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January 28, 2019 • बाबैन, कुरुक्षेत्र

नवम्बर मास के अंक ‘अभिनव इमरोज़’ के सम्पादकीय से प्रभावित होकर यह लेख भेज रही हूँ। इसमें लिखित सामग्री की मैं पूर्ण जिम्मेवारी लेती हूँ। इनके सोर्स बता सकती हूँ। आपसे विनम्र अनुरोध है कि इसे पत्रिका के पन्नों में जगह देने का अनुग्रह करें। इसे लिखने की प्रेरणा आपके सम्पादकीय से ही मिली है। आपको और पत्रिका को ढेरों शुभकामनाएँ सम्पर्क बनाये रखियेगा इससे हम जैसे दूर दराज के गाँवों में बैठे नामहीन से लोगों को ऊर्जा मिलती है।

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अभिनव इमरोज़’: सम्पादकीय के बहाने

‘अभिनव इमरोज़’ के नवम्बर अंक में प्रकाशित सम्पादकीय को पढ़कर न जाने क्या-क्या याद हो आया। सदी के वे आत्म बलिदानी महानायक जो शासकों की घोर एवं सतत उपेक्षा के बाद भी धूमिल नहीं हो पाए, एक एक कर के स्मृति पटल पर दस्तक देने लगे। कुछ और भी याद आने लगा। फणीश्वर नाथ रेझाु का बावनदास, उदय प्रकाश के जादूगर की भविष्यवाणी करने वाला जमूरा.... न जाने क्या.....क्या।

मदनलाल ढींगरा जिनकी शहादत को उनके परिवार ने ही अपमानित किया। तात्याँ टोपे जिनके मित्र ने ही उनकों अंग्रेजों को सौंप दिया। और क्रान्ति नायक भगतसिंह जिनके खिलाफ गवाही देने के लिये उसी के देशवासी कटघरे में खड़े हो गये थे।

बहल जी जिस आयातित बौद्धिकवाद की बात लिखते हैं। मैं सबसे पहले उसी में कुछ और जोड़ना चाहूंगी। मैं शुरु करती हूँ फणीश्वर नाथ रेणु जी के मैला आँचल के एक पात्र बावनदास से। उसमें आजादी के फौरन बाद की कथा है। एक व्यक्ति कहता है कि आज मैं पूर्णिया गया था। वहाँ एक अनोखी बात देखी। बड़े-बड़े घरों के बच्चे अंग्रेजी पढ़ना सीख रहे थे। जिनको हमने इतना खून बहा कर इतनी मुश्किल से निकाला है उनकी भाषा सीखना बड़ा बुरा लगता है। यह सुनकर बावनदास कहता हे- अभी तो शुरुआत है भैया। देखते जाओ ऐसा समय आने वला है जब गाँव के झोंपड़ों से भी ए बी सी डी की गूंज सुनाई देगी। इस आयातित बौद्धिकवाद को शायद रेणु जी बहुत पहले समझ गए थे।

दूसरी बात उदयप्रकाश की कहानी के जमूरे को लेकर है। पराधीनता के दिनों की कहानी है। एक जादूगर खेल दिखा रहा है। वह जादू के कमाल से एक रस्सी उछालता है। रस्सी हवा में खड़ी हो जाती है। फिर वह जमूरे को बुलाकर रस्सी पर चढ़ने को कहता है। जमूरा रस्सी के अन्तिम सिरे पर जाकर गायब हो जाता है।

अब जादूगर वहाँ पर एकत्र हुए दर्शकों की ओर रुख करके कहता है-मेहरबान, साहिबान, कदरदान अब मेरा जमूरा भगवान के पास है। जिसको जो पूछना है पूछ सकता है। मेरा जमूरा भगवान से पूछ कर आपकी सब समस्याओं का हल बता सकता है।

संयोग से एक अंग्रेज अपने एक हिन्दुस्तानी सेवक के साथ वहाँ से निकल रहा है वह उस तमाशे को देख कर रुक जाता है। वह अपने सेवक से कहता है कि जाओ जादूगर के जमूरे से ये पूछ कर आओ कि भारत में हम ब्रिटिशों का शासन कब तक रहेगा। प्रश्न सुनकर जमूरे की आवाज सुनाई देती है- यहाँ पर सदा आप का ही शासन रहेगा साहब। यह सुनकर अंरग्रेज फिर पूछता है-देश के लोग तो हमें यहाँ से भगाने पर तुले हैं और तुम सदा हमारा शासन रहने की बात करते हो। झूठ तो नहीं कह रहे?

नहीं साहब, हमारी भविष्यवाणी सत्य होती है हजूर। आप यहाँ से चले जायेंगे मगर शासन आप ही का रहेगा जनाब। हम स्कूलों में वहीं पढ़ेंगे जो आप तय करेंगे। हमारे खेतों में वही उगाया जाएगा जो आप कहेंगे। हमारा खाना, पहनना, तीज त्यौहार सब आपके मुताबिक होंगे, हजूर। जितनी लूट आपने मचाई उससे ज्यादा हम मचायेंगे साहब। जितने अत्याचार आपने किए हैं उससे कहीं ज्यादा आपके बाद होंगे। आप चाहे कहीं भी चले जायें मगर यहाँ पर शासन आप का ही रहेगा हजूर। मेरी भविष्यवाणी पत्थर पर लकीर है।’’ यह पढ़कर और आज के दौर में देश में जो कुछ हो रहा है उसे देखकर आसानी से समझ में आ जाता है कि उदय प्रकाश के जमूरे की कहानी की

भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हो रही है। यही शायद आयातित बौद्धिकवाद है जिसका ज़िक़र बहल जी अपने सम्पादकीय में करते हैं।

अब बात सदी के उन महानायकों की जो शासकीय उपेक्षा के शिकार हो कर भी जनमानस के लिए ज्योतिपुंज बने हुए हैं। मुझे मदनलाल ढींगरा की शहादत पर कुछ लिखना है। उनका पूरा परिवार हिन्दी व हिन्द का विरोधी और अंग्रेजों का परम भक्त नहीं अन्ध भक्त था। ब्रिटेन के इण्डिया हाउस में श्याम जी कृष्ण वर्मा, मैडम भीकाई जी कामा, सावरकर जैसे लोगों से मदनलाल का मिलना उनके परिवार यहाँ तक कि उनके मातापिता को भी पसन्द नहीं था। उन्होंने सावरकर से माउजर माँग ली और उसकी माउजर से अपने पिता के खास दोस्त कर्जन वायली को मौत के घाट उतार दिया। भारत के अनेक राष्ट्रवादियों ने ढींगड़ा को बेरहम हत्यारा करार दे दिया। उसके माता-पिता ने उसका शव लेने से इन्कार कर दिया। यहाँ तक कि अपना कुल-गोत्र ‘ढींगरा’ भी त्याग दिया। विदेश की धरती पर फाँसी की सजा पाने वाले प्रथम भारतीय सपूत ढींगरा ने अदालत में कहा था-

माँ भारती, तेरे इस बुद्धिहीन और धनहीन,

पुत्र के पास कुछ नहीं है जो अर्पण करूं,

मेरे पास केवल मेरा रक्त है और मैं

वही तुझे दे रहा हूँ।

एक और विडम्बना देखिये। अंग्रेजों ने उस वीर युवक के शव को अग्नि देने की जगह उसे जेल के कब्रिस्तान में दफना दिया। आजादी के बाद भी किसी ने उस वीर की अस्थियाँ भारत लाने में किसी सरकार ने कोई रुचि नहीं ली। 1976 में ज्ञानी जैलसिंह के प्रयासों से शहीद उद्यम सिंह की अस्थियाँ भारत लाने के लिये जब उद्यम सिंह की कब्र तलाश की जा रही थी तो संयोगवश वहाँ ढींगरा की कब्र मिल गई। इस तरह उनकी अस्थियों को सम्मान मिला। जय हो, मेरा भारत महान।

अब जरा याद कर लेते हैं नेता जी बोस को। आई.सी.एस. की वैभवपूर्ण नौकरी छोड़कर आत्मोत्सर्ग की राह चुनने वाले उस राष्ट्रनायक को नेहरु ने तोजो का कुत्ता कहा था। यदि वह तोजो का कुत्ता जीवित रहता तो बहुत से असली कुत्तों केा गीदड़ों को अपनी खाल बचानी मुश्किल हो जाती। शायद इसीलिये उस महानायक को सन्देहास्पद मौत मिली।

इसी कड़ी में एक और जगमगदीप है-भगतसिंह लोगों का मानना है कि उसे अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया। मगर यह अधूरा सत्य है। उस को फांसी देने के लिये न्याय का नाटक कर रही अंग्रेजी सरकार को सबूत तो पेश करने ही थे। और गवाह बने ‘महान’ लेखक खुशवन्तसिंह के पिता सरदार शोभासिंह जिन्होंने भगतसिंह के हाथ में पिस्तौल देखने की गवाही दी। बदले में उनको नई दिल्ली में बनने वाली इमारतों के ठेके और नाईटहुड सम्मान से नवाजा गया। शोभासिंह ने एक बार कहा था कि भारत के राष्ट्रवादी पीछे से मुझे चाहे कुछ भी कहते हों मगर जब मुझे नाईटहुड की उपाधि मिली तो मुझे बधाई देने वालों में अनेक राष्ट्रवादियों की पूरी फौज के साथ गाँधी जी भी शमिल थे। यह है भारत के राष्ट्रवादियों का चरित्र।

अन्त में श्री देवेन्द्र बहल जी को क्या कहूँ? समझ नहीं आता। यह लेख उन्हीं के सम्पादकीय का विस्तार समझा जाए। कुछ तिलमिलाहट बढ़ेगी तो मेरा लेखन सार्थक होगा।