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आलेख
April 5, 2020 • सुरेश सेठ • लेख

 

सुरेश सेठ, जालंधर, मो. 9914527719

 

घटाटोप अंधेरे में उजाले की दूध गंगा

मान्यवर श्री गुरु नानक देव के 550वें प्रकाशोत्सव पर धार्मिक संकीर्णता से परे हटकर एक ही दिन में जो नई सार्थक बातें हुईं, उनमें से एक रामलला के मंदिर का फैसला और दूसरा श्री करतारपुर धाम के लिए खुले दर्शन-दीदार की इजाजत और पुण्य गलियारे का खुल जाना। इससे देश में जो माहौल बदला है, उससे साहित्यकार अपने स्तर पर उद्वेलित हुआ है। इसीलिए आपको यह आलेख लीक से हटकर भिजवा रहा हूं। -सुरेश सेठ

पिछले कुछ वर्षो में सांस्कृतिक पुनरुत्थान के नाम पर देश के विभिन्न क्षेत्रों में सांस्कृतिक क्षरण देखा जा रहा था। अध्यापक अध्यापन नहीं कर रहे थे, शिक्षा संस्थान व्यवसायिक दुकानों में तबदील हो रहे थे। 
धर्मस्थानों में राजनीति की घुसपैठ हो गई थी और राजनीति में धर्म का इस्तेमाल एक सुविधाजनक स्तर पर करने की कोशिश की जा रही थी। आज जिस तरीके से अयोध्या का मामला सुप्रीम कोर्ट ने वक्त से पहले निपटा दिया है, अपना स्पष्ट निर्णय दे दिया है। उससे देश में सांस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए नयी उम्मीदें जागी हैं। चालीस दिन की लगातार सुनवाई के बाद यह फैसला सत्रह तारीख को आने की उम्मीद थी। इस फैसले को जल्दी दे दिया गया और वह भी उस दिन दे दिया गया जिस दिन पाकिस्तान और हिंदुस्तान के कूटनीतिक और छद्म युद्ध के चरमोत्कर्ष में एक सांझीवालता का मार्ग खुल रहा था। यह मार्ग वाघा-अटारी और डेरा बाबा नानक से खुलकर करतारपुर के परमधाम तक एक पुण्य गलियारे के रूप में जा रहा था, जहां से अब से लेकर सदियों तक हजारों श्रद्धालु गुरु साहिब के अंतिम दिनों के पुण्य स्थल का दर्शन दीदार करते हुए अपने जन्म को सफल कर सकेंगे। यह भी महसूस करेंगे कि धर्म का अर्थ संकीर्णता की दीवारें खड़ा करना नहीं होता, अपने-अपने कटघरों में बंद हो जाना नहीं होता और धर्म के नाम पर राजनीति का प्रसार नहीं होता। इन्हें ही सांस्कृतिक एवं मानवीय मूल्यों का संस्तरण कहा जाता है।
बहुत बड़ा था अयोध्या में भगवान राम के जन्मस्थान पर रामलला के मंदिर की स्थापना का मसला। पिछले 200 वर्षो से इस पर अदालती लड़ाई चल रही थी। बीच-बीच में 
विद्वेष के झंझावात भी बहे। यह भी कहा गया कि रामलला को तो राजनीतिक उठापटक और सांप्रदायिक ताकतों ने एक टैंट में बंद कर दिया लेकिन सांस्कृतिक पुनरुत्थान का पहला चिन्ह तब नजर आया जबकि देश के क्षरित होते हुए लोकतंत्र में इसकी न्यायपालिका की अर्थवत्ता पर भी छींटे उड़ाए जाने लगे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस गोगोई ने कहा कि सन् 1991-92 से लटकते हुए इस अदालती मामले की रोजाना सुनवाई करके उभय पक्षो को अपना-अपना पूरा मौका देकर सटीक फैसला उनकी सेवानिवृति से पहले दे दिया जाएगा। 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट का जो फैसला इस संदर्भ में आया था, उस फैसले को न तो संबंधित पक्षों ने स्वीकार किया था और न ही इसमें रामलला की भूमि का बंटवारा गरिमापूर्ण माना जा रहा था। अब जस्टिस गोगोई के पीठ ने अपना फैसला उस दिन सुनाया जिस दिन भारत और पाकिस्तान के बीच पुण्य गलियारा खुल रहा था और श्रद्धालुओं के जत्थे श्रद्धा से अभिभूत होकर बाबा नानक के अंतिम दिनों के साक्षी पुण्य स्थल श्री करतापुर साहिब गुरुद्वारा के खुले दर्शन करने जा रहे थे। फैसले से पहले बहुत तनाव था माहौल में। सोचा जा रहा था कि बाबरी मस्जिद को ध्वस्त करने के बाद रामलला मंदिर की स्थापना का अगर स्पष्ट निर्णय आ जाता है तो इसको मुस्लिम समुदाय कैसे स्वीकर करेगा? कहीं विद्वेष और घृणा की आंधी सभी मानवीय मूल्यों को उखाड़ तो नहीं देगी। इससे पहले जितने भी साक्ष्य प्रस्तुत होते रहे, उन साक्ष्यों में चाहे यह स्पष्ट था कि भूगर्भवेत्ताओं ने इस मस्जिद के नीचे एक प्राचीन मंदिर के पुण्य अवशेष ढूंढ लिए हैं लेकिन हर इतिहास को अधूरा मानने वाले लोग इस साक्ष्य को स्वीकार करेंगे या नहीं, इस पर बहुत संशय था।
जहां तक भौतिकवादी मूल्यों के प्रसार का ताल्लुक है, पिछले दिनों देश में बहुत कुछ ऐसा देखा गया था जिससे लगता रहा कि देश में उदात्त भावनाओं का क्षरण हो रहा है। लोग धर्म के प्रति समर्पण, धीरज, संयम और एक-दूसरे को सहन करने की भावना का त्याग कर रहे हैं। हर धारणा या तत्व का बाजार में मोल लग रहा है। कहीं न कहीं हर स्थापना के पीछे चोर गलियां निकल रही हैं, जहां अवसरवादी तत्व अपनी राजनीति की रोटियां सेंकते हैं। अपने लिए प्रगति के शार्टकट तलाशते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। शार्टकट संस्कृति के जमाने में रामलला की स्थापना के लिए सुप्रीम कोर्ट का यह स्पष्ट फैसला देश में ऐसी भावनाओं का संचार कर गया है कि जिन्हें देखकर हम कह सकते हैं कि अभी भारत ने अपनी सांस्कृतिक गहराइयां और मानवीय ऊंचाइयां नहीं छोड़ीं। फैसले के बाद जब भूमि रामलला के मंदिर को दे दी गई और मुस्लिम पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड को कहा गया कि उन्हें मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ भूमि अन्यत्र प्रदान कर दी जाएगी तो कुछ भी हो सकता था। प्रशासकों को हिंसा के झंझावात बहने का डर भी हो सकता था। इन्सानों के बीच धर्म के बीच धर्म की दीवारें खड़ी हो सकती थीं। लेकिन अयोध्या और फैजाबाद के मिलजुल कर रहते लोगों का सांझा जीवनयापन और एक-दूसरे को सहन करने की भावना कुछ और ही सत्य कहती रही जिसे राजनीतिज्ञों की संकीर्ण स्वार्थपरता ने कभी पहचान नहीं दी। लेकिन जैसे ही फैसला आया और सुन्नी वक्फ बोर्ड ने यह कहा कि हम इस फैसले को रिविजन के लिए चुनौती नहीं देंगे क्योंकि इससे आगे रिव्यू पेटीशन और क्यूरेटिव पेटीशन के रास्ते खुले थे, तो माहौल बदला। तीस धर्माचार्यो की मीटिंग गृहमंत्री अमित शाह ने फैसले के लिए शाम को बुलाई, उनका भी यही मत था कि धीरज, संयम और उदारता के साथ इस निर्णय को स्वीकार करना चाहिए। सर्वोच्च न्यायपालिका की पताका ऊंची रहे और देश अपने लोकतंत्र के स्तम्भों का सम्मान करे। 200 साल पुराना झगड़ा तो निपट गया लेकिन लोगों के मन में सांस्कृतिक पुर्नोत्थान के धनात्मक मूल्यों का संदेश दे गया। स्वार्थपरता, आपाधापी, उच्छड्ढंखलता और उद्दंडता के हावी होते माहौल में यह एक ऐसी सद्मूल्यों की दूधगंगा थी जो इस फैसले के बाद सब पक्षों में बहती नजर आई। हिंदुओं ने तो इसे स्वीकार किया ही लेकिन मुसलमानों ने भी इसके प्रति कोई बेजा प्रश्न नहीं उठाया। उन्होंने न्यायपालिका के सामने सिर झुकाया। इससे यही संदेश मिलता है कि भारतीय संस्कृति का क्षरण तब तक नहीं होगा, जब तक लोकतंत्र के चारों स्तम्भ जिंदा हैं। अयोध्या और रामलला विवाद के चिरलम्बित फैसले से न्यायपालिका ने भारतीय संस्कृति के पुनर्जीवन का एक रास्ता दिखाया है। विभिन्न धर्मो के सह-अस्तित्व में जीते इस देश ने साबित किया कि अनेकता में एकता की बात कहने की संस्कृति गलत नहीं है। कुर्सियों की छीन-झपट इसका चेहरा मलिन नहीं कर सकती। रामलला का फैसला तो आ गया। उसके बाद देश के विभिन्न वर्गो में जो प्रतिक्रिया हुई है, वह राहत की है, उदारता की है और सहनशील स्वीकार्य की है। उम्मीद है कि इस फैसले के बाद देश में फैलते हुए सांस्कृतिक क्षरण के 
अंधेरे में एक उजली दूधगंगा के उतरने का रास्ता भी हमवार हो सकेगा। जिसमें एक-दूसरे को सहन करते हुए सही रास्ते पर चलने का आत्मविश्वास होगा।