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पारो
December 11, 2018 • सुदर्शन प्रियदर्शनी

पारो

धरावाहिक उपन्यास

...बारहवीं किश्त में आप ने पढा- रायसाहेब बेटी कंचन के बारे में बात करने पारो के पास आए और पूछा कंचन कैसी लगी और पारो ने बताया भोली और सहमी हुई है। क्योंकि जवाब में रायसाहेब ने कहा शायद उसके पालने में कुछ गलतियाँ हुई हैं। शायद समय के साथ बहुत बड़ी दिखने लगी है। उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें माँ और बाबा का प्यार नहीं मिला। विस्तार में जाने से पहले पारो के सामने फफक पड़े, रायसाहेब अंदर तक पिघल चुके थे। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि वह पारो को कैसे बताएं कि वह कितने अहमी और स्वार्थी थे, पारो ने महसूस किया कि रायसाहेब में खास परिवर्तन आ चुका है। उसने रायसाहेब को आश्वसत किया कि वह भरसक प्रयत्न करेगी कि कंचन को वह प्यार दे सके। रायसाहेब के जाने के बाद पारो एक शून्य में डूब गई। सोचती काश! मैं अपने अतीत को भुलाने की शक्ति जुटा पाती। माँ ने अपनी बीमारी का बहाना बना पारो को गाँव बुलाया था-सच यह था कि देवदास के पिता भुवन चौधरी स्वर्गारोहन की स्थिति में थे, देव के पिता को मैंने मन से क्षमा कर दिया था-मेरी ओर से आश्वस्ति और क्षमादान पा कर उनकी आंखों में आंसु थे। माँ की ओर से संबंधों में आयी तरेर को दुरुस्त करने का प्रयास था। माँ को मन ही मन इस अवसर के लिए धन्यवाद अवश्य दिया था, वरना उम्र भर मन में एक अपराध बोध रह जाता, फिर भी न जाने क्यों माँ को क्षमा नहीं कर पाई.....।

        यों उन्होंने अपनी बेटी की भलाई ही चाही थी- किंतु उसके पीछे किसी अहम् की जो तुष्टि उन्होंने की थी और उसके लिये मेरी बलि चढ़ा दी- यह आज तक मेरे गले से नहीं उतर सकी। विडम्बना यह है कि हम बाहर वालों को जाने देते हैं उनकी की हुई शत्रुता भूल जाते हैं पर अपनों को  क्षमादान नहीं दे पाते।।

        पर अब वह सब अतीत है जो व्यतीत हो चुका है। समय के गर्भ में समा गया है। आज उस के अवशेषों पर बैठी मैं बिसूर रही हूँ जिसका कोई अर्थ नहीं है। धर्मदा के साथ बैठ कर मैंने । घंटों देव की बातें की थीं। जब कभी देव घर आये- घर से लड़ कर गये। कोई उन्हें समझ नहीं पाया। भाबी के व्यवहार से व्यथित और गलत समझे जाने की पीड़ा से पीड़ित। काश! मैं उनकी वह पीड़ा बांट पाती।

      हम सदैव चाहते हैं अपनों की पीड़ा बांट लेना पर नियति की यह प्रकृति नहीं है। हमारे अपने-अपने त्रास हैं, दुःख हैं, पीड़ायें हैं जो केवल हमें ही झेलनी होती है। उस की बांट भाग नहीं हो सकती और कभी हुई भी नहीं। पर मैं मां के इस आमंत्रण को स्वर्ग की न्यामत से कम नहीं समझती। दुनियां की सहस्र । नियामतें भी इस सुकून को नहीं खरीद सकती।

      इतनी बड़ी दुनियां में अगर देखें तो कहीं-कहीं, क्या-क्या घटता रहता है कि हमारी ये चिंतायें, बाधाएं, पीढ़ाएं कोई भी । अस्तित्व नहीं रखती। हम अपने इन छोटे-छोटे दायरों में इन छोटे-छोटे धागों में बंधे इन्हीं में उलझते-सुलझते अपनी पीड़ा को बना कर उठक-पटक करते रहते हैं। अपने ही दुःख–सुख का एक विराट घेरा बना लेते हैं और उसी धुरी की इर्द-गिर्द हमारी दुनियां घूमती-घूमती एक दिन थम जाती है।

      धर्मदा ने बताया कि एक दिन देव आये तो अपनी पुरानी संदूकची को टटोलते रहे और कहने लगे- धर्मदा - पारो मिले तो उसे कह देना- मेरे न रहने पर यह संदूकची ले जाय- इसमें । मेरे जन्म-भर की पूंजी है जो सिर्फ पारों से जुड़ी है। पारो की पायल, पारो की सिंदूरी डिबियां, बिना पैरों की गुड़िया, कुछ बेमेल चुड़ियाँ और वह छोटी-छोटी कागज की पर्चियां जिन पर वह कुछ न कुछ लिख कर और मरोड़ कर सब के बीच बैठी भी मुझ पर फेंकती रहती थी। आंखों ही आंखों से मुझे पता चल जाता था कि पारों ने इस में क्या लिखा होगा। फिर भी मैं अपने को रोक न पाता और सब के बीच से उठ कर दूसरे कमरे में जाकर खोलता तो पता है धर्मदा... उस में क्या लिखा होता.... देव! देव! और बस देव! कितनी पागल है न पारो! धर्मदा-

       भला मुझे मेरा नाम लिख कर क्यों दे रही है। पर वे सब बचपन की बातें थीं। तब इन चीजों की गहराई और समझ अपनी उस समझ से परे थी... फिर पारो को उस उम्र में भी कैसे पता था धर्मदा! मैंने जिंदगी का सब से बड़ा पाप किया कि भुवन चौधरी के घर जन्म लिया... मैं स्वयं एक कायर इन्सान हूँ धर्मदा.... मैं अपने प्यार को न बचा सका। पारो! मुझे कभी क्षमा नहीं कर सकती। उसे एक परायी भट्टी में झोंक दिया जिस में वह उम्र भर बस जलती रहेगी...। 

पर देव बाबू! आप भी तो...

       मेरा क्या है धर्मदा. मैं तो काट लूंगा- मुझे तो केवल अपने से लड़ना हैं पर उसे तो सारे समाज से, पति से, ससुराल से और सबसे ऊपर अपने-आप से लड़ना है। कितनी लड़ाईयां लड़ेगी। पारो। वह भी अकेली। धर्मदा! कल को मैं न रहूँ... तो भी तुम उस का ध्यान रखना....।। देव बाबू! आप क्यों इस तरह स्वयं को हवन कर रहे हैं। 

     देव बाबू! आप क्यों इस तरह स्वयं को हवन कर रहे हैं। मालकिन ने कितनी अच्छी-अच्छी लड़कियां देखी थी आप के लिये आप भी घर बसा लीजिये न देव बाबू... कब तक दर-दर भटकते रहेंगे....।

     अरे! धर्मदा- आप नहीं समझोगे। छोड़िये इस बात को पर आप यह संदूकची....

     नहीं! देव बाबू मुझे से यह काम न होगा। आप ही दे गा। आप ही के दीजियेगा और मैंने वह संदूकची उन को वापिस सौंप दी। पर एक दिन मैं जरूर ढूंढ कर आप को दूंगा- क्या पता उसमें देव ने कुछ विशेष रखा हो आप के लिये.....।।

      हाँ धर्मदा! आप जरूर ढूंढ़ियेगा- मैं उसे अपने पास रखना। चाहती हूँ...। उन्हें देव ने बार-बार छुआ था.. मैं अपने आप में। बुदबुदाती रही थी। मैंने धर्मदा को जाने के लिये कह दिया था। मैं उस क्षण केवल अपने साथ होना चाहती थी। मेरी आखें बरस रही थी- बस उस संदूकची की कहानी सुन कर। एक सुनहरा अतीत आंखों में उठ खड़ा हुआ था- साक्षात-सजीव-पारो! पारो कहता हुआ देव का स्वर मेरे कानों में गूंजने लगा।

      उस के बाद मैं एक दिन दबे पांव सब की नजर बचाकर कोठी गई.। भुवन चौधरी तो जा चुके थे पर मैं उस घर के चप्पे-चप्पे को, उस घर की हवा को, उस घर की चारदीवारी की मिट्टी को ईटों को, बारहादरी की भव्यता को, मेहराबों को, पीछे की फूलों वाली बावड़ी को जैसे एक बार फिर अपने अन्दर धारण कर लेना चाहती थी। मैं अपनी आत्मा में उस सुगंध को गहने तक उकेर लेना चाहती थी। मैं उस उजास के कुंये की गटक । लेना चाहती थी अपनी सांसों में। इतनी दूर तक, इतनी गहराई तक कि उम्र भर वह मेरी सांसों में महकती रहे। मेरे अन्दर जैसे एक अथाह गड्डा खुद गया था- जो खाली था और अपनी भरपाई चाहता था। मैं उस घर में कहीं भी बची हुई देव की सांसों को पी लेना चाहती थी। देव के कपड़ों की सुगन्ध अपने । आंचल में बांध कर ले आना चाहती थी। उसके कागज, पैंसिल, पैन, कोट, अचकन-ऐनक सभी एक जगह रखे थे- जी चाहता था सब कुछ चुरा लें। लेकिन रानी मां से पूछे बिना यह नहीं हो सकता था- इस लिये धर्मदा को पकड़े रखना चाहती थी। यह काम केवल धर्म–दा ही कर सकते थे।

      लगता था अब की इतने दिनों बाद गांव आई हूँ तो सब कुछ चुरा लूं जो पीछे छूट गया था या छोड़ गई थी। वे बीते हुये पल, वह सुख, वह हवा के झोंके, वे लहराती पेड़ों की डालियाँ वह ओस भीगी हरीतिमा... जिन का महत्व आप तब नहीं समझते जब आप उन पर चल रहे होते हैं या उसमें बीत रहे होते हैं। वह सारी सम्पदा खुदाई बनती है बीत जाने के बाद। रीत जाने के बाद ही आप अपना लोटा भरना चाहते हैं। जब भरा हुआ होता है तो रीतने का डर अन्दर नहीं होता।

       मैं सुबह-सुबह माँ को बताये बगैर उन खेतो-खलियानों, गलियारों और सड़कों पर निकल जाती थी जिन पर हम साथ-साथ चले थे कभी। जिन पर हम न जाने कितनी बार बड़े झगड़े मिले-बिछुड़े थे। आज वे मेरे लिये जैसे दरगाह बन गये थे। एक पूजा स्थल, एक तीर्थ स्थान-पावन-पवित्र धाम। मैं किसी दूसरी ही दुनियां में पहुँच गई थी। सचमुच प्रेम शस्त्र नहीं शक्ति है- अराधना के फूल हैं नैवेद्य नहीं।

       उन खेतों की मुडेरों के हर पग पर देव की परछाई मेरे पीछे-पीछे चल रही थी या मैं उस परछाई का पीछा कर रही पाई थी। कुंआ जैसे औंधा पड़ा था या मेरी चेतना ऑधी होकर उन गली-गलियारों में धूल-धुसरित होना चाह रही थी। यहाँ न वैभव की दीवारे थी न सास की चिरौरियाँ, न मेरी अवमानना। यहाँ केवल मैं अपने साथ थी। मैं देव के साथ थी। अब तो देव के घर की ऊँची हवेली की बुर्ज भी ढह गई थी। वहाँ भी वीराने सांय-सांय कर के सारी महलनुमा कोठी को पराजित कर रहे थे।

      क्या यही है जीवन! यहीहै माया का मोह, क्षणभंगुरता-नाश! कुछ भी तो नहीं टिकता.. सुना था पर आज आंखों से साक्षात देख रही हूँ...। इसी नश्वर तामझाम के पीछे हम दौड़ा करते हैं।

       मैंने सोचा था- मेरी आसक्ति भी नष्ट हो जायेगी देव के साथ पर मेरी आसक्ति नहीं गई और भी परिपक्व हो गई है। हाँ उस की भक्ति कहीं अंधकार में तिरोहित हो गई है। देव की स्मृतियों के सहारे मैंने अपने अधूरे सपनों को जीवित रखा है जब कि उनकी बैसाखियों तक टूट गई हैं।

       चलते-चलते पारो ठिठक गई- उसे लगा कहीं से धुंआसा करने वाला कोहरा उठ रहा है और उसकी आंखों को धुंधला कर रहा है- ऐसे में उस का हाथ किसी ने पकड़ लिया है- वह छुड़ाना चाह रही है पर पकड़ बड़ी मजबूत है..

       कौन हो–छोड़े मेरा हाथ! पारो पारो!

        पारो पारो!

        और पारो का शरीर कपकपायमान हो उठा उस के ओठो से बेतहाशा निकला-देव! यह तुम हो! आज इतने दिनों बाद मैंने सोचा तुमने मुझे भुला दिया है....

       कैसे भुला सकता हूँ पारो! जब तक तुम जीवन के साथ समझौता नहीं कर लेती- मैं यहाँ से नहीं जा सकता। अब तो बाबू जी ने भी तुम्हें क्षमा कर दिया है। अब किस की प्रतीक्षा है तुम्हें।

        पारो! निढाल सी होकर शून्य में ताकने लगी और अब देव ने उस का हाथ छोड़ दिया था- पर उसके स्पर्श की झुनझुनी उसके सारे शरीर पर छा गई थी। उस का रोम-रोम झंकृत हो उठा था। उसके माथे पर भयातुरता की किनियां उतर आई थी। आज वह डर गई थी अपने ही देव से।

डर गई क्या पारो!

            हाँ देव! आज तो तुम ने मुझे डरा ही दिया- यहाँ इस पत्थर पर बैठो- पारो! याद है यह वही पत्थर का टीला है- जिस पर तुम बैठ कर डालियों को अपनी तरफ झुका कर बैर । तोड़ती थी और हम एक दूसरे से छी-छीन कर खाया करते थे- या कभी-कभी ईमली भी इसी तरह खा जाते थे।

पारो! जैसे अपने आप में भूली हुई थी। वह एक असमंजस में थी। एक अचम्मे में थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके हाथों पर अभी भी देव के हाथों का दवाब क्यों महसूस हो रहा था। वह अपने हाथों को अपने गालों से छुहा रही थी और उनके स्पर्श को अपने अन्दर उतार नहीं थी।

 देव अन्यमसक सा होकर उसे देख रहा था। वह देख रहा था पारो- पहले से कितनी क्षीणकाया हो गई है। चिन्ता की " सहस्र लहरे उसके अपने वायवी अस्तित्व को लील रही थीं।

 तुम्हें क्या सता रहा है पारो!

 यह भी पूछने की बात है। तुम तो सब जानते हो!

नहीं पारो! जहाँ तक तुम्हारा सवाल है, तुम्हारी अथाह व्यथा हैं- मैं अब कुछ भी नहीं जानता। मेरी बुद्धि, मेरी चेतना, मेरा ब्राह्मांड कुछ भी नहीं कर पा रहे तुम्हारे लिये। काश! तुम मेरा अधूरापन समझ रहीं होती।

 क्या फुसफसा रहे हो! क्या सोच रहे हो- खुल कर कहो न।

 तुम्हें कुछ भी कहने का अर्थ ही क्या है!

 क्यों!

 तुम कौन सा मानती हो मेरी बात।

 तुम बात ही ऐसे करते हो कोई क्या माने।

तुम्हारे पास और कोई विकल्प है क्या!

 हाँ है न! मैं तुम्हारे पास आना चाहती हूँ...।

पारो! देव ने चीख कर कहा

ऐसे मत चीखो देव! मैं डर जाती हैं और अस्त-व्यस्त होकर स्वयं को खो बैठती हूँ.. मैं पहले ही बड़ी दुविधा में हूँ.

अब कौन सी दुविधा है।

 स्वयं रायसाहिब....

 अब क्या कहते हैं तुम्हारे रायसाहिब- मेरे बारे मेंतुम्हारे बारे में-

 अब कुछ नहीं कहते। इस बात से वह स्वयं लज्जित हैं....।

 यह कैसे हो गया।

 क्योंकि रायसाहिब स्वयं आहत हैं।

 क्यों क्या हुआ...।

मुझे उन्होंने अपने मुँह से तो नहीं कहा- पर वातावरण घुले पंछी उड़-उड़ कर बता रहे हैं-

क्या ...। 

राय साहिब की पत्नी ने आत्महत्या की थी।

क्या! यह क्या कह रही हो पारो। वह तो उसे बेहद प्यार करते थे न! ।

 इसीलिये तो....

 यह क्या कह रही हो!

 हॉ देव! यह प्यार और घृणा बड़े अजीव भाव हैं। मूल-भाव बने रहें तो अपनी सीमा में रहते हैं। पर जब इनके साथ अतिश्योक्ति के अनुभाव जुड़ जाते हैं तो यही भाव भयानक असुर बन कर डस लेते हैं।

तुम कहना क्या चाह रही हो पारो!

 पूरी कहानी तो मुझे मालूम नहीं पर कुछ छिटपुट इधरउधर से जो सुना वह यही कि रायसाहिब की अतिरिक्त आसक्ति ने उनकी पत्नी का दम घोंट रखा था। स्वतंत्रता के लिये सांस नहीं बची थी उसके पास...

 तुम्हें कैसे पता!

 एक दिन रानी मां को रायसाहिब को ताना-मारते सुना। पहली पत्नी की आत्महत्या का। रायसाहिब बहुत आहत हुये थे। यों मैंने सारी बात नहीं सुनी थी पर उस के बाद बहुत जल्दी ही रायसाहिब का रुख मेरे प्रति बहुत बदल गया।

कैसा बदलाव पारो।

 अब वह उस फिराक में रहते हैं कि बहाने-न बहाने से मेरे नजदीक आ सके। मुझ से बात कर सकें और अपना मन बहला सके। 

देव! उनका यह रुख मुझे अस्त-व्यस्त कर देता है।

 अच्छी बात है वह अपनी बैचेनी और दुःख तुम से बांटना चहाते हैं। पत्नी के साथ अपनी पीड़ा न बांट सकें वह हतभागा ही तो होगा ना पारो..!

तो मैंने बनाया है उन्हें हतभागा।

हॉ पारो! इस में तो दूसरी राय नहीं है मेरी।

जायो! यहाँ से मुझे तुम से कुछ नहीं कहना।

काश! तुम्हें छोड़ कर जा सकता।

 पारो ने देखा- वह जिस शून्य में बतिया रही थी वह केवल एक कोहरे भरा दिन है। जिस में छायायें और प्रति-छायें उभर रही हैं। न जाने कैसे एक शून्य में अपने आप से बात करने लगती हैं- जैसे देव सचमुच उस के आस पास हैं और उस की बतों का उत्तर दे रहा है। क्यों वह इतनी हताश हो जाती है रोज के रोज।

वह जब भी आंखों पर हाथ धर-आंखें बंद कर के बैठती हैं तो न जाने कहाँ-कहाँ विचरने लगता है उस का मन। कभी भूत में। कभी भविष्य में और कभी वर्तमान में लोटने–पलोटने लगता है... स