साक्षात्कार- दीप्ति गुप्ता से सन्दीप तोमर की साहित्यिक चर्चा
September 9, 2019 • दीप्ति गुप्ता,सन्दीप तोमर

दीप्ति गुप्ता जी वर्तमान में पुणे महाराष्ट्र में रहती हैं। लम्बे समय से लेखन से जुड़ी रही हैं, हिन्दी व्याकरण पर उनका अध्ययन उन्हें अलग पहचान देता है। सोशल मिडिया पर हिन्दी के भाषिक तत्वों पर अक्सर उनके द्वारा ली गयी क्लास को देखा जा सकता है, कितने ही लेखक उनसे हिन्दी सीख साहित्य साधना कर रहे हैं। जहाँ उन्हें कैफी आजमी जैसे बड़े शायर का सानिध्य प्राप्त हुआ वहीँ प्रकाश झा जैसे जमीनी फिल्म निदेशक और दीप्ति नवल जैसी कलात्मक फिल्मों की बेहतरीन अदाकारा के ऊपर उनकी कलम बखूबी चली है, फिल्मों की समीक्षा सहित अनेक परिचर्चाएं आयोजित कर चुकी हैं। साहित्यकार सन्दीप तोमर ने उनके साथ साहित्य पर खास बातचीत की है, आइये दीप्ति गुप्ता जी की नजर से उनकी साहित्यिक यात्रा का आनन्द लेते हैं संपादक)

सन्दीप तोमरः दीप्ति जी, आज जिस मुकाम तक आ पहुँचें हैं उसे एक “दस्तावेजी जिन्दगी” कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी। एक जिज्ञासा है- क्या आपकी पहली रचना ही पहली प्रकाशित रचना है?

दीप्ति गुप्ता: मेरी पहली रचना, मेरी पहली प्रकाशित रचना नहीं है। पहली रचना की उम्र मात्र 11 साल थी जब वह कलम से पन्ने पर दर्ज हुई थी। वह एक अबोध बालमन की कच्ची और मासूम सी अभिव्यक्ति थी। उस सुकुमार उम्र में, पहली बात तो यह कि अपने भावो और सम्वेदनाओं को अभिव्यक्त करने में ही एक संकोच और शर्मीलापन हावी रहता है। दूसरे अगर इत्तेफाक से कभी कुछ लिखा भी जाए, तो उसका प्रकाशन, उस अबोध रचयिता के ख्याल से  परे होता है।

आप चाहे तो इसे निश्छल-निर्मल बाल-मन में होने वाला लेखन का अप्रत्याशित बीजारोपण कह सकते हैं या मेरी बाल कलम का ''घुटने चलना'' कह सकते है। इसके कई साल बाद, मेरे बड़े होने के साथ-साथ, मेरी वह शिशु कलम भी मानो खामोशी से बड़ी होती गई, अनेक तरह के संकोच भरे सोच व किशोरावस्था के व्यर्थ के मनोविकारों, अकारण की कुण्ठाओं, से आजाद होती गई और आने वाले समय में कदम साध कर चलने की ऊर्जा से भरती गई। यह परिवर्तन अपने आप ही करवट लेता रहा- एक सहज विकास के रूप में। उस जमाने में किशोरावस्था और वो भी खासतौर से ''लड़की'' की किशोर वय अनेक अनकही पाबन्दियों के दायरे में आगे बढ़ती थी। इसलिए एक अच्छे काम को बिन बताए, अकेले करने में लाज और संकोच जकड़ लेते थे। उस समय आत्मविश्वास की बहुत कमी होती थी। अपनी क्षमता का पता ही नहीं होता था। इसलिए, समय के साथ, जब इन सबसे उबर कर, मैंने अपनी क्षमता और आत्मविश्वास की जमीन पर चलना शुरू किया तो, धीरे- धीरे लेखनी भी मुखर हुई।

मैं अपनी माँ की इकलौती संतान थी। मैं मुश्किल से एक वर्ष की थी, जब पिता का निधन हो गया था। घर-बाहर सब बच्चों के दो-दो, तीन-तीन भाई-बहन देखकर, मैं खुद को अकेला और कंगाल महसूस करती थी।

यह उत्तराखण्ड के आर्मी हेडक्वार्टर ''लैन्सडाउन'' की बात है, जहाँ मेरी माँ की राजकीय कॉलिज में उनके जीवन की पहली नियुक्ति इलाहाबाद शिक्षा विभाग द्वारा हुई थी।

टीचर्स हॉस्टल के बाहर फूलों की कतारबद्ध खूबसूरत क्यारियाँ होती थीं। सभी क्यारियों में एक साथ कई किस्म के फूल खिले होते थे। पर, एक क्यारी ऐसी थी, जिसमें इत्तेफाक से उस दिन सिर्फ एक ही गुलाब का फूल खिला हुआ था, तथा और फूलों की पौध शायद पाले की वजह से बढ़ नहीं पाई थी। मेरा नन्हा मन सहसा ही उस एकाकी गुलाब के प्रति सहानुभूति और सम्वेदना से भर उठा और मुझे मन ही मन महसूस हुआ कि उसके भी मेरी तरह भाई-बहन नहीं है और वह बेचारा निपट अकेला है। बहुत देर तक उसे प्यार से निहारती हुई, मैं बालसुलभ सोच के तहत उसके बारे में कुछ-कुछ सोचती रही।

फिर एकाएक दौड़ कर कमरे से कॉपी - पैन उठा लाई और गुलाब के फूल के पास बैठ कर, जैसा मेरे मन में आता गया, वैसा उस पर लिखती गई और देखा तो वह एक छोटी सी कविता बन गई थी। मैंने उसका नाम दिया

"A Lonely Flower"

वह आकस्मिक कविता अँग्रेजी में इसलिए लिखी गई, क्योंकि हमारी अँग्रेजी की टीचर मिस उप्रेती, किसी भी विषय पर हम बच्चों को पाँच- पाँच, दस -दस पँक्तियाँ लिखने के लिए खूब प्रोत्साहित करती थी। सो सोचा था कि लिखने के बाद, उन्हें दिखाऊँगी, लेकिन उन्हें दिखाने की हिम्मत न कर सकी क्योंकि वह मात्र गुलाब पर कविता होती तो ठीक था, पर, वह तो मुझसे जुड़ी व्यक्तिगत कविता अधिक थी। सो मैंने उस कॉपी को छुपा कर, अपनी अपनी मेज की दराज में खूब अन्दर दबा कर रख दिया। कुछ महीने बाद सफाई करते समय वह कॉपी मेरी माँ के हाथ लग गई और उन्होंने वह कविता पढ़ ली। मै बराम्दे में खेल रही थी। उन्होंने मीठे सुर में, मुझे  पुकारा। मैं झटपट अन्दर गई, तो उनके हाथ में अपनी वो ही कॉपी देख कर ठिठक गई। वे मुस्कुराते हुए बोली -

''ये तुमने लिखी ? कब लिखी''

मैं कुछ बोल ही नहीं पाई, फिर किसी तरह अटक-अटक कर कुछ बोलना भी चाहा, तो सब हलक में चिपक कर ही रह गया।

माँ मेरे संकोच को तुरन्त भाँप गई और मेरी सराहना करते हुए बोली -

 ''अरे यह तो बहुत अच्छी कविता लिखी है, दिखाई क्यों नहीं ? ''

आत्मविश्वास रहित उस नादान उम्र में कैसा लिखना और लिख कर, वो भी  माँ को दिखाना कि वे हँसेगी कि ये क्या बेकार सा लिखा है ?

उसके बाद कभी कुछ नहीं लिखा , बस स्कूली पढ़ाई, स्कूली प्रतियोगिताओं, साँस्कृतिक कार्यक्रमों में भागीदारी करते हुए, समय बीतता गया। लेकिन सम्वेदनशील मन में भावी लेखन के लिए कच्चा माल जमा होता रहा। वह पहले 1970- 71 में एक - दो लघु हिन्दी संस्मरणों और कुछ अँग्रेजी की गम्भीर विचारशील कविताओं में लम्बे - लम्बे अन्तराल के साथ डायरी में सिमटता रहा।

लेकिन 1985 से मेरी कलम ने रफ्तार पकड़ी और ''पंजाब केसरी'', ''अमर उजाला'', ''हिन्दुस्तान'', ''सन्मार्ग'', आदि

कई अखबारों में  धीरे-धीरे प्रकाशित भी होने लगी।

सन्दीप तोमरः जब आपने लिखना शुरू किया, तब के माहौल और आज में क्या फर्क आप देखते हैं?

दीप्ति गुप्ताः जब मैंने लिखना शुरू किया , तब के माहौल और आज के माहौल में जमीन- आसमान का अन्तर है।

यह एक शाश्वत सत्य है कि ''समय'' किसी के लिए ठहरता नहीं, किसी भी पड़ाव पर थमता नहीं। उसमें होने वाले सामाजिक- साँस्कृतिक ''बदलाव'' सदा से कुदरत की एक सहज - स्वाभाविक प्रक्रिया रही है। जो माहौल कल था, वह आज नहीं है और जो आज है, वह कल नहीं रहेगा। हम सभी ''काल'' के परिवर्तन - चक्र के साक्षी हैं।

पहले के माहौल में सम्वेदनाएँ और भावनाएँ तैरती थीं। फिजाओं में भावनाओं का कम्पन सा था। ठण्डी हवा का झोंका हमें भावुक बना जाता था।

सुहानी भोर हमारी उदात्तता को जगाती थी, तो साँझ का झुटपुटा हमारे किसी बीते पल की याद ताजा कर जाता था। साथ ही पहले के माहौल में एक ''लिहाज'' का स्पर्श था। आत्मीयता के चलते एक दूसरे के लिए प्यार भरी छूट,

सम्पूर्ण अधिकार दिए और लिए जाने पर भी, शालीनता के दायरों की कद्र की जाती थी। यानी पहले ''उन्मुक्तता'' नहीं होती थी। जबकि आज का माहौल, हर क्षेत्र में बहुत उन्मुक्त है। समाज के हर वर्ग में इस खुलेपन को देखा जा सकता है। वह हर उम्र पर हावी है। आज बच्चे अपने माता-पिता से कुछ भी कहने में नहीं हिचकते। आज की युवती हो या युवक, उसके पहनावे, हाव-भाव, सोच, नजरिया, बातचीत सब में बेइन्तहा उन्मुक्तता के दर्शन होते हैं। खुलापन बुरा नहीं, बशर्ते कि वह बेढब न हो। एक सन्तुलन में हो। जैसे पानी जब सीमाएँ तोड़ कर बह निकलता है, तो बाढ़ का रूप ले लेता है और तहस - नहस मचा देता है। पर, जब अपनी सहज सीमाओं के तालमेल में प्रवाहित होता है, तो कलकल करती सरिता और लहराता दरिया बन जीवनदायी बन जाता है। जरूरत से ज्यादा उन्मुक्त हवा

आँधी बन जाती है, पर , वही जब सिर्फ मुक्त रूप से बहती है तो सुखद बयार बन जाती है। तो आज का सामाजिक, साँस्कृतिक वातावरण - जिसमें धर्म, राजनीति सब आ जाते हैं - आज की पीढ़ी, पारस्परिक रिश्ते, परिवार, बाजार, सब एक उन्मुक्त आँधी की चपेट में हैं। किसी को किसी की सुनने की, किसी से मिलने तक की फुर्सत नहीं , तो जरूरी बातों की तो क्या ही कहें !!! सोना,जागना, नहाना,खाना,पीना सब ''दो मिनट'' वाला हो गया है। माता- पिता घर में साथ रहते हो या अलग, उनसे मिलने का वक्त भी ''दो मिनट'' ही तय रहता है। नाश्ता भी ''बस दो मिनट' (मैगी विज्ञापन) वाला होता ही है। रिश्ते अजनबी हो गए हैं। बच्चे समय से पहले बड़े हो गए हैं। युवा समय से पहले बूढ़े गए हैं (असमय आँखों पे चश्मा, बालों का सफेद होना, झड़ जाना, याददाश्त कमजोर होना)।

तो सारा माहौल ही आपाधापी, भागदौड़  बन के रह गया है, जिसमें 'इंसानियत', 'नेकनीयत', 'भावनात्मक मिल्कियत'सब गुम गए हंै और ज़िन्दगी मशीनी बन गई है।

मशीनी माहौल, मशीनी जिन्दगी में फिर भी कुछ सकारात्मक सम्भावनाएँ थीं, पर आज 21वीं सदी का माहौल और उससे कुप्रभावित जीवन, मशीनी का भी ''चरम'' रूप - ''डिजिटल'' हो गया है। भावनाओं- सम्वेदनाओं से दूर, उसकी हर चीज ''डिजिट्स'' में बँटी है। डिजिट, लघुतम इकाई होती है। जीवन का विस्तार और फैलाव, यदि डिजिटल टुकड़ों में सिमट कर रह जाए, तो निश्चित ही उसकी जीवन्तता का क्षय होगा ही। एक बटन दबाने पर यान्त्रिक सी जीवन्तता, तो दूसरा बटन दबाने से डिलीट....स्वाहा।

तो इस डिजिटल माहौल के अपने खतरे हैं, कुप्रभाव हैं, जिनसे हम अछूते नहीं है।

सन्दीप तोमरः साहित्य में आपका साबिक किन लोगों से पड़ा? किनसे आप प्रभावित हुए...?

दीप्ति गुप्ताः सन्दीप जी, मेरा सोचना है कि किसी भी साहित्यकार से प्रभावित होने के लिए जरूरी नहीं कि उनसे हम व्यक्तिगत रूप से मिले ही हों। फिर भी, उनसे मिलने का, संवाद करने का अवसर मिले, तो वह परम सौभाग्य मानती हूँ।

अब, जैसे, प्रेमचन्द इस दुनिया से तब चले गए, जब हम पैदा भी नहीं हुए थे। लेकिन मैंने छात्र जीवन में और उसके बाद, विश्वविद्यालय में शिक्षण के दौरान, प्रेमचन्द,अमृतलाल नागर,अज्ञेय, यशपाल, इलाचन्द्र जोशी, भगवतीचरण वर्मा, निर्मल वर्मा, कमलेश्वर, मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव, प्रसाद, निराला, पन्त, महादेवी, आदि अनेक गद्यकारों और पद्यकारों को पढ़ा।सभी अपने - अपने स्तर पर, अपनी ढेर खूबियों के साथ श्रेष्ठतम लेखक थे। पर जिनसे मैं सर्वाधिक प्रभावित हुई , वे प्रेमचन्द, अमृतलाल नागर, निर्मल वर्मा, कमलेश्वर, थे।लेखिकाओं में मन्नू भंडारी के 'आपका बंटी' और 'महाभोज' ने मुझे सम्मोहित किया। इनके बाद महिला लेखिकाओं में कुछ देर से मृदुला गर्ग, ममता कालिया, सूर्यबाला, चन्द्रकान्ता और चित्रा मुदगल को पढ़ा। इनमें ममता कालिया और सूर्यबाला जी की भाषा, अभिव्यक्ति और कथ्य ने मेरे मन को बहुत बाँधा।

सन्दीप तोमरः हिन्दी कहानी, उपन्यास और व्यंग्य में से गद्य की किस विधा को जीवन के अधिक करीब पाते हैं?

दीप्ति गुप्ताः मुझे हमेशा से कहानी और उपन्यास जीवन के सर्वाधिक निकट लगे। हांलाकि उपन्यास एक पूरा जीवन वृत होता है, तो कहानी जीवन का एक हिस्सा मात्र, लेकिन भले ही कहानी जीवन के किसी एक खण्ड से जुड़ी हो, उसमें जीवन की  भरपूर साँसें और धड़कने भरी होती हैं, जो हमारे दिल और हमारी रूह को अपने से ऐसे बाँध लेती है, जैसे हमसे उसका पुराना नाता हो।

इसके अलावा 'संस्मरण' और 'आत्मकथा'-ये दोनों

विधाएँ तो पन्नों पे दर्ज, सीधा दूसरा जीवन ही होती हैं।

सन्दीप तोमरः यशपाल, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव या फिर मोहन राकेश के बारे में कुछ कहें- उस समय के पूंजीवादी और प्रगतिशील खेमों की उठापटक पर आपकी क्या राय है?

दीप्ति गुप्ताः  प्रगतिशील लेखक बिरादरी हमेशा पुरानी चली आ रही जीर्ण-शीर्ण मान्यताओं और रूढ़ परम्पराओं के खिलाफ आवाज बुलन्द करने वाली क्रान्ति की पोषक रही है।

साहित्य में सबसे पहले प्रेमचन्द अपने समय में ही, दीन-हीन तबके के किसानों और मजदूरों को अपनी रचनाओं का नायक बना कर, प्रगतिवाद को जन्म दे चुके थे और तदनन्तर उनके बाद अनेक लेखकों ने उनके मार्ग का स्वतः ही अनुसरण किया, तथा राजा-रानी या उच्चकुलोत्पन्न पात्र को अपने कथानक का नायक न बना कर, जमीन से जुड़े लोगो पर अपने लेखन को केन्द्रित किया। सामाजिक कुरीतियों, बाल-विवाह, विधवा की उपेक्षित स्थिति और त्रासद जीवन, दहेज प्रथा, आदि को केन्द्रित कर खूब लिखा।

 प्रेमचन्द ने तो स्वयं एक युवा विधवा से शादी कर अपने असल जीवन में प्रगतिशीलता को अपनाया था। तब से आजतक प्रगतिशीलता साहित्य में बरकरार है।

प्रगतिशील लेखक वर्ग गरीब व उपेक्षितों का हिमायती था, उसके उद्धार की बात करता था, तो कहीं मार्क्सवाद भी इसके साथ जुड़ गया और अनेक लेखक विशुद्व मार्क्सवादी दर्शन और  विचारधारा के कट्टर अनुयायी हो गए।

जहाँ तक खेमेबाजी की बात है, तो, खेमे तो साहित्य जगत में मतवैभिन्य के कारण हर युग में देखने को मिलते हैं। प्रगतिशील लेखक समुदाय, मार्क्सवादी समुदाय, उदारवादी, कट्टरवादी वर्ग, वामपंथ, दक्षिण पंथ, इन सबमें, लेखक समाज विभाजित रहा। लेकिन ये विविध वर्ग साहित्य की प्रगति और विकास के कभी आड़े नहीं .आए।

मैंने आपके सब प्रश्नो के बेबाकी से और बहुत रुचि लेकर जवाब लिख दिए है।

सिर्फ दो सवाल - फिल्मी हस्तियों और कैफी साहब वाला, नहीं लिखा है .

सोचती हूँ कि क्या करना है।

सन्दीप तोमरः आपके प्रिय लेखक कौन से हैं, जिनका प्रभाव आप अपने ऊपर पाते हैं?

दीप्ति गुप्ताः प्रेमचन्द मेरे सब से प्रिय लेखक रहे। पात्रो के माध्यम से, मानवीय स्वभाव का सुन्दर चित्रण और विश्लेषण साथ ही, मानवीय मूल्यों का प्रतिबिम्बन उनकी कहानियों की विशेषता रही है। ये सब उनकी कहानियों में जिस सहजता से उभर कर आया है, वह दिल को बाँधने वाला होता है और उनकी अलग पहचान बनाता है। गाँव के परिवेश में पले- बढ़े पात्र हों या तत्कालीन शहरी परिवेश के मध्यम वर्गीय संघर्ष रत, अपनी खामियों और गुणों से पाठक के दिलोदिमाग पर हावी होने वाले पात्र हों, उन्हें हम अपने जीवन में, आसपास ही पाते हैं और उनके साथ एकाकार हो जाते है। यह सरलमना प्रेमचन्द की लेखनी का एक बहुत बड़ा सशक्त गुण था कि पाठकों का कहानी पात्रों के साथ तादात्म्य होना।

अपनी इन लेखकीय विशेषताओं के कारण ही , प्रेमचन्द ने मुझे कही गहरे प्रभावित किया और अनेक नामी व उत्कृष्ट लेखकों को पढ़ने के बाद भी, कोई भी मेरे मन में प्रेमचन्द की जगह न ले सका। अतएव इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रेमचन्द का मुझ पर सघन व अमिट प्रभाव रहा और वह आज तक बरकरार है।

सन्दीप तोमरः बीसवीं सदी और इक्कीसवीं सदी के 18 वर्षों को सम्मिलित करें तो आपके अनुसार बड़े कवि, कहानीकार, उपन्यासकार और व्यंग्यकार कौन हैं?

दीप्ति गुप्ताः आधुनिक फलक पर, अठ्ठारह वर्षों से पहले भी और इस अवधी के दौरान भी विविध विधाओं के रचनाकारों और कलमवीरों की कमी नहीं रही, पर, मुझे  कवियों में केदारनाथ सिंह, व्यंग्यकारों में श्रीलाल शुक्ल और उपन्यासकार व कहानीकार के रूप मंे कमलेश्वर जी के अलावा कोई और उनके स्तर का दूर-दूर तक नजर नहीं आया। उनको पढ़ना मुझे सबसे

अधिक प्रिय रहा।

संदीप तोमरः सदी के सबसे बड़े आलोचक किसे मानते हैं? एक समय आया जब लेखक खुद ही आलोचक की भूमिका में भी आया, आपकी क्या राय है?

दीप्ति गुप्ताः सदी के सबसे बड़े आलोचक, मेरी नजर में, हमारे बेबाक पाठक होते हैं। उनकी बेबाक अभिव्यक्ति ही हमारे लिखे की पूर्वाग्रह रहित, सच्ची और खरी आलोचना होती है।

बाकी, तथाकथित  स्थापित एवं ज्ञानी आलोचकों को तो मैंने बेहद पूर्वाग्रहग्रस्त पाया, जो कभी भी ईमानदारी एवं पारदर्शिता से, अपना समीक्षक फर्ज नहीं निबाह पाए। उनमें ''नीर-क्षीर विवेक'' का अभाव मुझे सदैव खटकता रहा। हो सकता है कि आप मेरी इस दृष्टि से सहमत न हो, पर, मेरा  यह  अभिमत अडिग व अपरिवर्तनीय है।

सन्दीप तोमरः फिल्मी हस्तियों को सम्मिलित करते हुए आपने पत्रिकाओं/अखबारों में परिचर्चाएँ आयोजित की। दीप्ति नवल, प्रकाश झा सरीके बड़े नामों से आपका साबिका हुआ, आप उन विभूतियों की सादगी और उनके जमीनी व्यक्तित्व पर कुछ कहना चाहेंगे?

दीप्ति गुप्ताः सन्दीप जी, जिस प्रकार साहित्य और साहित्यकार समाज का हिस्सा हैं, उसी तरह फिल्में और फिल्मी हस्तियाँ भी हमारे समाज का हिस्सा हैं। हम साहित्यिक विधाओं में समाज और जीवन के विभिन्न पहलुओं को चित्रित करते हैं तो फिल्म निर्माता - निदेशक उसे, दृश्य माध्यम फिल्मों द्वारा प्रस्तुत करते हैं। अभिनेता उसे अपने भाव-प्रवण अभिनय द्वारा अभिव्यक्त करते हैं। बहरहाल हम सभी ''रचयिता'' हैं और जो रचयिता होगा, वह निश्चित ही संवेदनशील और विचारशील भी होगा ही, तथा संवेदनशील और विचारशील इंसान को मैंने हमेशा सादगी और सरलता से भरपूर पाया।

हमारी साहित्यिक पत्रिकाएँ, अक्सर विशेष अवसरों पर, सिने विशेषांक निकालती रहती हैं। 2013 में, हिन्दी सिनेमा के 100 (3, मई, 1913) साल पूरे होने के उपलक्ष्य में, 'लमही' के सम्पादक 'विजय राय' जी 2012 से सिने विशेषांक निकालने की तैयारी में जुटे थे । तब उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं फिल्म नगरी मुम्बई के इतने पास रह रही हूँ, तो मैं इस विशेषांक में क्या योगदान कर सकती हूँ। तब मैंने उस पत्रिका के लिए,श्याम बेनेगल, प्रकाश झा, दीप्ति नवल,बी.आर.इशारा, चन्द्रप्रकाश

द्विवेदी, आर.के. नायर आदि फिल्मी हस्तियों के सहयोग से 'फिल्म और समाज' को केन्द्रित करते हुए एक विस्तृत परिचर्चा की थी,जो इन ऊँची हस्तियों के सादा मिजाज और सरल स्वभाव के कारण, दिए गए सहयोग की वजह से बहुत अच्छी बन पड़ी थी।

ये लोग तड़क -भड़क की फिल्मी दुनिया से जुड़े होने के कारण बेबात ही बदमिजाजी और गुरूर आदि के लिए बदनाम होते हैं। वरना वे भी हमारी तरह सीधे-सादे इंसान होते हैं, जो सुख-सुकून में रहते हुए, अपनी रचनात्मकता में लगे रहना चाहते हैं। श्याम बेनेगल, प्रकाश झा, आर.के. नायर (संस्थापक, फिल्म आर्काइव) और दीप्ति नवल को मैंने बेइन्तहा सरल स्वभाव और सादगीपूर्ण पाया। किसी तरह का तेवर, नखरा, और दम्भ नहीं। 45 - 50 मिनिट तक, फोन पर लम्बी बातचीत।  फोन पर मेरे पैसे कैसे कम लगे, बेनेगल साहब का इस बात का ध्यान रखना, प्रकाश झा का खुद फोन करके, इन्टरव्यू देना, मेरे निवेदन करने पर.कि मैं उनको दोबारा अपनी ओर से कॉल करती हूँ और मैं उनकी कॉल पर लम्बा संवाद नहीं करना चाहती तो, प्रकाश झा का बड़ी सादगी से कहना कि ''अरे, दीप्ति जी, क्या फर्क पड़ता है ? आप मेरी ही कॉल पर बातचीत कीजिए।''

फिर बीच-बीच में हास-परिहास द्वारा, मुझे सहज बनाना....उनके बड़प्पन को दर्शाता था।

सन्दीप तोमरः मानकीकरण से इतर आप हिन्दी के शुद्ध स्वरूप की हिमायती रहीं हैं। सोशल मिडिया पर शुद्ध हिन्दी लेखन पर आपका तेवर साफ दिखाई देता है, जबकि अनेक संपादक/प्रकाशक हिन्दी के मानकीकरण को अधिक अपना रहे हैं, इसे आप उनकी नासमझी के रूप में देखते हैं या फिर ये तेक्निकी खामी है?

दीप्ति गुप्ताः सन्दीप जी, सीधी सी और मुख्तसर सी बात है कि जिन लोगों ने कलम थामी है, तो उन्हें उस कलम से निकलने वाली भाषा के, रूप-गुण यानी उसके समूचे 'व्यक्तित्व' का ध्यान रखना चाहिए कि वह अपने सही, स्वच्छ, निखरे हुए रूपाकार में है या नहीं ? जिसे हमारे पुरोधा साहित्यकारों ने वर्षो की मेहनत-मशक्कत के बाद, उसके आरम्भिक, अविकसित अपभ्रंश रूप से निकाल कर, साहित्य - लेखन के काबिल बनाया, उसके  आन्तरिक और बाह्य कलेवर को सँवारा, जिससे कि उसमें पिरोये भाव, विचार और संवेदनाएँ बिना किसी रुकाव और अटकाव के, बहते नीर की तरह ,पाठक- मन में निर्बाध उतरती चली जाएँ।

जब भाषा प्रवाह पूर्ण होती है,तो उसमें अटकाव का सवाल ही नहीं और जब अटकाव नहीं, तो समझ लीजिए कि उसमें क्लिष्टता  भी नहीं।

अब ऐसी ''सरल-सहज साफ-सुथरी'' हिन्दी भी लेखन- जगत के लोगों से- चाहे वे लेखक हों या सम्पादक या प्रकाशक- सही-सही न लिखी जाए तो, यह बात खेदजनक है कि नहीं? जब लिखने वाले  का शब्दज्ञान ही सही नहीं होगा, तो वह अपने भावों और विचारों को पाठकों तक, उनके सही अर्थ के साथ कैसे सम्प्रेषित कर पाएगा ? तब तो वह  ''चिंता को चिता, मन भर गया को, मन मर गया'' लिख कर, भाषा की हत्या  और अर्थ का अनर्थ ही करता रहेगा।

इसलिए मैं हमारे विचारों की अभिव्यक्ति के साधन ''भाषा'' के अंग-भंग और अर्थ-भंग होने पर दुखी होती हूँ।

कम से कम साहित्य जगत के लोगों को तो सरकारी लिपिकों के लिए बनी, मानकीकृत भाषा रूप को न अपना कर, उसके शुद्ध व सही रूप को अपनाना चाहिए। हिन्दी के आँख-नाक काट कर, उसे कुरूप और बेमानी नहीं बनाना चाहिए। अब 'हिन्दी' शब्द को ही लोग , इस शब्द की 'नाक' काट कर, उसे बिन्दु बनाकर, शिरोरेखा पर चिपका देते हैं।

आधे 'न्' को लिखने में आखिर क्या परेशानी है ? क्यों परेशानी है ? अब तो, तकनीक भी इतनी विकसित और सुविधाजनक बना दी गई है कि उसमें लगभग सभी शब्दों को अर्द्ध रूप बने-बनाए तैयार मिलते हैं। एक कहावत है:

Where is will, there is way

अर्थात: ''जहाँ चाह वहाँ राह'' पर सुविधाभोगी इंसान को जितनी भी सुविधाएँ दो, उसका मन ही नहीं भरता और वह

धीरे-धीरे उनका दुरुपयोग करने लगता है। उसकी इस प्रवृत्ति का ही परिणाम है कि आज हिन्दी कटी-फटी होकर ''संक्षिप्तता'' के दायरों में सिमटती हुई, तुड़ी, मुड़ी और सिकुड़ी हुई होती जा रही है।

सुविधाभोगी लोग ''श'' और ''ष'' के सही प्रयोग की अवहेलना कर, हर जगह, बस एक ही ''श'' को लिख कर, खानापूरी करते नजर आते हैं। यही लापरवाही और मनमानी, वे ''न -ण'',  ''र -ऋ'', ''क-ख'', ''ब-व'' , ''भ-म' , ''श-स'' के प्रयोग में करते हैं। निस्सन्देह,  सही हिन्दी के हिमायती लोग तो, भाषा के साथ, ऐसी ज्यादती होते देख, बहुत असहज महसूस करते हैं और गलत शब्द लिखने से अर्थ बदलने पर तो जैसे उनके होश ही फाक्ता हो जाते है।

आप जब ''बीवी'' को ''बीबी'' बनते देखेगे, ''भावी'' (थ्नजनतम) को ''भाबी'', ''भोर'' को ''मोर'', ''शीला को सीला, ''काशी'' को ''खाँसी'' बनते देखेगें तो झुंझलाहट होनी लाजमी है।

पर, गलत लिखने वालों को, न तो गलत शब्द से और न ही गलत अर्थ से, जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता।

 कोई भी भाषा समय के साथ बेहतर होनी चाहिए या कमतर ? भाषा सुबह से लेकर शाम तक, हमारी हजार जरूरतें पूरी करती है, हमारी बात को, इस छोर से उस छोर तक पहुँचाती है, तो क्या हम इतना भी नहीं कर सकते कि हम इसे बेनूर और बेमानी न होने दें ? इसे समृद्ध और समपन्न बनाए रख कर, पूरा प्यार और सम्मान दे ?

सन्दीप तोमरः साहित्य, सिनेमा और राजनीति में मधुर रिश्ते रहते हुए भी आपने किसी को साहित्य में नाम पाने की सीढियाँ नहीं बनाया जबकि देखने में आता है कि कम लिखकर भी अनेक रचनाकार रातों-रात प्रसिद्धि पा गए, आप कुछ कहना चाहेंगी?

दीप्ति गुप्ताः ''कलयुगी चूहा दौड़ की दिशाहीन होड़''  हा,हा,हा,हा,हा......

आज के गलाकाट माहौल के मुताबिक, आपने बहुत जरूरी सवाल किया है।

सन्दीप जी, शीर्ष पर पहुँचने के लिए, सेलिब्रिटी लोगों के ''एक्सीलेटर'' और उसके प्रयोग के खतरों को न्यौत कर, ऊपर जाने के बनिस्पत मैं परिचित पायदानों वाली अपनी कलम की सीढ़ी से आत्मसम्मान, आत्मविश्वास, एवं गरिमा के साथ रफ्ता- रफ्ता ऊपर जाना पसन्द करती हूँ।

 बुजुर्गो की सीख और अनुभव को गाँठ बाँध कर रखना, हमेशा मुफीद होता है:

''देर आए, दुरुस्त आए'' - ''दौड़ के गिरे और पछताए''।

दूसरे के कंधे पर चढ़ कर, ऊँचाई हासिल करने को बेचैन लोग, निश्चित ही औंधे मुँह गिरते हैं।

रातों-रात साख पाने वाले, रातों-रात राख भी होते देखे गए हैं। सो ऐसी ''अस्थायी'' खोखली शोहरत का क्या करना, जो आपको बुलन्दी पर कायम न रख सके।

सन्दीप तोमरः इधर अभी साहित्य का स्वरुप एकदम बदल गया है। गजल के नाम पर हिन्दी गजल, हाइकू, लघुकथा बनाम लघु कथा (शोर्ट स्टोरी) और निराला जी के छन्दमुक्त कविता के आन्दोलन के बाद की आधुनिक कविता, फिर गंगा प्रसाद विमल जी का अकहानी आन्दोलन? क्या कहेंगे आप?

दीप्ति गुप्ताः आपका यह प्रश्न एक लम्बी बहस का बेहद जरूरी मुद्दा है। इस पर संगोष्ठियाँ आयोजित होनी चाहिए और नवीन बेतुकी विधाओं  को बाहर का रास्ता दिखाया जाना चाहिए।

सन्दीप जी, सच कहूँ तो ''हिन्दी गजल, लघु कथा, अकविता और अकहानी'' ये सब ''नाजायज औलादों'' की तरह हैं, जो बेहिस (संवेदनहीन) और बेसुरे लोगों द्वारा अस्ल और जायज गजल, लघु कथा, कविता एवं कहानी पर बड़े क्रूर ढंग से हावी कराई जा रही हैं।

कुछ मुठ्ठी भर लोग सही विधा को सही तरह से सीखने की अपनी नाकाबलियत और नाकामी के चलते, पुरानी खूबसूरत विधाओं की नकल पर, नित नई बदसूरत और बदनीयत विधाएँ  गढ़ लेते है और उन पर कलम चला कर, अपने सीखतड़पन को अदबी जामा पहनाया करते हैं।

सन्दीप तोमरः कैफी आजमी जैसे बड़े शायर का सानिध्य आपको मिला, उनकी नज्म “दूसरा वनवास” तथा अन्य बेहतरीन रचनाओं के आप साक्षी रहें हैं, आपके लेखन पर कैफी साहब जैसी हस्ती का कोई प्रभाव?

दीप्ति गुप्ताः सन्दीप जी, कैफी साहब एक बेहद उम्दा हस्ती थे। उनकी भावुकता, संवेदनशीलता, पारदर्शिता उनके व्यक्तित्व में उतर आई थीं। उनको देखने मात्र से ही, कोई भी जान सकता था कि वह इंसान कितना हस्सास, ईर्ष्या, द्वेष व हर तरह के भेद-भाव से दूर देवदूत सरीखा है। बहते हुए शान्त दरिया जैसा।

पर, यह जो आपने पूछा कि उनका मेरे लेखन पर कोई प्रभाव ? उसका जवाब है - ''नहीं''।

क्योंकि वे एक गजल गो थे। इसके अलावा फिल्मों के लिए, उन्होंने खूबसूरत नज्में लिखी....फिल्म की कहानी और दृश्य की माँग के अनुरूप। गद्य में उन्होंने कुछ नहीं लिखा। सो एक कलमकार के रूप में उनका मेरे लेखन पर प्रभाव का सवाल ही नहीं।

सन्दीप तोमरःअपनी किसी रचना के बारे में बताएं जिसे आप अपने जीवन के काफी करीब पाती हैं, आपकी अपेक्षा से अधिक प्रसिद्धि पायी रचना से भी अवगत कराएँ।

दीप्ति गुप्ताः मेरा सोचना है कि कायदे में यह सवाल अभी पेंडिंग रखना चाहिए। कारण सीधा सा कि मेरे अन्तस में बसी, अभी और कृतियाँ मेरी कलम से निकल कर, प्रकाश में आ जाएँ, हो सकता है कि वे मेरी आज की रचनाओं से बेहतर हों।

वैसे अगर आज की ही रचनाओं की बात करें तो, 2016 में प्रकाशित मेरा तीसरा कहानी-संग्रह ''हाशिए पर उगते सूरज'' मेरे दिल के सबके करीब है। इसकी हर कहानी असल चरित्रों का जीवन्त दस्तावेज है। समाज के हाशिए पर जीने वाले गरीबी के मारे लोग दीन-हीन और तंगहाल होने पर भी, सँस्कारों और मूल्यों के धनी होते हैं। अतएव  मेरे अनुसार, वे दमदमाते सूरज की मानिन्द होते हैं।

दमकने के लिए दौलत, ऐश्वर्य, बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ,सामाजिक स्टेटस नहीं, बल्कि उम्दा गुणों से भरपूर , बेहतरीन इंसान होना जरूरी होता है।

इस कहानी संग्रह की हर कहानी का पात्र गूदड़ में लाल की तरह है......चमचमाता हीरा सा है। क्षितिज पर प्रतिदिन उगते हुए सुनहरे सूरज की तरह है। इसलिए ही इसका शीर्षक कथ्य के तालमेल में रखा है।

इस संग्रह ने खमोशी से, आशा के विपरीत जो सम्मान पाया है, उसने मुझे अवश्य चकित किया।

इसे ''महाराष्ट्र हिन्दी अकादमी, मुम्बई'' का ''प्रेमचन्द कथा सम्मान'' भोपाल का '' तुलसी साहित्य अकादमी सम्मान'', कोलकाता का ''रवीन्द्रनाथ ठाकुर सम्मान'' मिला। साथ ही, इसका ''अमेरिकन लाइब्रेरी, नई दिल्ली'' के पैनल द्वारा, उस बरसों पुराने पुस्तकालय के लिए चयनित होना, एक सुखद आश्चर्य की तरह सामने आया। इसका शायद मुझे पता भी न चलता। लेकिन एक दिन जब मेरे पास अचानक फोन आया और मुझसे मेरे पिता का नाम पूछा गया, क्योंकि उन्हें कैटेलॉग में मेरे नाम के आगे पहचान रूप में पिता का नाम लिखना था, जिससे भविष्य में अन्य दीप्तियों में मेरा नाम मिल न जाए और मुझे आसानी से ढूँढा जा सके। उनके पूछने पर जब मैंने जानना चाहा कि पिता का नाम किसलिए, तब मुझे कहानी-संग्रह के चयनित होने की बात पता चली, तो जाहिर गदगद तो महसूस होना ही था।

सन्दीप तोमरः लेखन के मूल में जो चीजें जोडनी होती हैं, माना जाता है कि लेखक उन्हें लिखना भी नहीं चाहता। कई बार या यूँ कहूँ कि अधिकांश रचना वह नहीं होती जो उसका असल होता है। रचनाकार को अपने तमाम बेशकीमती अनुभवों से चुनाव करके उन पर लिखना होता है। आपकी नजर में वो बेशकीमती अनुभव क्या होते हैं?

दीप्ति गुप्ताः सन्दीप जी, लेखन में साहित्यकार का खुद का दृष्टिकोण, उसकी सोच और संवेदना, उसके अपने मूल्य, सँस्कार आदि, उसकी रचना के पात्रों, उनके विचारों व व्यक्तित्व में प्रतिबिम्बित होते हैं। लेकिन हर बार, उसके पात्र, सिर्फ उसकी ही सोच और नजरिए को प्रतिबिम्बित करें, यह भी जरूरी नहीं। क्योंकि लेखक अपने पात्रों से , अपने आसपास के लोगों, उनके विचारों, उनके गुणों-अवगुणों, उनके व्यक्तित्व के स्याह और सफेद पक्षों को भी प्रस्तुत करता है। कई बार एक पात्र, असल जिन्दगी के अनेक पात्रों के चरित्र का सम्मिश्रण होता है। तो यह कथानक की माँग के मुताबिक सृजित होता है।

मेरा सोचना है कि लेखक के अपने सभी अनुभव बेशकीमती, इस अर्थ में होते हैं कि वे उसे कोई न कोई सीख देते हैं, परिपक्व बनाते हैं, उसकी सोच और व्यक्तित्व का विस्तार कर, उसमें नए आयाम जोड़ते हैं, जिनका वह अपनी विविध कृतियों के सृजन में रचनात्मक एवं रोचक सदुपयोग करता है।

उसके अनुभव सदा अच्छे और सुखद नहीं होते, वे बुरे और दुखद भी होते हैं, धोखे, दर्द और पीड़ा से भरे हुए भी होते हैं। पर, वह उनमें डूबने के बजाय, उनसे उबर कर, उन्हें जीवन के मार्गदर्शक कड़ुवे सबक के रूप में सम्हाल कर रखता है तथा अपने पात्रों के माध्यम से उन खट्टे - मीठे अनुभवों को वह समाज तक पहुँचाता है , समाज को सचेत करता है और सही दिशा देता है।

सन्दीप तोमरः भाषा की बात हुई तो क्यों न कहानी और कविता की भाषा के सन्दर्भ में बात कर ली जाए, इधर जो रचनाएँ आ रही हैं, उनमें से अधिकांश में भाषागत अनुशासन का अभाव दिखाई देता है।

दीप्ति गुप्ताः सन्दीप जी, मैंने पहले भी, भाषा से जुड़े आपके एक सवाल के सन्दर्भ में कहा और वो ही यहाँ भी दोहराना चाहूँगी कि चाहे आप कविता और कहानी के सन्दर्भ में  या उनसे परे , भाषा में, अनुशासन के अभाव के बारे में हैरान होकर सवाल करें, इन सब सवालों का एक ही जवाब है कि इस बेतरतीब युग में ''अनुशासन'' हर क्षेत्र में, हर क्षितिज पर गायब है। जीवन शैली, रिश्ते-नातों, शिक्षा-दीक्षा, कहीं भी पहले जैसा अनुशासन या तनिक सी भी 'व्यवस्था' दिखाई नहीं पड़ती। तो जाहिर है कि भाषा भी उससे अछूती कैसे रहेगी ? पहले कहानी, उपन्यास, कविता आदि सभी विधाएँ, साहित्य के मनीषियों द्वारा निर्धारित तत्वों के अनुशासन में  ढली होती थीं। उनमें से एक तत्व ''भाषा-शैली'' भी होता था।

इक्कीसवीं सदी ने सभी पर अपना असर डाला, अनुशासन को निगला और सब पर बेतरतीबी के निशान छोड़े।

बेतरतीबी का आलम यह है कि अब तो मौसम भी अनुशासन को तज कर, मनमौजी के तरह आते-जाते हैं। सर्दी में  बारिश, तो बसन्त पर पतझड़ हावी रहता है।बरसात का मौसम सूखा निकल जाता है। इसी तरह पहनावे बेतरतीब, उनके डिजाइन बेतरतीब, कटी-फटी जींस पहनना, ऊपर के आधुनिक परिधान में एक बाँह छोटी तो एक बड़ी, एक कंधे से खिसकी हुई, तो दूसरी तिरछी होकर कंधे के ऊपर चढ़ी हुई। सब उलट-पलट। उसी तरह भाषा भी उलट-पलट। बिखरी हुई, सही मात्रा, स्वर और व्यंजनों से परे, एक यायावरी रूप में ढली हुई, बेअसर, बेरस, बेनूर भाषा, आज के युग की देन है, आज के युग की प्रतीक है।

सन्दीप तोमरः जब आप कहते हैं कि पत्रिकाओं के सम्पादक भाषिक रूप से संपन्न नहीं हैं तब आपकी उनके प्रति नाराजगी के कुछ सकारात्मक परिणाम परिलक्षित होते हैं?

दीप्ति गुप्ता: देखिए, दूसरों को लेकर, मैं अपनी सीमाएँ खूब जानती हूँ। पर, साथ ही अपनी भाषा के हित में बेबाकी से बोलने से भी नहीं कतराती।

वैसे, सामान्यतया, सम्पादक भाषा व साहित्य के अच्छे ज्ञाता होते हैं। लेकिन कुछ इक्का-दुक्का अपवाद भी ऐसे सम्पादको के रूप में सामने आते हैं, जिनका भाषा ज्ञान इतना शर्मनाक होता है कि देख कर हैरानी होती है।  मैं ताज्जुब करती हूँ कि एक वाक्य में 4 -5 गलतियाँ करने वाले, ऐसे लोग सम्पादक बन कैसे जाते हैं ?

पहले तो मुझे उन्हे टोकते हुए संकोच होता है कि उनके स्वाभिमान को ठेस न लगे। लेकिन जब वे लगातार अपने शून्य भाषा ज्ञान के चलते, हिन्दी के सम्मान पर प्रहार किए जाते हैं, उसका रूप बिगाड़े जाते हैं, तो उनकी भाषा सम्बन्धी अशुद्धियों पर सख्ती से आपत्ति जताने को मैं अपना फर्ज समझती हूँ। और वस्तुतः, मेरी विनम्रता से कही गई बात को न सुनने पर, फिर मैं कड़ाई का रुख अपनाती हूँ ,जिसके पीछे भाषा और सम्पादक, दोनों में निखार लाना मेरा ध्येय होता है। ऐसे में, समझदार सम्पादक तो समझ जाते हैं पर, ठीट सम्पादक, भाषा के साथ खिलवाड़ किए चले जाते हैं। उनको मुझे मजबूरन तेवर दिखाने पड़ते हैं और फटकारना पड़ता है। सीखने की कोई उम्र नहीं होती , बशर्ते कि व्यक्ति में सीखने का जज्बा होना चाहिए।जिनमें न जज्बा होता है, न अपनी कमियों को समझने और दूर करने की संवेदनशीलता होती है, ऐसों को पत्रिका के मालिक ही अक्सर बाहर का रास्ता दिखा देते हैं। पत्रिका और भाषा के हित में ये सकारात्मक परिणाम ही हुआ।

सन्दीप तोमरः चलते चलते कुछ एक और सवाल- नारीवादी लेखन के संदर्भ पर, “लिखने की आजादी” और “आजाद ख्याल लेखन” पर आपकी प्रतिक्रिया?

दीप्ति गुप्ता: ''लिखने की आजादी'' और ''आजाद ख्याल लेखन'', दो विपरीत स्तम्भ हैं।

बीते जमाने में कलमकारों को, वो भी विशेषरूप से महिला कलमकारों को सही और जायज बात लिखने की आजादी नहीं होती थी। उस काल में नारी की दयनीय दशा, उसका दबा-ढका अस्तित्व,उससे हर बात को सह जाने की अपेक्षा - के बारे में यदि कोई खुल कर लिखना चाहे तो उसे बहुत सोचना पड़ता था, हिम्मत जुटानी पड़ती थी। लिखने पर आलोचना भरपूर होती थी जैसे कि उसने कोई अपराध किया हो। या नारी को बिगड़ने की दिशा दिखा दी हो। तो सही मुद्दों को लेकर विचारशील, सही सुझाव देना, जीर्ण-शीर्ण मान्यताओं को समाप्त कर, सकरात्मक परिवर्तनों को प्रतिपादित करना, ये सब ''लिखने की आजादी'' के केन्द्र में होता है।

इसके विपरीत ''आजाद ख्याल लेखन'' में अच्छे की कम और बुरे की सम्भावनाएँ अधिक होती है। क्योंकि कुछ लोग ''आजादी'' का मतलब ''अराजक'' और ''उदण्ड''  होना लगा लेते हैं। आजाद ख्याल लेखन अच्छा भी हो सकता है। जैसे पुराने रूढ़ीग्रस्त जमाने में विधवाओं के पुनर्विविवाह के पक्ष में आवाज उठाना। लेकिन कोई नारी के परपुरुषगामी और पुरुष के परनारीगामी होने को सहज गतिविधि बताए, और इस बात की अपने लेखन के माध्यम से तरह-तरह से पैरवी करने लगे - तो इस तरह का लेखन समाज की सभ्यता और सँस्कृति पर चोट करता है और नकारात्मक लेखन की कोटी में आएगा।

वैसे इन दोनो तरह के लेखन की उदात्तता और अनुदात्तता कलमकार की समझदारी पर भी बहुत निर्भर करती है।

सन्दीप तोमरः आपको सबसे अधिक सुख या दुःख की अनुभूति कब होती है?

दीप्ति गुप्ताः सबसे अधिक सुख की अनुभूति अपने सृजन यानी अपने बच्चों और लेखन के साथ होने पर और दुखानुभूति इनसे दूर होने पर होती है ।

किसी रचना (उपन्यास,कहानी, कविता ,सँस्मरण आदि) का सृजन बच्चे के जन्म की तरह ही उल्लसित करने वाला होता है।

यदि लेखन से मुझे कभी -कभार बीमार होने पर या किन्ही सामाजिक व पारिवारिक गतिविधियों की वजह से विरत होना पड़ जाता है, तो मैं उदास और विचलित सा महसूस करने लगती हूँ। और लम्बा खिचने पर बहुत दुख व खालीपन से भर जाती हूँ।

मतलब कि बच्चों और लेखन में मेरे प्राण बसते हैं।

संदीप्त तोमर: यदि आप लेखन से नहीं जुडती तो क्या विकल्प होता?

दीप्ति गुप्ताः मैं गर लेखन से न जुड़ती, तो तूलिका और रंगों से जुड़ गई होती। कला के बीज मेरे अन्दर जन्मजात हैं। मैं हस्तकला, शिल्पकला में भी विविध प्रयोग करती रहती हूँ। मेरे घर में मेरी बनाई हुई, बड़ी-बड़ी पेंटिग्स लगी हुई है। एक-आध  बार, यूँ ही, शौकिया, अपने बने तैलीय और वाटर कलर चित्रों की प्रदर्शनी भी कर चुकी हूँ।

मेरे द्वारा बनाया हुआ, कुछ हस्तकला का समान भी कमरो में सजा हुआ है।

सन्दीप तोमर: और क्या लिखने की इच्छा है, जो अभी तक नहीं लिखा गया?

दीप्ति गुप्ता: मेरा मानना है कि अभी तक मैंने शून्य बराबर लिखा है। बहुत कुछ लिखना बाकी है। मुख्यरूप से मैं कथाकार हूँ। यूँ कविताएँ भी लिखी हैं और लिखती रहती हूँ। पर, मूलतः मैं कहानीकार ही हूँ। उसमें मेरा मन अधिक रमता है।

संदीप्त तोमर: नवलेखन के लिए आपकी राय?

दीप्ति गुप्ताः वैसे तो मैं किसी को राय देना पसन्द नही करती। हाँ सुझाव, जरूर शुभचिन्तक की तरह देती हूँ, वो भी दूसरे के पूछने पर।

नवलेखन के लिए मेरा एक ही सुझाव व सन्देश है कि वह सच्चा, खरा और ध्येय युक्त हो। समाज और मानव-जीवन का हित करनेवाला हो, रचनात्मक सन्देश देने वाला हो। विध्वंसकारी और लक्ष्यरहित लेखन जल्द ही अपना अस्तित्व खो देता है। वह पाठको द्वारा भुला दिया जाता है।

सन्दीप तोमरः एक सवाल मजाकिया लहजे में-“सन्दीप तोमर के लिए दो शब्द?''

दीप्ति गुप्ता: सन्दीप जी, कम समय में जितना भी आपको समझ पाई हूँ, वह ये कि आप एक बहुत संवेदनशील, कर्मठ और जुझारू इंसान हैं। आप की तमाम पोस्ट पढ़कर मैंने पाया कि आप मानवीय, सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक सभी मुद्दों पर संवेदनशीलता से मंथन और चिन्तन करते हैं और समस्याओ के निदान भी देने की अनूठी सामर्थ्य रखते हैं। मैंने ऐसे व्यक्ति सहज ही साहित्य की ओर मुड़ते देखें हैं और जिस दिन मैंने जाना कि आप साहित्य जगत का सक्रिय हिस्सा है, तो यह देख कर, मुझे अपने अनुमान पर फक्र हुआ था।

आप जैसे सच्चे - अच्छे लोगो की साहित्य को बहुत जरूरत है। आप साहित्य से कभी भी उदासीन मत होइएगा। आप में वे अपेक्षित चिंगारियाँ हैं जो साहित्यकार की कलम को जीवित रखने के लिए जरूरी होती हैं। कहने की जरूरत नहीं सुबोध, प्राञ्जल भाषा तो आपके पास है ही।

आपके लिए दिल से शुभकामनाएँ और दुआएँ है कि आप अपनी खरी शख्सियत और खरी कलम के बल पर,  समाज की एक सक्रिय इकाई बने और भरपूर प्रतिष्ठा  प्राप्त करते हुए, अभीष्ट सपनों को साकार करें।

सन्दीप तोमरः ओह, दीप्ति जी, अपने बारे में आपके उम्दा विचारों को जानकर गदगद हूँ।कैसे और किन शब्दों में आपको धन्यवाद दूँ। आभारी हूँ।

दूसरे, आपने जिस खूबसूरती, बेबाकी और तर्कसंगत ढंग से मेरे सभी सवालो का जवाब दिया, उसके लिए शुक्रगुजार हूँ। आपकी तेजोमय सुघड़ लेखनी सदैव सक्रिय रहे और साहित्य जगत को गौरवान्वित करती रहे।