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अमृता प्रीतम एक याद
March 1, 2020 • मुक्ति वर्मा

शख़्सियत

अमृता प्रीतम एक याद

ऋग्वेद में कहा है रू- अदीब और आलम, अपने ही बल से जीते हैं और हर काल के अँधेरे में कुछ दीये जलाते हैं।

पंजाब की बेटी अमृता प्रीतम भारत की ऐसी ही महान् लेखिका थी, जो माँ सरस्वती के मन्दिर में अपनी ऐसी पुख्ता ईंट लगा गई है जिसकी मननशीलता, पारदर्शिता के आगे आज भी हम नत मस्तक हैं। हर विषय पर आध्यात्मिक हो या राजनैतिक, प्रेम-प्यार का हो या बैर-विरोध का, आकाश, अग्नि, पृथ्वी, जल, वायु उनकी कहानियाँ-कविताएं इन सब विषयों से पूर्ण तथा ओत-प्रोत रही हैं।

भारत की आजादी से पहले हम पंजाबी साहित्य से इतना परिचित नहीं थे, लेकिन अचानक पंजाबी कविताओं के बोल अमृता की कलम से ऐसे निकले जैसे झरने पर्वतों की टेढ़ी-मेढ़ी शिलाओं को पार कर साफ शफ़्फ़ाफ़ जल धारा में पूरी घाटी पर छा गये हों। उनकी भाव भंगिमाएं व उनका बांकापन केवल पढ़कर या सुनकर ही समझा जा सकता है।

उनकी प्रत्येक कहानी, प्रत्येक कविता और प्रत्येक उपन्यास दिल को चीर देने वाली दर्द भरी दास्तां है, जिसे पढ़कर एक आम आदमी उसे अपना समझने में हिचकिचाता नहीं। अपनी बोली में लिखे कविता के बोल उसके दिल से ऐसे निकले हुए हैं जैसे हम जीने के लिए साँस लेते हैं। यह शब्द सचमुच उसके श्वास ही थे, तभी तो वो कहती हैः-

आज मैंने अपने घर का नम्बर मिटाया है / और गली के माथे पर लगा, गली का नाम हटाया है। / और हर सड़क की दिशा का नाम, पोंछ दिया है। / पर आपको मुझे जरूर पाना है / तो हर देश के, हर शहर की, हर गली का द्वार खटखटाओ।

यह एक शाप है, एकं वर है / और जहाँ भी आजाद रूह की झलक पडे / समझना वह मेरा घर है।

इस पुरूष प्रधान समाज में संघर्ष और द्धन्द स गुजरती अमृता ने अपनी सामाजिक यातनाओं की कहानी बड़े खुले अंदाज में ‘रसीदी टिकट’ में कही है।

अमृता का कहना है -

‘‘मैं अमृता अदन बाग के छाया वाले पेड़ छोड़ कर उस राह पर चल दी जहाँ झाडी में सॉपों की तरह रेंगती हुई लोगों की जुबाने थीं। कटु जबानें नहीं जानती कि मुहब्बत में भीगी जबान कैसी अतरस बनती है। यही अन्तरस वर्जित को अवर्जित बनाता है और दुनियावी कानून को खुदाई कानून बनाता है। अदन बाग के वर्जित फल को खाने वाली कशश ‘आदम’ और ‘हव्वा’ को विरासत में मिली है, जिनके सपनों ने कशश को जगाया और बजता हुआ ‘इकतारा’ सुन लिया और धड़कता पल जी लिया या खुदा।’’

‘‘उनकी इलाही रमज को वासना मय ऑखों से बचाए’’

यह हकीकत है कि मुहब्बत का द्वार जब दिखाई देता है तो उसे हम किसी एक नाम से बाबस्ता कर देते हैं। पर उस नाम में कितने नाम मिले हुए होते हैं कोई नहीं जानता, शायद कुदरत भी भूल चुकी होती है कि जिन धागों से उस एक नाम को बुनती है, वे धागे कितने रंगों के होते हैं, कितने जन्मों के होते हैं। मेरे पास अब एक ही नाम है जो अंर्तध्वनि जैसा है। मैं और मेरा खुदा ही जानता है और उनकी कलम बोलती है -

तुम मिले, तो / कितने ही जन्म / नब्ज बनकर / मेरे बदन में धड़कने लगे। / अब, कौन वैद्य, मेरी नब्ज देखेगा।

वो पूछती है -

क्या इस ‘तुम’ को कोई अलग नाम दिया जा सकता है? जिन धागों से ऐ खुदा तुमने इस नाम को बुन दिया, उन

धागों में तो तुम भी शामिल हो तो किसका नाम बाकी रह गया।

अमृता बताती थीं कि दुनिया कितनी अजीब है। बोली -

कुछ नजदीकी चाहने वालों ने मुझे कहा भी कि ‘‘जैसा तेरा जी चाहता था वैसे ही जीती, लेकिन ऊपर से समाज बना रहने देती - भ्रम पाले रहती।’’

लेकिन ‘‘मैं अमृता कैसे कहती कि मैंने दुनिया राजी नहीं करनी थी’’-

मैंने तो अपने मन के खुदा को राजी करना था, क्योंकि मैं समझती हूँ ‘‘वफा’’ तो अंर्तमन के खिल जाने की महक का नाम होता है। लेकिन दुनिया वालों ने इसे इतने छोटे अर्थ वाला बना दिया कि यह सिर्फ फतबों के लिए रह गया। यह सुनकर एक टीस सी उठी। बोलना तो क्या था ? सोचती रह गई।

अमृता का विरह एक आलौकिक सत्य था जैसे उनके ही शब्दों में -

‘‘तेरा मिलन ऐसा होता है / जैसे कोई हथेली पर / एक वक्त की रोजी रख दे / लगा कितनी कशश है बात में।।

अमृता का प्रेम आत्म मिलन की एकमात्र वेदना है। वह

साधना अवस्था में कहती है -

योग की इक राह भी तू। / इश्क की दरगाह भी तू।।

सचमुच अमृता की सोच वारिसशाह, बुल्लेशाह, सुल्तान वाहू, राधा और मीरा का अक्स था जो इलाही भावनाओं से पूर्णतयाः अभिभूत है। उनकी कल्पना आलौकिक सीमाओं को लॉघ, उस अन्र्तरस तक पहुंच चुकी थी जहाँ साधारण व्यक्ति के लिए पहुंचना संभव नहीं है, तभी तो माता तृप्ता व गुरू नानक देव को लेकर ‘‘नौ सपने’’ कविता और उसमें एक-एक महीने की प्रस्तुति शायरा के मन रूपी सागर में छलकी होगी, तभी तो अमृता ने इन मोतियों को बटोरा और कलम के फावड़े से समुद्र मंथन कर डाला - यह महानता की अछूती मिसाल ही तो है।

अमृता की शायरी में एक गूंज, दर्द शरीर को स्पन्दित करने वाले तन्तु हैं, जो पाठक के अर्न्तमन तक गूंजते हैं। यह अमृता की शायरी ही तो थी, जिसने सआदत हसन मण्टो जैसे अदीब को भी रूला दिया।

एक जगह अमृता शिकायत भी करती है उस ऊपर वाले से -

यह तुमने क्या किया मेरे साथ ? मेरे अल्ला आखिर यह तेरा कौन सा फलसफा था मेरे साथ ? जाने कितने बरस मेरी जिन्दगी के हलाक होते रहे और अब जब कह सकती हूँ -

‘‘कर बिस्मिल्लाह खोल दी सत्तर गाँठे। तब भी मेरे सुकून को हलाक करने कितनी स्याह ताकतें उठ खड़ी हुई और यह हकीकत है। मैंने जैसा मेरा तसव्वुर था, उसमें फर्क नहीं आने दिया और तंग आकर उस से बोली -

‘मेरे खुदा, / इक दिन तेरे पेड़ पर आकर, / इक मन्नत मांगी थी। / और अपने चोगें से एक कन्नी फाड़कर, / तेरे पेड़ की टहनी पर बाँधी थी। / मैंने अपने खून का इक-इक कतरा / इक-इक अक्षर में बदल दिया। / और वही मेरा इक-इक अक्षर / दुनिया की सूली पर टॉग दिया गया।

मेरे खुदा / अब इस पेड़ से बाँधी गाँठ को / खोलने के लिए आ जाओ / और मेरी आत्मा का आखिरी अक्षर / अपने दामन में ले लो

अमृता कहती है ‘‘कलम’’ अगर साधना और चिन्तन की

ध्वनि बन जाए उसमें से खुदा का दीदार होता है।

वह सचमुच एक सन्यासिन थी। कविता उसकी साधना थी। चिन्तन ही उसका संसार था। लेकिन मैं सोचने पर मजबूर हूँ कि क्या अन्तर रह जाता है मीरा, राधा और अमृता में। 1853 से 2006 तक का इतिहास देखें तो क्या हम वहीं नहीं खडे ?

अब अमृता कहाँ होगी ? कब पैदा होगी ? कहाँ पैदा होगी? होगी भी या नहीं - वही जानती है। मैं सचमुच कुछ नहीं जानती। मैं तो केवल इतना जानती हूँ कि कभी-कभी कोई फनकार, अदीब अपने ही ख्यालों, ख्वाबों, लफजों, रंगों से धरती को खुद सहलाता है, सँजोता है और अपने अश्कों से सींचता है। उन्हीं अश्कों को लेकर हमारी पंजाबी की महान शायरा ने अपनी अदबी सुगन्ध से कहानियों, शायरी व उपन्यासों द्वारा पूरे विश्व को विभोर कर दिया और विश्व की नजरों में पंजाबी की सिरमौर बनी।।

लेकिन अफसोस कि पंजाब ने उसकी दाद नहीं दी, अमृता दर्द भरे शब्दों में कहती है - ‘‘हसरत एक ही थी कि कभी सहज जीना नसीब हो जाये, लेकिन कोई राह कहीं दिखाई नहीं देती थी।’’ अमृता मानती भी है कि कोई भी कायनाती रहस्य कुदरत ऐसे ही किन्हीं नादान के हाथों में नहीं पकड़ा देती। हर मजहब व हर समाज की एक साजिश हुई जो हजारों नियम बनाती है और जवान होते इंसान की सूखती-सिसकती आत्मा को पानी का छींटा दे देती है। मैं समझती हूँ - ‘‘दुनिया के लिए दौड़ना और दुनिया से दौडना, दोनों पहलू काम नहीं आते।’’

अपने राजनैतिक दौर से भी वो सन्तुष्ट नहीं थी। उनका कहना है कि ‘‘जड़ को समझो नहीं तो नये पत्ते नहीं आयेंगे और आने वाले नये पत्तों का स्वागत करो।’’

मैं समझती हूँ यह पंजाब की बेटी सरस्वती का वरदान थी. लेकिन अब तगदिली का शिकार यह पंजाब इसे महफूज न रख सका।

अमृता को विश्वास था कि इश्क का भेद तो देव-दानव भी नहीं जान सके. इन्सान ने क्या जान पाना है। उनका कहना था कि ‘‘इश्क तो एक परस्तिश और अल्लाह का सबसे कीमती तोहफा है।

पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश, इन पाँचों तत्वों के बीच इतना गहन आकर्षण क्यों है ? निश्चय ही कोई छठा तत्व भी होना चाहिए जो इन दसों दिशाओं को स्पन्दित करता है और वो गुनगुनाने लगती है और कस्तूरी मृग की तरह एक-दूसरे को ढूँढती उसमें अवतरित हो एक सुगन्ध फैला देती हैं। वह तत्व है ‘‘प्रेम’’।

यही छठा तत्व मधुर मिलन का सांकेतिक रूप है।

अमृता प्रीतम जिसने सच और परमात्मा को प्रेम के साथ साये की तरह आते देखा तो अमृता की कलम बोली -

हमने आज ये दुनिया बेची। / और एक दीन, खरीद के लाये / बात कुफ्र की, की है हमने।

अम्बर की एक पाक सुराही, / बादल का एक जाम उठाकर, / घँूट चाँदनी पी है हमने।।

सपनों का इक थान बुना था / गज एक कपड़ा फाड़ लिया / और उम्र की चोली, सी है हमने

अपना सा उसमें, कुछ भी नहीं है. रोजे़ अज़ल से / तेरी अमानत. वही तो तुमको दी है हमने ।।

हिन्द-पाक बँटवारे का अमृता के दिल पर गहरा असर था। उनका मन इस तकसीम से छलनी हो चुका था। अपनी सीधी-साफ जबान में इस खून-खराबें से तँग आई लिखती हैः

‘‘हिन्द-पाक की सरहद पर बन्दूक तान कर खड़े फौजियों के बीच “फैज” को कहो कि एक तरफ बैठ जाये। दूसरी तरफ मैं स्वयं बैठ जाऊँगी। बारी-बारी से नजमें पढेंगे और दोनों तरफ इतने लोग जुट जायेंगे कि सरहद पैरों के नीचे मिट जायेगी। उस वक्त कौन गोली चलायेगा ? कोई भी नहीं क्योंकि सब एक-दूसरे के गले मिल रहे होंगे। अरे, दुश्मनी तो सोया हुआ नाग है जिसे एक बार जगा लें तो नस्लों के बदन नीले पड़ जाते हैं।’’

इतनी सोच पर भी जब कहीं से कोई ओट न मिली तो वारिस शाह को मुखातिब कर बोलीः

आज वारिस शाह से कहती हूँ / अपनी कब्र में से बोलो / और इश्क की किताब का / कोई नया वर्क खोलो / पंजाब की एक बेटी रोई थी / तूने इक लम्बी दास्तान लिखी / आज लाखों बेटियाँ रो रही हैं / वारिस शाह तुमसे कह रही हैं।

ऐ दर्दमन्द के दोस्त, पंजाब की हालत देखो / चैपाल लाशों से अटा पड़ा है, चनाब लहू से भर गया है।

किसी ने पाँचों दरयाओं में  / एक जहर मिला दिया है / और यही पानी / धरती को सींचने लगा है।

फिर ज़हरीली हवा / वन जगलों में चलने लगी / उसमें हर बाँस की बाँसुरी / जैसे एक नाग बन गई।

आज सभी कैदी बन गये / हुस्न और इश्क के चोर / मैं कहाँ से ढूँढ कर लाऊँ / एक वारिस शाह और।

अमृता प्रीतम की रचनाएं इस बात का जीता-जागता प्रमाण हैं कि पंजाबी कविता की अपनी एक अलग पहचान है। उसकी अपनी शक्ति है, अपना सौन्दर्य है, अपना तेवर है। नारी की अन्तरंग अनुभूतियों को छूती, दर्द के पर्वतों में दरारें बनाती वारिस शाह को पुकारते हुए अमृता के यह नग्मे मानव हृदय की धड़कन से साक्षात्कार करते है। वो आज हमारे बीच नहीं हैं। यह जन्म-मरण भी अजीब खिलवाड़ है। अपना प्यारा चला जाता है तो फिर कभी गल्ती से भी दिखता नहीं। अमृता भी कहाँ दिखेगी? - नहीं - कभी नहीं। मौत जीवन का बहुत बड़ा सत्य है।

पत्ता टूटा डार से, ले गई पबन उडाय। अब के बिछुड़े कब मिले दूर पड़ेगे जाए।।