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आबे-हयात
March 1, 2020 • देवी नागरानी • कहानी

‘मैं अमर होना चाहता हूँ और मौत को किसी सूरत में भी कबूल नहीं करूँगा...’ वह अकसर अपनी दिली ख्वाहिश का इजहार करता।

मैं उसकी बेतुकी बातों को हंसी में उड़ाते हुए छेड़-छाड़ के लहजे में जवाब देता - ‘अगर तुम अनश्वर दुनिया की ख्वाहिश रखते हो तो आबे-हयात ढूँढो। उसको पीकर ही तुम अमर हो सकते हो, वरना मौत तो एक अटल हकीकत है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता।’ यह सुनकर उसके चेहरे पर एक मासूम-सी मुस्कराहट जाहिर होती और वह बड़ी ही अधीरता से पूछता - ‘यार ! उस दूत का कोई पता तो चले। मैं सच में उसे तलाश रहा हूँ ताकि चंद घूँट पीकर मौत के खौफ से निजात पा सकूँ।’

मैं उसकी अनश्वर जिन्दगी की ख्वाहिश और मौत के मुंतजर मंजर में उसके विगत काल में झाँकता तो वह बेकसूर नजर आता। हकीकत में वह अपनी माँ का इकलौता और लाडला बेटा था। उसकी पैदाइश के बाद उसके घर में मौत ने खेमे गाड़ लिये थे। सारे बहन-भाई पैदाइश के कुछ अरसे बाद ही मौत का निवाला बन जाते। उसकी कोख जली माँ उस गम से नीम पागल हो चुकी थी। वह अपने इकलौते बेटे को बाहों में जोर से यूँ समेट लेती, जैसे मौत उसके भी दर पर खड़ी हो और उसे छीन कर ले जाना चाहती हो। वह दर्द भरे लहजे में कहती -

‘बेटा तुम कहीं न जाना, अगर तुम भी बिछड़ गए तो मैं जिन्दा न रह सकूँगी।’ उसके तसव्वुर में अपनी माँ के चेहरे पर पड़े आँसुओं का गहरा असर था। उसके बहते हुए आँसू और बेअख्तियार खुद कलामी ने उसके दिल और दिमाग पर सम्पूर्ण कब्जा किया था। तभी तो वह माँ के उन बहते आँसुओं की खातिर नश्वर जिन्दगी के ख्वाब देखता रहता और हमेशा मौत के खौफ से घिरा रहता।

हम दोनों एक ही कक्षा में थे और बचपन से हमारी गहरी दोस्ती थी। वह अपनी तनहाई की आदत और माँ की कड़ी निगरानी रखने के कारण से घर से बाहर नहीं निकलता था। मैं हर रोज उनके घर जाता और हम मिलकर घंटों खेलते रहते। घर का आँगन हर शाम हमारी बातों और कहकहों से गूँज उठता। उसकी माँ मुझे अपने बेटे की तरह चाहती थी। कभी-कभार वह हमारे साथ मिलकर बच्चों की तरह भी खेलती।        

यूँ वक़्त का पहिया घूमता रहा और हमने जवानी की दहलीज पर कदम रखा। समय के  साथ-साथ मेरे दोस्त के दिल में शाश्वत जिन्दगी की आरजू भी बढ़ती चली गई। आख़िर वह जुनून की शक्ल में तब्दील हो गई। उस एक खयाल पर उसकी सुई हर वक्त अटकी रहती, इसी कारण मुझे बहुत ज्यादा दुख होता। वह जब बोलना शुरू करता तो उसके लहजे में भरपूर यकीन और चेहरे पर एक निश्चित कठोरता के आसार दिखाई देते। उसके बात करने के अन्दाज से मेरे जिस्म में झुर-झुरी पैदा होती।

वह एक ऐसे सपने का पीछा कर रहा था जिसका वास्तविक दुनिया से कोई वास्ता न था। उसने इसे अपनी जिन्दगी का मकसद बना लिया था। मुझे उसके बारे में यह डर लगा रहता था कि कहीं वह पागल न हो जाए। लेकिन दूसरी तरफ उसके मजबूत इरादे को देखकर यह सोचने पर मजबूर हो जाता कि अगर किसी मकसद की चाह में ईमान की सच्चाई की चाशनी शामिल हो तो आदमी अपनी मंजिल जरूर पा सकता है।

स्कूल की पढ़ाई खत्म होने के बाद, आगे की पढ़ाई हासिल करने के लिये मैं शहर चला गया। उन दिनों मैं पढ़ाई और शहर की रंगीनियों में ऐसा खोया कि अपने घर और पुराने दोस्तों से मेरा वास्ता लगभग कटकर रह गया। कभी-कभार मेरे दोस्त का कोई खत मिलता, जिसमें हर बात जिन्दगी से शुरू होती और मौत पर खत्म होती। पढ़ने के बाद ऐसा महसूस होता जैसे वह पूरी दुनिया को जादुई ढंग से झाँसा देना चाहता हो। उस के अजीब-ओ-गरीब खयालात के बारे में सोचते हुए मैं परेशान हो जाता लेकिन उनकी सच्चाई को झुठला भी नहीं सकता था।

छुट्टियों के दौरान जब मैं घर लौटा तो पता चला कि वह न जाने कहाँ गायब हो गया है। अगले दिन उसकी माँ की तबीयत पूछने गया तो वह खौफ से डरी हुई हिरनी की तरह लगी, जिसके बच्चे को शेर उठा ले गया हो और वह बेबसी से चारों तरफ उसकी तलाश में भटक रही हो। उसकी तरसती आँखों में बेशुमार सवाल तैर रहे थे। आस भरी निगाहें मेरे चेहरे पर यूँ गड़ी थी जैसे मैं अपने दोस्त के बारे में कोई खैर-खबर लाया हूँ। उसकी हालत देखकर मेरा दिल भर आया। वह जबान से कुछ न कह सकी पर डबडबाती आँखों से हाल बयां होता रहा। उसकी खूबसूरत बड़ी-बड़ी आँखों से आँसुओं की लड़ी फूट पड़ी। खामोशी से मेरी कलाई पकड़ी और अपने कमरे में ले गई। अलमारी से एक खाली लिफाफा निकाल कर मुझे थमाया। लिफाफे के अन्दर खत पड़ा था जो उसने अपनी माँ के नाम लिखा था। मैंने गौर से देखा तो सफेद कागज पर काले हर्फो के बीच में मेरे दोस्त का मासूम चेहरा उभर आया जो रौशन लौ की तरह जहन के धुंधले आसमान पर बिखर कर गुम हो गया। उसकी माँ बेचैन निगाहों से मुझे घूर रही थी। मैं अपने जज्बात को छुपाते हुए ठहर-ठहर कर खत पढ़ने लगा।

‘प्यारी माँ ! मैं मौत के खौफ से छुटकारा पाने के लिये एक सफर पर रवाना हो रहा हूँ जो मुझे वह शाश्वत जिन्दगी बख्श दे जिसके भविष्य में न कोई हद और न कोई इन्तहा हो। उसके बाद मेरा नाम कभी भी मुर्दों की सूची में न आएगा, क्योंकि मैं उनमें शुमार होना नहीं चाहता। मैं अमर होना चाहता हूँ और मुझे यकीन है कि मैं अपने मक्सद में जरूर कामियाब हो जाऊँगा। जिन्दगी भर मेरी यह ख्वाहिश रही है कि मैं अमर बन जाऊँ। तुम्हारे हसीन चेहरे पर सदा बहते हुए आँसुओं की कसम मैं तुम्हारी ख्वाहिश हर हाल में पूरी करूँगा। फकत तुम्हारी दुआओं का मुहताज’ - बेटा।

खत पढ़ने के बाद मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं उसके बारे में क्या कहूँ ? मेरा दोस्त एक ऐसी मृगतृष्णा के पीछे भाग रहा था जिसको हासिल करना पाँवों को छालों से लहूलुहान करना था। मेरे पास उसकी माँ को झूठी तसल्ली देने के लिए शब्द नहीं मिल रहे थे, इसलिए खामोश और गमगीन होकर अपने घर वापस आया।

जिस दिन मेरी छुट्टियाँ खत्म हुईं , मैं शहर जाने की तैयारियों में लगा हुआ था। सुबह सवेरे मेरे दोस्त के घर से दिल दहलाने वाला शोर उठा। मैं घबराकर हाल जानने उस ओर दौड़ा। दरवाजे से जैसे ही अंदर दाख़िल हुआ तो आँगन में एक ताबूत दिखाई दिया।

मेरे दोस्त की माँ उसके सिरहाने खड़ी थी। उनकी खुश्क आँखें और विश्वासपूर्ण अन्दाज  देखकर हैरत से चकरा गया। मैं उनके करीब पहुँचा तो एक अजनबी को अफसोस के साथ कहते हुए सुना ‘आपके बेटे ने बड़गाम में मर्दाना लड़ाई लड़ते हुए भारतीय फौजियों के हाथों शहादत का जाम पिया है। वह बे-इन्तहा दिलेरी से लड़ा और दुश्मन की सब गोलियाँ अपने सीने पर झेल गया।’

यह सुनकर उसकी माँ के मुँह से उफ तक न निकली। उसने आस उम्मीद के विपरीत गर्व से अपना सीना चैड़ा करते हुए पूरे विश्वास के साथ कहा - ‘खुदा ने उसकी ख्वाहिश पूरी कर दी। मेरा बेटा अमर हो गया... शहीद कभी नहीं मरते... उसने शाश्वत जिन्दगी पा ली... ! मेरा बेटा ज़िन्दा है... मेरा बेटा नहीं मरा... मेरे बेटे ने मौत को शिकस्त दे दी ! मेरा बेटा ज़िन्दा है !’