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ग़ज़लें
September 16, 2019 • नलिनी विभा ‘नाज़ली’

न हो उदास कि दस्ते-ख़ुदा1 है सर पे तिरे

सवाब2 पाया उसी ने, झुका जो दर पे तिरे

तुझे ख़बर भी न होगी वो झोली भर देगा

बहुत हसीन-सा मंज़र3 दिखेगा घर पे तिरे

ग़मे-हयात4 से तय है, ख़ुदा निकालेगा

हिफ़ाज़तें5 जो करे साथ रह सफ़र पे तिरे

तिरे जलाल6 को मिलने न ख़ाक7 में देगा

वो रहमतें ही करेगा सदा हुनर8 पे तिरे

तिरी दुआ में अगर 'नाज़ली' है सच्चाई

ख़ुशी की बारिशें बरसाएगा वो घर पे तिरे