ALL संपादकीय पुस्तक कहानी कविताएँ ग़ज़लें लघुकथा लेख पत्रांश साहित्य नंदनी बिरासत
नवगीत
September 19, 2019 • हर्ष कुमार हर्ष

अब कभी अभिभूत होता

है नहीं यह मन

छूटे उपवन सुखद-सुमंगल

चाहों की सरगम

सुन चिड़ियों का चीख-चिल्लाना

दिन जग जाता है

 

तिमिर भरा हर दिवस लगे

जो तुम न पास रहे

सजधज की न रहे तमन्ना

दर्पण धूल चखे

संकलपों की साँकल जर्जर

बेकाबू होकर

तानें-मेने व्यंग्य-बोलियों

से भरती आँगन

 

पीड़ाएँ उमड़ी नवगीतों

की परियाँ बन-बन

संवेदन जतलाने बैठे

पेट-पोंछने भाव

नाखुन चबा विसर्जित करती

रही अचंचल चाव

दूध-धुले विश्वासों वाले

चुम्बन रूठ गये

पगली पायल की चूड़ी से

होती है अनबन

 

सपनों का आधार और

आकार रहे सहमा

पत्थर बन न सका कलेजा

मुट्ठी में उलझा

महुआ फूला, महकें फूलीं

मन का ठूठ बुझा

पलकें बिछी रहीं राहों में

गिरे नहीं शबनम

किससे दिल का बोझ बँटाए

अर्धमृत यह तन