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नींद
September 11, 2018 • केदारनाथ सिंह

जहाँ गोली

चिड़िया के डैने में घुसती है

जहाँ रोटी पानी में गल जाती है

मैं ठीक वहीं से बोल रहा हूँ

 

कुछ चेहरे मुझे दिखाई पड़ रहे हैं

कुछ चेहरे मुझे बिल्कुल दिखाई नहीं पड़ रहे

 

मैं एक खोंते से निकलता हूँ

और शहर में घुस जाता हूँ

मैं शहर से निकलता हूँ

और एक बहुत बड़ी माँद मुझे दिखाई पड़ती है

 

कोई था जो चला गया है

अपने नख और जबड़ों को छोड़कर

कोई नहीं था जिसके न होने की तीखी गंध

चारों और फैली हुई है

 

 मुझे पहली बार लगता है मैं अकेला नहीं हूँ

मैं अकेला नहीं हूँ इस बस्ती में

क्योंकि कहीं न कहीं आलू भूने जा रहे हैं

कहीं न कहीं बच्चे बैठे हैं

एक लम्बी और सफेद दाढ़ी को घेरकर

और दाढ़ी से काले चीते बाहर निकल रहे हैं

 

जहाँ भूख 

शर्म से अलग होती है

जहाँ काले चीते

भुनते हुए आलू की खुशबू में बदल जाते हैं

मैं ठीक वहीं से बोल रहा हूँ

 

मुझे नींद के लिये

किसी बेहतर शब्द की तलाश है।