ALL संपादकीय पुस्तक कहानी कविताएँ ग़ज़लें लघुकथा लेख पत्रांश साहित्य नंदनी बिरासत
अमरीका हड्डियों में जम जाता है
October 6, 2020 • अंजना संधीर • कविताएँ

अंजना संधीर, अहमादाबाद, मो. 09099024995

 

वे ऊँचे-ऊँचे खूबसूरत हाईवे

जिन पर चलती हैं कारें

तेज रफ्तार से, कतारबद्ध, चलती कार में चाय पीते-पीते

टेलिफोन करते, टू डोर कारों में, रोमांस करते-करते

अमरीका धीरे-धीरे सांसों में उतरने लगता है।

 

मुंगफली और पिस्ते का एक भाव

पेट्रोल और शराब पानी के भाव

इतना सस्ता लगता है सब्जियों से ज्यादा माँस खाना

कि ईमान डोलने लगता है

महंगी घास खाने से

अच्छा है

सस्ता मांस खाना

और धीरे-धीरे अमरीका स्वाद में बसने लगता है।

 

गर्म पानी के शावर

टेलिविजन की चेनलें, सेक्स के मुक्त दृश्य

किशोरावस्था से वीकेंड में गायब रहने की स्वतंत्रता

डिस्को की मस्ती, अपनी मनमानी का जीवन

कहीं भी, कभी भी, किसी के भी साथ

उठने, बैठने की आजादी...

धीरे-धीरे हड्डियों में उतरने लगता है अमरीका।

 

अमरीका जब सांसों में बसने लगा

तो अच्छा लगा क्योंकि सांसों को पंखों की उड़ान का अंदाज हुआ।

जब स्वाद में बसने लगा अमरीका

तो सोचा खाओ इतना सस्ता कहां मिलेगा?

लेकिन हड्डियों में बसने लगा अमरीका तो परेशान हूँ

बच्चे हाथ से निकल गये...वतन छूट गया

संस्कृति का मिश्रण हो गया

जवानी बुढ़ा गई, सुविधाएँ हड्डियों में समा गई

अमरीका सुविधाएँ देकर हड्डियों में समा जाता है

व्यक्ति वतन को भूल जाता है

और सोचता रहता है

मैं अपने वतन जाना चाहता हूँ

मगर इन सुखों की गुलामी मेरी हड्डियों में बस गई है

इसलिये कहता हूँ

तुम नए हो

अमरीका जब सांसों में बसने लगे

तुम उड़ने लगो... तो सात समुदंर पार

अपनों के चेहरे याद रखना।

जब स्वाद में बसने लगे अमरीका

तो अपने घर के खाने और माँ की रसोई याद करना

सुविधाओं में असुविधाएँ याद रखना

यहीं से जाग जाना...

संस्कृति की मशाल जगाए रखना

अमरीका को हड्डियों में मत बसने देना

अमरीका सुविधाएँ देकर हड्डियों में जम जाता है।