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संपादकीय
June 4, 2019 • Devender Kumar Bahl

पिछले तीन महीनों से मैं जरूरत से ज़्यादा अस्त-व्यस्त रहा। अभी भी पूरी तरह से व्यवस्थित नहीं हो पाया हूँ। कार्यालय एवं लाईब्रेरी इत्यादि के स्थानांतरण के कारण सब कुछ अव्यवस्थति हो चुका है। इस दौरान प्रतिबद्धताएं भी टलती रहीं और दिनचर्या भी तुड़ित होती रहीं।

अभिनव इमरोज़ एवं साहित्य नंदिनी का हम तीन लोग ही संपादन एवं प्रबंधन का कार्य करते हैं: मैं, मेरा ड्राईवर और एक पार्ट टाईम ग्राफीक्स डिजाईनर। सीमित बजट में जैसे-तैसे ज़िन्दगी के तकले पर तसल्लियों की रूई से धागा कातते रहते हैं ताकि शब्द-शब्द संयोजित कर के हर महीने की 3 तारीख को आपकी अभिनव इमरोज़ और साहित्य नंदिनी की पुष्पांजलि भेंट करते रहे। पंखों में जितनी उड़ाने बाकी है उसका सद-उपयोग आपकी एवं साहित्य सेवा को समर्पित ही है।

हमारी आपकी समझ और पारस्परिक सहयोग एवं सहभागिता उत्कर्षित होती रहे। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ:-

सुश्री मेधावी जैन का एक प्रेरणात्मक, साकारात्मक, परामर्श मिला। जिसे मैंने अपने इस संपादकीय पृष्ठ का हिस्सा बनाना उचित समझा