ALL संपादकीय पुस्तक कहानी कविताएँ ग़ज़लें लघुकथा लेख पत्रांश साहित्य नंदनी बिरासत
अभिनव इमरोज आवरण पृष्ठ 2
June 30, 2020 • देवेंद्र कुमार बहल • संपादकीय

मैं ऐसा मानती हूँ कि समस्याओं के मूल में ही समाधान होते हैं जिनको खोजना भी काफी हद तक हमारे ही हाथ में होता है। जैसे बाल यौन हिंसा हो या बाल उत्पीड़न से जुड़ी कोई भी समस्या, बहुत बार की काउंसिलिंग, समस्या को सुलझाने में कारगर होती है। पर यह भी सत्य है कि शिकार हुआ बच्चा या किशोर इस पीडा के दंश को ताउम्र भोगता है। यह बहुत ही कष्टदायी स्थिति है। बार-बार वाकये को दोहराने से पीड़ित की पीड़ा बढ़ती है अतः इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

 यहाँ एक बात उल्लेखनीय है कि जो पीड़क है वो भी मानसिक रूप से कुंठित है, मानी उसको भी सजा के अलावा गहन काउंसिलिंग की जरूरत है क्योंकि वो मानसिक रोगी है। उसको भी इलाज की जरूरत है। पर चूंकि हमारी जेलों में सजा तो दी जा सकती है पर सघन रूप से समझाइश की व्यवस्था उच्च स्तर की नहीं है।

पीड़ित के दर्द को प्रेम और स्नेह से उबारा जा सकता है, इसके लिए कोशिश करनी होगी। दूसरी तरफ साठ-सत्तर प्रतिशत केसेज में पीड़क को भी समझाइश की जरूरत होती है। पर चूंकि हम अपराधी को इस दृष्टि से नहीं देखते, तो उसके लिए सिर्फ सजा के प्रावधान को ही सोच पाते हैं।

दरअसल जब हम समस्या के मूल में जाएँगे तो पाएँगे कि पीड़क मानसिक रोगी है, उसको भी सख्त इलाज की जरूरत है। मेरी नजर में पीड़क और पीड़ित दोनों के लिए ही सोचना होगा। साथ ही समाज की उन मूलभूत परिवार जैसी इकाइयों को सुदृढ़ बनाना होगा जहाँ बच्चों को मूल्यों और संस्कारों की घुट्टी पैदा होते ही पिलाई जाती थी, ताकि मानसिक उच्छृलतायें व्यक्तित्व को विचलन न दें। 

कई बार बच्चों के अलावा जनकों की भी काउंसिलिंग की जरूरत होती है क्योंकि बच्चों का किसी भी स्तर पर चोटिल होकर किसी के बहकाने पर गलत संगत में पड़ जाना या उनका स्वयं कुंठित हो जाना अन्य समस्याओं को जन्म देता है।

 

कभी
अनजान पीड़ाओं का
कुछ यूँ
स्पर्श कर जाना.....
ठहर जाएं...
आप भी उनके साथ गिनती के
निमित्त पलों के लिए
और पीड़ाओं का
स्वतः ही
पन्नों पर उतर
प्रथम पृष्ठ से
अंतिम पृष्ठ तक
आपको भी 
पाठक बना लेना
सब पहले से
तय ही तो है.....