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साहित्य नंदिनी आवरण पृष्ठ 4
June 21, 2020 • देवेंद्र कुमार बहल • साहित्य नंदनी

‘कम आवाजों का शहर’-स्मृति आख्यानों की ऐसी किताब है जिसे ज्ञानप्रकाश विवेक जैसे अनुभवी लेखक ने बड़ी आत्मीयता, हार्दिकता, सादगी और संवेदना से तहरीर किया है। ज्ञानप्रकाश विवेक अपनी सृजनशील, महीन भाषा के लिए जाने जाते हैं। इन स्मृति आख्यानों की भाषा अपनी संवेदन लय में गूंजती हुई महसूस होती है।

विभाजन की त्रासदी को झेलते हुए, टूटते-बिखरते हुए जीवन संघर्ष करते हुए किरदारों की छवियां इन संस्मरणों में बड़ी शिद्दत के साथ मौजूद हैं।

अपनी जड़ों से उखड़े हुए लोग, जीवन के प्रति अटूट विश्वास पैदा करते हैं। यही क्षीण-सा भरोसा साधारण लोगों का जीवन राग बन जाता है।

ज्ञानप्रकाश विवेक ने इन संस्मरणों में विस्थापन की वेदना को गहराई से व्यक्त ही नहीं किया बल्कि कठिन वक्त में जीवन जीने की उस उद्दाम इच्छा को भी, मानीखेज अंदाज में तहरीर किया है जो निहत्थे, खाली हाथ, अभावग्रस्त लोगों की जिन्दगी का हासिल होती है।

ये संस्मरण जिनमें यादों का लश्कर रखा दवा है, जिसमें गुजिश्ता समय की पदचाप को सुना जा सकता है।

 

ध्यान के आतिशदान में यादों की दियासिलाइयाँ

निजी नाणमा स्मृति! जैसे पर्दे के पीछे छुपकर खड़ा कोई गुजिश्ता वक्त! स्मृति, जैसे जिन्दगी के मुसाफिरखाने में खाली बेंच पर बैठी अतीत की गर्द! स्मृति, जैसे कोई कटी हुई पतंग, आवारगी के पांव लगाकर, भटकती हुई, यहाँ-वहाँ! स्मृति जैसे बेआवाज बस्ती में गूंज उठी हो कोई पुरानी-सी आवाज। माया स्मृति! टेबल फैन के सामने रखी खुली किताब। फड़फड़ाती हुई.... जिल्द की कैद से रिहा होने को आतुर। स्मृति जैसे अकेलेपन से गुफ्तगू। जैसे वर्तमान से नाराजगी। जैसे पलटकर बहुत दूर देखने की जिद। जैसे किसी बवण्डर को पालतू बनाने का हुनर। जैसे अपने होने को महसूस करने और अपने न होने का सूफियाना भाव। जैसे अपनी देह को आराम कुर्सी पर रखकर, बहुत पीछे, सराबों की जानिब निकल पड़ने की तौफीक।

या फिर! स्मृति जैसे गर्म तवे पर आसमान की आँखों से गिरा, किसी टूटे हुए सितारे का आँसू।

और मैं।

मैं जैसे कोई मोम का बंजारा, अधबुझी आग का जूता पैरों में डाले, संस्मरणों के किरदारों की नशिस्त में शामिल। या फिर मेरे अंदर यादों का खामोश-सा आतिशदान, किस्सों की दियासिलाइयों को जलाता-बुझाता हुआ।

जिन्दगी सचमुच खुशफहमियों का तलघर है। जहाँ हम अपने आपमें गर्क जैसे- जहाज समन्दरों में, प्यास जरों में, रेलगाड़ियां सफर में गर्क और परिन्दे उड़ान में, आवाजें गुम्बदों में तो उदासियां दिल की छावनी में गर्क।

और मैं।

मैं स्मृति आख्यानों में गर्क।

मेरे पिता शायर, अफसानानिगार और विस्थापित। वो विस्थापन की वेदना लेकर, बेघरी का दर्द उठाकर, इस मुल्क के छोटे-से शहर बहादुरगढ़ में स्थापित हुए। यह शहर, कम आवाजों का शहर, पिता को शरण देता हुआ। पिता का एहतराम करता हुआ, मामूली-सा शहर।

पिता अपने साथ क्या-क्या लाए, इसका पता नहीं। लेकिन वो अपने साथ उर्दू जबान, शायरी और यादों का सरमाया लेकर आए। उन्हीं यादों को वो अक्सर नम आवाज और पुरकशिश अंदाज में सुनाते थे। मैं तब छोटा था। उनकी बातें मेरे जहन में इकट्ठा होती चली गईं। शहर के अन्य विस्थापितों के संघर्ष, जीवन शैली अनुभव और बातचीत से भी मैंने संस्मरणों के लिए जमीन तैयार की। इन संस्मरणोंध् आख्यानों के लिए मैंने बेहद जज्बाती, स्मृतियों की गूंज पैदा करती भाषा का सृजन किया।

ये स्मृति आख्यान, विस्थापितों की वेदना, उनके जीवन संघर्ष, अभावों में भी जिंदादिली के अतिरिक्त, फिर से उठ खड़े होने का साहस और जिजीविषा से भरपूर, एक ऐसी साधारण लोगों की दुनिया में ला खड़ा करते हैं जिनके जीवन का साधारणत्व सबसे बड़ी शक्ति है। 

इन स्मृति आख्यानों में दुख की तान और जिन्दादिली का वैभव एक साथ गूंजते महसूस होते हैं।

ज्ञानप्रकाश विवेक, 1875, सेक्टर-6, बहादुरगढ़-124507 
मो. 9813491654