प्रताप जी के लिए-(देखा-समझा देस-बिदेस से गुजर कर)
September 9, 2019 • प्रमोद त्रिवेदी

अपने सफर में प्रताप जी ने

कहाँ-कहाँ

खुद को कितना छोड़ा

और कितने बने रहे तब भी-

प्रताप सहगल?

हर यात्रा लेती है सब से कुछ-कुछ

और जगह बना लेती हैं

सैलानी में स्मृतियाँ!

ये तो खेलती हैं तरह-तरह के खेल!

अब की बार जब पहुँचेंगे

एफ-101, राजौरी गार्डन

वह पूछेगा -'आप कौन?'

सहगल साहब तो निकल गए हैं-

आदतन, नए सफर पर।

मैंने कहीं नहीं जाना।

न पाना,

न होना,

न खोना,

न छूट चुके के लिए

बिसूरना-रोना।

अपनी दुनिया में जड़ीभूत

एक कथा खुद-

अपरिवर्तनीय!

चैंकता घबरा कर

तो वहीं का वहीं

कुछ उलट-पलट लेता।                       

आप चाहें तो आसानी से तब्दील कर सकते हैं मुझे

तब्दील, किसी कथा में!!!

फाड़ भी सकते हैं घबरा कर

उस मनहूस गल्प को...

धूल खाए जूते,

जुराबों में बसी गंध,

मैले कपड़े,

और भी बहुत कुछ बतला रहे हैं।

 

अभी-अभी लौटे हैं आप-

एफ-101, राजौरी गार्डन

घर आपको खींच ही लाया!!!

रिजार्ट, सुविधाएँ, उत्साह,

लजीज खाना

नए लोग-नई पहचान

फिलहाल सब स्थगित।                       

मन नहीं बात करने का।

सफर हुआ पूरा, तब भी मन कहीं-कहीं भटक रहा!

अपने ही घर से रिश्ता जोड़ने की

नए सिरे से कोशिश।

कोशिश नए सिरे से संवाद शुरू करने की-

अपने ही घर से..!

भीमबेटका,

ओरछा,

जबलपुर नक़्श आप में

उज्जैन-माँडव की स्मृतियाँ

अब भी ले जाती हैं

रूपमती की रागदारी में

अचरज में आप कि-

इतिहास की नृशंसताओं में भी

राग के स्वर भंग नहीं हुए!!!

माफ करें,

आपकी दिल्ली मुझे तिलिस्म-सी लगती है

और उसके बंद दरवाजों की चाबी नहीं है मेरे पास।

टिकूँ तो मरण

और भटकूँ तो भी...!

समाया है यहाँ समय,

समय में....

लोग को ढूँढो तो मिलते हैं मुखौटे!

मैं पूछता हूँ प्रताप सहगल का ठिकाना,

मुखौटा कहता है-

'ढूँढो कहीं राणा प्रताप में....

एक आदमी की तरह आना

और लौटना चाहता था-

मैं,

दिल्ली से।

 

दिल्ली से साबुत कोई नहीं लौटा आज तक।

पढ़े होंगे आपने- 'खतरों से सावधान' के सूचना पट

पर कर दिया उन्हें अनदेखा।

खतरों से रू-ब-रू होने की ललक

ले गई आपको आगे।

चकित करने वाले खतरों ने

खींच लिया अपनी ओर!

साहसी ही लाते हैं कुछ नायाब

बाँधकर अपनी पोटली में...

उन्हीं खतरों के आसपास रच सकते हैं

चाहें तो एक उपन्यास!

(या स्थगित कर सकते हैं)

हर कोई कहता है- 'यह दिल्ली तो सचमुच नरक!'

फिर क्या है कि जन्नत का टिकिट कटवाते हुए

नहीं भूलते,           

                                                                               

दिल्ली वापसी का टिकिट कटवाना।

ऐसा क्या है आखिर

उस दिल्ली में?

खोलूँगा जब भी सफे

दुबारा,

उसी दृश्य के बीच मैं नए दृश्य के सामने होऊँगा!

भिन्न होगा,

उसी समुद्र या पहाड़ का रंग।

वह मेरी आँखों का नहीं,

उन शब्दों का जादू होगा!!

हवा छुएगी तो

उसकी ठण्डक या तपिश भिन्न होगी!!

इसी किताब में मैं,

कोई अलहदा किताब पाऊँगा,

प्रताप सहगल में ही     

                                               

एक सर्वथा भिन्न प्रताप सहगल!

नए सिरे से रिश्ता जोड़ते नजर आएँगे!!!

पता नहीं,

यह फैंटेसी उन्हीं शब्दों ने रची

या मैंने

या समय के अन्तराल ने!!!

अपने पहले पाठ में छुपा रह गया जो-जो

आ रहा सामने चमत्कार की तरह !!!

शुक्रिया!

अपनी आँखों से दिखा दिया वह सब

जो मैं नहीं देख पाता

जहाँ-जहाँ पाया 'ओरछा'

इन्हीं वर्णाकृति में नजर आई बेतवा!!!

सुनाई दी उसकी 'कल-कल'।

दिखाई दी अयोध्या से आ रही राजा राम की सवारी!!!

 

नजर आए कोई नया छन्द पूरा करते आचार्य केशव!!!

शुक्रिया।

शुक्रिया।

शब्दों के मार्फत मैं समय के पार जा सका!!

इन्हीं में नजर आए मुझे

कितने ही खिड़की-दरवाजे

मिली धूप और हवा

मैं इसी धूप और हवा से रू-ब-रू हो

दाखिल हो सका

अचरज में....!!!!