सिलवटें
October 3, 2019 • विकेश निक्षावन

श्रीधर की मौत की खबर जगमोहन ने आकर दी थी। चार रोज पहले जगमोहन बता कर ही गया था कि वह बावलपुर जा रहा है। मैंने कागज के एक पुर्जे पर श्रीधर का फोन नम्बर लिखते हुए कहा था- बावलपुर जा रहा है तो श्रीधर से भी मिलते आना। यह उसका फोन नम्बर है, उसके यहां जाने से पहले उसे फोन घुमा लेना।

खबर देते हुए जगमोहन सुबक पड़ा था। जरा सहज होते हुए बोला- मैंने उनके यहां जाने से पहले फोन किया तो सारिका भाभी बोली थीं, श्रीधर फोन पर नहीं आ सकते। उनसे मिलना है तो घर पर आना होगा। जगमोहन एक पल के लिए रूका फिर बोला- सारिका भाभी की आवाज में एक खौफ था, जिसने मुझे विचलित कर दिया था। अपने काम से फारिग होते ही मैं उनके यहां चला गया था। सारिका भाभी शायद मेरी ही प्रतीक्षा में थीं। मुझे देखते ही वह ऊपर वाले कमरे में चले आने का निर्देश दे सीढ़ियों की ओर बढ़ गयीं। मैं भी उनके पीछे-पीछे हो लिया था। लगता है श्रीधर कुछ अस्वस्थ चल रहा है जो फोन पर भी नहीं आया और नीचे भी नहीं आ पाया। सारिका भाभी का चेहरा भी तो कैसा उतरा पड़ा है। बस इतना ही विचार आया था मेरे मन में।

जगमोहन के होंठ सूख रहे थे। होंठों पर जीभ फेरता हुआ बोला, हालांकि सारिका भाभी के चेहरे से कुछ भी अन्दाजा लगाया जा सकता था, लेकिन व्यक्ति इस हद तक कहां सोच सकता है। छत के आखिरी कमरे में ले जाकर सारिका भाभी दीवार की ओर इशारा करती बोली थीं, वो सामने रहे तुम्हारे दोस्त के दोस्त। मिल लो उन्हें।'

जगमोहन की आंखें एकाएक छलछला आयीं। अपनी

अश्रुधारा के बीच ही वह बोला, 'दीवार पर लगी श्रीधर का फोटो और उस पर फूलों की माला... मेरे लिए एक अच्छा-खासा विस्फोट था यह।'

जगमोहन आगे कुछ नहीं बोल पाया। जिस विस्फोट को जगमोहन ने झेला था मैं भी उसे ही झेल रहा था। जगमोहन की आंखों में इस वक्त समन्दर तैर रहा था। लेकिन मेरी आंखें बिल्कुल शुष्क थीं। श्रीधर के लिए तो मैं पहले ही बहुत आंसू बहा चुका हूं। अब अगर रोना भी चाहूं तो शायद नहीं रो पाऊंगा।

-श्रीधर सुबह-सवेरे नदी किनारे घूमने गया था। जगमोहन ने जरा सहज होते हुए बात जारी की- जाने कैसे नदी पर से उनका पांव फिसला और वे नदी की लहरों के साथ ही बह गए।

जगमोहन को यह बात सारिका भाभी ने ही बतायी थी। जगमोहन पहले तो बताने से कतरा रहा था परन्तु मेरे सवाल का जवाब तो उसे देना ही था।

श्रीधर क्या दूध पीता बच्चा था जो नदी पर से उसका पांव फिसल गया। मेरा सवाल भी तो बचकाना था जो मैं यह पूछ रहा हूं कि श्रीधर की मौत कैसे हुई?

श्रीधर भला एक दिन में मरा है क्या? उसने तो मौत का एक-एक कतरा पिया है। और पिछले बीस वर्षो से वह इस जहर को बराबर पी रहा था।

-बच्चे बड़े हो रहे हैं श्रीधर कुछ उनका भी सोच लो।

-मैं क्या सोचूं भला! मेरी तरफ से कुछ हो तो सोचूं भी। उसकी एक से एक घटिया बात बर्दाश्त करता हूं मैं पर कहीं तो मुझे जुबान खोलनी पड़ती है। बस वहीं पकड़ लिया जाता है मुझे। मेरे एक ही शब्द को पकड़ कर मुझ पर सौ इल्जाम लगा दिए जाते हैं। पिछले बीस बरसों का खाता मेरे आगे खोल कर रख दिया जाता है। श्रीधर को बच्चों की तरह बिलखते देखा करता था।

-ऐसा क्यों है श्रीधर? भाभी ऐसी क्यों है? श्रीधर कहीं गहरे में डूब जाता। मैं घण्टों उसके पास बैठा रहता। शायद मेरी बात का जवाब दे पाए। लेकिन वह जवाब नहीं दे पाता था या फिर देना नहीं चाहता था... पता नहीं।

सारिका को श्रीधर ने खुद ही तो पसन्द किया था। मां और बाबूजी तो उन दिनों शिरडी गए हुए थे। एक रोज म्यूनिसिपल पार्क में घूम रहा था तो रमन बाबू सामने पड़ गए। अलका जीजी भी साथ थीं। श्रीधर को देखते ही वह बोली थीं- अरे कब तक ऐसे अकेले घूमते रहोगे?शादी-ब्याह करा लो जिन्दगी सार्थक हो जाएगी।

हां! जीवन की सार्थकता को वह शायद नहीं समझ पा रहा है, यही विचार आया था उसके मन में एकाएक बोला था, 'अगर ऐसा ही है जीजी तो फिर मेरा जीवन सार्थक करने में मेरी मदद कीजिए न।

-मुकरोगे तो नहीं?

-कदापि नहीं। अलका जीजी ने पक्का वादा ले लिया था।

अगले रोज ही रमन बाबू और अलका जीजी ने उसे घर पर बुला कर सारिका से उसका परिचय कराया था।

यकीनन सुन्दर चेहरे छलते हैं। श्रीधर तो यही मानने लगा है अब। विवाह के बाद घर की दहलीज के भीतर कदम रखते ही सारिका की पहली शर्त यह थी कि वह उसके साथ तभी रहेगी जब वह इस घर से अलग हो जाएगा।

श्रीधर जड़ हो आया था। रमन बाबू के घर पर श्रीधर से सारिका का पहला प्रश्न था तुम्हारा सबसे फेवरेट व्यक्ति?

-मेरे माता-पिता। -उसके बाद?

-मेरे दोस्त श्रीधर मेरी ओर इशारा करता हुआ बोला था।

श्रीधर मुझे भी जबरदस्ती साथ ले गया था। हालांकि मैंने बहुत मना किया था लेकिन उसने साफ शब्दों में कहा था- मां और बाबूजी यहां नहीं हैं। क्या तुम मेरे भाई की जगह नहीं ले सकते?

-और मेरा नम्बर कौन सा होगा? सारिका भाभी मुस्कराती हुई बोली थीं।

-अंऽऽऽ। भई यह तो सोचना पड़ेगा। श्रीधर ने मजाक के अन्दाज में कहा था। लेकिन यह अन्दाज श्रीधर को इतना महंगा पड़ेगा वह सोच भी नहीं सकता था।

-इस घर से अलग! श्रीधर चीखा था- मैंने तो तुम्हें पहले ही कहा था कि मैं मां और बाबूजी के बिना नहीं रह सकता।

-जानती हूं। और तुमने उन्हें जीवन में पहले नम्बर पर रखा हुआ है यह भी पता है मुझे। लेकिन अब पहले नम्बर पर तुम्हें मुझे रखना होगा। और वह तभी हो सकेगा अगर तुम इस घर से अलग होओगे।

श्रीधर अपना दुखड़ा लेकर मेरे पास आ पहुंचा था। मैंने स्पष्ट कहा था- अब तो यह समझौता तुम्हें करना पड़ेगा श्रीधर। वरना मां और बाबूजी...।

-क्या उन्हें छोड़ दूं?

-ट्रांसफर का बहाना बना कर शहर चले जाओ। पास रह कर मां और बाबूजी को कभी खुशी न दे पाओगे। सारिका भाभी नहीं रह सकेगी उनके साथ।

जाने किस रात श्रीधर इस गांव से विदा ले गया मुझे भी पता नहीं चला। हां, जाने से पहले वह बाबूजी को अपना अता-पता दे गया था। बाबूजी हार गए थे उसे पत्र लिख-लिख कर। लेकिन कोई जवाब नहीं आया था। बाबूजी ने मुझे ही कहा था कि मैं उसका पता करके आऊं। वे मुझे काफी मानते थे।

कहीं श्रीधर का मन भी तो नहीं बदल गया शहर जाकर। यही सोचकर मैं उसके पास गया था। श्रीधर ने बताया था कि उसके हाथ बाबूजी का कोई पत्र नहीं लगा। सारिका से पूछेगा तो बात और बढ़ेगी। थोड़ी देर के लिए श्रीधर बाहर गया तो मैं सारिका भाभी से बोला था- आजादी का यह अर्थ नहीं होता भाभी कि अपनों से रिश्ते ही तोड़ लिए जाएं।

-जरा तमीज से बात करो। तुम्हारी औकात क्या है जो मुझसे यह सवाल करने जा रही हो। श्रीधर से क्या रिश्ता है तुम्हारा?।

मैं अवाक था।

सारिका भाभी पुनः उसी आवेश में बोलीं- जवाब दो, श्रीधर के साथ तुम्हारा क्या रिश्ता है? अगर सच में तुम्हारा उसके साथ कोई रिश्ता है तो मैं तुम्हारा सदका उतारूंगी। हां, ये दोस्ती जैसे लिजलिजे रिश्ते...। जाने कल को कितने दोस्तों की लम्बी लाईन लग जाए और वे भाभी-भाभी करते हुए रसोई घर के भीतर या फिर बेडरूम तक घुसते चले आएंगे।

-बात मेरे सम्बन्ध की नहीं है। मां और बाबूजी...

-बस्स! सारिका भाभी ने बीच में रोकते हुए हाथ आगे बढ़ा दिया था- दूसरों की आड़ मत लो अपनी इस नयी जिन्दगी को मैं गांव के उस तबेले वाले घर में नहीं काट सकती।

सारी बात इतनी स्पष्ट थी कि किसी तरह की सिफारिश, हमदर्दी या समझौते की गुंजायश नहीं थी। पूरी रात छत के कमरे की कड़ियां गिनते कटी थी।

श्रीधर भी सुबह जल्दी ही उठ गया था। उससे विदा लेते हुए लगा था कम से कम थोड़ी देर और रूकने को कहेगा लेकिन वह तो दरवाजे तक भी नहीं आया। बस एक झूठी मुस्कान से एक पल के लिए उसके होंठ फैले फिर सिकुड़ कर रह गए थे।

उसके बाद श्रीधर के पास जाने का सवाल ही नहीं उठा जब कोई चीज मन से उतर जाती है तब दिमाग भी उसकी कोई तस्वीर नहीं बना पाता। श्रीधर की इस खामोशी के पीछे मुझे उसकी भी कायरता दिखाई दे रही थी।

वक्त तेजी से निकलने लगा था। श्रीधर को लाख याद करने पर भी उसका केवल धुंधला सा चेहरा मेरे सामने आ खड़ा होता। उसका वो मासूम भोला सा चेहरा जाने कहां खो गया था।

एक बार पुनः श्रीधर से सामना हुआ था। बाबूजी को पैरेलाईसिस का अटैक हो आया था। अम्मा ने मुझे सन्देशा भिजवाया था कि मैं श्रीधर को खबर कर दूं। अम्मा ने एक बात विशेष तौर से कहलवायी थी कि श्रीधर को आने के लिए नहीं कहना केवल बताना है उसे अगर थोड़ी बहुत शर्म होगी तो खुद ही चला आएगा। बहू आती है या नहीं इससे किसी को कोई अन्तर नहीं पड़ने वाला।

लगा था श्रीधर से फोन पर बात करते हुए मेरा स्वर कांप जाएगा। लेकिन बात करते हुए मुझे स्वयं को लगा था जैसे मेरा स्वर और अधिक कठोर हो आया है। बस इतना ही कहा था मैंने, बाबूजी को पैरेलाइसिस का अटैक आया है। आगे कोई शब्द नहीं निकला था मेरे मुंह से।

मैं सुबह-सवेरे अम्मा को सूचना देने चला गया था कि मैंने श्रीधर को फोन कर दिया है। परन्तु वहां पहुंचा तो देखा, श्रीधर बाबूजी के पांव पर अपना सिर रख कर सुबक रहा था। एक पल मेरी ओर देखा तो मेरे गले लग कर फूट ही पड़ा। इस तरह तो कभी किसी बच्चे को भी रोते नहीं देखा था मैंने।

श्रीधर के लिए सब गिले-शिकवे जाते रहे। बाबूजी ने तो ता-उम्र कभी किसी की शिकायत नहीं की फिर भला आज क्या कहते। बल्कि श्रीधर को देखते ही उनके चेहरे पर एक सुकून आ गया था और उस सुकून को साथ लिए ही बाबूजी उसी रात सदा के लिए विदा ले गए।

सारिका भाभी आयी थीं। उन्हें आना पड़ा था। लगा था, बाबूजी के किरया-करम् के बाद लौट जाएंगी। लेकिन नहीं, उन्होंने शहर न लौटने का निर्णय ले लिया था। चलो इन्हें अहसास तो हुआ, सभी ने यही सोचा था। किन्तु सारिका भाभी ने सबके सामने बड़े स्पष्ट रूप से कहा था, गांव की इतनी बड़ी जमीन भला अपने हाथ से कैसे जाने दूं। अम्मा को दो वक्त की रोटी हम बड़े शौक से खिला सकते हैं।

श्रीधर शहर से सामान लिवाने जाने लगा तो सारिका भाभी मेरी ओर इशारा करती बोलीं- इस व्यक्ति को साथ ले जाओ। बिना मतलब के तुम ऐसे लोगों के आगे-पीछे घूमते हो...अब जब जरूरत आन पड़ी है तो ये लोग तुम्हारा साथ न देंगे?

मैं हैरान था सारिका भाभी के आगे श्रीधर किस कद्र खामोश हो जाता है। तीन दिन शहर में रूके थे हम। कितना ही छोटा-बड़ा सामान सलीके से पैक करना था।

गांव लौटे तो सारिका भाभी चाय का कप मेरी ओर बढ़ाती बोलीं- चाय पियो और रास्ता नापो अपना। मत सोचना कि यह कोई बहुत बड़ा अहसान किया है तुमने हम पर। ध्यान रखना बाबूजी अब नहीं रहे। कहीं अम्मा से हमदर्दी जताने के बहाने तुम हर रोज यहां चले आओ।

सारिका भाभी का स्वभाव देखते हुए उधर कदम उठने बिल्कुल बन्द हो गए थे। यों भी मेरा तबादला हो गया था। कभी-कभार श्रीधर से फोन पर बात हो जाती थी। पिछले सप्ताह श्रीधर को फोन किया तो तुरन्त बोला- यार चले आओ न। बहुत जी चाह रहा है तुझसे मिलने को।

नहीं श्रीधर, फोन पर ही काफी है। भाभी के श्लोक सुनना क्या तुम्हें अच्छा लगने लगा है?

-नहीं रे! तुम्हारी भाभी यहां नहीं है। दो रोज से शालिनी के यहां गयी है। उसकी बेटी की शादी है। सारिका कल लौटेगी। तुम कम से कम एक रात तो मेरे पास रूक सकते हो। यार चले आओ, इनकार मत करना।

और सच में मैं इनकार नहीं कर सका था। चंद घंटों में ही मैं श्रीधर के पास था। श्रीधर चाय बनाने लगा तो मैं सीधे से बोला था- यार मुझे तो भूख भी बहुत लगी है।

-अब भोजन तो दो घंटे बाद मिलेगा। सारिका साग बना कर रख गई थी। परांठे मैं बनाऊंगा। बहुत मजा आएगा।

श्रीधर जैसे कहीं भीतर तक अतृप्त था। चाय का पहला चूंट भरते ही श्रीधर बाबूजी को लेकर शुरू हो गया था- सच में बहुत सीधे थे बाबूजी। सादा जीवन और उच्च विचार थे उनके। मुझे बहुत चाहते थे वे, लेकिन मैं उनके जीवन से उतना ही कट गया। सारिका भाभी के की वजह से मैं सब से दूर हो गया।

सारिका भाभी ऐसी क्यों है? एकाएक मेरे मुंह से निकल आया था। हालांकि यह सवाल मैं श्रीधर से पहले भी कई बार पूछ चुका था।

-यह सब उसे विरासत में मिला है। नहीं बदल सकती वह अपने को। श्रीधर बड़े साफ शब्दों में बोला- सारिका के लिए मैं किसी से शिकायत भी नहीं कर सकता। मैंने स्वयं ही उसे अपने लिए चुना था। सब लोग यह सोचते होंगे कि मैं अब तक सारिका से क्यों जुड़ा हुआ हूं? दरअसल अब सारिका केवल मेरी पत्नी ही नहीं, दो बच्चों की मां भी तो है। मैंने सोचा था बच्चे हो जाएंगे, सारिका बदल जाएगी। किसी दूसरे के लिए उसके मन में प्यार जगेगा। लेकिन मात्र भ्रम था वह मेरा, कहीं कुछ नहीं बदला। बच्चे तो अपना जीवन जीने से ही कतराने लगे हैं। बिटु तो कभी किसी को घर पर लाया ही नहीं। वह साफ कहता है, पापा दूसरों के सामने तमाशा नहीं बनना हमें आपने तो जिन्दगी जी ली, हम दूसरों के सामने जिल्लत नहीं सह सकते। अब मम्मी को भी हम फैक तो नहीं सकते।

कितनी रात बातों में कटी थी और कितनी नींद में, पता नहीं। सुबह पूर्ववत जल्दी ही उठ गया था मैं श्रीधर के उठने तक मैं लगभग तैयार हो चुका था। जूतों के तस्में बांधते हुए मैंने कहा था, अब अगली बार कब मिलना हो पाएगा?

-जब तुम्हारी भाभी घर पर नहीं होगी, फोन कर दिया करूंगा तुझे। श्रीधर हंस दिया था। श्रीधर अब भी मुझसे मिलने की इच्छा रखता है इस बात से ही पर्याप्त संतोष मिला था मुझे।

लेकिन ऐसा क्या हुआ होगा कि श्रीधर ने पानी में कूद कर अपनी जान गंवा दी। आखिर सारिका भाभी ने ऐसी कौन सी इन्तिहा कर दी होगी जिसके आगे श्रीधर बिल्कुल हार गया। लगभग दो माह बाद मैं सारिका भाभी के यहां चला आया। चाहते हुए भी खुद को रोक नहीं पाया था। मुझे देखते ही सारिका भाभी ने बस इतना ही कहा था- तुम उस रोज यहां न आये होते तो हालात शायद कुछ और होते।

इस वक्त बात को मैं पूरी तरह से नहीं पकड़ पाया। ऋचा और वेणु मुझसे आकर लिपट गये थे। मैं देर तक उनको सहलाता रहा।

इस बीच सारिका भाभी चाय ले आयीं। हम चाय पीते रहे लेकिन हमारे बीच चुप्पी ऐसे पसर गयी मानो श्रीधर की मौत के हम दोनों ही जिम्मेवार रहे हों। भाभी के प्रति कोई द्वेष मेरे मन में नहीं उमड़ रहा था। जो भी रहा हो जैसे भी रहा हो , सारिका भाभी अब तो पछता रही होंगी।

रात लौटना चाहा था लेकिन भाभी प्लेट में खाना ले आयी थीं। छोटी वाली तिपायी पर रखती बोलीं- खाना खा कर ऊपर वाले कमरे में सो जाना। मैंने बिस्तर लगा दिया है। सुबह जब चाहो चले जाना। तभी भाभी ने आंचल के पल्लू से बंधी एक चाबी मुझे पकड़ायी - यह श्रीधर की अलमारी की चाबी है। दो रोज पहले कह रहे थे तुम्हें कुछ किताबें देनी हैं। वे कौन-सी किताबें थीं मुझे नहीं पता अब चाहो तो कोई भी किताब ले जा सकते हो। तुम्हारे पास संभली रहेंगी। मैं बिना शौक के कब तक संभाले रखंू। जब पहले ही शौक नहीं रहा अब जबरदस्ती कैसे पाल लूंगी। बच्चे अभी छोटे हैं.....

यकीनन श्रीधर की अलमारी देखने की मेरी उत्सुकता बढ़ गई। खाना खा कर मैं सीधे ऊपर चला गया। कुछ पल तो यों ही अलमारी के बाहर लटक रहे उस छोटे से ताले को देखता रहा।

श्रीधर ने अलमारी को ताला क्यों लगाया हुआ है? उस रोज तो इस पर कोई ताला नहीं था। ताला खोलते हुए मेरे हाथों में एक कम्पन हुआ।

धर्मवीर भारती के 'गुनाहों का देवता' से लेकर मोहन राकेश के 'आधे-अधूरे' और भगवती चरण वर्मा के 'चित्रलेखा' पर मेरी नजर गयी। एकाएक किताबों के बिल्कुल ऊपर रखा एक लिफाफा मेरे हाथ में आ गया था। लिफाफा पलटा तो उसके ऊपर अपना नाम देख चैंका था मैं। झट से लिफाफा खोला मैंने। एक छोटा-सा कागज का पुर्जा था उसमें। तेजी से उस पर नजर दौड़ाने लगा।

-उस रोज तुम्हारे जाते ही सारिका आ गयी थी। कमरे में चारों ओर नजर दौड़ाती बोली थी रात कौन आया था?

-कोई भी तो नहीं! मैंने पूरे आत्मविश्वास से कहा था। लेकिन सारिका की मुस्कराहट मुझे भीतर तक छेद गयी थी- इस बिस्तर पर सिलवटें देख रहे हो? जरा गिनो तो इन्हें, इन्हीं से पता चल रहा है कि रात यहां कोई सोया था।

-जो औरत बिस्तर की सिलवटें गिन सकती है कल को वह मेरी सांसें भी गिनेगी। तब नहीं बर्दाश्त कर पाऊंगा मैं। कागज का वह पुर्जा मेरी मुट्ठी में भिंचने को हो आया।

यकीनन श्रीधर की मौत की जिम्मेवार सारिका नहीं मैं हूं। कागज के पुर्जे को जेब में ठूसता हुआ न चाहते हुए भी कुछ किताबें उठा मैं नीचे चला आया।

ऋचा और वेणु बरामदे में खड़े थे। मुझे देखते ही ऋचा मेरे पास चली आयी। मेरा हाथ अपने हाथों में लेती बोली- अंकल, कुछ लोग कहते हैं पापा ने आत्महत्या की है। क्या ऐसा हो सकता है?

बड़ी मुश्किल से संभाला था मैंने खुद को। जुबान कहीं लड़खड़ा न जाए, इस इरादे से स्वयं को मजबूत करता बोला- नहीं बेटे, ऐसा कुछ भी नहीं है। लोग तो बहुत कुछ कहते हैं। वो तो नदी पर से पांव फिसल गया था उसका।

एक झूठ बोला था मैंने। क्षोभ और आत्मग्लानि से भरा मैं लौट आया था।