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अगले जनम मोहे बिटिया नहीं पुरुष कीजो
October 14, 2020 • मेधावी जैन • बिरासत

मेधावी जैन, गुरुग्राम

 

ओ जीव, स्वागत है

तुम यहाँ स्त्रीत्व कर्मों से भरी पोटली साथ बांध कर लाए हो 

जो ग्यारह बारह वर्ष की कच्ची उम्र से ही 

खुलनी शुरू हो जाएगी 

जब इस नन्ही, बचकानी उम्र में ही 

तुम चाहे तन-मन से न हो 

किंतु तुम्हारी योनि माँ बनने योग्य हो जाएगी 

जब वह माह के पाँच दिन स्वतः ही 

रक्त स्त्रवित करने लग जाएगी 

तुमसे यह सब नहीं संभलेगा 

तुम रोओगी, खीझोगी 

माँ से, ख़ुद से, पूछोगी कि मेरे साथ ही क्यूँ? 

किंतु तुम्हारे धैर्य की परीक्षा यहीं से आरंभ हो जाएगी 

अभी तुम स्वयं को संभालने की चेष्टा कर ही रही 

होंगी 

कि पाओगी कि छाती के उभार भी प्रत्यक्ष नज़र आने लगे हैं 

तुम्हें चाहे चिढ़ा जाएं 

किंतु वे ज़माने की निगाहों में छाने लगे हैं 

तुम्हारी देह कुछ नियत स्थानों पर वक्र होने लगेगी 

चर्बी, देह के कुछ स्थान विशेषों पर जमने लगेगी 

तुम्हें भी यही, सौंदर्य की परिभाषा लगने लगेगी 

यह तुम्हारी यौन सक्रियता के लगभग 

चार दशकों की शुरुआत होगी 

और इस दौरान जब तुम इस विचित्रता में 

रच बस जाओगी 

इसे अपनी नियति मान अपने सौंदर्य पर इठलाओगी 

तब, हाँ तब... वह समय आएगा 

जब तुम्हारा यह रजस्वला होने का दंभ

तुमसे छीन लिया जाएगा 

प्राकृतिक होगा, इसलिए पुनः तुम कुछ न कर पाओगी 

इसे भी अपनी नियति मान धैर्य का उदाहरण दे 

जाओगी 

इस दौरान जो जो तुम्हारे साथ घटित होगा 

तुम्हारे घुटने हिलेंगे, शरीर का पोर पोर दुखेगा 

शुक्र मनाना कि तुम्हारा गर्भाशय न निकाला जाए 

और निकालना भी पड़े तो भी तुम क्या ही कर पाओगी 

शायद एक समय ऐसा आएगा 

जब तुम स्वयं को स्वयं से कहती पाओगी 

हे दाता, इतनी अरज सुन लीजो

अगले जनम मोहे बिटिया नहीं 

पुरुष कीजो...