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सवालों से भरी कोंपलें
December 11, 2018 • वीना विज उदित

सवालों से भरी कोंपलें

चाँद कतरा-कतरा पिघल

कर रहा शरारतें

मेरे जिगर की ओट से

मचलीं कुछ हसरतें

फूलक के पार चलीं

अपने लिए तलाशने

इक नया पारावार...

मेरे भीतर की इक धरा

गहरे में पैठ

ज़ख्मों का कारवाँ सहेजती

मरहम लगा दुलारती

जीने का भ्रम देती

आँखों की पोरों में रेशे भर

देती भावों को विस्तार..

वीरान वृक्ष का दामन

जर्द पत्तों की बेशुमार भीड़

बेबस सूखी टहनियाँ

झरे पत्ते जीर्ण-क्षीर्ण

पवन झोंके उड़ा ले चले

धूल-रंजित कर जिन्हें

देखी है ऐसी जाती बहार..

ठुके हैं तृषित सुलभ उर में

कुछ नए प्रश्न

सवालों से भरी कोपलें रिसता है जिनसे

रिसता है जिनसे

असहिष्णु, संवेदनशील अनल

बिखरेगा कण-कण में

एकाकार होगा

प्रणव-ध्वनि में समाकर ।