू चीटर! दिल करता है तुम्हारा गला घोंट दूँ-स्साली! खुद सालों से कर रही है।”

कैली को काटो तो खून नहीं। जैसे चोरी पकड़े जाने पर चोर उल्टे वार करता है, वो भी छूटते ही चिल्लाई, ”बकवास मत करो। अपने अकेलेपन से तंग आकर नया काम कर रहे हो -मुझ पर बेबुनियाद लाँछन लगाकर, होश में तो हो तुम ? ” और पैर पटकते हुए वहाँ से जाने लगी तो अबीर ने उसकी कलाई पकड़ ली। खींचकर उसे पास बैठा लिया और बोला, ‘तुम्हे प्रूफ चाहिए तो लो सुनो” और उसने सारा किस्सा उसे सुना दिया। अपने ही मुँह पर अपनी करनी का कच्चा चिट्ठा सुन कर वो भीतर तक काँप उठी। लेकिन उसका हाथ झटक कर खड़ी हो पागलों की तरह जोर-जोर से अट्टहास कर उठी। जिस पर अबीर ने घृणा से उसके मुँह पर जोर से थूक दिया। (अमेरिका में आप पत्नी पर हाथ नहीं उठा सकते, सजा हो सकती है।) सोचने लगा कि वो भारत में होता तो इसे बताता।

थूक को जोर से हाथ से पोंछते हुए वो चीखी कि ये उसका शरीर है वो जिस किसी के साथ अपनी मर्जी से उसे बाँटे,उसको इसमें दखल देने की कोई जरूरत नहीं है। अपने पति के बिना महीनों रहने से मीरू प्यार के लिए तड़प रही थी। उसके सान्निध्य से मीरू की दैहिक भूख की तृप्ति हुई और उसे भी आनन्द -भोग हुआ। मीरू के अकेलेपन में रोने-बिलखने से उससे हमदर्दी में प्यार करते समय कब सब बदल गया, उसे मालूम ही नहीं हो सका। अब तो सालों बीत गए है। उसने तो मीरू को जीवन दान दिया है। हँसी-खुशी दी है। यह दो दिल, दो बदन मिलने का संबंध है, फिर वो किसी के भी हों। वह दोषी नहीं है। उसे कोई शर्मिंदगी नहीं है। यह कहते हुए उसने मारने के लिए अबीर की गिरेबान में हाथ डालना चाहा लेकिन अबीर अपना गिरेबान छुड़ाकर घर से बाहर निकल गया। कार में बैठते ही उसने आँखें बंद कीं और दोनो हाथों से अपने बाल नोच लिए। वो क्या करे, क्या न करे; उसे कुछ सूझ नहीं रहा था। उसने कार घुमाई और अपने दोस्त डाॅ. दिनकर के घर चल पड़ा। पहले भी वे कई बार साथ बैठा करते थे। ऑपचारिक बातों के पश्चात उसने जो भी पूछा और जो कुछ समझा- वह हैरान कर देने वाला था। उसने पूछा, ”यार ! एक बात बता- क्या साधारण स्त्री जो दो बच्चों की माँ बन चुकी हो, क्या कभी वो समलैंगिक में बदल सकती है? पति के होते हुए भी उससे संबंध न रख कर; क्या पर-स्त्री से संबंध बना सकती है?

उत्तर- तूं यह सब क्यों पूछ रहा है?

बस, यूँ ही कुछ पढ़ रहा था। अपना संशय मिटाना चाहता हूं।

डा. बोला-“ये शरीर के कैमिकल इमबैलेन्स का खेल है। जैसे कि औरत या मर्द में एस्ट्रोजन की कमी या बहुतायत होने से हार्मोन का इमबैलेन्स हो जाना है। एक यह कारण है। (कई लोग इसका होना, औरत की ड्लिवरी के बाद कुछ हद तक मानते हैं।) दूसरे, हारमोनल इमबैलेन्स मानते हैं। कई बार तो वे समलैंगिक भी हो जाते हैं और भिन्नलैंगिक भी साथ-साथ बने रहते है। लेकिन अधिकतर ये समलैंगिक ही बने रहते हैं। अपने प्राकृतिक स्वभाव व शारीरिक बनावट के अनुसार वे स्वयं एक-दूसरे में ही संतुष्टि पा लेते हैं। मनुष्य मात्र का इस पर वश नहीं रह पाता है। हमारा भारतीय समाज इसे मान्यता नहीं दे सका। लेकिन पश्चिम में यह मान्य है।”

सब बातें सुनकर अबीर समझ तो गया किन्तु दिल मान नहीं रहा था। उसने उनके साथ ही डिनर किया और घर वापिस आ सोने का उपक्रम करने लगा। जहाँ तक वो जानता था बिन ब्याही सहेलियाँ ‘लैस्बियन’व बिन ब्याहे दो पुरुष जो आपस में यौन-संबंध रखते हैं- ‘गे’ होते हैं। न्यूज में ऐसी चर्चा होती ही रहती है, खासकर आजकल। लेकिन एक स्त्री का पहले साधारण रहकर बच्चे पैदा करना फिर असाधारण होकर समलैंगिक बन जाना-ये हजम न होने वाली बात थी। हमारे समाज में इसे स्वीकारना बेहद कठिन व दुश्कर है। हमारे भीतर इस विषय में जानते ही घृणा की लहर व्याप्त जाती है। फिर कैसे-? कैसे वह स्वीकार कर ले? उसके बच्चे शरम व ग्लानि से कुछ भी वाहियात कदम उठा सकते हैं। वह अपने दोस्तों, रिश्तेदारों को क्या बताएगा कि उसकी पत्नी-!!!

वह एकान्त में चीख उठा, नहीं-नहीं। इस अनैतिक संबंध के पर्दाफाश की शर्मिंदगी वो अपने आप में सह नहीं पा रहा था। सारी रात सो न पाने के कारण वो सुबह आफिस नहीं जा सका था। घर की चुप्पी मे उसे अपने सिर की नसें फटती लग रही थीं। सीने में भी रह-रह कर दर्द उठ रहा था।वह डगमगाता हुआ मैडिसन की अल्मारी तक पहुँचा और ‘टैलीनौल’ निकालने लगा, तो दवाइयो की शीशी व दवाइयाँ सब हाथ से छूट कर वहीं नीचे बिखर गईं। साथ ही न मालूम दिल की धड़कन रुक गई कि दिमाग की नसें फट गईं। वह वहीं जमीन पर बिछे कालीन पर गिर गया और उसका दर्द सदा के लिए चैन पा गया। कमरे के कोने में उपस्थित वह सोच रहा है कि घर में फैली दूषित अग्नि में स्वयं की आहुति देकर उसने पीछे एक ‘धुएं की लकीर’ छोड़ दी है, जो हौले-हौले व्योम मे फैलकर अपना अस्तित्व खो देगी। जिससे उसके परिवार, उसके बच्चों पर कोई निशां नहीं रहेगा।

-जालंधर, मो. 9464334114