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‘मेरी परी’
March 1, 2020 • Devender Kumar Bahl • कहानी

बहुत देर से फोन बजे जा रहा था। माया थोडी़ देर और सोना चाह रही थी। फोन उठाना नहीं चाह रही थी। यह मोबाइल उफ! तौबा! बंद होता, फिर बज उठता। पता नहीं किसका था, जिसे चैन ही नहीं है! आखिर खीज कर माया ने फोन उठा लिया। फोन माया की बड़ी बहन वृन्दा दीदी का था। फोन पर जो बातें हुई उसे सुन कर माया के चेहरे पर चिंता की रेखायें आ गई। बात की गहराई को समझते हुये माया ने पति को ऑफिस में फोन कर सब बता दिया। वृन्दा से हुई फोन पर बातें सुन शिव भी दो क्षण के लिये सोच में पड़ गया। वृन्दा ने जो बातें कहीं वो सही थीं। बातें माया और शिव की पुत्री परी के बारे में थीं। परी माया और शिव की दत्तक पुत्री थी। परी की शादी वृन्दा की रिश्तेदारी में तय हुई है। लड़का मलय मुम्बई में नौकरी करता है। वृदां के अनुसार परी का सत्य लड़केवालों को बता देना चाहिये जो सही है। शादी विवाह झूठ की बुनियाद पर तय नहीं होता। दोनों सोच में पड़ गये कि अब यह बात पहले परी को बतानी पडे़गी। यह सबसे कठिन काम है। कोई माँ बाप अपने मुख से यह कैसे कह सकते हैं कि तुम मेरी जाया बेटी नहीं हो! मैने तुमको गोद लिया है! यह सुन कर उस बच्चे की मानसिक अवस्था क्या होगी? उसका दिल नहीं टूट जायेगा? वह अपने माता पिता पर कैसे फिर विश्वास करे सकेगी? चितिंत माया, कमरे में कुर्सी पर बैठने लगी थी तभी, उसका पांव टेबल से टकरा गया। माया ने सम्भलने की कोशिश की, तो उसका आंचल नीचे गिर गया। उसने उसे उठा कर झटके से कंधे पर फेका। एक आवाज हुई और टेबल पर रखा फोटो फ्रेम गिर गया। माया ने उठाकर देखा वह परी की तस्वीर थी। माया ने तस्वीर कलेजे से लगा लिया। पुराने समय की सारी बातें यादें माया के आँखों के सामने चलचित्र की तरह आने लगीं। शादी के तीन महीने बाद जब उसे पता चला, कि वह माँ बनने वाली है उसे बहुत खुशी हुई। उसी दिन, शिव भी वकील बन गये थे। घर में दोहरी खुशी थी। डॉक्टर को दिखाया गया तो डॉक्टर ने कहा गर्भ है ही नहीं भ्रम हुआ है। समय गुजरता गया कभी माया की उम्मीद न बंध पायी। शादी के सात साल होने को आये पर वह माँ नहीं बन पाई थी। यह दुख उसके हृदय में सदा रिसता रहता था। हर स्त्री को माँ बनने की इच्छा होती है माया भी एक स्त्री थी अपनी अपूर्णता का अहसास उसे हर क्षण होता रहता था। पर ईश्वर की मर्जी के बिना कुछ नहीं हो सकता है। पति का सहयोग हमेशा रहता। इसी कारण वह सब दुख आसानी से सह लेती थी। एक दिन शिव ने अपने पिता से कहा, कि वह दिल्ली जाकर भाग्य आजमाना चाहता है। हर पिता अपने बेटे को अपने से आगे देखना चाहता है। शिव के पिता ने जाने की इजाज़त दे दी, शिव की माँ भी खुश थी। बस यह दुख था कि अब शिव और माया दूर चले जाएंगें। माया रहती है तो पुरे घर में रौनक छाई रहती है। अब तो पुरा घर सूना हो जाएगा,पर बच्चे जहां भी रहे बस खुश रहें। दिल्ली जाने के समय माया और राधा दोनों के आँखों में आँसू थे। इस बार शिव भी थोड़ा दुखी लग रहा था। माँ बाप के साये तले हर इन्सान अपने आप को बहुत सुरक्षित महसूस करता है। माया को दिल्ली बहुत अच्छा लगा। एकाकी माया का समय दिल्ली मैं और नहीं कट पा रहा था। माया दिन भर बच्चे की कामना में डूबी रहती थी। बच्चे की तमन्ना दिन पर दिन बढ़ती जा रही थी। वह अब गुमसुम रहने लगी थी। जीवन में जो चाहिये थे सब उसके पास था। उन सबका भोग करने वाला कोई नहीं था। शिव को चिंता थी कहीं माया इस शोक में बीमार ही न पड़ जाये। वह हर तरह से माया को खुश रखने की कोशिश करता था। एक दिन माया ने टी .वी. में नवजात शिशु के फेके जाने की खबर देखी। बस उसके मन में गोद लेने की लालसा जाग उठी। उसने अपनी यह इच्छा शिव को बतायी। शिव को भी संतान की इच्छा थी सो वह राजी हो गया। उसने कहा इस बात को घर पर बताना जरुरी है। वह लोग माता पिता है उनकी रज़ामंदी ज़रुरी है। शिव ने माँ को सब दिया सभी लोग राज़ी थे। माया के मन से बहुत बड़ा एक बोझ उतर गया। दूसरे दिन दोनों चाईल्ड केयर पहुंच गये। वहां की महिला ने बताया कि तीन महीने बाद बच्चा मिलेगा। माया को लगा वह तीन महीने कैसे काट पायेगी? अब तो दिन एक साल की तरह लग रहे थे। दो महीने बाद वहां से खबर आई, आप कल आ जाईये! वहां जाकर पता चला कि रात से बच्चे को बुखार हो गया है। बुखार उतरने पर ही बच्चा मिलेगा, चाहे तो वो बच्चे से मिल सकते हैं। पर शिव ने मना कर दिया। माया सोचने लगी न जाने मेरी किस्मत में क्या लिखा है? वह भगवान से प्रार्थना करने लगी कि बच्चा जल्दी ठीक हो जाये! उसने सबको खबर कर दिया कि बच्चा आज नहीं आ पाया है। समय तो माया के लिये ठहर सा गया था। दो दिन बाद वह अनमनी सी बाल्कनी के पास बैठी थी। एक टैक्सी रूकी ड्राइवर शिव के घर का पता पुछ रहा था। उसने देखा माँ पापा, सास ससुर सभी लोग दिल्ली आये हैं। वह खुशी से नीचे दौड़ पड़ी। सबको देखकर माया की खुशी का ठिकाना न रहा। परिवार वाले माया के टूटते मनोबल को बढ़ाने आ गये थे। आप जो काम करना चाहते हो और अगर उसमें सारे परिवार का साथ रहे, तो वह सोने पे सुहागा हो जाता है। फिर एक दिन वहां बुलाया गया। जब माया वहां पहुंची तो वह घबड़ाहट और रोमांच दोनों से भरी थी। वह सिर झुकाकर चुपचाप एक कुर्सी पर बैठ गई। मन में कई तरह के सवाल आ-जा रहे थे। दिल की धड़कन बढ़ गई थी। शिव पास में उसका हाथ थामें खड़ा था। तभी लगा कोई औरत उसके पास खडी हो गई है और उसके गोद में एक बच्चा है। वह माया के गोद में डालने की कोशिश कर रही है। वह बोली,

‘‘लिजिये! आपकी बेटी आ गई!’’

माया की आँखें भर आईं। उसने बच्चे को अपने कलेजे से लगा लिया। दोनों के दिल की धड़कने एक हो गयीं। शिव ने उसके कंधे को छुआ तो माया ने कहा,

‘‘मेरी परी आ गई!’’

शिव ने मुस्कुरा कर कहा,

‘‘दोनों की!’’

माया ने भरी आँखों से हामी में सिर हिलाया। माया ने बच्चे को शिव को दिया। शिव ने बहुत ड़रते हुए बच्चे को उठाया। ‘‘यह तो बहुत छोटी है’’ कह झट से बच्चे को माया को पकड़ा दिया। दोनों बच्ची को लेकर घर आ गये। परिवार के सभी सदस्य परी के आने के समय शामिल थे। घर में हंसी खुशी का माहौल था। माया शिव के जीवन में यही एक चीज की कमी थी। वह भी अब पुरी हो गई। माया ने भगवान को बहुत बहुत धन्यवाद दिया। अनजाने में कभी उसने अगर भगवान को कोसा होगा, उसके लिये माफी भी मांगी! माया और शिव का तो पुरा संसार इस बच्चे ने बदल दिया था। माया का तो पुरा दिन कैसे बीत जाता पता ही नहीं चलता था। अब बच्चे के काम से इतनी ब्यस्त हो गई कि उसे दूसरे काम की सुध भी नहीं रहती। समय के पास तो अपना पंख होते हैं वह अपनी गति से चलता रहता है। बढ़ता रहता है। परी भी सबका प्यार पाकर बडी हो रही थी। परी ने बारवीं के बाद मैनेजमेंट की पढाई करनी चाही। अब वह बैगलोर में पढाई कर रही है। जब परी नौकरी करने लगी तबसे माया को शादी की चिन्ता रहने लगी। परी भी शादी को तैयार थी उसने मलय से बात की थी मलय उसे बहुत अच्छा लगा था। सब ठीक चल रहा था, आज अचानक यह बात सामने आ गई। एक हद तक यह ठीक भी है। बस एक कठिनाई है कि परी से कैसे बताया जाये? कैसे समझाया जाय? माया हर समय मन ही मन में रटती रहती।

‘‘तुम मेरी बेटी हो! भले मैने तुम्हें अपने कोख से जन्म न दिया हो! पर ईश्वर ने तुम्हें हमारे लिये ही इस धरती पर भेजा है, दुनियां भले तुमको गोद लिया बच्चा समझे, पर तुम हमारे हृदय के अंदर से आई हो। तुम मेरे लिये सबसे प्रिय हो तुमसे प्यारा हमारे लिये इस संसार में और कोई नहीं है। तुमसे ही हमरा सारा संसार है।’’

शिव अलग चिंतित रहता। सोचता जब यह बात परी को पता चलेगा तब परी के साथ माया को भी देखना पडे़गा। उस दिन की कल्पना से ही वह भयभीत हो जाता। जिस दिन परी और माया आमने-सामने होगीं, उनकी क्या प्रतिक्रियाएँ होगीं! परी हमारे प्यार को समझेगी? कहीं पुछने न लगे कहां से लिया? मेरे असली माँ बाप कहां है? क्या जवाब दे पाऊंगा? लेकिन यह तो होकर ही रहेगा! इससे बच नहीं सकते! शिव ने अपने मन को स्थिर कर विश्वास की डोरी को पकड़े रखा। र्निर्णय हुआ, परी को मुम्बई बहुत पसंद है, उसे वहीं बुलाया जाय। वहीं पर सब बातें होगीं। परी मुम्बई आ गई। माया के एयरपोर्ट नहीं आने पर उसे हैरानी हुई क्योंकि परी को लाने के लिये माया एक बार बुखार में कांपती भी आ गई थी। शिव ने बताया यहां आने के बाद माया की तबीयत ज्यादा खराब हो गई है। पता नहीं क्यों परी का दिल ज़ोर से धड़कने लगा था। इस बार न जाने क्यों उसे अच्छा नहीं लग रहा था। उसके मन में माँ पापा से मिलने को लेकर प्रसन्नता थी। फिर भी, पता नहीं क्यों एक अनजाना सा भय उसके मन में आ रहा था। उसे बार-बार लग रहा था, कुछ न कुछ होने वाला है! परी होटल पहुंच कर दौड़ती हुई कमरे में गई। माया लेटी हुई थी उसकी दोनों आँखें रो-रो सूजी हुई थीं। परी को माया बहुत कमज़ोर लग रही थी। चेहरे पर परेशानी साफ झलक रही थी। परी को देखते ही माया फफक उठी। उसका रुदन परी की घबड़ाहट और बढ़ा रहा था। शिव चुप कराने लगा फिर बोला,

‘‘तुमसे मिलने के लिए बेचैन थी। तुम्हारी याद आ रही थी। अब रो क्यों रही हो?’’

परी को समझ में नहीं आ रहा था कि ‘याद आना’ और ‘रोना’ इसका क्या मेल है? रोज़ बात होती है, जरूर कोई खास बात है? परी ने माया से पुछा,

‘‘क्या बात है मम्मी! क्यों इतना परेशान हो?’’

माया कुछ नहीं बोली।बस रोते-रोते अब उसकी सांसें अटकने लगी थीं। शिव ने हंसकर कर कहा,

‘‘अब क्यों इतना रो रही हो? अब तो बेटी भी आ गई!’’

परी को लग गया कोई बात तो ज़रुर है? दोनों मुझसे छिपा रहें हैं! ऐसा क्या हुआ है! जिससें माँ इतना आहत है कि चुप नहीं हो पा रही है? कौन सी ऐसी बात हो गयी है? मेरे आने के बाद भी रोते जा रही है ? माया को इस तरह से रोते देख परी की भी आँखें भर आई। परी की भरी आँखें देख शिव ने माया से कहा,

‘‘देखो! तुमको रोते देख तुम्हारी बेटी भी रोने लगी है!’’

माया ने जैसे ही परी की रोने की बात सुनी! वह अचानक से उठ खड़ी हुई। परी को अपने गले लगा कर बोल उठी,

‘‘ना बेटा!मेरा बच्चा!ना परी!तुम मत रोना!कभी मत रोना! तुमको, हम लोग कभी रोता नहीं देख सकते हैं!’’

माया का यह रुप परी पहली बार देख रही थी। वह और घबरा गई फिर बोली, ‘‘मम्मी! प्लीज मत रो! बताओ न! क्या टेंन्शन है? क्यों रो-रो कर अपना हालत खराब कर रही हो?’’

माया की समझ में नहीं आ रहा था क्या कहे! बात कैसे शुरु करे! उसने परी की ओर देखा। परी उससे सट कर गले में हाथ डाले बैठी थी। परी ने माया के आँसूं पोछे, पानी पिलाया! फिर बोली,

‘‘अगर कोई बात है तो बताओ! प्लीज.?

अब माया थोड़ा संयत हो चुकी थी। वह परी की ओर देख कर बोली,

‘‘मेरी जो दोस्त है न सुषमा!’’

‘‘हां! उनको कुछ हो गया क्या?’’

‘‘नहीं! उसकी बेटी उससे बहुत नाराज है! घर छोड़ कर चली गई है!’’

‘‘उनकी बेटी घर छोड़ कर चली गई! तो तुम क्यों इतना रो रही हो? कहीं गई होगी आ जायेगी!’’

‘‘नहीं बेटा! वह सचमुच घर छोड़ कर चली गई!’’

‘‘अच्छा ठीक है! तो तुम क्यों परेशान हो?’’

‘‘सुषमा ने उसको गोद लिया था! जब बेटी को इस सच का पता चला तो वह गुस्सा होकर घर छोड़ कर चली गई!’’

‘‘पागल है क्या? इसमें घर छोड़ने की क्या बात है? उसको तो अपने पेरेन्टस पर प्राऊड फील होना चाहिये? गोद लेना तो अच्छी बात है! हम भी एक बच्चा तो जरूर गोद लेगे!’’

‘‘ना बेटा! ऐसा नहीं बोलते!’’

‘‘तो तुम! उसके लिये इतना पागल की तरह रो रही हो?’’

‘‘नहीं! उसके लिये नही?’’

‘‘तो फिर ?’’

माया क्षण भर चुप रही। शिव और माया एक दुसरे का मुंह देख रहे थे! कौन पहल करे! परी एक-एक कर अपने मम्मी पापा का मुंह देख रही थी! उसके दिमाग में कुछ आ रहा था, कुछ जा रहा था। कोई कुछ बोल नहीं रही थी। कमरे में एक खामोशी पसरी थी। परी को अब शक होने लगा था उसे अब माया की कहानी बनावटी लगने लगी! वह जो बातें सोचना नहीं चाह रही थी, वही सब उसके दिमाग में आने लगी। माया फिर रोने लगी थी! परी ने देखा पापा के चेहरे का रग भी उड़ा हुआ है। परी को अपने मम्मी-पापा के चेहरे पर एक अनजाने ड़र की रेखा दिख रही थी। धीर-धीरे उसे समझ में आने लगा। मम्मी का इस तरह से रोना। फिर एक झूठी कहानी बताना। दिमाग में कई तरह के प्रश्न आ-जा रहे थे। उसके दिल की धड़कन अचानक से बढ़ गई! परी को लगा जैसे उसके सीने में कुछ उलट-पुलट हो रहा हो। उसका दिल अचानक से भारी होने लगा था। एक अनजाना डर उसके दिल को भी घेरने लगा था। उसे इतना समझ आने लगा कि यह कहानी मम्मी के दोस्त की बेटी की नहीं लगती। कहीं यह कहानी मेरी तो नहीं? दिल में एक धक्का सा लगा। हां, यह कहानी मेरी ही है। ये लोग मुझे बताने में ड़र रहें हैं! एक क्षण उसे लगा, ये क्या हो गया? यह मेरे साथ ही होना था? मैं इनकी बेटी नहीं? उसका दिल बैठने लगा था। फिर, उसे तुरंत अपने मन को समझाया। नहीं, वह सिर्फ, इन्हीं की बेटी है। जो बेटी के खोने के ग़म से इतना तड़प रहे हैं! इतनी तड़प, इतना प्यार, माँ बाप ही कर सकते हैं! यही मेरे मम्मी पापा, सब कुछ यही है? मै कितनी लकी हूं? मुझे इतने लविगं माँ बाप मिले हैं? अब उसका दिल अपने, मम्मी पापा के लिये प्यार से भर गया, वह चुपचाप अपनी मम्मी के पास खडी हो गई। फिर बोली, ‘‘मम्मी! मैं नहीं भागूंगीं, कभी नहीं, अपनी मम्मी पापा को छोड़कर कहां जाऊंगीं? मुझे इतना प्यार करने वाले मम्मी पापा कहां मिलेगें?’’

माया अब और ज़ोर से रोने लगी। तब परी हंसकर बोली,

‘‘नहीं भागे, इसलिए रो रही हो?’’

‘‘ना मेरा बच्चा, मेरा सोना! हमारे जीने का आधार तुम हो बेटा, तुमको पाकर हम लोग जीने लगे हैं।’’

शिव जो चुपचाप खडे़ थे, उनकी सिसकी निकल गई। परी ने जाकर शिव को जकड़ लिया।

‘‘डोन्ट क्राई पापा! प्लीज पापा! डोन्ट क्राई! आइ कान्ट ईवेन थींक आफ लिवीगं, यू पीपुल नाऊ! डोन्ट क्राई!’’

परी की आँखों मे भी आँसू आ गये। तीनों के आँसू मिल एक मज़बूत परिवार बना गये। अब कोई ड़र नहीं। परी दो दिन रही। उसने खूब शापिगं की। माया का मन छोड़ने जाने का था। पर, परी ने मना कर दिया। माया चाहती थी परी दो चार दिन और साथ रहे. वह भी तो डिसर्टब हुई होगी? पर, परी ने मना कर दिया। माया को लग रहा था परी कुछ नहीं बोली, पर मन तो उसका भी दुखा होगा? जितना सामान्य वो दिख रही थी उतनी होगी नहीं? पर शिव ने कहा उसे भी कुछ समय देना होगा। जब बैंगलोर से परी की चहकती आवाज में फोन आया तो माया के मन को सुकून आ गया। परी ने बताया, उसने मलय से मुम्बई से लौटने के बाद खुलकर बात की। मलय ने कहा, इससे कोइ फर्क नहीं पडता है। अब बृन्दा दीदी से बात करना बाकी है। माया ने खूद ही वृन्दा को फोन लगाकर कहा कि वृन्दा स्वयं इस बात को बता दे! यह कहकर कि शादी की मधस्यता वह कर रही है, इसलिए सच्चाई बताना उसका फ़र्ज बनता है। वो लोग अपने मुंह से तो यह बात कभी नहीं कहेगें। माया ने कहने को कह दिया। पर, ख़ूद बहुत बेचैन हो गई। पता नहीं क्या जबाव आये। दो दिन हो गये। न वृन्दा का न परी के होने वाले ससुराल से ही फोन आया। माया को अब घबड़ाहट होने लगी। कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं है? तीसरे दिन जानकी देवी का फोन था ‘‘हैलो’’ समधन जी सुषमा जी का फोन आ गया है आप निश्चित रहें- हमारे यहां किसी शक की गुजाइंश नहीं होती। फोन बंद होने के बाद माया ने दोनों हाथ जोड़कर भगवान को कोटिशः धन्यवाद दिया।

उसने बाहर देखा सुरज डूबने को था। पंक्षियों का पुरा झुंड घोसलें की ओर जा रहा था...।