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Abhinav Imroz, October 2012
September 25, 2018 • Devender Kumar Bahl

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सम्पादकीय

         मंटो का यह शताब्¢ी वर्ष चल २हा है, 'अभिनव इमोज' ने भी इनहाने अकीत पेश कने के लिए इस अंक को मंटो शताब्दी विषेशांक बनाया है ओ विषय चुना है “मंटो के सिवा और माजी अलोका” मंटो के व्यक्तित्व व कृतित्व का स्पेक्ट्रम तो बहुत विशाल है, मंटो सामान्यत: एक आहित्यकार है, उसके व्यक्तित्व की क्याषा एक महान कहालीका के वो पर हुई है। उसकी चलाएँ समाज, धर्म औ२ ववक्षा के लिए एक साल पैगाम हैं। मंटो की कहानियाँ, कलाषा, मनोविज्ञानिक विशलेषण औ4 मालवीय कॅवेनशीलता की कोटी पर्व अविव हैं। मंटो ले साहित्य की परिभाषा कवे हुए लिखा है ‘‘अब था वो अब है, वरना एक बहुत बड़ी बेअद्भुखी। जे व या तो ने वन है, वला बहुत ही बटूबुमा री है। अब औ4 अटूब, जेवर औ व जेवर में कोई म्यानी इलाका नहीं है। वह जमाना बवै ८ औ बी टों का जमाना है। लिसाने वाले लिखा है हैं बया अटूख ! जबाब वही है। सिर्फ लहजा बन गया है।” मंटो ने जो भी लिया, एक मक्का के लिए लिया। मंटो जूम था, भविष्य ह्वष्टा या उसने बँटवावे की पविभाषा लालू ने की 8 जो आज तक विस १हा है। इस वक्भ वतन को वो ‘‘पागलों ने भी स्वीकाव बहीं किया। मंटो ने जो लिखा ओ३ जो मंटो ने ओला वह मंटो त क सकता या मंटो की कहानियां हुकूमत व समाज के लिाफ दिए हुए वह फसलें हैं जिन्हें चुनौती बह 7 जा सकती। मंटो की  जिन्दगी  मुखसर थी, लेकिन उसकी पष्टवादिता औ२ हकीकत  शकवत अमन है।