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अधूरा ज्ञान
October 29, 2020 • गागर में सागर, स्व. सतेन्द्र शरत् • कहानी

एक गाँव में मंदबुद्धि नाम का लड़का रहता था। मंदबुद्धि उसका असली नाम नहीं था। वह पढ़ने-लिखने में बिलकुल ध्यान नहीं देता था, इसीलिए उसका नाम धीरे-धीरे मंदबुद्धि ही पड़ गया। मंदबुद्धि ने भी बाद में अपने नाम के अनुरूप होने में ही अपनी भलाई देखी। सो पढ़ाई-लिखाई को नमस्कार कर, उसने खेल-कूद में अपना ध्यान लगाया। उसके साथी और मित्र परीक्षाएँ पास कर, ऊँची-ऊँची कक्षाओं में जाते रहे और मंदबुद्धि उसी तरह दिन-प्रतिदिन अंधकार और अज्ञान के गड्ढे में नीचे-ही-नीचे धंसता रहा। अपनी पढ़ाई समाप्त कर, उसके मित्र अपने-अपने काम-धंधों को सँभालने लगे। मंदबुद्धि तब तक गाँव का सबसे ज्यादा निकम्मा, ऊधमी, बेकार और आलसी युवक बन चुका था।

जब तक मंदबुद्धि के माता-पिता जीवित रहे, उसे खाने-पहनने के लिए किसी प्रकार की चिन्ता नहीं करनी पड़ी, किन्तु उन दोनों की मृत्यु के कुछ दिन बाद वह दाने-दाने के लिए भटकने लगा। लोग उसे देख, मुँह मोड़ लेते। मित्र लोग उससे कतराते। उसकी सहायता कौन करता ? भूख से पीड़ित होकर -मंदबुद्धि की समझ में आया कि उसने पढ़ाई-लिखाई की ओर ध्यान न देकर कितनी बड़ी गलती की है। किन्तु अब तो चिड़िया खेत चुग चुकी थीं। अब पछताने के सिवा और क्या हो सकता था ?

तंग आकर मंदबुद्धि पड़ोस के एक दूसरे गाँव में चला गया। वहाँ एक वैद्यजी रहते थे, जो उसके पिता के मित्र थे। वैद्यजी ने मंदबुद्धि की दशा पर तरस खाकर उसे अपने साथ रख लिया और वायदा किया कि यदि वह ध्यान देगा और मेहनत करेगा, तो वे उसे वैद्यक सिखा देंगे। मंदबुद्धि प्रसन्नता से फूल उठा और छाया की तरह वैद्यजी के साथ रहने लगा और देखने लगा कि वैद्यजी किस तरह लोगों का इलाज करते हैं।

एक बार वैद्यजी पेट-दर्द के एक रोगी को देखने गये। रोगी के कमरे में पहुँचकर उन्होंने इधर-उधर देखा, रोगी से कहा-“तुमने बदपरहेजी की है। मैंने कहा था, जब तक तुम्हारा बुखार न उतर जाये तुम मूंग की दाल के सिवाय और कुछ न लेना, लेकिन तुमने कच्चे चने और मटर खाई है ?"

रोगी का पीला मुंह और भी पीला हो गया। उसने डरते हुए कहा, "वैद्यजी, मुझसे यह गलती तो हो गई है। आप मुझे इसके लिए माफ कर दें और कोई दवाई भी दे दें।"

दवाई देकर जब वैद्यजी घर लौट रहे थे, तो मंदबुद्धि ने वैद्यजी से सवाल किया, "वैद्यजी आपको कैसे पता चला कि बीमार ने कच्चे चने और मटर की फलियाँ खाई हैं ?"

वैद्यजी ने मुस्कराकर कहा, "बड़ी सीधी-सी बात है तुमने देखा नहीं, उसकी चारपाई के नीचे चने और मटर के छिलके पड़े हुए थे। बस, मैं समझ गया कि इसके पेट में इसी कारण दर्द हुआ है।"

वैद्यजी की और बातें तो मंदबुद्धि की समझ में नहीं आती थी, लेकिन यह बात उसकी समझ में आ गई।

कुछ दिन बाद एक कुम्हार के बुलाने पर वैद्यजी मंदबुद्धि के साथ कुम्हार के यहाँ गये  कुम्हार के गधे का गला सूज गया था और दर्द के कारण गधा बुरी तरह छटपटा रहा था। वैद्यजी ने गधे के गले को ध्यान से देखकर कुम्हार से पूछा, “इसकी यह हालत कब से है?" कुम्हार ने जवाब दिया, "कल रात से। ये गन्ने के खेत में चर रहा था। मैं इसे वहाँ से लाया था। तभी से इसके गले में तकलीफ है।"

वैद्यजी ने कुछ सोचते हुए कहा, “मेरे खयाल से गन्ने का कोई बड़ा टुकड़ा इसके गले में फंस गया है। ऐसा करो, तीन-चार आदमी इसे पकड़कर जमीन पर लेटा दो और तब एक आदमी जोर से इसके गले पर मुंगरी मारो। ऐसा करने से गन्ने का फँसा हुआ टुकड़ा निकल जायेगा।"

लोगों ने वैसा ही किया। गन्ने का टुकड़ा सीधा हो गया और गधे के मुंह से बाहर निकल आया। वैद्यजी ने तब एक लेप गधे के गले पर लगाने को कहा और घर वापस आ गये।

गधे के ठीक होने पर मंदबुद्धि ने वैद्यजी से पूछा, “आपको ये कैसे पता चला कि गधे ने गन्ना खाया था और उसका टुकड़ा उसके गले में फंस गया था?"

वैद्यजी ने मुस्कराकर कहा, "बड़ी सीधी-सी बात है, भाई। गधा गन्ने के खेत में चर रहा था और उसके बाद उसके गले में सूजन हो गई। गले में गन्ना फँस जाने के अलावा और क्या कारण हो सकता था?" मंदबुद्धि की समझ में वैद्यजी की यह बात भी आ गई। कुछ दिनों बाद मंदबुद्धि सोचने लगा कि काफी कुछ वैद्यक तो वह अब जान ही गया है। उसने यह भी देख लिया कि वैद्यजी रोगियों का इलाज कैसे करते हैं। अब उसे अपने गाँव लौटकर खुद ही वैद्यक करनी चाहिये।

एक दिन उसने वैद्यजी से कहा, "अच्छा, वैद्यजी, अब मैं अपने गाँवों लौटना चाहता हूँ। बात ये है कि वैद्यक तो मैं सीख ही गया हूँ। अब मैं लोगों का इलाज करना चाहता हूँ।"

वैद्यजी ने मुस्कराकर कहा, "मंदबुद्धि, अभी तो तुम्हें बहुत कुछ सीखना है। अभी तो तुमने कुछ भी नहीं सीखा। तुम अभी बीमार का इलाज नहीं कर सकते।"

मंदबुद्धि बोला, "आप मुझे इतना मूर्ख न समझिये, वैद्यजी। आपके साथ रहकर मुझे काफी अनुभव हो गया है। बाकी अनुभव तो लोगों का इलाज करने पर मुझे हो ही जायेगा।"

वैद्यजी ने उसे बहुत समझाया, मगर मंदबुद्धि अपनी ज़िद पर अड़ा ही रहा। हारकर वैद्यजी ने उससे कहा, "अच्छा, मंदबुद्धि, तुम अगर जाना ही चाहते हो, तो जाओ। मगर तुम्हें लोगों का इलाज करने का पूरा ज्ञान अभी तक नहीं हुआ है। ये ध्यान रखना कि अधूरा ज्ञान उलटा तुम्हें ही हानि न पहुँचाए। अधूरा ज्ञान बहुत खतरनाक होता है।"

वैद्यजी की बात अनसुनी कर, मंदबुद्धि अपने गाँव लौट आया और वहाँ उसने यह बात चारों ओर फैला दी कि मैं वैद्यक सीख आया हूँ और अब गाँव में ही रहकर लोगों का इलाज करूँगा।

दो-तीन दिन बाद ही मंदबुद्धि को अपनी योग्यता दिखाने का अवसर मिल गया। एक आदमी उसके पास आया और बोला, "वैद्यजी, मेरी माँ के गले में शायद फोड़ा निकल आया है। उसका गला सूज गया है और उसे बहुत दर्द हो रहा है। क्या आप चलकर उसे देखेंगे ?"

मंदबुद्धि बहुत ही प्रसन्नता के साथ रोगी को देखने के लिए तैयार हो गया। उस आदमी ने उसे वैद्यजी कहा था न, इसलिए उसे बहुत ही खुशी हो रही थी।

बीमार के पास पहुँच मंदबुद्धि ने वैद्यजी की तरह कमरे में चारों ओर देखा। बुढ़िया की चारपाई के पास उसे घोड़े की काठी या जीन पड़ी दिखाई दी। फौरन ही मंदबुद्धि जोर से बोल उठा, "हूँ: 'मैं समझ गया, इस बुढ़िया ने जरूर कोई घोड़ा खाया है।"

मंदबुद्धि की बात सुन, पास खड़े लोग आश्चर्य से मंदबुद्धि को देखने लगे। बुढ़िया के लड़के ने कहा, "वैद्यजी, आप यह क्या कह रहे हैं ? एक हफ्ते से तो मेरी माँ ने एक चूंट दूध तक गले से नीचे नहीं उतारा है और आप कह रहे हैं कि इसने घोड़ा खाया है और फिर हमारा घोड़ा भी खेत में चर रहा है।"

मंदबुद्धि ने अकड़कर कहा, “वैद्य तुम हो या मैं ? मैं जो कुछ कह रहा हूँ, ठीक कह रहा हूँ। तुम्हें मेरी बात माननी ही चाहिये।"

बुढ़िया दर्द से कराह रही थी। उसके गले को ध्यान से देख, मंदबुद्धि बोला, "जरूर कोई चीज अन्दर फंस गई है। चिन्ता की कोई बात नहीं है। मैं मिनटों में इसे ठीक किये देता हूँ। आप लोग कोई डण्डा या सोटा मुझे दीजिये और कमरे के बाहर चले जाइये।"

मंदबुद्धि की अकड़ और उसका रोब देख, लोग सहम गये थे। चुपचाप उसे एक छोटा-सा डण्डा दे, वे सब कमरे के बाहर चले गये।

मंदबुद्धि ने डण्डे को तानकर बुढ़िया के गले पर दे मारा। बुढ़िया बहुत जोर से चिल्लाई और आखिरी साँसें गिनने लगीं। उसके मुंह से खून निकलने लगा।

बुढ़िया की चीख सुन, सब लोग अन्दर आ गये। बुढ़िया को मरते देख वे लोग समझ गये कि मूर्ख मंदबुद्धि ने ही उसके गले पर डण्डा मारकर उसके प्राण लिये हैं। उन्होंने मंदबुद्धि से डण्डा छीना और उससे पूछा, “तू वैद्य है या राक्षस ? 'तूने इस बुढ़िया को क्यों मारा ? जब तुझे लोगों का इलाज करना नहीं आता, तो तू इलाज करने के लिये तैयार क्यों हो गया ?"...

मंदबुद्धि के पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं था। वह डर के मारे थरथर काँपने लगा।

फिर क्या था ? लोगों ने उसी डण्डे से मंदबुद्धि की खूब पिटाई-धुनाई की और उसे मारते-मारते गाँव के बाहर कर दिया।

और तब मंदबुद्धि को वैद्यजी की सीख याद आई-अधूरा ज्ञान बहुत खतरनाक होता है।