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आलेख
April 5, 2020 • Devender Kumar Bahl

रमेश दवे, भोपाल, मो. 9406523071

साहित्य का शांति-पाठ

शांति नहीं तब तक जब तक / सुखभाग न नर का सम हो / नहीं किसी को बहुत अधिक / और नहीं किसी को कम हो 
जब तक मानव-मानव का / सुख-भाग नहीं सम होगा / शामित न होगा कोलाहल / संघर्ष नहीं कम होगा।

इन पंक्तियों के कवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपने खण्ड-काव्य ‘कुरुक्षेत्र’ के माध्यम से जब यह कहा होगा, तब साहित्य में एक प्रकार की लोक-चेतना थी जो अन्याय, असमानता, शोषण के विरूद्ध संघर्ष का संदेश देती थी। दो दो महायुद्ध क्रमशः वर्ष 1920 और 1945 में विध्वंस रच कर बंद तो हो गए थे और शांति का राजनीतिक-पाठ लीग ऑफ नेशंस और संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना से रच चुके थे मगर क्या इस महाहिंसक शक्ति प्रदर्शन द्वारा महाध्वंस के बाद दुनिया के किसी भी साहित्यकार ने शांति का कोई महापाठ रचा। माना कि 1945 के बाद महायुद्ध तो नहीं हुए, मगर युद्ध तो जारी हैं, आतंक जारी है, हिंसा जारी है, महाशक्तियों के शीत-युद्ध जारी थे और अब भी टुकड़ों में जारी है।
अब प्रश्न यह है कि सात अरब आबादी के संसार में महायुद्धों की हिंसा के बाद, एक ही गांधी, एक ही मार्टिन लूथर किंग जूनियर और एक ही नेल्सन मण्डेला पैदा क्यों हुए ? लाखों क्यों नहीं। साहित्यकार भी मौन का मास्क पहन कर निष्क्रिय क्यों बैठे रहे ? हिंसा के विरूद्ध अहिंसा के पक्ष में खड़े क्यों नहीं हुए? माना जाता है कि वर्ष 1789 में फ्रांस की राज्य क्रांति के बाद दुनिया भर में शांति और सद्भाव का यूरोप में सर्वाधिक साहित्य रचा तो गया, और सोवियत रूस में भी बोल्शेविक क्रांति के बाद बड़े साहित्यकारों ने क्रांति के पक्ष में तो भी लिखा, सारी दुनिया को प्रभावित भी किया मगर वहाँ की रक्त-क्रांति न तो पेस्तर नाँक को सह सकी, न सोल्जेनिशिन को, न वैज्ञानिक सखारोव को और हालात यहाँ तक पैदा हो गए कि रूस, पोलेण्ड, हंगेरी आदि अनेक देशों में यातना-शिविरों में लाखों लोग मारे गए। साहित्यकारों ने लिखा तो जरूर मगर लेनिन, स्टेलिन, खुश्चोव, बुल्गानित, ब्रेजनेव आदि के शक्तितंत्र में साहित्यकार की शांति और अहिंसा की आवाज पैदा नहीं हुई। इतना अवश्य हुआ कि मार्क्सवाद की समाजवादी विचारधारा ने भौतिक द्वंद्व के प्रश्न, शोषण के प्रश्न, असमानता और अन्याय के प्रश्न, पूंजीवादी व्यवस्था के विरूद्ध प्रश्न तो उठाए, मगर सारी दुनिया के साहित्यकारों ने एकजुट होकर ऐसा कोई आंदोलन नहीं छेड़ा जो शांति का नया पाठ रचता। यहाँ तक कि मार्क्सवाद की कोख से जो मार्क्स-वाद लेनिनवाद (एम.एल.समूह) पैदा हुआ वह भी हिंसक हो गया और माना जाता है नक्सलवाद भी उसी हिंसा की संतान है।
साहित्य की भूमि शांति, समान-हित, सद्भाव और करूणा की भूमि मानी जाती है लेकिन विश्वभर के महाकाव्यों में भी युद्ध ही तो मुख्य भूमिका में हैं, फिर चाहे वह रामायण हो, महाभारत हो, ग्रीस के होमर द्वारा लिखे गए इलियड, ओडेसी हों, ट्रोजन वार हो, दांते के डिवाइन कामेडी का तर्क का चित्रण हो अथवा सोफोक्लीज और शेक्सपीयर के त्रासदी-नाटक हों। मनुष्य की हिंसक भूख ने साहित्यकारों में भी तो युद्ध, घृणा, द्वेष, ईष्र्या और विचार-धाराओं की संकीर्णता ही रची। साहित्यकार विपाट से भले ही समानता की बात करते रहे मगर व्यवहार से तो न उदार बने, न शांति, अहिंसा और सदभाव के रचनाकार। क्या उन्होंने ऐसा साहित्य रचा जो मनुष्यता का शांति-पाठ होता? आज सारा विश्व बिना किसी महायुद्ध के भी हथियार और हत्याओं के आतंक से ग्रस्त है। विश्व को बचाने में लाखें वर्षों से हो रहे प्रयत्नों को ध्वस्त करने में कुछ घण्टे ही पर्याप्त हैं। सभ्यता के दावेदारों का यह शस्त्रवाद क्या किसी आसुरी-शक्ति का भय पैदा नहीं करता? विचार और विचारकों ने जो आदर्श रचे, उन विचारकों का भी क्या हश्र किया गया। सुकरात को जहर दिया गया, ईसा को सलीब पर चढ़ा दिया गया, मोहम्मद साहब पर पत्थर बरसाये गए, बुद्ध को सड़ा मांस परोस दिया गया, दयानंद को उनके ही सेवक ने जहर पिला दिया और अंततः हमारे समय के, हमारी ही तरह चलते-फिरते, सत्य, अहिंसा के साथ मनुष्यता का शांतिपाठ करते गांधी को भी मार दिया गया। मनुष्य की मनुष्यता के विरूद्ध यह कितनी भीषण घृणा है।
बौद्धिकों और साहित्यकारों से अब एक ही प्रश्न है कि राजनीतिज्ञ जितना जन विज्ञान जानता है और उसके आधार पर जनता से अपनी सही या गलत नीतियों का समर्थन पा लेता है, वैसा साहित्यकार क्यों नहीं कर पाता ? वैज्ञानिक-समूह एटम बम हो, चंद्रयान मिशन हो या मंगल-ग्रह मिशन उन पर जितना लोकप्रिय हो जाता है वैसा किसी बड़ी शांति-वादी रचना करके साहित्यकार क्यों नहीं हो पाता ? रामायण में युद्ध के बाद लंका में भले ही शांति आ गई हो मगर भारत में तो विश्वविजय के अश्वमेघ यज्ञ होते रहे। महाभारत के महा-विनाश के बाद भले ही शांति-पर्व रच दिया गया हो लेकिन शांति की संस्कृति धारा तो आज तक भी नहीं बह सकी! आज भी यदि अमेरिका-मेक्सिको के बीच सीमाई विवाद और आतंक है, रूस में चैचन्या का आतंकवाद है, इंग्लेण्ड में आयरलेण्ड, स्पेन में केटेलोनिया का, चीन में हांगकांग और ताइवान का, पाकिस्तान में पखतूनों का, भारत में नक्सलवाद और सीमापार के आतंकियों का, ऐसे अनेक देश अगर आंतक ग्रस्त हैं तो फिर शांति के नाम पर नोबेल सम्मान, साहित्य के नाम पर नोबेल सम्मान देने का मतलब ही क्या ?
साहित्यकार भी अब राजनीति करने लगे हैं। लेखक तो हमेशा सत्ता का प्रतिपक्ष होता है मगर जब लेखक अपनी पसंद और विचारधारा की सरकारों के आने जाने के साथ सम्मानों, पुरस्कारों और पदों की होड़ में लग जाता है तो यह कल्पना ही कैसे की जा सकती है कि साहित्य में फिर कोई कबीर, तुलसीदास, प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी पैदा होंगे ? अब तो दल से जुड़ते लेखक दिल से तो जुड़ते ही नहीं। ज्ञान, अध्ययन, प्रतिभा और श्रेष्ठता से जुड़ने के बजाय खेमेबाजी के खूटों से बँध जाते हैं। अधिक बौद्धिक हो जाने पर उन्हें मार्क्सवाद, लेनिनवाद, माओवाद के तमाम हिंसक विदेशी मॉडल तो सर्वश्रेष्ठ लगते हैं. प्रगतिशील लगते हैं लेकिन गांधी. विनोबा. जयप्रकाश उनके लिए प्रतिक्रियावादी हो जाते हैं। माना कि राष्ट्रवाद तो एक प्रकार का हिंसावाद ही है, वह लोगों की हिंसक भूख बढ़ाता है लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं देश नाम की कोई चीज होती ही नहीं।
मनुष्य जब तक हथियार बनाता रहेगा, तब तक हिंसा, आतंकवाद और सीमाई संघर्ष जारी रहेंगे। हजारों साल में अर्जित की जाने वाली शांति अगर हथियारों से कुछ ही मिनिटों में सारी पृथ्वी को शमशान में बदल सकती है तो क्या यह नहीं लगता कि धर्म, राजनीति,समाजसेवक, साम्प्रदायिक सौहार्द्र, सदभाव जैसे बड़े बड़े शब्द पाखण्ड के ही पर्यायवाची हैं। न इन शब्दों से, न इनकी राजनीति से, और न साहित्य से शांति के ऐसे पाठों की रचना हो पाई जो दुनिया को हिंसा और हथियारों से मुक्त करती।
आज के साहित्य में तो ऐसी ध्वनियाँ भी सुनाई नहीं देती जो साहित्य की शक्ति, शांति, प्रेम और सद्भाव में निहित होती है। भले ही महाकाव्य और महाकथा यानी उपन्यास के अंत या साहित्य के अंत की घोषणा कर तकनीक या प्रौद्योगिकी को स्थापित किया गया हो लेकिन क्या किताबों का अंत संभव है? भले ही करोड़ों की आबादी में कुछ लाख पाठक बचे हों, भले ही सारी दुनिया में एक ही पाठक बचा रहे,पाठक बचेगा तो किताबें भी जिन्दा रहेंगी और किताबें जिन्दा रहीं तो शांति भी जीवित रहेगी। साहित्यकार की सबसे बड़ी चुनौती ही यह है कि वह शांति सदैव रचता रहे। शांति जीवित रही तो साहित्य कभी नहीं मरेगा। यह भी कितनी बड़ी विडंबना है कि जितने काव्य-महाकाव्य युद्ध, अशांति या रक्त-क्रांति पर लिखे गए उतना शांति का साहित्य नहीं रचा गया फिर चाहे वह काव्य हो, कथा-उपन्यास हो या नाटक हो। भारत हमेशा एक शांतिपूर्ण देश रहा है, उसने कभी किसी देश पर न तो आक्रमण किया, न किसी अन्य देश के गुलाम या उप-निवेश बनाया। यह भारतीय सभ्यता की सबसे महान उपलब्धि है। इस सभ्यता की रक्षा का दायित्व अब साहित्यकार पर है। उसे अब ऐसा साहित्य-पाठ रचना होगा जो युद्ध के बाद के शांति पर्व के पाठ के बजाए महा-शांति पाठ हो। मनुष्य ने मनुष्य को मारने, हारने और जीतने, संपत्ति और साम्राज्य बढ़ाने के युद्ध करने वाले बादशाह, तानाशाह और सम्राट तो पैदा किए मगर दुनिया भर में कितने शांति-नायक पैदा हुए ? एक गांधी, एक मार्टिन लूथर किंग जूनियर, एक नेल्सन मण्डेला, अगर दुनिया और देश बदलने की जिद कर सकते हैं तो साहित्यकार क्यों नहीं? सारी दुनिया में सैनिक, सेनाएँ और सैनिक अडडे जितने हैं उतने न साधु-संत हैं, न आश्रम, न गुरूकुल न ज्ञान के शांति-निकेतन, न साबरमती, सेवाग्राम। इसलिए अब शांति की एक मात्र उम्मीद साहित्य और साहित्यकार ही हैं जो शांति का मनुष्य-पाठ रच सकते हैं।