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मशाल क्रांति की....
August 31, 2018 • सत्यप्रकाश सिंह ‘सत्या'

रहे सदा प्रयास ये, मशाल क्रांति की जले ।

बयार में सुगंध है, नया - नया विहान है।

प्रफुल्य सी धरा लगे, नवीन गीत गान है।

सुदूर पूर्व देश से , दिनेश चक्षु खोलते।

हुआ विहान जान के, विहंग पंख तोलते।

 

विदा निशा हुई तभी प्रभात को लगा गले ।

रहे सदा प्रयास ये मशाल क्रांति की जले।

 

कपोत श्वेत रंग के, सियासते उड़ा रहीं ।

अखंड सत्य धर्म की जमीन को छुड़ा रही।

असंख्य लाल मात के, मिटे मिली स्वतंत्रता।

शहीद का लहू पड़ा जमीन पे पुकारता ।

 

अमीर क्या गरीब क्या, सभी उठो चलो चले।

रहे सदा प्रयास ये मशाल क्रांति की जले ।

 

सुषुप्त राष्ट्र –भक्ति का पड़ा हुआ जमीर है।

प्रपंच पाप जो रचे, वही यहां अमीर है।

निदान भूख रोग का अबूझ है व गूढ़ है।

यकीन आप मानिए स्वतंत्रता अपूर्ण है।

 

कभी किसी गरीब का, न सूर्य आस का ढले ।

रहे सदा प्रयास ये मशाल क्रांति की जले।

 

मिटे न आन -- बान ये, दहाड़ते चले चलो।

कि धर्म जाति की जड़े, उखाड़ते चले चलो।

पढ़े सभी बढ़े सभी , ध्वजा कभी झुके नही।

करो कृपा यही प्रभू , कि कारवां रुके नही।

 

न ईस्ट इंडिया पुनः , समाज को कभी छले ।

रहे सदा प्रयास ये मशाल क्रांति की जले ।