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पारो
December 27, 2018 • सुदर्शन प्रियदर्शनी

धरावाहिक उपन्यास

पारो

प्रणय, प्राण और प्रारब्ध एक दस्तावेज़ीय अवलोकन

 

...चैदहवीं किश्तः में आप ने पढा- ... पारो रोज़ अपने अंदर उतर कर अपने अतीत को कुरेदती रहती, गाँव की गली-गली, बूटा बूटा उसे किसी न किसी याद से जोड़ देता। बारिश में पारो भीग गई। तभी उसने देखा एक बग्घी आकर उसके निकट रूक गई। यह रानी माँ- देव की माँ थी। उन्होंने पारो को बुलाया और बग्घी में बैठा लिया और कहा- ‘‘पारो, मुझे तुमसे कोई गिला नहीं’’ पारो की व्यथा आज गल कर आँसुओं में बह गई और वह बहुत हल्का महसूस करने लगी। रानी साहिबा का व्यवहार जहाँ उसे एक विजयी भाव दे गया वहीं वह कहीं और भी पराजित हो गई। यह सोचकर, क्या कोई कमी थी उसके प्यार में जो यह सब देव और मेरे प्यार की गहनता को नहीं समझ सके......

मैं सारा रागद्वेष छोड़ कर भी अगर रायसाहेब को देखूं तो मुझे उन के कई रूप दिखाई देते हैं। एक परंपारिक सामंती रायसाहेब जो पुरुष के अहंकार से ग्रस्त है और दूसरी ओर कहीं एक नीचे दबा हुआ एक हारा हुआ पुरुष, एक आहत पति। वह पति जिस ने अपने समस्त प्यार को उड़ेल कर भी प्यार नहीं पाया। एक अतृप्त आत्मा। एक सूखे रेगिस्तान के दुह में चिनवा दिया गया स्तूप, अडिग पर तेज हवा के झोंके में झूलता हुआ। सब से कमजोर प्रणय प्रार्थी पति जिसे अपनी एक पत्नी की प्रताड़ना के बाद दूसरी पत्नी की सायास अर्जित अवहेलना मिली। सच में, वह केवल दया के पात्र बन कर रह गये हैं। अपनी ही ज़मीन पर हारे हुये सिपाही अपनी ही रक्षा टुकड़ी से पराजित हताहत!

पारो ने सोचा- बिचारे कैसे प्रार्थी हैं, न कर पाते हैं और कहते हैं कि पारो! तुम ठीक तो हो।

अपने आप में क्या बड़बड़ा रही हो पारो! मुझे भी बतायो क्या सोच रही हो!

तुम अभी यहीं हो गये नहीं।

अपने प्रश्न का उत्तर लिये बिना कैसे जाऊँ।

अब तो माँ ने भी हमें क्षमादान दे दिया है, अब काहे की बेचैनी, काहे की दुविधा।

यों बैचेनी तो आज कल चली ही जायेगी पारो पर जो दोनों तरफ घाव लगे हैं, जो अन्दर तक दिलों की चिराई हुई है इस में कहीं जगहँसाई भी शामिल है। उन सब की दुवेच्छा भी इस में शामिल है वह सब क्या जुड़े सकेगा ?

माँ की बेबसी, माँ की विह्वलता सोच कर मन कहीं गहरे अतल में डूब जाता है। हम उन सब की व्यथा का कारण बने। उन के दृढ़ दुर्ग की जड़े हिला कर रख दी। उनकी मान्यतायों को ठोकर मारी अपने प्यार के स्वार्थ के लिये। पारो कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति विशेष के लिये इतना विवश क्यों हो जाता है, क्यों वह सारी सीमाएँ लाँघ जाता है, राहों का मुख मोड़ देना चाहता है ?

दिन रात जितना तुम्हारे प्यार के लिये बिसूरता हूँ उतना ही अपने माता पिता की विवशताओं की आग में जलता हूँ,  झुलसता हूँ। उन्होंने वही किया जो उन की परम्परा ने उनसे करवाया। वही किया जिसे उस समय नादानी ही सही पर उन्हंे उचित लगा। बदले में मैंने उनके सारे उपकारों को लालन पालन को,समर्पण को, लाड़ प्यार को त्याग कर माचिस दिखा दी। उन्हें सदैव के लिये तड़पने के लिये छोड़ दिया। यहाँ तक कि पिता के तर्पण के समय भी मेरे पांव नहीं संभले। उन्हें मुखाग्नि तक नहीं दे पाया पारो, क्या कर दिया तुमने, कैसा जादू डाला कि मैं आज तक सुध बुध खोये हूँ...। आज भी संभल नहीं पाता। जब तक तुम्हें एक आंख देख न लूँ, जैसे आत्मा तड़फने लगती है। ऊपर से तुम इतनी दुष्ट, जिद्दी हो कि आज भी इस भूल भूल्लैया से निज़ात नहीं पाने देती। मैं माँ बाबा के लिये पश्चाताप की अग्नि में जलता ही हूँ साथ ही तुम्हारे अधूरेपन के लिये भी बिसूरता हूँ....। तुम मुझे मेरा आत्मदान नहीं दोगी तो मैं उम्र भर एक भटकी हुई आत्मा बन कर रह जाऊँगा। तुम्हें सुखी देख कर रायसाहेब के साथ पत्नी के रूप में देख कर ही मेरी आत्मा की तृप्ति होगी। क्या इतना भी नहीं कर सकती मेरे लिये।

पारो! अप्रतिम होकर देव को देखने लगी। उस की आंखों में अजस्र आँसू उमड़ पड़े। वह अपनी आत्मग्लानि में ध्वस्त हो उठी। एक अपराध बोध में वह घिर घिर आई।

क्या हम सचमुच इतने दूर हो गये हैं!

क्या हमारे बीच एक दूसरे के लिये कुछ करने की कोई इच्छा नहीं बची। क्या सब कुछ मर गया है जो कभी हमारे बीच कुछ था ही नहीं   या जो था वह मर गया है। हाँ या न के बीच झूलते आधे से ज्यादा दशक बीत गई है शायद। क्या ऐसा भी होता है कि होने के चिन्ह उम्र भर नहीं जाते और जियोलोजिकल शब्दावली में फासिल बन जाते हैं पर अन्दर से अपने असली वजूद को लिये हुये पूरी धड़कन के साथ।

आज तक उन क्षणों को छूने के लिये हाथ बढ़ाने नहीं पड़ते वे स्वयं ही उपस्थित होकर ऊपर नीचे भरपूर बाहों में भर लेते हैं।

कभी पारो सोचती है इतना भी क्या एक व्यक्ति के वजूद का अहसास जो काली स्याही सा लगे और कभी छूटे ही न। शरीर के अन्दर से भी अन्दर कहीं जोंक सा चिपका बैठा रहे और रक्त मांस चेतना सब कुछ हज़म कर जाने के लिये उद्यत। सारे वजूद को ग्रहण लगा जाय और उस की छाया मैं उम्र भर सारा व्यक्तित्व सारे बंसत, हर, बौर हर, आषाढ़, बस धूल धुसरित होकर डालडाल सुबकता रहे। उन छुअनों को अपने ऊपर महसूस कर सारी उम्र अछूते बने रहो  दुनियां की और कोई छुअन और कोई पराग तुम्हें बाहर से ही स्पर्श कर निकलता रहे और अन्दर से तुम्हारा वही दूषित पर अपने आप में नया नकोर पहले वाला बंसत बौराता रहे।

प्रकृति की हर डाल  जंगल का हर पेड़ पौधा झर जाय और बौरा जाय, नये रंग में, नयी महक में और नयी छवि में पर मुरझाया मन कभी दूसरे पात पर झूल न सके। यह कैसी विडम्बना है मानव मन की। इस में विद्वेष नहीं, ईर्षा नहीं, केवल एक मात्र समर्पण रह जाता है अकलुष, पवित्र, पावन, ओस की बूंदों की तरह झिलमिलाता हुआ।

रोज सोना पड़ता है, वे बारिश की बूंदें आज भी हथेलियों में नम क्यों है? जंगली रास्ते की सनसनाहट आज भी क्यों शरीर में सिहरन भर देती है, बीच बीच में खड़े होकर अंधेरों को निगलने के लिये क्यों तुम्हारी बाँहें, क्यों ऊपर तक उठ कर प्रकाश भर देती हैं। क्यों ओठों पर कोई नम सी किरण हिचकोले लेने लगती है ? उन हिचकोलों में एक बार सारी कायनात भूकम्पग्रस्त हो जाती है। अब तक के और उस के पहले के सारे अनुभूत भुकम्प धाराशायी हो गये हैं। पर उस के चरण आज तक कलेजे को रौंध रहे हैं। ऐस क्यों ?

ऊपर वाले ने दो जीवों के बीच यह कैसी संरचना की है कि छूने भर से ब्राह्मंड डोल जाता है और उम्र भर उन हिचकोलों से आप उबर नहीं पाते। ध्वंस के बाद भी आप उन्हीं हिचकोलों में झूलते रहना चाहते हैं। आज तक वही छुअन, वही सिंहरण हर रात

प्राणों पर दस्तक देती है और इतना साहस नहीं होता कि बंद किवाड़ खोल पाऊँ और किसी अतीत हुये दिन को छू सकूं। किसी बीते पल की संवेदना को फिर से रूबरू होकर जी सकूं। कुछ हाथ नहीं आता केवल उन क्षणों का अन्दर समाया हुआ पिष्टपेषण ही हाथ आ पाता है अंगुलियों से फिसलता हुआ। तब नहीं पता था कि आज के हाथ आये हुये मीठे पल कल इतिहास हो जायेंगे। जबकि उस समय वे केवल आम चलते फिरते क्षण लगते थे जो हमेशा मुट्ठी में बंद रहेंगे पर आज तो वे मोहनजोदड़ों की खुदाई में भी न मिलेंगे। इसी लिये जो कल था वह स्वयं ही न जाने कब इतिहास में लुढक गया और अतीत जीवी बन कर खंडकर मात्र रह गया।

समय का हर पल, हर दिन किसी गर्त में समाता जाता है और स्मृति शेष के पदचिन्हों पर हम सारा जीवन अर्पण करते रहते हैं। वे स्मृतियों के पल वर्तमान को भी लील जाते हैं और एक रोमानी अतीत छोड़ जाते हैं जिस से लटके लटके हम आज का वर्तमान निभाते चले जाते हैं।

मनुष्य का बाहरी रूप उस अन्दर के वुजूद से मेल नहीं खाता इसी लिये जब आप अपने हृदय को टटोलते हैं तो परत दर परत किस्से कसीदों के धात्रौ की तरह खुलते चले जाते हैं। जिस की नींव बड़ी गहरी होती है और उन से वर्तमान का मुँह सदैव धुआंसा हुआ रहता है। एक आवरण के नीचे दूसरा आवरण एक मानव के अन्दर दूसरा मानव समा जाता है जो कभी अपने पर हँसता है तो कभी बिगड़ता है।

आज पारो यही महसूस कर रही है कि वह आज के इस पड़ाव पर किस पारो को जिये! वह पारो जो देवदास के साथ मर चुकी हैं या उस पारो के साथ जिस ने देव की माँ का दंभ तोड़ने के लिये या अपनी माँ की झूठी अहमव्यता के समक्ष अपनी बलि दे दी थी  या उस पार्वती के साथ जिसे पहले ही दिन पति ने अपनी नकार का निर्णय दे दिया था। आज पारो को यही दुविधाएँ तलवार की धार की तरह काटती है। इन सब के बीच वह कहाँ है। उस का एक निष्ठ प्यार कहाँ है। उस का देव कहाँ है? जिसके नाम की लौ के साथ वह दस साल जीती रही और उसे बुझने न दिया। वह तो एक निहत्थी नारी है जो रायसाहेब की तरह अपने प्यार को स्वीकार भी नहीं कर सकती खुले आम जता भी नहीं सकती कि मुझे पत्नी पद से नकार कर आप मुझ पर कितना बड़ा उपकार कर रहे हैं न मैं पार्वती हूँ न पारो।

वह पारो भी कहाँ रही जो देव के उम्र भर के सिक्के संभाल कर रखने वाले की न बन सकी। उस की हो न सकी जो छोटी छोटी न्यामतें पोटली में बांध कर उसे अपने साथ संजोये रहा। जब उन स्मृतियों के भरे खजाने को खोल कर उसके सामने रखा गया वह मर क्यों नहीं गई उस देव के साथ! आज वह किस पार्वती को जीये! किस पारो को अद्र्धा चढ़ाये। या कोई नयी पारो गढे जिसे मालूम हो कि वह देहरी लांघ कर भी उम्र भर अछूती रह सकती है। लोग उम्र भर साथ निभाने के लिये साथ रहते हैं पर हर दिन साथ रह कर भी उम्र भर अनछुये रह जाते हैं। एक दूसरे को पाकर भी विलग रहते हैं क्योंकि शरीर मिलन बाहरी है मन का मिलना नहीं हो पाता। उम्र भर इस अधूरेपन का ढोल बजा बजा कर अपने खलावों को तृप्त करते रहते हैं। क्या ऐसे बनावटी खोल में मैं उम्र भर रह सकती हूँ! जी सकती हूँ! एक धोखे का जाल बुना रहने दे सकती हूँ...।

पर पारो तुम आज भी तो वही कर रही हो यह आवाज सच है उस आवाज का टेटूँआं कैसे दबा सकती है।

पिछले पांच सालों से मैं अपने साथ, देव के साथ, माँ के साथ, रायसाहिब के परिवार के साथ, इसी आडम्बर और झूठ का किरदार निभा रही हूँ। रायसाहेब की माँ मुझे कितना प्यार करती है पर मैं उन्हें भी तो छल रही हूँ। मेरे और रायसाहेब के बीच क्या घट रहा है वह तो बिल्कुल अनजान हैं। रायसाहेब ने भी सामाजिक गरिमा का ओढ़न ओढ़ रखा है। अन्दर से तो उन्हें पहले दिन से पता है जब उस पहली रात उन्हें मैंने भी दबंग होकर उत्तर दिया था

मैं आप की प्रतिज्ञा और कटिबद्धता को हँसी खुशी निभाऊँगी और रायसाहेब भौच्चक होकर देखते रह गये थे....।

तुम्हें यह स्वीकार है।

जी! मुझे पूर्णतयः स्वीकार है।

रायसाहेब पर जैसे घड़ों का पानी पड़ गया था। कैसे एक औरत इतने बड़े रायसाहेब को ठोकर मार रही है। पुरुष का अहम् फूत्कार उठा था। वे कमरे में बदहवासी में चक्कर काटते रह गये थे और मैं वहाँ से निकल आई थी। सारी रात दालान और छत की महरौली पर चक्कर काटती रही थी क्योंकि मालूम नहीं था कि किस कमरे में जाऊँ और सिरहाने पर सिर रख कर सुकून से आँख बंद कर सकूँ।

सुबह होते होते एक कमरे का अधभिड़ा दरवाजा ठेल कर मैं एक सोफे में धँस गई थी और लगभग दस बजे दरवाजे पर जोर की दस्तक के साथ रानी माँ अन्दर आ गई थी और मुझे भौच्चक विस्फारित दृष्टि से अपलक निहारती रह गई थी कुछ पूछना चाहकर भी कुछ पूछ नहीं सकी थी। क्योंकि वह तो इसके पीछे का इतिहास जानती ही होगी। उन्होंने उसी तरह चुपचाप दरवाजा भेड़ कर मुझे वहीं अलसाने के लिये छोड़ दिया था।

उस दिन मैं अपनी जिंदगी की एक बहुत बड़ी बाजी जीत गई थी  जिसके समक्ष मैं आज भी अपना सिर झुका सकती हूँ। उस दिन के बाद आज तक यही लगा कि रानी माँ जैसे एक अपराधी बन कर मेरे प्रति बहुत विनीत हो गई थी यह उनकी लाचारी थी। और मेरे प्रति उन की सद्भावना भरी सहानुभूति। रानी माँ ने आम माँओं की तरह कभी यह नहीं जताया कि कहीं मुझ में ही कोई कमी रही होगी कि मैं रायसाहेब को अपना नहीं बना सकी।

वह सदैव अपने हाव भाव में अपने पुत्र की मंशा के समक्ष छोटी होती रहीं और मेरे लिये यही मेरी जीत थी। पत्नी बन अपने आप को सौंपना शायद नारी का बड़ा त्याग है। विशेषता जहाँ उस के मनसा वाचा कर्मणा में संयुक्तता नहीं है। जहाँ उसके लिये यह एक चुनौती हो जाता है। यों तो कितने पति पत्नी होते होंगे जो जीवन में संर्वाग समर्पण कर सकते होंगे अन्यथा वे केवल सामाजिक समझौतों मंे ही जीते हैं। और अन्दर से अधूरे और खाली रह जाते हैं।

क्या हम केवल दुनिया की खुशियों के लिये अपनी फूल झड़ियाँ जलाते रहें। हम जन्मे है तो हमें अपनी खुशियाँ भी चाहिये  हमारे हिस्से की जो हमारा हृदय प्रज्जवलित कर सके। हमारे अन्दर अपना दीया जला सके। पर ऐसा होता कहाँ है! बाहर का उजाला अन्दर आता भी है तो दुबका दुबला। एक बार बुक्का मार कर कोई सिंदूर की तरह फैला नहीं देता हमारे माथे पर। हम उसी नकार में जीते चले जाते हैं। उसे अपनी नियति समझ कर और कभी अपनी हीनता समझ कर। मेरे साथ भी आज तक यही हुआ है। फिर भी मैं भाग्यशाली हूँ कि मुझे अपनी किसी हरकत की जवाबदेही नहीं देनी पड़ी। घर में रस्सी बंधे लहू की तरह चक्कर काट काट कर गोल घूमती रही है और कहीं नहीं पहुँचती रही हूँ....।

कहीं भी पहुँचना, न पहुँचना और पहुँचना चाहना या न चाहना अन्ततः हमारे अपने ही हाथ में होता है। हारते और जीतते भी हम अपने से ही हैं। कोई बाहर वाला हमें मात नहीं दे सकता। इस लिये यह लड़ाई भी मेरी अपनी ही है। यह न मैं देव के लिये लड़ रही हूँ न रायसाहेब के लिये न अपनी माँ के लिये न रानी साहिबा के लिये। इस की गोटी केवल मैं स्वयं हूँ। अब मेरी अन्विति क्या है  यह मुझ पर निर्भर करता है। मैं स्वयं कितनी सशक्त और अडिग रह सकती हूँ या अपने आप को रखना चाहती हूँ  यह मुझे कोई समझा नहीं सकता।

जीवन में संबंधों के उलझावों में उलझते सुलझते हम पटकियां खाते खाते जीवन ठेलते रहते हैं। यद्यपि हमें कहीं मालूम होता है कि सब कुछ हो जाता है सब कुछ अन्ततः चल निकलता है। कहीं किसी के होने से या न होने से कुछ भी रुकता नहीं हैं। किंतु हम फिर भी अबोध रूप में उस पत्थर को अपने ऊपर हावी होने देते हैं। जैसे हमारा मरना जीना उसी निर्णय पर टिका हो......

 

सुदर्शन प्रियदर्शनी