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साहस और डर के बीच
July 9, 2019 • नरेन्द्र मोहन

नरेन्द्र मोहन की डायरी से

साहस और डर के बीच

7 जुलाईः अच्छा ही हुआ कि मैं लेखक के रूप में धीरे-धीरे पहचाना गया, तत्काल नहीं धीरे धीरे मैं जाना-पहचाना गया मुझे शोहरत मिली और मैं निरन्तर काम करता रहा और वैसा जज़्बा बना रहा। लिखते हुए हर बार मुझे लगा जैसे मैंने खुद को नए सिरे से खोज लिया हो, पहचान लिया हो और कुछ वैसा कर लिया हो जो लिखे बिना संभव नहीं है। उम्र के शुरूआती 20-22 साल छोड़ भी दें तो भी एक लम्बी रचना उम्र के इस पड़ाव पर एक नयी कृति लिखने का थ्रिल आज भी महसूस करता हूँ।

10 जुलाईः आवेग में बहना या विचार में डूबना मेरे लिए एक जैसे ही हैं और जब वे एक हो जाते हैं तो मुझे लगता हैं जैसे मैंने संपूर्णता में जी लिया हो या बिना लिखे कोई रचना लिख ली हो। 'मस्तानी' पर मैं नाटक लिखना चाहता था मगर कोई न कोई बाधा आती रही और मैं न लिख सका लेकिन जिस शिद्दत से मैंने उस पर काम किया, उसके किरदार को जिया मुझे लगा जैसे नाटक लिख लिया। रोहित विमुला को लेकर नाटक लिखना चाहता हूँ। कुछ काम कर भी लिया है, तो भी पता नहीं लिख पाता हूँ कि नहीं। उसे और उस की परिस्थितियों को बड़ी शिद्दत से जी रहा हूँ। इस तरह जीना मेरी रचनाशीलता को सान पर चढ़ा देता है और मैं...उम्र थोड़ा आड़े आने लगी है। डांटती-डपटती है। उससे बेपरवाह.सा काम करने में जुट जाता हूँ। बाहरी दबावों से जूझता रहता हूँ और अन्दरूनी दबाव मुझे कम परेशान नहीं करते। दोनों में तालमेल बैठाना मुश्किल होता जा रहा है।

15 जुलाईः प्यार में या दोस्ती में हार आना या जीत जाना, दोनों मेरे लिए अर्थ खो चुके हैं। अगर कुछ अर्थवान रहा है तो वह है प्यार में और दोस्ती में हम साथ होने की तकलीफ और सुख और उसकी ऊष्मा कितनी महसूस करते हैं?

21 जुलाईः यह इच्छा स्वाभाविक है कि मेरी रचनाओं को लोग पढ़ें, मुझे जाने-समझे, पहचाने। लेकिन अपने विचारों के विरूद्ध जाकर मैं लोगों में लोकप्रिय बनूँ, यह मैंने कभी नहीं चाहा विचारों के ताप में इधर-उधर फैला कचरा जलाता रहता हूँ। यही ढब है मेरे लिए लिखते रहने और ज़िन्दगी जीने का।

मैं जानबूझ कर उन दिशाओं की तरफ जाता रहा हूँ जो मेरे सामने चुनौतियाँ प्रस्तुत करें-ज़िन्दगी में और लेखन में भी। एक जगह से दूसरी जगह चले जाने की मेरी इच्छा के पीछे यह मनोभाव काम करता रहता है।

यह भी है कि मैं एक तरह के लोगों से ऊब कर दूसरी तरह के लोगों के बीच चला जाता हूं नएपन की तलाश में। ऐसा नहीं कि मुझे हमेशा नए अनुभव हुए हों या राहत मिली हो। कई बार एक ऊब से दूसरी ऊब के बीच लटका रह गया हूँ।

कई बार ऊँचाइयाँ नापी हैं और झटके से नीचे भी गिरा हूँ... एक पतंग जैसे कोई काट दे, खींच ले। मेरी पतंग को 'बो' की ऊँची आवाज़ांे के साथ काटने वालों की कमी नहीं रही है, पर नयी से नयी पतंग को उड़ाने से मैं बाज़ नहीं आया हूँ।

22 जुलाईः आप के बारे में जो बहुत कुछ जानते हैं, वे ही अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए बड़े-बड़े सिद्धांतों की आड़ में आपके खिलाफ निन्दा अभियान चलाते रहते हैं। मैंने देखा हैं और झेला है ऐसे पोपले और खोखले लोगों को गाल बजाते यूनिवर्सिटियों में, नाट्यसंस्थानों, अकादमियों और कला केंद्रों के परिसरों में।

बड़ी-बड़ी बातें बनाने वाले, चतुराई दिखाने वाले, पाखंडों-आडम्बरों में लिप्त लोगों को मैंने सीधेसादे संबंधों को तहस-नहस करते देखा है।

25 जुलाईः स्वाधीन ढंग से लिखने और जीने की स्वतः सहेजी बेचैनियों से गुजरता हूँ, तो भी, कई बार बाहरी-भीतरी

कारणों से शर्म और ग्लानि महसूस करता हूँ। इससे मैं सिनिकल बन गया होता अगर मुझमें अपने ढंग से जीने और लिखने की शर्म और ग्लानि को कविता और नाटक का हिस्सा बना देने की कुव्वत न होती। निम्न स्तर के पालिमिक्स में लिथड़ा हुआ लेखकों का एक झुंड अपने पैरों खुद कुल्हाड़ी मार रहा है। खुद जैसे हैं वैसे हैं, लेकिन जब वे बाजारूपन और भोंडी टिप्पणियों पर उतर आते हैं तो बड़ी कोफ्त होती है। लेखकीय साख बचे तो कैसे? ऐसे लेखकों को कोई खरीदने नहीं आता, वे खुद आगे बढ़ कर अपनी बोली लगाते/लगवाते हैं।

26 जुलाईः लगातार गिरती दोस्तियाँ गिरते संबंध, गिरती सेहत गिरती देश की हालत कोई बड़ा काम करने नहीं देती। यह गिरना शारीरिक ही नहीं है, मानसिक और ज़हनी भी है जहाँ आदमी खुद को डूबता-सा महसूस करता है। देखता हूँ-'सूखे में नदी/गिरती गयी/नदी में सूखा/फैलता गया'। छटपटाता जरूर हूँ उबरने के लिए मगर देखता हूँ किनारा दूर है कहीं। इस तरह के घातक खालीपन को, जहाँ उदासी ने डेरा डाल लिया हो, भरना मुश्किल ही है। तो भी... तो भी... एक तरफ सभ्यता-संस्कृति के बुनियादी आधारों, संस्थाओं, मूल्यों-मर्यादाओं में तोड़-फोड़- टूटने की हद तक भयावह अलगाव, दूसरी तरफ स्तुति-गायन- आडम्बरपूर्ण प्रशंसा, तंग आ गया हूँ इस सबसे। 27 जुलाईः पारिवारिक संबंधों के तूफानों को उठने से पहले ही थामने की कोशिश करता हूँ पर अगर वे न थमे तो उनका सामना करने में जुट जाता हूँ। मनीषा और सुमन के परिवारों में परिस्थिति वश कई संकट उभरते रहे हैं और मैं उनके साथ जूझता रहा हूँ। अमित दूर मुंबई में है। उसकी आँच मुझ तक कम आ पाती है। तूफान के बीच होने और दूर से उसे देखने में बहुत फर्क है। कितना संभल पाया हूँ इन सबके बीच या कितनी टूट-फूट हुई है मेरे भीतर, क्या कहा जाए?

30 जुलाईः दिल्ली की भाग-दौड़ अब मुझे रास नहीं आती। यहाँ की उठा-पटक, मारामारी से बेजार हो चुका हूँ। कई बार लगता है मैं दिल्ली छोड़ कर किसी और जगह चला जाऊँ (जाता भी रहता हूँ बीच-बीच में, मगर न मनचाहा माहौल मिलता है, न राहत। लौट आता हूँ अपनी जगह। मेरी स्टडी मुझे खींचती है। और मैं लौट आता हूँ यहीं) अपनी स्पेस की चाह में....

5 अक्टूबर: कुछ सरोकार और दृष्टियाँ मेरे साथ इस तरह लिपटे रहे हैं कि न मैं उन्हें छोड़ सका न वे मुझे। संघर्ष करने में मजा आता है और प्रतिरोध मुझे सच के हिस्से के तौर पर दिखता है। जैसे कि 'अभंग गाथा का अभंग प्रतिरोध का जलता हुआ टुकड़ा ही है, करूणा की धीमी-धीमी आँच के साथ वह एक ज़िद की तरह मेरे साथ है जैसे निंदर मेरे साथ है। अच्छा कहो या बुरा, वही है जो इस ज़िद को ज़िन्दा रखे हुए है।

10 अक्टूबर: यहाँ एक से एक बड़े लेखक है, हिन्दी के ही नहीं, भारतीय भाषाओं के भी। सही अर्थों में बड़े दो-चार ही हैं सैकड़ों में। ज़्यादातर का रूतबा सरकारी और संगठनात्मक है। दो-ढाई किताबों की पूँजी के बल पर ये प्रख्यात कहलाते हैं और हर तीसरे दिन किसी सभा की अध्यक्षता करते नजर आते हैं। इनके अपने-अपने दल है जो इन के पीछे-पीछे चलते हैं डफली बजाते। ठोक-पीट कर तय किए गए शब्दों की वही बजबजाहट। सिर भन्ना जाता है। क्या किया जाए?

मैं अपनी लेखकीय जिन्दगी को कभी छोड़ न सका। गिरता-पड़ता, हताश होता, उबरता निरन्तर काम करता रहा। मुझे लगा जैसी भी हो, यही मेरी दुनिया है, मेरी अपनी चुनी हुई दुनिया जिसे मैंने जाना है और जहाँ मुझे जीना-मरना है।

24 नवम्बर: दिल्ली में रहना कोई दिल्लगी नहीं है, यारो। आखिर देश की राजधानी है। जहाँ कई-कई विश्वविधालय, शिक्षा संस्थान, कला अकादमियाँ, कला-दीर्घाएँ, साहित्य अकादमियाँ, ललित कला और संगीत-नाटक अकादमियाँ, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय आदि, क्या नहीं है यहाँ? और आप जानते हैं कि सभी सरकारी-अर्ध सरकारी संस्थानों की डोरियाँ केन्द्रीय सरकार की उँगलियों से लिपटी हुई हैं। जैसा सूत्र संचालन वैसा प्रदर्शन। घोटाले? शिक्षा, साहित्य, कलाओं में आप नाहक घोटालों की बात उठा रहे हैं। मज़ा लीजिये ज़नाब, साहित्य और कलाओं का, शुद्ध मज़ा!

जो हो, दिल्ली, दिल्ली ही है। रही होगी कभी यह रेशमी नगरी, आज इसकी आन, बान और शान के क्या कहने। बड़ी-बड़ी सभा-संगोष्ठियाँ और लोकार्पण यहाँ होते रहते हैं। किताबों की सबसे बड़ी मंडी। एक के बाद एक हजारों किताबें आती हैं। और एक अदृश्य कुँए में गिरती जाती हैं। जलते-जलते प्रशंसा करते, हँसते-हँसते छुरा घोंपते हुए लेखकों की यहाँ हजारों किस्में हैं और चुप्पी की साजिश के कहने ही क्या! उन अदाकारों की बात न ही उठाइए जो इस कला से काटते हैं कि खून का एक कतरा न गिरे और आप लुढ़कते नजर आए।

20 दिसम्बर: प्यार से लबरेज हो कर, गले तक डूब कर जानना और जीना चाहा जिंदगी के हर पहलू को। उस तरह जाना और जिया भी कुछ-कुछ, मगर ज्यादातर हुआ यह कि बीच में ही ठिठक कर रह जाता... न वह प्यार न वे दोस्त। डूबना-उतराना कुछ वक्त की खुशफहमी, फिर वही अ-दोस्ती का रूखा-सूखा सन्नाटे भरा दौर।

एक तड़प के साथ अपनों और दोस्तों से जुड़ता हूँ पर, समय बीतने के साथ महसूस होता है कि जिसे मैं चाँद समझा था, वह एक तपती हुई चट्टान है और मैं झुलसे पंखों के साथ ज़मीन पर आ गिरता हूँ। जिया हूँ मगर थोड़ा-थोड़ा उतना ही जितना पाया है प्यार थोड़ा-थोड़ा।

75 की उम्र तक उम्र को चकमा देता रहा, लेकिन 80 बीतते न बीतते आ ही गया उसकी गिरफ्त में। संबंधों में और दोस्ती में पैदा होती रही दरारों में, अंतरालों में झांकता रहा दूर तक कि दिखता रहे आसमान, प्यार या प्यार का आभास थोड़ा-थोड़ा।

धीरे-धीरे सिमट रहा सरोवर का पानी... सरोवर- अरे सरोवर कहाँ आ गया बीच में! नदियों और पेड़ों से प्यार रहा है मुझे। लाहौर की नदी रावी को अपने भीतर बहता महसूस करता रहा हूँ, मगर यह क्या उस नदी को सूखते हुए देखता हूँ निचाट सूनेपन में अपने भीतर।।

कहाँ से कहाँ आ गया मैं? भीतरी दुनिया के बरक्स बाहरी दुनिया में जो उलट-फेर महसूस करता हूँ, उसके सामने मैं, पुरानी गठरी फेंक उठ खड़ा होता हूँ।

प्यार की राहों का कोई अंत नहीं है। रोकता है, थामता है प्यार, क्षितिजों के पार ले जाता है, प्रेरित करता है ऊँचे शिखरों को छूने के लिए। खतरे ही खतरे हैं। ऐन उस वक्त निंदर मुझे आ दबोचता है। अब क्या करूँ? कोई समझाएं निंदर को कि हम समझाएं क्या?

25 दिसम्बर: नए से नया लेखन करता रहा हूँ। लेखकीय चुनौतियाँ झेलना स्वभाव में रहा है और वह निंदर जो मुझे उस तरफ धकेलता रहा है, उसे कैसे भूला सका हूँ? वह मझे उन कामों को करने की तरफ ले गया जिन के बारे में मैंने कभी सोचा न था। हाँ कई बार उसने सख्त मना भी किया। पता नहीं उसने कैसे भांप लिया कि मैं महाकाव्य लिखना चाहता हूँ। वह मेरे सामने तन कर आ खड़ा हुआ एक दिन, 'नहीं, तू महाकाव्य नहीं लिखेगा'। 'क्यों नहीं, क्या मैं महाकाव्य लिख नहीं सकता?” उसके सख्त रवैये को मैंने हँसते-हँसते काटते हुए कहा। 'लिख सकते हो जैसे सैकड़ों लिखे गए हैं। उन सैकड़ों में एक होना चाहोगे? बोलो 'कामायनी' के बाद कोई महाकाव्य तुम्हारी याद में टिका रहा क्या' ? उसकी बात में दम था। मुझे चुप देख वह मेरे सिरे हो गया, “तुम तो बाहरी-भीतरी स्वतंत्रता पर एकाग्र लंबी कविता की बात करते रहे हो, तुम्हे यह क्या सूझा कि महाकाव्य-खण्डकाव्य के रूप-विधानों में जकड़ी हुई काव्य-संरचनाओं की बात करने लगे? बता, भला आज कौन लिख रहा है महाकाव्य? मैंने जैसे ही कहा, 'फलां ने, फलां ने' मैं अपनी ही सोच पर क्षुब्ध हो उठा। रचनात्मक दृष्टि से क्षीण वे महाकाव्य न हमारे समय की संवेदना से जुड़े हुए है, न ही उनमें हमारी परिस्थिति और इतिहास की जिन्दा धड़कने दर्ज है।

30 दिसम्बर: दिन ढलने को है और अँधेरा तेजी से उतर रहा है। लिखना पढ़ना मुश्किल हो गया है। अँधेरा कब तक रहेगा और कितना अबेध्य, यह सोच कुछ लेखक, कलाकार अँधेरे में काम करने का अभ्यास करने लगे हैं, इस उम्मीद से कि शायद अँधेरा सुलगने लगे। मुझे एक लोककथा याद आ गई है- सम्राट ने बुनकर को आज्ञा दी कि वह उसके लिए एक ऐसा परिधान बनाये जैसा किसी महीपति ने आज तक न पहना हो। बुनकर ने कुछ ही दिनों में तारों-अन्ततराओं से बुना सूक्ष्मतर, अमूर्त, दिव्य लिबास तैयार कर दिया। राजा को निर्वस्त्र कर उसे पहना दिया इस शर्त के साथ कि वह अँधा-अभागा ही होगा जो इस लिबास को देख न सकेगा। पल-भर में धूम मच गई 'मूर्ख के लिए अगम्य राजा के नए वस्त्र की'। पलक झपकते मदमाता राजा हाथी पर था। विशाल जुलूस के आगे-आगे मंत्रिगण, श्रेष्टिजन, सैन्य प्रमुख- राजा की जयकारों से आसमान का कोना-कोना गूंज उठा। साहस और डर के बीच जनता उमड़ पड़ी है राजा का दिव्य रूप देखने। क्या होगा, अब क्या होगा-

इधर-उधर फैली बिखरी अनंत लहरियों-सी

अस्फुट ध्वनियों के बीच

यकायक निर्मल हँसी की कौंध एक निकली कि

राजा डोल उठा।

डोल उठे सेनापति, श्रेष्टिजन

राजा ने आगे बढ़ तलवार खींच ली

चीख उठा वह

किसने सन्नाटा तोड़ा

मेरे हुक्म बिन कौन हँसा

किस मूर्ख की शामत आई?

 

जनसमूह से मुँह निकालता

मासूम निडर-सा एक नन्हा बालक

चकित-विभ्रमित आगे बढ़ आया

विस्मय से राजा को देखा

हँसा- हा हा हा

हँसता रहा हा हा हा

देखो देखो- राजा नंगा

हँसते हँसते चीख पड़ा वह- राजा नंगा है।

दूर दूर तक फैल गई ध्वनियाँ

राजा/नंगा/ है!