ALL संपादकीय पुस्तक कहानी कविताएँ ग़ज़लें लघुकथा लेख पत्रांश साहित्य नंदनी बिरासत
मध्यवय की ओर बढ़ती स्त्रियों उत्साहित रहो
June 4, 2019 • मेधावी जैन

अपने पारिवारिक जीवन के दौरान अक्सर महिलाएँ स्वयं को कुछ ज्यादा ही इन्वेस्ट कर देती हैं, चाहे वे भावनाएँ हों, संवेदनाएँ अथवा शारीरिक निष्ठा। चूँकि महिलाएँ

अधिकतः घर पर ही रहती हैं सो प्रत्येक रिश्ते संग अधिक समय बिताती हैं. चाहे वह बच्चों के साथ हो, पति के या अन्य रिश्ते जैसे सास, ननद इत्यादि। समय बीतने के साथ साथ वे स्वयं को और अधिक शामिल करती रहती हैं, यह निहितता अनजाने में उम्मीदों के एक अमूर्त सेतु को जन्म देती है जो उन्हें यकीन दिलाता है कि हो न हो एक दिन ये सारा प्रेम एवं समर्पण उन्हें वापस मिलेगा। किंतु यह बात गलत साबित होती है (कम से कम अपने कमजोर क्षणों में उन्हें ऐसा लगता है) क्योंकि परिवारजनों की दृष्टि में वही सेतु अनुदत्तता (ग्रांट) का होता है, जहाँ घर की महिला हमेशा, प्रत्येक परिस्थिति में सबके लिए उपस्थित है चाहे वह किसी की बीमारी हो, घर की देखभाल, छोटी-छोटी चीजों की ढूँढ़ या कुछ और इसी सिलसिले में एक

गृहणी होने के नाते मैंने भी कुछ-कुछ पंक्तियाँ, समय-समय पर लिखीं हैं जिन्हें मैंने इस लेख में पिरोने का प्रयास किया है. आशा है कि कई महिलाएँ इनके साथ स्वयं को कहीं न कहीं जुड़ा पाएँगी।

समय बीतने के साथ प्रत्येक स्त्री विनम्र होती जाती है क्योंकि वह जानती है कि चिड़चिड़ाहट में कुछ नहीं रखा। वे अपने बड़े होते बच्चों की बदमिजाजी से धैर्यपूर्वक निबटती हैं एवं औरों की चालाकियों को अनदेखा करना भी सीख लेती हैं।

मेरी मुस्कराहट को लोग मेरी मूर्खता समझते हैं/मेरी विनम्रता को मेरा सीधापन/मेरी मौन सहनशीलता को कायरता मानते हैं/कहते हैं, 'यह सीधी है, इसे तो कोई भी बेवकूफ बना सकता है/वे नहीं मानते कि मैं मुस्कान से विपरीत वातावरण को हल्का रखने का प्रयास करती हूँ/सब कटुताएँ, चालाकियाँ समझती हूँ/किन्तु मानती हूँ कटुता वापस लौटाने से कटुता और कटु होगी/एवं सहनशीलता को मैं निर्भयता कहती हूँ/मैं

सीधी नहीं, जीवन के प्रति समर्पित हूँ/जानती हूँ कि धोखा केवल स्वयं को दिया जा सकता है।

जीवन के इस मुकाम पर वे बेहद नजदीक रिश्तों का विश्लेषण करती भी दिखती हैं।

जीवन के कई पड़ावों पर आभास होता है कि भाई-बहन केवल अपने प्रेम द्वारा, आपस में इस रिश्ते को मिलकर खींच लेंगे. किन्तु कभी शीघ्र तो कभी कुछ समय पश्चात् उन्हें यह अहसास होता ही है कि उनका रिश्ता माता-पिता से होकर जुड़ा है। बिना माता-पिता के रिश्तों का औचित्य बहुत तेजी से घटता है।

और तब हम चिंतन करते हैं, 'जब सब रिश्ते अंत में बेकार ही साबित होने हैं तो आखिर व्यक्ति रिश्तों में पड़ता ही क्यों है?'

जब बच्चे युवा होने पर अपने अपने जीवन की उड़ान भरने हेतु घर से बाहर जाने की तैयारी करते हैं, वह स्वयं को व्यस्त रखने के तरीके ढूँढ़ती है।

वह उदास सी अन्तस् के दरवाजे से गुजर रही थी/ अन्तस् औजार लेकर तोड़-फोड़ में लगा था/उसने पूछा, 'क्या कर रहे हो?'

अन्तस् ने कहा, 'दोनों बच्चे बड़े हो अपनी उड़ानों में व्यस्त हो रहे हैं ना! तुम व्यस्त रहो सो मैं तुम्हारे लिए एक नया पथ तैयार कर रहा हूँ।

वह आँखों में आँसूँ भर मुस्करा दी।

वह चुपचाप प्रत्येक रिश्ते पर गहनता से विचार करती है एवं धीरे-धीरे स्वयं को किसी भी प्रकार की विपत्ति के लिए तैयार करती है।

जिन रिश्तों का मैं ताउम्र दंभ भरता हूँ/कोई साथ नहीं जाता, अकेले ही मरता हूँ/और तब सोचा करता हूँ/स्वयं को इस काबिल बनाना है/ कि यात्रा अकेले ही तय कर सकूँ/साथ में सब हों तो उम्दा/अन्यथा किसी से कोई शिकायत न करूँ.।

जब मेरे बेटे ने बारहवीं के पश्चात् बाहर जाकर पढ़ने का फैसला किया तो एक ओर तो मैं ख़ुश थी किंतु दूसरी ओर दुविधा में थी क्योंकि मैं देख पा रही थी कि यह केवल उसके जीवन का नया पड़ाव ही शुरू होने नहीं जा रहा अपितु मेरे जीवन में भी एक नया पड़ाव आने को है. यह उसका मुझ पर छोटी-छोटी चीजों के लिए निर्भर रहने वाले ख़ुशनुमा पहलू का अंत था. अंततः लेखिका होने के नाते मैंने उस फेज से निकलने के लिए ये पंक्तियाँ लिखीं.

जब तुम अपनी छोटी-छोटी चीजों को ढूँढ़ने के लिए मुझ पर निर्भरता जताते हो/तब चिक-चिक करती मैं आकर झट से वह ढूँढ़ देती हूँ/तब भीतर से मैं कितनी ख़ुश होती हूँ/तुम नहीं समझोगे.....

तुम्हारा बड़ा होना, आगे बढ़ना बेशक सुकून देता है/किन्तु उसके एवज में जब मेरा बच्चा मुझसे दूर होता है/यह कितना कष्टकर होता है/तुम नहीं समझोगे...

अब विद्यालय का प्रांगण छोड़/तुम विश्वविद्यालय जाने की तैयारी में हो/स्कूल के लिए प्रतिदिन मेरा तुम्हें जगाना/किस क़दर मेरी दिनचर्या का हिस्सा था/तुम नहीं समझोगे...

तुम उत्सुक हो, बेपरवाह/जीवन से भरा लबालब प्याला पूरा पीने को/जिन्दगी को आगोश में लेने को/मैं ख़ुश हूँ बहुत/चाहती हूँ तुम जीवन पूर्णतः जियो/इस क़दर कि कुछ बच न रहे/किन्तु तुम्हें यूँ जाने देना/जो करो, करने देना/बस यूँ ही क्यों मुझे भावुक किए देता है/तुम नहीं समझोगे....

यूँ तो मेरा और तुम्हारी दीदी का प्रेम जगजाहिर है/किन्तु फिर भी मेरी चेतना के केंद्र में तुम क्यों हो/तुम नहीं समझोगे..

और तब एक स्त्री समाज से यह मौन प्रश्न करती प्रतीत होती है।

नया रिश्ता आरम्भ होने पर मोह-बंधन तो सब सिखाते हैं/किन्तु उसमें भिन्न मोड़ आने पर स्वयं को कैसे संभालें/यह कोई नहीं सिखाता।

बच्चे अपनी ज़िन्दगियों के साथ आगे बढ़ जाते हैं, वे माता-पिता हैं जिन्हें यह अवस्था सर्वाधिक कठिन लगती है क्योंकि बच्चों के बिना घर पहले जैसा नहीं लगता। वह घर जो सदैव उनकी युवा ऊर्जा, संगीत, आने-जाने वाले ढेरों दोस्तों और 'आज खाने में क्या बनेगा' जैसे प्रश्नों से ओत-प्रोत रहता था. उन्हें स्वयं को समझाना ही पड़ेगा किः

जिस प्रकार माता-पिता के लिए बच्चे सब कुछ हो सकते हैं, ज्ञात रहे उस प्रकार बच्चों के लिए माता-पिता सब कुछ नहीं हो सकते और यदि होते भी हैं तो इससे उनके अन्य रिश्तों के पनपने में अभाव रहता है। वैसे भी झरना चाहे जल का हो या प्रेम का, सदा ऊपर से नीचे की ओर ही बहता है चूंकि यही नियम है, यही उत्तम है।

पुनः अपने कमजोर क्षणों में स्त्री चिंतन करती है/बच्चे बाहर से घर लौटें तो माँ दिखनी चाहिए, घर पर मिलनी चाहिए/पिता शाम को थके हारे दफ्तर से घर लौटें/तो माँ का मुस्कराता चेहरा स्वागत में तत्पर मिलना चाहिए/किन्तु माँ सबसे अधिक स्वार्थी है/माँ अकेले रहने से घबरातीं हैं/माँ को हर समय, सब चाहिएं।

और तब एक दृढ़ स्त्री होने के नाते वह स्वयं को समझाती है कि यदि वह घर में हर किसी का संबल हो सकती है तो स्वयं का क्यों नहीं? और हमेशा की तरह वह हल खोज लेती है और जीवन के पथ पर शांतिपूर्वक आगे बढ़ती है।

जीवन के इस दोराहे पर कुछ रिक्तता सी उभरी है/इसे उदास रहकर भरूँ या रचनात्मक होकर/तरजीह मेरी है।

शक्ति का रूप होने के कारण वह स्वयं को प्रोत्साहित करती हैः

हाँ, तुम कर सकती हो/वर्षों से तुमने केवल समर्पण सीखा है/हर रिश्ते, हर परिस्थिति में खुद को अर्पण करना सीखा है।

अपनी चेतना को तुमने सदैव औरों में ढूँढा है/तुम्हारे त्याग को सबने स्वीकृत करना सीखा है

अब वक्त है, अपनी चेतना को निज में समेटने का/स्वयं की संतुष्टि के लिए कुछ करने का।

अब समय है, अपने पंखों को इस्तेमाल करने का/गगन में निर्भय हो ऊँची उड़ान भरने का।

हाँ, तुम कर सकती हो/तुम घर और बाहर एक साथ/

समान सुगमता व विनम्रता से संभाल सकती हो

चूँकि तुम और कोई नहीं, स्वयं शक्ति हो

इसी के साथ मैं प्रत्येक स्त्री को उसके जीवन एवं उसमें उपस्थित संघर्षों से शांतिपूर्वक निबटने के लिए शुभकामनाएँ देती हूँ और इस लेख को यहीं समाप्त करती हूँ।