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फर्ज़- स्व. मौ. व अप्र. लघुकथा
August 19, 2019 • किशोर श्रीवास्तव

घायल मरीज़ को दिखाने के बहाने वह आतंकवादी उस डाक्टर को मोटर साइकिल पर बैठालकर अंधेरी रात में भाग निकला था। वह उसका अपहरण कर उससे फिरौती में तगड़ी रकम वसूलना चाहता था। जब डाॅक्टर को सच्चाई का पता चला तो वह उसकी पकड़ से छूटने की कोशिश करते हुए चीखने-चिल्लाने लगा।

शोर सुनकर राह से गुज़रते हुए एक पुलिसवाले की नज़र उन पर पड़ी तो उसने आतंकवादी पर गोली चला दी। परन्तु उस आतंकवादी ने घायल होने के बावज़ूद डाॅक्टर और मोटर साइकिल से अपनी पकड़ ढीली नहीं होने दी।

अंततः गंतव्य तक पहुंचते ही उसकी मोटर साइकिल से पकड़ कुछ ढीली हुई और वह लड़खड़ाकर फर्श पर गिर पड़ा।

रात भर उसे होश न रहा। सुबह जब उसे होश आया तो उसने अपने आपको बिस्तर पर पड़ा पाया। उसके शरीर पर जगह-जगह पट्टियाॅं बंधी हुई थीं, और इधर-उधर दवाइयाॅं बिखरी पड़ी थीं।

उसने आश्यर्चचकित होकर डाॅक्टर की ओर देखा और उसके सामने सवालों की झड़ी लगा दी, 'तो क्या तुम रात भर यहीं रहे, मुझे बेहोश पाकर तो तुम भाग भी सकते थे, क्या तुम्हें अपनी जान का खतरा तनिक भी महसूस नहीं हुआ?'

हाॅं... और शायद नहीं भी..., दरअसल, जिस तरह से तुम बेकसूरों को मारने के अपने पेशे से बंधे हुए हो, उसी तरह से मैं किसी घायल को इस तरह से असहाय छोड़कर न भागने के अपने फर्ज़ से बंधा हुआ था।' डाॅक्टर ने जवाब दिया।

आतंकवादी की आंखों में पश्चाताप के आॅंसू छलक आए थे।