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पावस रितु- कविता
August 16, 2019 • सरोज गौरिहार

पावस रितु,

करती मन मानी,

बात न मानी।

बरसे वहाँ,

ताल भरे हैं जहाँ,

या ना बरसे।

मोर पुकारे

सीपिका खोले खड़ी

अंतर द्वार।

सूना सूना सा,

धरती का आँचल

सूखे हैं खेत।

निहार रहे,

नयन कृषक के

नभ की ओर।

बीता आसाढ़,

सावन रीता गया

बिना बरसे।

तरस रहा,

चातक लिये आस

अपने उर।

प्यासा पपीहा,

पियु पियु पुकारे

निहारे नभ।

और ये बादल,

इतराये से फिरे

रूकें न कहीं।

कौन मनाये,

समझाये इनको

मान लो बात।

तृप्त कर दो,

तनमन धरा का

भिगो दो उसे।

अच्छी होती है,

बरखा समय की

बरस जाओ

अरे बरस जाओ।