मुखौटा
September 9, 2019 • गुलेर

प्राकृतिक संज्ञा - नाम ख़राब हो जाने के डर से, जिस आवरण को ओढ़कर हम समाज को भरमाने निकलते हैं, उसे मुखौटा कहते हैं। बच्चों में मुखौटे का बड़ा चलन है, शारीरिक निर्बलता के चलते, बड़ों की दुनिया में सबलता प्रदर्शित करने के प्रयास में मेले से मुखौटा ख़रीद लाते हैं। उसे पहन कर सबको डराते हुए सबल होने का आडंबर करते हैं। बच्चों की बात जुदा है, बड़ों को उनसे डरने का अभिनय करना भी चाहिए। बच्चे में सबलता प्रबल होती है और बड़े का मनोरंजन हो जाता है। निदा फाजली ने कहा भी था - “घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो, यूँ कर लें/किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए।”

परिस्थितियाँ हास्यास्पद तब होती हैं जब बड़े मुखौटा पहनने की जिद्द करें। हालाँकि बड़ों के मुखौटे बच्चों से निराले हैं, इनके आकार अलग और प्रकार भिन्न होते हैं। मसलन आप एक बीज हों... जिसकी नियति झाड़ होना है, और तदृच्छा1 से किसी बरगद के नीचे गिराए गए हों। वैसे बरगद के नीचे होना एक सुखद अनुभव है; जीवन की जेठ के थपेड़े नहीं खाने पड़ते। परंतु चैत्रवृक्ष2 के नीचे पेड़़ नहीं हुआ जा सकता..... इसलिए आपको झाड़ होकर जीने में आनंद नहीं आता, क्योंकि आसपड़ोस के तथाकथित पेड़, आते-जाते ताना देते हैं - “बाप बरगद और बेटा झाड़!” उसपर झाड़ की महत्वकांक्षा पेड़ हो जाने की और नैसर्गिक3 पहचान पर संकट के बादल मँडराने लगते हैं...। किसी विचारक ने कहा था - 'हर व्यक्ति महत्वपूर्ण होता है। परंतु, यदि आप मछली की परीक्षा उसके पेड़ चढ़ने की योग्यता से करेंगे, तो वह आजन्म बेवकूफ होने के भ्रम में जियेगी।' ...इधर झाड़ को झाड़ होना स्वीकार नहीं उधर बरगद पेड़ बनने नहीं देगा, इसी अंतर्द्वंद्व में झाड़ अपनी पहचान से मुक्ति चाहता है।

आत्मद्वंद्व को कर्म-वेदी पर, प्रयत्नाग्नि में स्वाहा करना कठिन कार्य हो सकता है, तो चलो नशे का मुखौटा ख़रीद लाते हैं। जितनी देर दिमाग में नशा होता है, विचारों पर मुखौटा चढ़ जाता है। नशे की आढ़ में झाड़ विस्तृत देवदार हो जाता है जिसका शिखर आकाश को

बींधता हुआ, आनंद की चरमसीमा को पार करते हुए, साक्षात् शिव हो जाने को तत्पर है। दिमाग की कोशिकाओं में प्राणवायु का पुनः संचार होते ही, इधर वर्तमान काट खाने को तैयार, उधर आत्मग्लानि की अग्नि में मन जौहर को मचलता है। मुखौटे पर कई और मुखौटे चढ़ने को तैयार हो जाते हैं। अक्सर सोचता हूँ - 'जो हम हैं, उसे यथार्थ में स्वीकार कर लें, तो कुछ और हो जाने की चाहत के मुखौटों से बचा जा सकता है क्या?' सृष्टि में झाड़, पेड़, पहाड़, पत्थर सभी तो स्वीकार्य हैं। सबकी उपयोगिता है, सभी महत्वपूर्ण हैं। कभी सोचिए - 'पत्थर उड़ने की महत्वकांक्षा पाल लें और पेड़ बहने को लालायित हो उठें!'

परंतु बड़े बच्चों के मुखौटे और भी हैं। मानो सृष्टि ने आपको मनुष्य बनाया... और तदृच्छा ने आपको सामान्य परिवार के योग्य समझा। आय के सीमित संसाधनों के बावजूद माता-पिता अपनी समझ और पहुँच के दायरों को खींच-खींच कर आपको राजसी ठाठ देने को तत्पर हैं। चूँकि वे राजसी परिवार से नहीं, राजाओं के शौक़ से अनभिज्ञ, जो उन्हें प्राप्य नहीं था तुम्हें दिलवा दिया; उनके लिए यही राजसी उपभोग हुआ। घर में पिता की दवा के लिए पैसे हों या न हों, परंतु तुम्हें दोस्तों को दिखाने के लिए पवनहँस चाहिए। यह पवनहँस मुखौटा है जो तुम्हारे दिहाड़ीदार होते ही बिखर सकता है। फेसबुक पर एक करुण क्रंदन सुना। उम्रदराज माँ-बाप, एक वीडियो के माध्यम से, अदृश्य फेसबुकिया न्यायाधीश से गुहार लगा रहे थे कि उन्हें इकलौते मतलबी बेटे के चंगुल से छुड़ाया जाए। वो उनके कमाए हुए घर पर जबरन क़ब्जा कर, माँ-बाप को बेघर करने पर तुला है। माँ की आँखों का गंगाजल और सुबकते बाप द्वारा आँसुओं को पी जाने के असफल प्रयास में बेटे का मुखौटा भरभराकर टूट चुका था।

इन्सानी मुखौटों की माया असीम है। सरस्वती के वरदपुत्र, शब्दों के क्षीरसागर से चुनकर अभिव्यक्ति के मोती लानेवाले, जब सच्ची बात कहने में किंकर्तव्यविमूढ़5 होते हैं, छद्मनाम6 का मुखौटा पहन लेते हैं। मानो आप ब्रह्मा के मानसपुत्र हों... और तदृच्छा से समाज को चैतन्य करने के उद्देश्य से आपको अभिव्यक्ति4 की योग्यता देकर मनुष्ययोनि में भेजा हो। परंतु इस योनि के राजसिक उपभोग, बुद्धि को माया से आवृत्त करने को आतुर हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार आकर्षण में ब्रह्मा का चरित्र स्खलित हो गया था, ऐसे में मानसपुत्रों की व्यथा स्वीकार्य है। सत्य के पथ पर मनुष्य एकाकी ही होता है। सबके साथ चलने का मोह तथा समूह का नेतृत्व करने की आकाँक्षा दोनों हों, तो सबसे पहला समझौता सत्य से ही होता है। बावजूद इसके, अभिव्यक्ति का ज्वालामुखी मुखौटा पहनने को विवश करता है। आत्मश्लाघा7 में जनमानस की प्रतिक्रिया जानने की आवश्यकता - 'छद्मनामधारी कैसा लिख रहा है(?)', छद्म को छद्म भी नहीं रहने देती। जैसे एक सियार को शेर की खाल मिल जाए, और वो जंगली कुत्तों पर शरदपूर्णिमा तक धौंस जमाए... डराता फिरे। परंतु जैसे ही सत्य का पूर्णचंद्र असत्य के छद्मावरण को प्रकाशित करेगा, कंठ से हुँआ... हुँआ... के प्रलाप में मुखौटा चरमरा जाएगा।

सत्य का मार्ग एकाकी सही परंतु प्रशस्त-पुण्य है। 'नेतृत्व सबको साथ लेकर चलने में नहीं, मार्ग प्रशस्त करने में हैं।' सफलता बुद्धि का लोहा मनवाने में नहीं, बुद्धि के सदुपयोग से, बुद्धिजीवियों को जलसमाधि के दंश से मुक्त करवाना सफलता है। आप सफल हैं यदि आपमें स्वीकार्यता है। अपने सत्य को स्वीकार करने से जो सुख प्राप्त होता है, वही मुक्तिबोध है। कुछ विशेष होने की चाहत से अधिक सहज मनुष्य होने का प्रयास बेहतर है। प्राचीन अवधारणा है कि मुखौटों की ऊर्जा नकारात्मक होती है, इसे पहनने वाले में अवसाद की संभावना बढ़ती है। 21वीं शताब्दी में जब आयुर्विज्ञान ने लगभग सभी रोगों पर विजय प्राप्त कर ली है, तो सोचिए... बीमारियों का वैश्विकबोझ बढ़ोतरी पर क्यूँ है? कहीं ये मुखौटे ही कारण तो नहीं!!

  1. Divine wish, 2. Holy tree, 3. Natural, 4. Expression, 5. Indecisive. 6. Fake name, 7. Perkiness.

गुलेर, काँगड़ा