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आरती
June 7, 2020 • अनुवाद: जसबिंदर कौर बिंद्रा • कहानी

अनुवाद: जसबिंदर कौर बिंद्रा, मो. 9868182835

  अमृता प्रीतम

साहित्यअकादमी के सौजन्य से, 
मूल लेखक: मोहन बाबा
सम्पादक: रघुवीर सिंह

 कोठरी के आगे कोठरी,उसके आगे और कोठरी,आगे एक गुफा। दीए की धीमीलौ से रास्ता टटोल रहे थे। रास्ता चिपचिपा-सा था। नौ सदियों की धूल इस रास्ते से गुज़रचुकी थी। रोज पूजा का घी और दर्शनार्थियों के पैर इस रास्ते से गुज़रतेथे। गुफा में अन्नपूर्णा की मूर्ति थी।

“मेरा दम घुट रहा है। इस गुफा में अन्नपूर्णा ने कैसे नौ सौ बरस काटे होंगे...‘‘

शुक्र है,मेरी जुबान पुजारियों को समझ में नहीं आती। वैसे भी वे दूसरे की बात सुनने के बजाय अपनी सुना रहे थे, “पैसा,माँ पैसा पैसा...‘‘।

कितनी ही कोठरियाँ,कितनी ही मूर्तियाँ,कितने ही पुजारी और सभी आपस में भिड़ते हुए। दर्शक को जैसे खींचकर अपनी-अपनी मूर्ति का दर्शन करवाना चाहते थे और फिर जैसे हाथ डालकर उसकी जेब से कुछ निकाल लेना चाहते थे।

बाहर आकर मेरे साथी कहीं से ठंडा पानी लाए,सुपारी और लौंग लाए और मेरी साँस में साँस आई।

“इस मंदिर का नाम था लिंगराज। कोई और मंदिर देखोगे?‘‘

“अन्नपूर्णा बहुत सुंदर है,मगर कैद में पड़ी हुई है। यहाँ कोई मंदिर ऐसा है,जहाँ कला-मूर्ति हो,मगर कोई पुजारी न हो।‘‘

“यहाँ भुवनेश्वर से कोणार्क कोई चालीस मील है,ग्यारहवीं सदी की मूर्ति कला,कोई पूजा नहीं,पुजारी नहीं। चालीस मील कोई ज्यादा नहीं थे। सड़क के दोनों ओर नारियल के वृक्ष थे। बाँस के झुंड थे,केले के चौड़े पत्ते थे और पान की बाड़ियाँ थीं।

“पहले इस मंदिर के पास समुद्र था। अब वह ख़ुद चला गया है,रेत पीछे छोड़ गया है।‘‘

मंदिर सूर्य देवता का था। आगे सात घोड़े जुते हुए,पीछे रथ के पहिए सोलहसौ फुट कीऊँचाई। मालूम नहीं,पत्थरों को तराशने में कितने औजार कितनी छेनियाँ और कितने कलाकारों के हाथ लगे होंगे।

सामने नृत्य-मंदिर। चारों ओर नर्तकियाँ,शेर और हाथी दरबान की भाँति खड़ेहुए।

‘‘कमाल है,सिर्फ नर्तकियों के बुत ही नहीं,नर्तकियों की मुस्कुराहट भी पत्थरों में तराशी हुई है।‘‘

‘‘बाईं ओर नौ ग्रह सँभाल के रखे हैं। कभी ये मंदिर के माथे पर थे।‘‘

किसी पुजारी के कहने पर माथा नहीं झुकता था,आज कला के आगे स्वयं ही झुक गया था।

लौटते समय मैंने पूछा, “इसके आस पास कुछ और देखने लायक है?‘‘

“मंदिर-मूर्ति तो कोई नहीं। यहाँ नजदीक ही एक झुग्गी में एक औरत रहती है। आरती उसका नाम है। वह चित्रकार है,उसकी चित्रकला देखने योग्य है।‘‘

नारियल के वृक्षों के बीच में एक झुग्गी थी। मैंने दरवाजा खटखटाया।

साठ वर्षीय औरत ने दरवाजा खोला। जैसा जलाल उसके चेहरे पर था,वैसी चमक अक्सर लोगों को नसीब नहीं होती। साँवले रंग में कशिश थी।

झुग्गी जैसे गुफा थी,कितनी ही मूर्तियाँ उसमें नगों जैसे जड़ी हुई थीं। पहली ही तस्वीर ऐसी थी,जिसने हाथ पकड़कर रोक लिया। मुश्किल से मैं दूसरी के पास पहुँची,वो तो जैसे बातें करने लगी।

“मुझे लगता है,हुनर जब अपने कलाकारों के पास मित्रों के समान मिलने आया और आपके पास पहुँचकर फिर आगे जाना ही भूल गया।‘‘

साठ वर्षीय आरती मुस्कुराई। कहने लगी, ‘‘हुनर नहीं दर्द...‘‘ वह कैसी झुग्गी थी,जहाँ आरती रहती थी,दर्द रहता था,हुनर रहता था।

सारे साथी बाजार में एक छोटे से होटल में चाय पी रहे थे। आरती के पास मैं अकेली गई थी। आरती दो नारियल ले आई। हम दोनों नारियल पानी पीने लगे।

“यहाँ बड़ी दूर-दूर से लोग आते हैं। विदेशों से भी आते हैं। आपकी कला देखते-परखते,सराहते हैं,खरीदते हैं। हो सकता है पहले भी किसी ने आपसे यह पूछा हो मगर मैं एक बात आपसे अवश्य पूछना चाहती हूँ।‘‘

‘‘क्या?‘‘ - “इतने हुनर के लिए आपने सिर्फ एक ही रंग क्यों चुना है?‘‘

आरती के साँवले चेहरे पर बिजली-सी कौंधी। उसकी सभी कृतियाँ काले रंग की थीं। लगता था पहले किसी ने उससे इतना रहस्यमयी प्रश्न नहीं पूछा था।

‘‘मैं पहले सारे रंग इस्तेमाल करती थी।‘‘

‘‘फिर?‘‘

‘‘एक दिन मैंने सारे रंग फेंक दिए,सिर्फ एक ही रंग अपने पास रख लिया’’

‘‘बहुत बरस हो गए होंगे?’’

“हाँ,करीब पच्चीस बरस। मुझे एहसास हुआ,कोई और रंग मेरा साथ नहीं देगा। सिर्फ यही रंग मेरे साथ निभेगा।‘‘

‘‘इस रंग ने आपके साथ वफा की और हुनर ने इस रंग के साथ वफा की। “यह रंग विरह का है। इसकी वफा पर कभी किसी को शक नहीं हुआ।‘‘‘‘हाँ आरती। मेरे गीत इस बात की गवाही देते हैं।‘‘

गीतों की बात होने लगी। कहानियों की बात लंबी हो गई और फिर इन बातों ने आरती के मन की बात को भी आवाज दे दी। वह कहने लगी। “तीस वर्ष मेरी उम्र के ऐसे पन्ने थे,जिन पर मैंने विवाह का शब्द नहीं लिखा था। एक दिन एक व्यक्ति आया,न मेरी जात का,न मेरे देश का। मेरी तस्वीरों को देखने,मेरे घर के एक मूढ़े पर क्या बैठा मेरे दिल में आ बैठा।

“उसने हाथ बढ़ाया और मेरी जिंदगी के सफे पर विवाह का हर्फ लिख दिया।

“जात-गोत कुछ मिलता नहीं था। मुझे मालूम था,मेरे माँ-बाप इसे स्वीकार नहीं करेंगे। उसने मेरे रंगों की डिब्बी खोली और लाल रंग की बिंदी मेरे माथे पर लगा दी।”

“कितना रंगीन विवाह...‘‘ “इस रंग से उसने मेरी जिंदगी के पाँच बरस रँग दिए।‘‘

“सिर्फ पाँच बरस...‘‘

“हाँ,सिर्फ पाँच बरस,लेकिन मुझे कोई अफसोस नहीं। वो पाँच बरस मेरी उम्र के माथे पर लाल बिंदी समान लगे हुए हैं।‘‘

“मगर आरती। सिर्फ पाँच ही क्यों? ऐसे सिंदूर को तो कोई सिर्फ माथे पर नहीं लगाता,हनुमान की तरह सारे शरीर पर मल लेता है।‘‘

‘‘हनुमान होना हर किसी की किस्मत में नहीं होता,अमृता। एक बच्चे की उम्मीद बंधी थी। आसमान पर एक तारा निकल आया था,मगर वह तारा टूट गया। आसमान खाली हो गया। फिर चार बरस बीत गए,आसमान पर वो तारा फिर कभी न उभरा।‘‘

“मगर आरती,धरती पर दो दीए जलते थे,तुम्हारे दो दिलों के दीए। क्या उनसे धरती पर रोशनी नहीं थी?‘‘ ‘‘नहीं अमृता। वह अँधेरे आसमान की ओर देखता थाऔर उसी का हो जाताथा अमृता।

‘‘फिर।‘‘

एक दिन वह मेरे पास से चला गया। शायद उस देश को ढूँढने के लिए,जहाँ की रातें तारे बाँटती हों।‘‘

“आरती...।‘‘

“जाते समय मैंने उसके हाथ में अपना ब्रुश दिया और लाल रंग की डिबिया दी ताकि वह अपने हाथों से मेरे माथे पर लाल बिंदी लगा दे। फिर जब वह चला गया. मैंने सारे रंग फेंक दिए। सिर्फ काला रंग रख लिया। सदैव विरह का रंग। मझे एहसास हो गया था कि और कोई रंग मेरा साथ नहीं दे पाएगा। अब तुम खुद ही इसकी वफा देख रही हो।‘‘

जिन हाथों ने अन्नपूर्णा को गढ़ा,जिन्होंने नर्तकियाँ गढ़ी थीं और जिन हाथों ने आरती को गढ़ा था,मैंने सभी को प्रणाम किया।

मुझे लगा...मैंने कब कहा था,मुझे वो मंदिर दिखाओ जहाँ कला-मूर्ति हो,मगर पुजारी न हो। मुझे लगा,किसी कोठरी से अन्नपूर्णा की मूर्ति भागकर आई और यहाँ नारियल के वृक्षों में आकर आरती बन गई। कभी सागर इसके निकट बहता था,अब वह ख़ुद चला गया था,रेत पीछे छोड़ गया था। झुग्गी एक मंदिर थी,आरती एक मूर्ति और वहाँ कोई पुजारी नहीं था।