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आधुनिक बचपन
October 29, 2020 • राजकुमार सिंह • कहानी


राजकुमार सिंह, अध्यापक, विजडम अकादमी सीनियर सेकेंडरी पब्लिक स्कूल,
जोधपुर, राजस्थान, मो. 9695678187

बचपन, एक अनूठा अनुभव और जीवन का सबसे सुखद समय जो आज के इस आधुनिक युग मे मात्र एक शब्द बनकर रह गया है। बचपन जो एक अवस्था थी उमंग की, खेल की, उत्साह की, ऊर्जा की; जो आज सिर्फ एक शब्दकोश की परिभाषा बनकर रह गया है जिसको पढ़कर सिर्फ पुराना बचपन याद आ सकता है (भारद्वाज 167). वो समय नहीं और न ही आज के बच्चों का वैसा बचपन। हमारा बचपन याद आते ही अंग-अंग मे उत्साह भर जाता है। लेकिन साथ ही आज के बच्चों पर तरस आता है की उनका बचपन तो रहा ही नहीं और रहा भी तो सिर्फ जुबान पर। वास्तविकता में तो कब का वह कल्पना की खाई में समां चुका था। आधुनिकता ने अगर कुछ छोड़ा है तो बुजुर्गों की यादों में उनका उछलता हुआ बचपन। मुझे याद आता है कि हमारा बचपन जिसमें हम बच्चों के साथ खेला करते थे आज के समय की आधुनिकता की जंजीरों से इतना दूर थे कि पता भी नहीं था कि एक दिन बचपन सिर्फ किताबों की कहानियां बनकर रह जाएगा। इस अद्योगिकी और वैज्ञानिक खोज के तीव्र प्रवाह ने अगर उस बचपन के लिए छोड़ा है तो बस हमारे और आज के आधुनिक बचपन के बीच में तुलना करने के लिए मुश्किल समय और कागज और कलम के बीच थोड़ी सी नजदीकी जिसमें हम दो अक्षर लिख कर उस बचपन को बयां करने का प्रयास करते है। इसके आलावा आज अगर कुछ बचा है तो केवल बचपन की मुस्कुराती हुई स्मृतियां ।

हमारे बचपन में आज के जैसी सुविधाएं तो नहीं थी परंतु ऐसी चीजें थी जो बचपन को जीवन का सबसे यादगार समय बना देती  थी। आज सुविधाएं तो हैं परंतु बचपन नही है और जो है वह सिर्फ कहने को (होल्ट12)। मुझे याद आता है कि हमारा उस समय तीसरी कक्षा में दाखिला होना था। स्कूल का पहला दिन था। पापा घर पर नहीं थे। इसलिए हमारे दाखिले की जिम्मेदारी मम्मी को सौंपी गई थी। उस दाखिले की जिम्मेदारी मम्मी के लिए कुछ ऐसी थी जैसे कि  किसी सभा में उनको अभिभाषण देना हो। जल्दी-जल्दी सुबह का नाश्ता तैयार करने के पश्चात् मम्मी ने हम लोगों को तैयार किया और खुद तैयार होकर निकल पड़ी स्कूल के लिए। हड़बड़ी में वो हम तीनों को जूता पहनाना ही भूल गई और हम भी इससे बेखबर थे; हम लोगों को तो सिर्फ दोस्तों से मिलने की उत्सुकता थी।इसी जल्दबाज़ी में चप्पल में ही स्कूल पहुंच गए जिसके लिए पहले ही दिन मास्टर जी की डाँट से स्कूल का शुभारम्भ हुआ। हम सभी स्कूल के समय पर ही पहुंच गए और सुबह की प्रार्थना सभा में हक्के बक्के खड़े हो गये। सभा समाप्त हुई तो कुछ समय बाद हम तीनों को मास्टर जी के कार्यालय में बुलाया गया और दाखिले के पश्चात पिछले वर्ष की भांति सारे कानून-कायदों का पाठ पढ़ाया गया और स्कूल समय  से आने के लिए धमकी स्वरूप चेतावनी दी गई जिसका पालन करना अनिवार्य था।

इस प्रकार दाखिला हो गया और रोज की दिनचर्या में स्कूल जाना भी शामिल कर दिया गया।  काफी सारे बच्चों के लिए तो यह एक सजा के समान था और ना चाहकर भी जबरदस्ती जाना ही पड़ता था। हमेशा की तरह रोज  सुबह सुबह हम सभी को जगाने के लिए मम्मी को खासी मेहनत करनी पड़ती। कभी-कभी तो न जगने पर बिस्तर पर ही पानी उड़ेल दिया जाता था। इस प्रकार बड़ी मुश्किल से और बेमन से उठते थे और फिर जल्दी-जल्दी तैयार होकर नया-नया बस्ता टांग के झूमते हुए निकल लेते थे स्कूल के लिए (रामानुजन 63). । कुछ को तो छड़ी के सहारे स्कूल तक खदेड़ कर मास्टर जी के हवाले कर दिया जाता था। कभी मन से तो कभी जबरदस्ती किताब निकालकर पढ़ना ही पड़ता था और कार्य पूरा करना पड़ता था। स्कूल पहुंचने के बाद छुट्टी का इंतजार कुछ यूँ रहता था जैसे जेल के कैदी को बेल का इंतजार हो। 

खैर इंतजार करते-करते वह छुट्टी का समय भी आ जाता था। शाम के तीन बजते ही छुट्टी की घंटी बजती थी और समस्त अध्यापक गण पुलिस का रूप धारण कर लेते थे और समस्त बच्चे भीड़ का। हालाँकि जीत तो अध्यापकों की ही होती थी और उन्हीं के अनुसार निकलना पड़ता था। घर पहुंचकर बस्ता लगभग फेंकने के स्वरुप में ही रखते थे और निकल लेते थे खेलने-कूदने। रोज शाम को मोहल्ले के सारे बच्चे इकठ्ठा होते थे। कुछ साइकिल चलाने में अपनी योग्यता साबित करते थे तो कुछ दौड़ कर रेस जीतने में। कुछ जो ज्यादा छोटे बच्चे होते थे वो अपनी टोली की रेलगाड़ी बनाते थे और उनमें सबसे आगे वाला अपने को इंजन मानकर सभी को रेलगाड़ी के डिब्बे के समान खींचता था। बच्चों के संध्या के खेल में लुका-छिपी, कबड्डी और पुलिस-चोर के खेल प्रमुख थे। सभी खेलों में कुछ ऐसे बच्चे होते थे जो सदैव सेना प्रमुख एवं तानाशाह की भूमिका निभाते थे और हम छोटे बच्चों को उनकी बात माननी ही पड़ती थी। 

जैसे-जैसे दिन गुजरते गए वैसे-वैसे साइकिल सीखने में हमारी भी रुचि बढ़ती गई। उस समय साइकिल सीखना एक ऐसी कला समझी जाती थी जिसको हासिल करने के बाद हमें बड़े लोगों के बीच में ऐसा व्यवहार मिलता था जिसको हम बच्चे एक उत्कृष्ट सम्मान समझते थे। साथ ही साथ जिम्मेदारियां भी बढ़ जाती थी जिसका निर्वाहन करना किसी मनोरंजन के समान था। जब भी किसी बाहर के काम के लिए कहा जाता था फटाक से साइकिल उठा लेते थे और चल देते थे बड़ी उत्सुकता से उस काम को करने के लिए। इसलिए हमारी टोली के बच्चे पूरी लगन के साथ साइकिल सीखते थे। साइकिल सीखने की प्रक्रिया भी कई चरणों में बांटी गई थी।  प्रथम चरण में साइकिल संभालना और पैडल पर पैर रखना आता था जिसके बाद यह समझा जाता था कि अब यह बच्चा साइकिल सीख सकता है। दूसरे चरण में कैंची चलाना और उसमें निपुण होना। यह चरण कुछ ऐसा था जिसमे हमारे शरीर से विभिन्न प्रकार के रेखागणित के कोण बन जाते थे। सबसे रोचक चरण यही था जिसमें कि प्रायः सामने न देखने के कारण हाथ पैरों में चोट भी लग जाती थी लेकिन बचपन की उमंग के आगे यह चोटें मायने भी कहां रखती थी।  किसी तरह गिरते-पड़ते कैंची सीख ही लेते थे तथा काफी दिनों तक उसी मे निपुणता हासिल किया करते थे। तीसरे और चौथे चरण में डंडा और गद्दी चलाना सीखा जाता था। चौथे चरण के बाद हमें पूर्ण रूप से साइकिल चालक स्वीकार कर लिया जाता था और साइकिल सीखने वाले का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था। इस प्रकार यह सबसे सुंदर और रोचक घटना होती थी।

इस प्रक्रिया को पूरा करते-करते लगभग हम बच्चे बड़े हो जाते थे और जिम्मेदारियों से मिलाप हो जाता था तो कुछ का बचपन कब गुजर गया पता भी नहीं चलता था परन्तु साइकिल नहीं सीख पाते थे। बचपन की ऐसी ही कई अन्य घटनाएं बड़े रोचक ढंग से घटित होती थी जो गांव की गलियों से लेकर खेत की पगडंडियों तथा कस्बों के रास्ते से गुजर कर शहर पहुंचती थी जहां पर बचपन लगभग खत्म हो जाता था तथा हम जिंदगी के दूसरे पड़ाव में पहुंचते थे। कुछ पढ़ाकू बच्चे गांव छोड़कर शहर चले जाते थे और अपनी पढ़ाई पूरी करते थे। ऐसा होता था हमारा पुराना बचपन। 

आधुनिकीकरण हमारे बचपन को कैसे निगल गया समझ नहीं आता है। आज के बच्चों का बचपन देखकर लगता ही नहीं है कि वह हमारे ही जैसे बच्चे हैं। हम लोगों को तो बारहवीं  कक्षा तक पता ही नहीं था कि मोबाइल फोन कैसे चलाया जाता है; और तो और कुछ को तो ये भी नहीं पता होता था कि  ये होता कैसा है। आज समय कितना आगे चला गया है। अब तो बचपन तो बचपन की शुरुआत ही फोन एवं कंप्यूटर से होती है। प्रतिस्पर्धा का दौर इतना ज्यादा हो गया है कि बच्चे सही से चलना भी नहीं सीखते कि माता-पिता उनका एडमिशन बोर्डिंग स्कूल में करा देते हैं (अग्रवाल, 193)। जहां पर हमारे समय में मिट्टी-धूल में खेलना बचपन माना जाता था वहीं पर आज बच्चों के पैर में मिट्टी के निशान बमुश्किल ही मिलते हैं। उनको सिर्फ किताबों का कीड़ा बना दिया जाता है। बचपन तो उनसे छीन के पता नहीं किस खंदक मे फेंक दिया गया है। आज के बच्चे तरह-तरह के फोन का प्रयोग करते हैं परन्तु बचपन क्या होता है पता ही नहीं चल पाता। पराकाष्ठा तो यह है कि माता-पिता भी भूल गए हैं कि उनके बच्चों की बचपन की अवस्था भी होती है और उन्हें इस अवस्था में मनोरंजन की आवश्यकता होती है। इनका मनोरंजन तो इलेक्ट्रॉनिक मनोरंजन है। वास्तविक मनोरंजन तो इस आद्योगिकीकरण तथा वैज्ञानिक युग के भारी भरकम राक्षस ने निगल लिया है। शायद अब तो आशा करना भी बेईमानी होगी कि आज का बचपन एक बार पुनः हमारे बचपन जैसा सुखद एवं सौहार्दपूर्ण हो सकता है? प्रतिस्पर्धा एवं विज्ञान की ज़ंजीरो में जकड़ा हुआ यही है आधुनिक बचपन।

 

संदर्भ-सूची:

अग्रवाल, शोभा. (2019). स्वस्थ मानसिक विकास कैसे हो? (वेदों, शास्त्रों तथा आधुनिक स्वस्थ / चिंतको के विचार). लखनऊ: लक्ष्मी प्रकाशन

भारद्वाज, विनॊद. (2006). बृहद आधुनिक कला कोश. नई दिल्ली: वाणी प्रकाशन

होल्ट, जॉन. (2005). बचपन से पलायन: बच्चों की आवश्यकताएं व अधिकार. अनुवाद- पूर्वा याज्ञिक, कुशवाहा. भोपाल: एकलव्य प्रकाशन

रामानुजन. (2010). “यही मेरी पढाई थी और खेल भी,” बड़ों का बचपन- संजीव ठाकुर. भोपाल: एकलव्य प्रकाशन