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अब के बिछुड़े...
October 6, 2020 • सुदर्शन प्रियदर्शिनी • कहानी


सुदर्शन प्रियदर्शिनी, 246, Stratford Drive, Broadview Heights, Ohio 44147, 'U.S.A.'
Email : sudershen27@gmail.com

रजत! आज न जाने कहाँ से और कैसे तुम मेरी ही बस में पिछली सीट पर आ बैठे थे? समय का कितना बड़ा अंतराल बीच में से फिसल चुका है। लेकिन आज तुम्हें पहचान कर पुकार भी नहीं सकती। तुम्हें पुकारने के खुलेपन से अपने सामाजिक दायरों के तंग होने का भय भी समा गया है मन में...।

तुम्हारी बैलोस ठहरी हुई दृष्टि... उन्नत भाल और सौंदर्य का वही अभिराम रूप जहाँ सारी कल्पनायें फीकी पड़ जाती हैं...।

आज तुम्हें तुम्हारे असली नाम से पुकार कर तुम्हें कैसे अपने पास बुला लूँ? देखती हूँ तुम्हारी दृष्टि में भी एक शून्य लटका हुआ है जो कुछ भी नहीं पहचानता शायद, जो मेरी पहचान में भी बाधा बनकर खड़ा हो गया है। आज तुम्हें लेकर सारा बचपन क्यों आँखों में उतरा आ रहा है? कहीं तुम्हारा घर बार-बार बादलों-सा हृदयाकाश में घुमड़ने लगा है। वही घर, जिसकी खिड़की पर मैं एक दिन यूँ ही बिना किसी भावना के, अपनी उम्र के कच्चेपन को लिये तुम्हारी प्रतीक्षा करती रही थी ... पर यह बहुत बाद की बातें हैं।

उससे भी पहले अपने उन साथ-साथ सटे हुये घरों की वह कतार याद आती है जिसके विशालकार आँगन में हम लुका-छिपी खेलते थे। क्वार्टरों के बीच बने कम्युनिटी हाल के टेढ़े स्प्रिंगदार दरवाजों की ओटों में लकीरों वाले खेल खेलते थे। जो दूसरों की खिंची हुई लकीरों को ढूंढ नहीं पाता था, उसे सजा मिलती थी। कभी आँख पर पट्टी बाँधकर तो कभी उसकी पीठ पर पक्के-पक्के धौल जमा कर।

तुम भी कभी-कभी हमारे साथ खेलते थे तुम हम सबसे कुछ बड़े थे और उसे बड़े होने से ज्यादा तुम्हें अपने बड़प्पन और आठवीं क्लास का अहम था। हमारी उम्र अभी नंगे बरामदे में गीटे और स्टापू खेलने की थी। वह छोटी-सी अनजान उम्र जिसमें कभी-कभी तुम अपने पूरे रौब के साथ आकर खड़े हो जाते थे और कहते थे गोरी मेम....उठ यह खेल नहीं खेलेंगे। छुक-छुक रेलगाड़ी वाला खेल खेलते हैं और बाकी सबके मना करने पर भी मैं बंधी-सी तुम्हारे खेल में शामिल हो जाती थी। तुम सीटी बजाते और इंजिन बनकर कहते-सब डिब्बे अपनी-अपनी जगह पर जुड़ जाओ... इंजिन के साथ फर्स्ट क्लास का डिब्बा लगेगा और झट से निकर में से खींचकर पीछे से अपनी कमीज का छोर मेरे हाथों में थमा देते और चालू हो जाते छुक-छुक आज ... सोचती हूँ क्या तुम जानबूझ कर अपने डिब्बे से मुझे जोड़ लेते थे? क्या वह फर्स्ट क्लस का डिब्बा मैं थी?

मुझे गिलहरियों की तरह पेड़ पर चढ़कर कचली-कचली खुमानियाँ और आडू कुतरने का बेहद शौक था। यह नाम भी तुम्हारा ही दिया हुआ था गिलहरी। सभी पेड़ के नीचे खड़े हुये मेरी कुतरी हुई जूठी खुमानियाँ उठाते और गालियाँ देकर फेंक देते थे। वे जूठी शबरी के बेर या तुम खाते थे या मेरी... बहनें मैं लड़की थी और कहती थी तुम क्यों खाते हो मेरी जूठी खुमानी... फेंको इसे और तुम खुमानी को और भी दाँतों से भींच कर कटर-कटर कर खाने लगते थे। सभी तुम्हें गंदा-गंदा कहकर चिढ़ाते थे पर तुम चिकने घड़े से खी-खी कर हँसते रहते और खाते रहते।

कभी-कभी हमारी पूरी टोली की टोली नीचे खड्डों में उतर जाती। सभी तितर-बितर होकर कोई खेतों में तो कोई खेतों की मेड़ों पर बैठे सूखे पत्ते बटोरकर गेहूँ की बालियाँ सेंकते, तो कभी मक्की के मौसम में मक्की के भुट्टे और तुम मेरे पास, उन सबसे निर्लिप्त होकर आकर खड़े हो जाते और कहते चल हम खड्ड में से रत्तियाँ तोड़कर लाते हैं। हम दोनों रत्तियाँ तोड़ने चले जाते। उचक-उचक कर रत्तियाँ तोड़कर तुम मेरी मुट्ठियाँ भर देते। कितनी प्यारी होती थी वह रत्तियाँ... लाल-लाल और काली छोटी-छोटी बुंदकी वाली...लगता है जैसे जिन्दगी का सारा गुलाल हाथों में भर देते थे तुम। पर समझ ही कहाँ थी... इन बातों की उस उम्र में...तुम बताते इन्हें खाने से आदमी मर जाता है। इनमें जहर होता है मिनी...मैं कहती मैं जरूर उन्हें खाकर देखूगी कि मैं मरती हूँ या नहीं और तुम झटके से सारी रत्तियाँ मुझसे छीन लेते और मारते सो अलग...हम दोनों इसी झगड़े में वापिस सबके पास पहुँच जाते। दोनों की आँखे लाल होती-तुम्हारे गुस्से से और मेरी आँसुओं से...रजत ! उन लाल रत्तियों का जहर मुझे तो पीने न दिया लेकिन स्वयं अकेले आज तक पीते चले आ रहे हो...।

एक दिन कम्युनिटी हाल के एक अधरे कमरे में हम लोग ड्रामा खेल रहे थे ... तुम बने राम और मैं सीता...एकाएक तुम मुझे खींचकर अंदर ले गये और झटपट बाहों में पकड़कर अपने निकट खींच लिया और मेरे ओठों पर जोर से काट खाया और कहा-सीता की बच्ची बड़ी प्यारी लग रही है। मैं उस समय यह सब नहीं जानती थी और जोर से चिल्ला पड़ी थी...और बाद में इसे तुम्हारी शरारत समझ कर माफ भी कर दिया था। लेकिन रजत आज पूछती हूँ तुम यह सब तब भी जानते थे और सब कुछ जानबूझ कर करते थे है न!

उसके बाद हम दस वर्ष के अंतराल पर मिले। तब मेरी उम्र 18-19 बरस की हो गई थी और तुम शायद 26-27 के थे। यों यह मिलना तुमसे साक्षात न हुआ। पर हुआ तुमसे ही केवल तुमसे...तब भी अगर जान पाती तो शायद तुम्हारे अनकहे प्यार से झनझना उठती। किन्तु एक बार भी-तब भी नहीं, आज तक भी नहीं कहा कि मिनी तुम मेरी हो...एक बार कहते तो मन की साफ-स्फटिक स्लेट पर तुम्हारा नाम ही तो खुदता। वह नाम तो आज तक यों भी खुदा है...वह कब कैसे मालूम नहीं हुआ। पर तुम्हारे नाम की इबारत में कभी न पढ़ सकी रजत...जब पढ़ने की अक्ल आई तब तक उस पर जमाने की तमाम खाक पुत चुकी थी। तारकोल की तरह काली और मजबूत...।

दस साल बाद अकस्मात जब मैं तुम्हारे घर गई तो तुम वहाँ नहीं थे। मैं शाम तक तुम्हारे कमरे की खिड़की में बैठकर तुम्हारी राह देखती रही। उस नीचे से आने वाली पगड्डी पर न जाने कितने लोग चढ़े-उतरे लेकिन नहीं खिला तो वह एक लाल कनेर का फूल...आज तक मैं समझ नहीं पायी कि बगिया में इतने फूल खिलते हैं-कितने रंग अलग-थलग पर मन एक ही फूल, एक ही रंग पर उम्र भर के लिये क्यों ठिठक जाता है? उसके बाद सारे रंग फीके और उदास हो जाते हैं। उस एक रंग की तलाश में उम्र गर्क कर देता है इंसान। आज मेरी अपनी बगिया में भी क्या नहीं है लेकिन फिर भी आज यहाँ तुम्हें देखने के बाद लगता है कि कोई कोना, क्या उम्र भर रीता-रीता ही नहीं रह गया?

उस दिन तुम्हारी माँ ने सरसरे ढंग से कहा और मैंने सरसरे ढंग से सुना। संजीदगी की उम्र भी अपनी-अपनी होती है। वह कह रही थीं-रजत बहुत देर से और कई बार बीती रात गये लौटता है। आकर भी अपनी कूचियाँ और रंग लेकर बैठ जाता है। फिर कब रात ढलती है और कब सवेर उगती है कुछ पता नहीं चलता है। बावला हो गया है। मुझे लगता है अंदर ही अंदर किसी को प्यार करता है-पर कह नहीं पाता...मैं चाहती हूँ, तुम आज यहीं ठहरो और उसे समझाओ। तुम उसकी बचपन की सहेली हो, शायद तुम्हें कुछ बताये।

इसी एवज में तुम्हारी माँ ने मुझे कितने ही चित्र दिखाये। मैं तुम्हारी सारी सौन्दर्यानुभूति को उन चित्रों में अनुभूत करती रही थी। कैसे-कैसे एक-एक भावना उभरकर एक-एक लकीर से अपना अर्थ खोल रही थी। जो आज स्पष्ट हो रहे हैं। उस समय तो मैं केवल एक दर्शक होकर, उन रंगों की अभिरामता में खोई हुई, उनकी प्रशंसा करती रही थी। तुम्हारे एक चित्र में मेघदूत की परिकल्पना अद्भुत थी। प्यासा बेहाल बादलों के समक्ष गिड़गिड़ाता हुआ युग चित्रित किया गया था। आज लगता है वह तुम्हीं थे। क्यों तुम्हारा कोई संदेश इस सबसे पहले मुझ तक नहीं पहुँचा? मेरी कच्ची उम्र इतनी तो कच्ची न थी कि तुम कहते तो मैं न समझती। उस उम्र में भी मैंने लड़के-लड़कियाँ घर से भागते देखे हैं तो क्या मैं तुम्हारा प्यार न समझती...?

तुम्हारी माँ ने भी क्यों अदृश्य रूप में ही अंदेशे दिये थे? स्पष्ट क्यों नहीं कहा? शायद तुमने ही कभी उनसे स्पष्ट होकर किसी एक नाम पर उंगुली नहीं रखी तो बेचारी वह भी क्या करतीं?

तुम्हारी माँ ने कहा जो मैं आज समझ रही हूँ... उस दिन समझा होता तो आज जो तुम्हारे शून्य में लटकी बावरी दृष्टि मुझे बेंध रही है न बेंधती। रजत एक लड़की को प्यार करता है। उसकी शक्ल हूबहू तुमसे मिलती है। बिल्कुल तुम्हारी बहिन जैसी लगती है... तुम कहो तो मैं वे सारे चित्र तुम्हें दिखलाऊँ। लेकिन रजत! न तो उसका नाम बतलाता है, न ही वह चित्र किसी को दिखाता है। किसी एक्जीबीशन्स में भी वह उन चित्रों को नहीं ले जाता। जबकि गैलरी वालों की एकाध बार नजर उन चित्रों पर पड़ी और उन्होंने आग्रह भी किया। किन्तु उसने साफ इंकार कर दिया। मैं वह चित्र देखना चाहती थी, किन्तु तुम्हारी माँ ही कहकर भूल गई थीऔर मैं भी संकोच के मारे आग्रह नहीं कर पाई पर मन में दो और दो-चार वाली बात फिर भी नहीं आई। सिर्फ तुम्हारी माँ को इतना ही कहा कि रजत! बहुत बड़ा हो गया है...।

तुम्हारी माँ ने मेरे चिबुक को छूकर कहा था--गोरी मेम तुम भी तो बहुत बड़ी हो गई हो... उनके मुँह से सुनकर अटपटा लगा। गोरी मेम शब्द से मुझे तुम्हारा चिढ़ाना याद आता है... तुम कहते थे-अंग्रेज चले गये और अपनी गोरी मेम यहीं छोड़ कर गये। अरे! तुम अंकल-आंटी की बेटी थोड़े ही हो वह तो अंग्रेज जा रहे थे और जाते-जाते किसी गठरी की तरह तुम रेल की पटरी पर गिर गई और अंकल तुम्हें उठकार घर ले आये। यह कहकर तुम तालियाँ बजाते और सबके साथ हँसते और चिढ़ाते। इस बात पर हमारी कट्टी भी हो जाती थी। क्योंकि तुम्हारे कारण बाकी भी उसी नाम से बुलाने लगते थे। रजत! तुमने एक बार भी कहा होता गोरी मेम मैं तुम्हें अपनी मेम बनाऊँगा तो शायद यौवन की देहरी पर पाँव रखते मैं पीछे मुड़कर देख लेती...।

खिड़की में बैठे-बैठे शाम हो गई थी। मैं लौट आई थी तुमसे बिना मिले...पर एक बार उस दिन तुम से मिले बिना भी शायद मिल आई थी। उस दिन शायद कोई दस्तक टकराई थी किन्तु द्वार खोलने वाला ही न था कहीं...।

फिर एक दिन पता चला रजत अपनी सुध-बुध खो बैठा है। वह पागलखाने में है। उस दिन मेरा मन रोया था डूब-डूब कर...उस दिन पहली बार लगा कहीं अंदर एक हरसिंगार का पौधा था जो आज मुरझा गया है। उस दिन सचमुच कुछ अनहुआ हुआ था...जिसे शब्द देने से पहले खत्म होना पड़ा था।

तुम्हारे मन में कहीं गोरी मेम ही थी, यह बात भी बहुत बाद में तुम्हारी माँ ने मेरी माँ से कही थी। तब तक हरसिंगार झर चुका था। मैं घर, देहरी, उम्र लांघ कर किसी और की हो चुकी थी।

काश! तुम एक बार कह देते रजत ! हो सकता है बात मान ही ली जाती। अगर न भी मानी जाती तो आज यह हौंस तो रहती कि हमने एक-दूसरे को आवाज तो दी थी...वह आवाज ही यहाँ तक नहीं पहुंची।

अब तो आज जहाँ खड़ी हूँ तुम्हारा हाल तक नहीं पूछ सकती। इतना लंबा समय का अंतराल, तुम्हारी आँखों का शून्य, अपरिचय का बीहड़, रेगिस्तान, ये सब कैसे लाँघू! और फिर यदि तुम, तुम न हुये तो रजत !

क्या ऐसा नहीं लगता तुम्हें कि तुम आज भी अगर एक बार अपनी गोरी मेम के लिये बांहें फैला दो तो गोरी मेम पिछले सारे फैलाव स्वयं समेट लेगी और चली आयेगी तुम्हारे पास पर ऐसा कभी नहीं कर सके तुम रजत! आज ही क्या कर पाओगे?

एक बार बीच में पता चला कि तुम ठीक हो गये हो...पर विवाह के लिये नहीं मानते हो। तुम्हारे छोटे बहिन-भाइयों की शादियाँ भी हो गई थीं।

सुना है एक बार विक्षिप्त हुआ व्यक्ति कभी अपनी धुरी पर वापिस नहीं लौटता। आज तुम्हारी निर्लिप्त दृष्टि का शून्य भी इस बात की गवाही दे रहा है कि तुम वही रजत हो-पर शायद पूरे रजत नहीं हो...मैंने पीछे मुड़कर कई बार देखा है लेकिन तुम उसी तरह तटस्थ बैठे हो। किसी के लिये कहीं भी कोई भाव या पहचान तुम्हारे चेहरे पर नहीं है।

बस खड़ी है। सोलन के स्टेशन पर। सड़क के किनारे बाजार से कुछ कदम दूर...मेरी खिड़की पर इतने बरसों बाद न जाने कहाँ से एक रत्ती का पेड़ झुक आया है? जी चाहता है तुम्हारी आँखों में देखू और रत्तियाँ मुट्टी में भरकर तुम्हारे हाथों में रख दूँ। तब भी क्या तुम्हारी पहचान नहीं लौटेगी?

अब तुम नीचे उतर कर चाय पी रहे हो। मैं काँच की खिड़की से तुम्हारी पारदर्शी छवि आँखों में भर रही हूँ। बिल्कुल वही हो। रत्ती भर भी अंतर नहीं आया।

रत्ती का पेड़ बैलोस बड़ा हो गया है। तुम्हारी अर्द्धविक्षिप्त-सी दृष्टि मुझे बेंध रही है और शायद कह रही है-गोरी मेम अब क्या चाहती हो? अब मैं क्या करूँ तुम्हें पहचान कर? क्या करूँ? अब इन आँखों में फूल न खिलाओ। अब इनमें सौन्दर्य की पहचान न जगाओ मैं सब कुछ भूल चुका हूँ और भूला ही रहना चाहता हूँ।

मैं तुम्हारी नजर की क्या कहूँ रजत ! मेरी आँखों के कोर गीले हैं। बस चाहती हूँ एक बार पूँछ लूँ और तुम्हारे मुहँ से सुन लूँ कि तुम-तुम्हीं रजत हो-वही मेरे अपने रजत ! क्योंकि अबके बिछड़े फिर न जाने कब किस मोड़ पर मिलें और मिलें भी कि न...।