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‘घास हूँ.....’
August 7, 2020 • सेराज खान बातिश • साहित्य नंदनी


सेराज खान बातिश, खिदिरपुर, कलकत्ता, मो. 9339847198

आम आदमी के जीव में बेहतर बदलाव और उनकी बेहतर जिन्दगी का सपना कवि की आँखों में है। लेकिन वह यथार्थ में है, आम आदमी को हर पल टूटा हुआ-बिखरा हुआ पाता है। पेट की आग बुझाने के लिए गरीब आदमी को वह हाड़तोड़ मेहनत करते देखता है। फिर भी वह देख पाता है कि जनविरोधी सरकारी नीतियों के कारण आम आदमी से दूर रोटियाँ पहरे में हैं। चुनावी वादों और नारों के शक्ल में ‘रोटियों के बारिश की बात फैल गई’। लेकिन हकीकत में रोटियाँ आम आदमी के हाथों से दूर ही रहीं। कवि ने आम आदमी के मूल आधिकार के विपरीत भयावह यथार्थ और भूखे आदमी की आकांक्षा के तनाव को रचकर अपना प्रतिरोध दर्ज किया है।

कलकत्ता से कोलकाता हुये महानगर का कोई कवि जब अपने संघर्षों को याद करता है, तो उसे अपनी कविताएं याद आती हैं।

जिन्होंने उपेश पंकज को अस्सी के दशक में महानगर कलकत्ता की सड़कों पर कंधे से झोला लटकाये वामपंथी विचार धारा सिर पर चढ़ाये देखा है, उन्हें अधिकारी उमेश को आज देख कर पहचानना थोड़ा मुश्किल होगा। यह सच है कि इस बीच कई पीढ़ियां जवान हो गई और अब तीस-पैंतीस वर्षों वाला महानगर कलकत्ता भी नहीं रहा, न राजनैतिज्ञ दृष्टि और ना ही सामाजिक दृष्टि से मगर कवि की दृष्टि में आज भी वही महानगर बसा हुआ है, यह स्वाभाविक भी है।

लेकिन इन वर्षों में बहुत कुछ बदला है, व्यक्ति, विचार और शक्ल सूरत भी बदलते गये, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ को अपना स्थायी जमीन बनाने वाले कवि, कथाकार, पत्रकार, आलोचक, प्रखर वक्ता उपेश पंकज की हाल ही में प्रथम कविता संग्रह ‘एक धरती मेरे अंदर’ प्रकाशित हुआ है।

सीने में पलती वर्षों की कविताएं लावा के रूप में एक वर्ष के अंदर फूट कर निकली है। इन कविताओं को महज एक वर्ष में सृजित न समझा जाये। बल्कि तीस वर्षों की भ्रूण तपस्या के रूप में कागज पर उतरी हैं, ये कविताएं -

वे दो कविताएं जो उमेश की शहर कलकत्ता में पहचान बनाईं, वे भी इन सत्तर के आस-पास कविताओं में शामिल हैं।

हिन्दी कविताओं की गिरती हुई शाख पर इन दिनों खूब चर्चा हो रही है। कलकत्ता की एक पत्रिका मुक्तांचल ने तो शोध स्वरूप अपना एक विशेष अंक अतिथि संपादक मनीषा झा को संपादन के ‘नयी सदी के आर-पार हिन्दी कविताओं के पचास साल प्रकाशित किया है। हिन्दी कविता के गद्य रूप, काव्य, शिल्प पर काफी बहस है....।

खैर, इस बहस में न पड़कर हम उमेश की कविताओं पर दो बारा लौटते हैं:

पहले उन दो कविताओं पर थोड़ा प्रकाश डाला जाये जो कवि अपने संघर्ष के दौरान महानगर कलकत्ता से लेकर गया था। पहली कविता है ‘बरगद काटने की प्रक्रिया में’ यह कविता जिस ओर संकेत करती है, वह बड़ा ही भयानक है। एक ओर बरगद जहां हरियाली का प्रतीक है, वही रूढ़िगत पूंजीवादी व्यवस्था और सामंतवाद की ओर उठी हुई उंगली की तरह है।

यह कविता पढ़ते समय उमेश की भंवें तन जाती थीं और माथे पर कई शिकन खिंच आते थे, जैसे वे व्यवस्था द्वारा आहत हो.....

दूसरी कविता है ‘महानगर एक अजगर’, यह कविता युवावस्था की सबसे उत्तम कविता है, उमेश की इन छोटी सी कविता में कवि की आंदोलित भावनाएं प्रतिबिम्बित हुई हैं: इसमें जो आक्रोश है, गुस्सा है वह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। संभव है ऐसी कविता उमेश अब नहीं लिख पायेंगे, क्योंकि जिस त्रासदी को उन्होंने भोगा है, उससे वे उबर आये हैं: कुछ पंक्तियां देखे: ‘नगर की चमचमाती खड़ी आकाश चूमती अट्टलिकायें...... नगरों का नगर कलकत्ता महानगर, बहुरूपिया है। अजब अजगर है। कहीं सुधा-रस छलकता, कहीं ज़हर ही ज़हर....

ऐसे ही एक छोटी सी कविता ‘नांव’ में वे कहते हैं-समुद्र की विशाल जल राशि से नाव का आकार बहुत छोटा होता है। लेकिन वह जलराशि पर तैर जाती है। कभी-कभी उस जल राशि में नांव फंस जाती है, जिसे सूर्य की साजिश कवि कहता है। यह सूर्य अपनी रश्मि रथों के साथ समुद्र में उतरता रहता है। कवि कहता है कि सूरज के उस सातवें घोड़े की चौकड़ी भरने से पहले वह उसका लगाम पकड़ लेगा, क्योंकि वह एक कुशल घुड़सवार है। इस कविता में कई प्रतीक है जो मनुष्य के संघर्ष को आहत कर निरकुंश बना देते हैं। मगर कवि उस स्थिति से अपने को उबारना जानता है।

कवि ने अपने आंदोलनकारी प्रवृत्ति को अपने सीने में सदा जगाये रखा। चाहे महानगर कलकत्ता हो या कंकड़बाग़, फेजर रोड़ पटना हो या फिर लखनऊ। वह अपने हृदय में एक धधकती आग को जिलाये रखा है। देखें गदहे चार दृश्य’ की कविताएं, किस-किस उद्योग से कवि ने वर्तमान-परिवेश की उद्धृत किया है-‘‘हमारे अच्छे दिन आ गये क्या......? बल्कि ढोते-ढोते छिल गई है पीठ/ न दाना न पानी/ हरा चारा तो दूर की बात/ और तो और रेंकने पर भी बंदिश/ गदहों में भी षठा असंतोष है। आंदोलन की तैयारी/ कितने अच्छे दिन थे हमारे..../ पड़ रही है मार-घायल पीठ पर।

कवि ने वर्तमान व्यवस्था पर करारा चोट करते हुए आम-जनता, अबोध बोटरों को गदहे से तुलना की है, जिन्हें अब ध्यान आ रहा है कि उन्होंने भयंकर भूल की है, सत्ता सौंपकर।

उठो साथी कविता में कवि, केदार नाथ सिंह की कविता को याद करते हुये कहता है कि उठो साथी हमें केदार की परंपरा को आगे बढ़ाना है। इसी जागरण के सिलसिले में वे ग़ज़लकार दुष्यंतकुमार को भी याद करता है। कवि कहता है कि साथी पुल अर्थात व्यवस्था की कीलें ढीली हो गई हैं। रेल जब गुज़रती है तो पुल थरथराता है-(तू किसी रेल सी गुजरती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ-दुष्यंत) आओ साथी इसमें हम नई कील ठोंक दें, उठो साथी उठो....

इस कविता में पंकज शासन-प्रशासन सत्ता में आई शिथिलता को दिखलाना चाहते हैं।

‘गुब्बारे बेचता लड़का’ कविता में बहुत ही दारूण दृश्य प्रस्तुत करता है। महानगर कलकत्ते के एक बड़े शायर शहूद आलम आफ़ाकी का यह शेर याद आता है-क्या- कोई शहर में बच्चा नहीं रोने वाला, दाने-दाने को तरसता है खिलौने वाला, लेकिन ‘एक धरती मेरे अंदर’ के कवि पंकज ने इस कविता के माध्यम से जो एक नई बात कही है वो यह है कि गुब्बारे में एक दस वर्ष का बच्चा अपनी सांस फूंक कर बेचता है और अपने परिवार को पालता है।

अपने परिवार के कई लोगों की सांसों को ज़िदा रखने की कोशिश में लगा हुआ है। उसकी मासूम आंखों में बड़ी आशा व हसरत से अपनी उम्र के बच्चों की ओर देखती हैं कि वे उसकी सांस की कीमत चुकाये एक दो गुब्बारे खरीद लें

एक और कविता है जंगल खत्म नहीं होते’ यह कविता इस लिये भी महत्वपूर्ण है कि अभी पूरी दुनिया में पर्यावरण को लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं....’ महाराष्ट्र के ‘आरे’ जंगल क्षेत्र में पेड़ों की कटाई को लेकर पर्यावरण साथियों ने पेड़ों की कटाई के विरुद्ध आंदोलन किया था।

लेकिन यहां कवि एक दूसरी बात कहता है, उसका मानना है कि पेड़ों की कटाई से कभी जंगल ख़त्म नहीं होंगे नहीं होंगे, धरती का यह सुहाग, हरियाली कभी खत्म नहीं होगी, जब तक कि हमारे बीच पशु-पक्षी हैं, ये पक्षी खासतौर पर हमारे पर्यावरण के मुख्य संवाहक हैं: कविता की कुछ पंक्तियां देखें- ‘‘चीरती बादलों को टपकती बारिश की बूंदों की तरह/जुड़ाती सूर्ख तप्ती जमीन को/ चिड़िया अपनी चोंच से/रोपती है बीज नये जंगल का/उगते हैं नये पौधे/चिड़िया के होते जंगल/कटते तो हैं, मगर खत्म नहीं होते....’’

अद्भुत हैं कवि की कल्पना, विश्वास लेकिन चिड़िया की चोंच से कम उसके बिट से न पेड़-पौधों का बीज रोपित होता रहता है। इस छोटी सी कविता अधिक में कवि ने जो बड़ी बात कही है, उस से पर्यावरणविदों की चिंताएं अवश्य ही कुछ कम होंगी।

जब तक कोई रचना कुछ नया नहीं कहती, उसमें कोई नवीनता नहीं होती तब तक वह रचना सार्थक रचना नहीं होती साहित्य में व्यर्थ वृद्धि की तरह होती है, वह सृजन- उमेश पंकज ने यद्यपि एक साल में साठ-सत्तर कविताएं लिख डाली हैं लेकिन उन कविताओं का तेवर तीन दशक के उतार-चढ़ाव, राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण, देश-नफरत अन्याय और सांप्रदायिक दंगों को प्रस्तुत करती हैं: नहीं लगता है कि कवि उन तीन दशकों तक अपनी व्यस्तता के कारण निशब्द रहा या कुछ नहीं लिख पाया। मन के तरल बिम्बों पर तैरती आकुल-व्याकुल भावनाएं अंकुरित होती रहीं, कवि खामोश रहा पर भावनाएं तरंगित होती रहीं।

‘पेड़ जो खड़ा है‘, कविता में कवि ने देश के अंदर होते मार-काट, सांप्रदायिक दंगे को दिखलाना चाहा है, उजड़ते फखरूद्वीन के घर-परिवार को दिखलाया है, कवि ने परिवार का सब कुछ नष्ट हो गया है। कुछ भी शेष नहीं बचा है। फख्ररूद्दीन का मगर वर्षों से खड़ा पेड़ सब कुछ देखा है, जानता है सब कुछ सहता आया है धूल-धुंआ आग की लपटे गोलियों की बौछारें, .......बंधे हुये सूअर और पेशाब-शौच करते लोगों की सड़ान भी वर्षों से झेल रहा है, पेड़, पेड़ से ही पूछा जाना चाहिये फख़रूद्दीन के लुप्त हुये परिवार के विषय में..... दीखें कुछ पंक्तियां- ‘‘शहर के बीचों बीच कूड़े से पढ़ी लावारिस पड़ी जमीन/शानदार हवेली थी वहां जो जला दी गई थी। राख बन गई हवेली की जमीन/मलिकाना हक को लेकर कई गैंगवार हुये......।

इसी प्रकार ‘तलवार’,‘काला घोड़ा’,‘अभी जिन्दा हूँ’, ‘क्रांति धर्मा’, पीछा कर रही हैं बातों, देह की छत पर नाखून, रोटियां पहरे में, शब्द, जिन्दा हूँ, धसियारी टोला की औरतें, मौत, अन्त तक लड़ूंगा, जंगल का दर्द, तमीज, समय हंसता है, आदि कविताएं हैं, जो कवि की चिंता, भाव सोच और विचार को प्रस्तुत करती हैं, कवि के अंदर बेचैनी को दिखलाती है: कविताएं बताती हैं कि कवि राजनीति की बदलती दुनिया से कितना आहत है।

‘क्रांति धर्मा’ कविता कवि के कलकत्ता में ‘संघर्षरत-जीवन और आंदोलन की याद दिलाती है: कलकत्ता विश्वविद्यालय की सीढ़ियां, सहपाठी, कल कारखाने के मजदूरों के आंदोलन और एक-एक कर गुम होते क्रांति धर्मा मित्र-बन्धु.......

वर्षों बाद भी कवि को वह काल समय और बंधी हुई मुट्ठियां याद आ रही हैं- कवि कहता है- ‘अरसे बाद भी लखनऊ में रहते हुये। मैं कुछ देर कलकत्ता विश्वविद्यालय/ की सीढ़ियों पर रोज बैठता हूँ। और ताकता हूँ, आसमान कि/वह बाजदिख जाये और वह लौट आये उन्हीं सीढ़ियों पर

एक छोटी सी कविता ‘घास हूँ मैं’ पढ़ते हुये, अज्ञेय की कविता ‘हरी घास पर क्षण भर’ की याद हो आती है। लेकिन कविता अपने लघु आयतन के बावजूद कई कविताओं या यह कहा जाये कि आज की कई बड़ी कविताओं से भी बेहतर है, तो कोई ग़लत नहीं होगा।

कवि ने घास की औकात बताते हुये बताया है कि घास में कोई फूल, फल, छाया नहीं होती। उसकी जड़े गहरी नहीं होती, उसका जीवन क्षणिक होता है। उसे कोई खाद पानी भी नहीं देता। उसमें फूलों सी सुगंध नहीं होती। लेकिन उसमें माटी की गंध होती है। वह पौष्टिक आहार भी नहीं है किसी मनुष्य के लिये लेकिन वह पशुओं के लिए प्रिय चारा है, यही उसकी संतुष्टि है।

इन तमाम कविताओं को पढ़ने के बाद समझा जा सकता है कि इन तीस-पैंतीस वर्षों में देश में बहुत कुछ बदला कितने वरिष्ट नेता अपन पार्टी त्याग कर सत्ता सुख हेतु सत्तारूढ़ पार्टी में शामिल हो गये, राज्यपाल हुये, मंत्री हो गये। लेकिन कवि उमेश पंकज ने अपनी वैचारिकता से कभी समझौता नहीं किया। कहा जा सकता है कि पंकज वामपंथ का वो लोहा हैं, जिनमें कभी जंग नहीं लगेगा।