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अप्रेम कथा पारो-देवदास
October 6, 2020 • कमलादत्त • कहानी


कमलादत्त, 2645 Midway Road, Decatur, Georgia-30030

सुबह सात बजते ही टेलीफ़ोन की घंटी बजने लगी थी। मन न होने पर भी फ़ोन उठाना पड़ा था। एक बार टूटी नींद लगनी नहीं थी, सो खीझ कर उठी थी। दूसरी ओर तुम थे, खीझे हुए।

"पिछले चार दिनों से कम-से-कम बीस मरतबा तुम्हें कॉल किया है, रात के एक बजे तक, कहाँ रहीं तुम, और तुम मुझे इस काबिल भी नहीं समझती? तुम्हारे जीवन का इतना बड़ा निर्णय और तुमने मुझसे कुछ भी नहीं कहा। क्या मेरा इतना भी अधिकार नहीं?"

अधिकार शब्द तुम्हारे मुँह से बड़ा अटपटा लगता था। कैसा अधिकार? और कब से? बरसों पहले तुम्हें बहुत-से अधिकार देने चाहे थे; तन-मन से, पूरी निष्ठा से, तुमने सभी कुछ नकार दिया था, मुझे भी। और अब इतने बरसों के बाद तुम किस अधिकार का वास्ता दे रहे हो? तुम कहते हो "तुम्हारे जीवन का इतना बड़ा निर्णय और पिछला सारा साल तुम्हारे शहर में बिताने के बावजूद तुमसे मैं यह बात छिपाये रही और चार दिन पहले मेरे इस निर्णय की बात सुन तुम टूटे हो।" यह सब सुनना तुम्हारे मुँह से झूठा और अटपटा लगा।

कौन हो तुम मुझसे यह अधिकार माँगने वाले ? बीस साल पहले जो तुम्हें रास नहीं आया, आज उसी अधिकार की माँग! प्रेम-ब्रेम के अनेक किस्से सुने हैं, पर ऐसा नहीं।

बीस साल पहले तुम्हारे उस पिछड़े शहर में मैं एम.ए. करने आयी थी। बिजनेस मैनेजमेंट और ऐडमिनिस्ट्रेशन का पहला-पहला डिपार्टमेन्ट वहाँ खुला था। तुम पी-एच.डी. कर रहे थे। उस सेमीनार में ऑडिटोरियम में तुम मुझसे आगे वाली पंक्ति में बैठे थे। पैर बदलते हुए गलती से मेरा पैर तुम्हारी पैंट को छू गया था। पीछे बैठी सीनियर्स हँसी थीं - “अरे, अरे, तुमने बेचारे की इतनी सफेद पैंट खराब कर दी ! नया-नया इंस्ट्रक्टर बना है; ज़्यादा ही सफेद कपड़े पहनता है। बेचारा!" शर्म से लगभग दोहरी होती मैं सिर्फ इतना ही कह पायी थी, “आई एम वेरी सॉरी !" तुम्हारी तरफ देख भी नहीं पायी थी। तुमने कहा था, “कोई बात नहीं, फारगेट इट।"

उस लम्हे में कुछ अनकहा-सा हमारे बीच घट गया था। क्या तुम्हें भी ऐसा लगा था? शायद नहीं। वैसे तुममें कोई खास बात नहीं थी। बरसों बाद सोचा था, क्या था उस आकर्षण में? शायद तुम्हारे चेहरे की तरल उदासी।

उस ज़माने में चेहरे पढ़ना या समझना नहीं आता था। बरसों बाद सोचा था शायद यही रहा होगा।

बस तुम उस पल अच्छे लगे थे, और कोई बात हमारे दरमियान नहीं हुई थी।

फिर रैगिंग करती सीनियर्स ने उस दिन नयी आयी लड़कियों के नाम विभाग के सीनियर लड़कों और गैर शादीशुदा प्रोफेसरों के साथ जोड़ने शुरू कर दिये थे। हर नयी लड़की के नाम के साथ विभाग के नाम के लड़कों की चिटें निकाली जाने लगी थीं। मेरे नाम के साथ निकाली थी तुम्हारे नाम की चिट, वह महज़ संयोग था या किसी सीनियर के दिमाग की खुराफात, आज भी नहीं मालूम। बस, लड़कियों ने छेड़-छाड़ शुरू कर दी थी।

हम तीन लड़कियाँ थीं बड़े शहरों से आयी हुईं। सभी-की-सभी पब्लिक स्कूलों की पढ़ी हुई। हर वक़्त तुम्हारे मुर्दा-से शहर को कोसती हुई, गर्दोगुबार को कोसती हुई। फिर नये-पुराने छात्रों के परिचय के लिए पिकनिक का आयोजन था। मेरे शहर के एक प्रोफेसर वहाँ थे। कहने लगे, “अरे, तुम तो इतने बढ़िया शेर पढ़ती थीं, कुछ सुनाओ। और फिर पूरी-की-पूरी पिकनिक ढ़ेरों अशआर पढ़ते गुजर गयी थी। तुम नहीं थे उस पिकनिक में। आँखें तुम्हें खोजती रही थीं।

लड़कों से बातें करने में उससे पहले कभी शर्म, झिझक महसूस नहीं की थी। तुमसे कॉरीडोर या सीढ़ियों पर सामना होता, आँखें शर्म से झुक जातीं। लड़कियों के बीच ज़ोर से ठहाका लगाती मैं, तुम्हें देखते ही बर्फ की मानिन्द जम जाती। तुम्हारे सामने पड़ने पर चलना तक मुश्किल हो जाता था। लगता था, इतनी नर्वस हो जाऊँगी कि चल ही नहीं पाऊँगी।

फिर उस दिन कॉरीडोर में तुमने रोक लिया था, "हैलो! कैसी हैं ? सुना है, बहुत सुंदर अशआर पढ़ती हैं, हमें नहीं सुनायेंगी क्या?"

शर्म से सिर झुकाये इतना ही कहा था, "ठीक है सर, ज़रूर सुनाऊँगी।" और कॉरीडोर के दूसरे सिरे पर अपनी सहेलियों के झुंड को आते देख भागते हुए झटपट सीढ़ियाँ उतर गयी थी; डर था, लड़कियाँ तुम्हारे सामने छेड़खानी न शुरू कर दें।

सोचा, तुम्हें भी शायद मैं अच्छी लगी, तभी तो तुमने रोक कर शेर सुनाने का आग्रह किया। होस्टल के कमरे में अकेले रहने पर छत पर टहलते वक़्त हर समय बस एक खुमारी दिलोदिमाग पर छायी रहती थी। एक गुदगुदाहट-सी। तीन साल का कोर्स था। पहले साल की पढ़ाई ज़्यादा मुश्किल नहीं थी। इससे पहले कई लड़कों से कॉमरेड किस्म की दोस्ती रही थी। प्यार करने वाली लड़कियाँ हमेशा बचकानी और बेहूदा लगी थीं। होस्टल में लड़कियों से बतियाते वक़्त, आसमान में बादलों को देखते वक़्त, इधर-उधर काम-धाम करते वक्त हर समय तुम्हारी याद बनी रहती थी। एक मीठा-मीठा सा दर्द भी उस याद के साथ बराबर बना रहता था। डिपार्टमेन्ट में निगाहें हरदम तुम्हें खोजती रहती थीं। अपने में हो रहे इन परिवर्तनों पर खुद ही हैरानी होती थी।

शहर पुराना था। बंदिशें खूब थीं। शक हो कि खत लड़कों के हैं तो वॉर्डन डाक सेंसर करती थी। मेरे पुराने सहपाठियों के खत बराबर आते थे। बिना खोले उन्हें दे देती, जब कि बाकी लड़कियों को लड़कों के खत आने पर खूब डाँट सुननी पड़ती थी। एक दिन मैं पूछ बैठी थी, “मिसेज कौल, आप बाकी लड़कियों के खत खोलती हैं, मेरे नहीं।" हँसी थीं वे और एक शेर पढ़ लिया था -

“खत का मजमू भाँप लेते हैं लिफाफा देखकर” फिर हँसी थीं वे, “तुम बड़ी समझदार लड़की हो, हमें मालूम है। तुम प्यार-व्यार के चक्कर में नहीं पड़ने वाली।" अपने पर शर्मिन्दा हुई थी। लगा था, अपने में हो रहे परिवर्तनों पर शायद मेरा कोई बस न हो। ढेरों लक्ष्य थे उन दिनों। अच्छा स्टूडेंड होने के, अच्छी पोस्ट के, देश सेवा के सामाजिक बदलाव लाने के। अच्छा कलाकार होने के। प्यार उन सबमें नहीं शामिल था। हमेशा बचकाना ही लगा था।

उन दिनों फूल लगाने का बेहद शौक था। मैं और मेरी कुछ सहेलियाँ यूनीवर्सिटी गार्डन के पिछले हिस्से से छुपकर गुलाब तोड़ा करते थे। एक दिन तोड़ ही रहे थे कि तुम उधर साइकिल पर जाते दिख गये। लगा, तुम्हें हमारी फूल चुराने की हरकत पसंद नहीं आयी। कुछ दिन फूल चुराना और लगाना बंद कर दिया। तुम्हें देखते ही हाथ-पाँव फूल जाते थे। खिलखिलाहट थम जाती थी। एक तरह से उन लम्हों की सुध-बुध नहीं रहती थी।

उस पहली बार कॉरीडोर में रोक कर शेर सुनाने के आग्रह के बाद तुम कभी पास नहीं आये, कभी रोका नहीं, कभी फिर कुछ कहा नहीं।

यूनीवर्सिटी में होने वाले नाटक की ऑडीशन चल रही थी। मैं हीरोइन के रोल के लिए चुन ली गयी थी। यूथ फेस्टिवल में मुझे बेस्ट ऐक्टिंग का अवार्ड मिला था। और फिर यूनिवर्सिटी कलर। मैं एक साथ उस शहर और यूनीवर्सिटी की बड़ी लोकप्रिय लड़की बन गयी थी। वह लड़की, जो बड़ी लायक थी, बुद्धिमान थी, कलाकार थी और अच्छे अशआर पढ़ती थी और बड़ा मीठा बोलती थी। चाहा था तुम आओगे; मुबारकबाद दोगे, कुछ कहोगे पर चाहा कुछ नहीं हुआ। बस डिपार्टमेन्ट के बहुत से लड़के आगे-पीछे फिरने लगे थे। कोई ऐक्टिंग की तारीफ करता, कोई दिमाग की और शायरी के अंदाज़ की। बहुत से सेमिनार-जूनियर बहुत करीब आ गये थे। इस सबके बीच तुमसे बात करने की चाह बराबर बनी रहती थी। तुमने कोई कोशिश नहीं की और मेरी तो हिम्मत ही नहीं पड़ती थी कभी कुछ कहने की।

उस दिन लाइब्रेरी में बैठी थी। आने वाली डिबेट की तैयारी करती हुई। तुम आये, सामने वाली कुर्सी पर बैठ गये। सोचा, जान-बूझकर शायद मुझसे बात करने का बहाना ढूँढ़ आये हो।

तुम कहते हो, “कैसी हैं आप?"

मेरा हाथ अचानक सिर पर चला जाता है। चोटी का गुलाब हाथ में आ जाता है। उसी से खेलने लगती हूँ।

तुम कहते हो, “फूल बहुत पसंद हैं आपको।"

“जी हाँ, जी सर!"

लगा था, तुम टीचर की तरह डाँटोगे और कहोगे, “इस तरह फूल चुराना ठीक नहीं, खासकर आप जैसी समझदार लड़की के लिए।"

पर तुम कहते हो, “आज तो आपको हमें भी कुछ अशआर सुनाने ही पडेंगे।"

मैं झिझक-झिझक कर अपनी पसंद के एक-दो अशआर पढ़ती हूँ।

तुम तारीफ करते हो। फिर तम एक ही साँस में कह जाते हो कि तम्हारी माँ सौतेली थी। तुम डेढ़ साल के थे कि तुम्हारी अपनी माँ मर गयी थीं और कि तुम पूरी तरह सेल्फमेड हो। ट्यूशनें कर-करके तुमने सारी पढ़ाई की है। फिर तुम झटके से उठ कर खड़े हो जाते हो, कहते हो, “चलिए, हम भी आपको एक शेर सुना दें। हमेशा मुझे यह हौंसला देता है। उम्मीद बंधाता है :

डूब जाऊँगा ऐ नाखुदा लेकिन -

मुझे तूफाँ से लड़ तो लेने दे...

मैं हतप्रभ बैठी रही थी, तुम उठ कर चल दिये थे। सोचती रही थी, कितना कठिन रहा है तुम्हारा जीवन। और साथ ही यह भी सोचा था; अपना समझा होगा, तभी तो इतना कुछ कह गये।

बाद में जाना, तुम तो हर लड़की से यही कहते थे।

फिर कहीं से पता चला, तुम अपनी थीसिस पूरा कर रहे हो और शाम को लाइब्रेरी में बैठते हो। मैं अपनी शामें लाइब्रेरी में बिताने लगी थी। पढ़ना तो बहाना था। वैसे दोस्तों का अच्छा-खासा झुण्ड बन गया था। चाय पीने वाले दोस्त अलग, ड्रामे वाले दोस्त अलग, साहित्य में रुचि लेने वाले दोस्त अलग। हर ग्रुप में रहते हुए भी तुम्हारा ध्यान बराबर बना रहता था।

हाँ, तो मैं शामें लाइब्रेरी में बिताने लगी थी। पढ़ाई कम, रुक-रुक कर तुम्हारी तरफ देखना और ऐसा भ्रम भी बनाये रखना कि पढ़ रही हूँ। जब भी रुक-रुक कर तुम्हारी तरफ देखा, तुम्हें किताबों में उलझा पाया, लिखता पाया।

फिर जाने तुम्हें क्या हुआ, तुम एक दिन अपनी कुर्सी से उठे, और उसे ले जाकर लाइब्रेरी के कोने में पटक दिया और मुँह मोड़कर पढ़ने बैठ गये। शायद यह मेरे लिए संकेत था कि मैं तुम्हें डिस्टर्ब करती हूँ, और तुम्हें मेरा लाइब्रेरी में बैठना पसंद नहीं। पर कोई बात हमारे बीच नहीं हुई। न मैंने कही, न तुमने। उस दिन तुम्हारे उस तरह कुर्सी पटकने से मैंने लाइब्रेरी में बैठना बंद कर दिया। समझा था कि तुम मुझे कतई पसंद नहीं करते, कि मैं शायद अपने को तुम पर थोप रही हूँ। बाद में जितने दिन तुम्हारे उस शहर में रही, तुम्हें देख मैं भी रास्ता बदलती रही। साथ ही कुछ मित्रों के यहाँ ज़्यादा जाना भी शुरू कर दिया था। सुना था, तुम कहीं पास ही रहते हो।

अपने मन को समझाया भी था, पहली बार घर से बाहर निकली हूँ। सो शायद किसी के करीब आने की चाह अकेलेपन की वजह से है। और कि तुम मुझे नहीं चाहते और कि शायद मुझसे नफरत करते हो।

फिर गर्मियों की छुट्टियाँ हो गयी थीं। मुझे लू लग गई थी। पूरे महीने बिस्तर से लगी रही। पूरी गर्मियाँ बरामदे में सो कर बितायी थी। सामने के घरवालों का एक रिश्तेदार उनके पास रहता था। बहुत ऊँची बात करता था। उसके पंजाबी बोलने का ढंग और आवाज़ तुम्हारे जैसी ही थी।

 अजीब पागलपन के दिन थे वे, खुमारी के, मीठे-मीठे दर्द के, बात-बेबात रोने के। और कमरे में लेटे-लेटे छत के पंखे या कड़ियों को लगातार देख सपने बुनने के।

और फिर पूरी-की-पूरी यूनिवर्सिटी हमारे शहर आ गयी थी। सुना था, तुम बैंकिग के टॉप कम्पटीशन में बैठ रहे हो। इस बीच एक कोर्स के कुछ अंश तुमने पढ़ाये थे। एक सवाल पूछने पर तुम देर तक समझाते रहे थे। सहेलियों ने छेड़ा था, फिर उम्मीद बँधी थी। तुम आँख-मिचौनी खेलते रहे थे। कक्षाओं में बेहद अपनापन जतलाने के बावजूद कॉरीडोर में मिलने पर रास्ता बदल लेते।

तुमने हमेशा दूरी बनाये रखी। और मुझे कोई रास्ता आता नहीं था तुम्हें बताने का कि मैं तुम्हें बेहद पसंद करती हूँ। सोचा था, तुम अनजान नहीं, कि न समझ पाओ, कि मैं तुम्हें बेहद पसंद करती हूँ। नाटक, गोष्ठी आदि सबमें भाग लेने पर भी मुझमें बड़ा भोलापन था और एक हद तक बहुत शर्मीली भी थी मैं तुम्हारे सामने पड़ते ही आँख झुक जाती थी।

इस बीच तुम्हें देख पाने की अकुलाहट बराबर बनी रहती थी। लेक्चर-हॉल की खिड़की से सड़क दिखाई देती थी। सलाखों से परे देखती रहती थी तुम्हारी एक झलक पाने के लिए, पूरी क्लास गुमसुम बैठी बिता देती थी तुम्हें देख पाने की चाह में। कई बार तुम्हारे ऑफिस के सामने से बेवजह गुज़री कि तुम्हारे ऑफिस का दरवाज़ा खुला होगा और तुम्हारी एक झलक मिल जायेगी। प्यार में सुध-बुध खोने वाली लड़कियों की मज़बूरी तब मेरी समझ में आयी थी और अपने से कोफ्त हुई थी, क्यों इतना मज़ाक उड़ाती थी मैं उनका। वे ही सब बचकानी बातें तो मैं अब खुद कर रही थी। फिर एक जलसे में एक टीचर कह उठे थे, “क्लास में आप कुछ सुनती भी हैं या बाहर ही देखती रहती हैं?" खूब रोयी थी। ज़िन्दगी में पहली बार किसी टीचर से पढ़ाई की वजह से डाँट खायी थी, मैंने। अपने-आपसे बेहद शर्मिन्दगी हुई थी। किस चक्कर में पड़ गयी समझदार नीता पाठक।

उस दिन साइकिल पर यूनीवर्सिटी जा रही थी। तुम सामने से आते दिख गये। मुझे रोका और कहा, “पढ़ाई कैसी चल रही है?"।

“ठीक ही चल रही है, सर!"

तुमने कहा था, "मेरे पास बड़े अच्छे नोट्स हैं, अपने बनाये हुए। तुम्हें घर आकर देना चाहूँगा। अपना पता देंगी?"

घर का पता लिखा दिया था। तुम आये थे नोट्स देने पर लगा था, तुम मुझे पसंद करते हो। तुमने हिदायत दी थी, मैं किसी से न कहूँ कि तुम्हारे नोट्स मेरे पास हैं। लोग बेवजह बातें बनायेंगे। हँसी आयी थी तुम पर, मेरे पास कम-से-कम छह सीनियर्स के नोट्स थे। पर लगा था, तुम चाहते हो, तभी तो अपने नोट्स दिये। तुम अज़ीब आँख-मिचौनी खेलते रहे। कभी तुम ज़रा बोल लेते। आस बँध जाती और कभी तुम एकदम दूर हट जाते।

मैंने जाने कितनी बार आँखें बंद कर लकीरें खींची - दो-दो को काटा, अगर एक बाकी बचेगी तो मुझे प्यार करते हो, नहीं बचेगी तो नहीं करते हो।।

कितनी बार डेजी के फूलों की पँखुड़ियों को तोड़ा - लब्ज मी, लब्ज मी नॉट...

डिपार्टमेन्ट में वैसे सब ठीक ही चल रहा था। छात्रों के दो ग्रुप थे। स्मार्ट लड़के और अधिकांश लड़कियाँ एक ग्रुप में, और गाँव से आये गरीब घरों के सीधे-साधे अंग्रेज़ी न बोल पानेवाले लड़के और बहन जी टाइप लड़कियाँ दूसरी तरफ। इलैक्शन के दिनों में दोनों दलों में खूब होड़ रहती थी। अधिकांश लड़कियाँ एक तरफ होने पर भी गाँव वाले ग्रुप की जीत होती थी क्योंकि अधिकांश लड़के उसी ग्रुप के थे। यूनीवर्सिटी में टॉप तो हमेशा इसी ग्रुप का लड़का करता था। हम गाँव से आये लड़कों का मज़ाक उड़ाते और उन्हें 'झावा' कहते थे। बरसों बाद इसी सीधे ग्रुप के कई लोगों से गहरी मित्रता हुई और अपने दिखावटीपन पर शर्म आयी। कितने सतही थे उन दिनों हम। स्मार्ट ग्रुप के लिए बड़ा बेशकीमती मोहरा थी मैं। शायद यूनीवर्सिटी में फर्स्ट आने की संभावना रखती थी। उस ग्रुप के सभी लोग बहुत प्रोत्साहित करते थे। सालाना इम्तिहान मेन सेंटर में हुआ करते थे। सीनियर्स का ग्रुप मेन हॉल तक पहुँचाने आता। बेस्ट विशेज़ देने आता। इम्तिहान खतम होने पर सभी लोग वहाँ मिलते। चाय पिलाते। अगले परचे के बारे में पूछताछ कर घर भेजते। सीनियर्स ने बहुत प्यार दिया उन दिनों। इनमें कुछ टीचर्स भी शामिल थे।

तुम कभी पास नहीं आये। देखने पर हमेशा रास्ता बदलते रहे। लगने लगा था, तुम्हें मुझसे कतई लगाव नहीं। नोट्स दिये हैं तो सिर्फ अच्छा स्टूडेंट मानकर।

मन में हरदम कुछ सुलगता-सुलगता रहता था। हर किसी के बीच होने पर भी मैं पूरी तरह वहाँ नहीं होती थी। बस, तुम्हें ही खोजती रहती थी। एक दर्द था, एक ज़ख्म था, हरदम रिसता हुआ, दुःखता हुआ।

फिर रिजल्ट निकला था। मैं यूनीवर्सिटी में फर्स्ट आयी थी। लड़के-लड़कियों के बीच घिरी मैं खड़ी थी। तुम दूर से दिखे। भाग कर तुमसे कुछ कहना चाहा, सुनना चाहा। तुम नोटिसबोर्ड से चिपके खड़े रहे। पास नहीं आये। जब तक दोस्तों से छुटकारा पा तुम तक पहुँचती, तुम जा चुके थे।

तुम एक दिन फिर मिले। औपचारिक मुबारकबाद - “तो आप फर्स्ट आ गयीं। मैं कल अपने नोट्स लेने आऊँगा। मैं कम्पटीशन में बैठ रहा हूँ। उसी के लिए चाहिए।"

तुम्हारी उपेक्षा से मेरे अंदर गहरी उदासी घर करती जा रही थी।

यह क्यों मुझे पसंद नहीं करता? क्या मैं इसके काबिल नहीं? क्या नहीं है मेरे पास?

फिर मेरा बात-बेबात भाई बहनों पर खिझना, बात-बेबात पर रोना। मैं क्यों नहीं उसे पसन्द, क्या मैं सुंदर नहीं ? क्या वजह है, क्या वजह है उसकी उपेक्षा की ? बहुत-से सवाल सालते रहे। तुमने कुछ कहा नहीं, मुझमें कहाँ हिम्मत थी कुछ भी पूछने की।

तुम दो-तीन बार घर आये। चाय का प्याला या कुछ और ऑफर करते हुए तुम्हारे चेहरे पर कुछ पढ़ना चाहा। ज़्यादा देर निगाहें कभी तुम्हारे चेहरे पर टिक ही नहीं पायीं। कोई आज भी पूछे कि तुम्हारी आँखों का क्या रंग है - कह नहीं पाऊँगी। वैसे तुम्हारे चेहरे पर मुझे लेकर पढ़ने को था भी क्या, और आसपास घर के लोग भी अक्सर रहते थे। न होने पर भी तुमने मुझे लेकर शायद कुछ महसूसा ही नहीं।

उस साल तुम्हारी एक किताब लौटाते वक़्त मैंने उसमें नये वर्ष का शुभकामना पत्र रखा था - कुल दो पंक्तियाँ लिखी थीं -

“बीत गया यह वर्ष” तथा “मुबारक हो।"

मुझ जैसी संजीदा खुद्दार लड़की इससे ज़्यादा खुलकर और कह भी क्या सकती थी?

तुम नहीं जान पाओगे कि कितना टूटी मैं तुम्हें लेकर। तुम पहले व्यक्ति थे जिसे चाहा था। बरसों बाद अहसास हुआ था, वे लड़कियाँ ठीक रहती हैं छिटपुट अफेयर करने वाली। इधर-उधर पड़ोसी के लड़के, दुकानदार या किसी से भी थोड़ा-थोड़ा फ्लर्ट करने वाली, मुझ जैसी संजीदा हमेशा अपने को बचाये रखने वाली लड़की जब किसी को चाहती है और प्रत्युत्तर नहीं पाती तो बहुत टूटती है। हिम्मत बंधाने वाले छोटे-छोटे अनुभव उनके कभी नहीं रहते। वे देती हैं तो पूरी तरह। टूटती हैं तो बुरी तरह।

फिर तुम कम्पटीशन में सिलेक्ट होकर दूसरे शहर चले गये थे। शनिवार को तुम हमारे शहर लौटते थे। सारा-का-सारा दिन इतवार का घर बैठे गुज़ार देती कि शायद तुम आओ। तुम नहीं आये कभी। और कभी आये तो मैं उन्हीं लम्हों में घर नहीं हुई। उन दिनों बड़ी उदास-उदास कहानियाँ लिखीं, कविताएँ लिखीं।

बात-बेबात रोते देख करीब की एक-दो सहेलियाँ पूछ बैठी थीं, “नीला, तुम भी कहीं प्यार-व्यार के चक्कर में तो नहीं पड़ गयीं ?" रो पड़ी थी मैं, "किसी को बेहद पसंद करती हूँ, पर वह मुझे कतई पसंद नहीं करता। कम-से-कम रोमांटिक तरीके से तो नहीं ही।" बहुत ज़ोर देने लगी थीं वे, “कौन है?" तुम्हारे नाम का पहला अक्षर पढ़ा था - 'रा'। उन दिनों मेरे जान-पहचान के तीन लड़कों का नाम 'रा' से आरम्भ होता था। सहेलियाँ परेशान होती रही थीं - कौन हो सकता है।

मेरे नाम के साथ तुम्हारे नाम की चिट निकालने वाली लड़कियाँ भूल गयी थीं, कि तुम्हारे लिए कितना टूटी हूँ। हँसी-हँसी में किये गये मज़ाक कितना दुःख दे गये। कितना तोड़ गये। तुम कुछ कहते तो थोड़ा हौंसला रहता। तुमने तो मेरी तरफ देखा भी नहीं उस ढंग से। फिर एक सहेली की छोटी बहन को ऐडमिशन दिलाने मैं तुम्हारे शहर आयी थी। वहाँ के प्रिंसिपल मेरा बड़ा आदर करते थे। तुम मिल गये। खाना खिलाने ले गये हम सभी को। तुमने बार-बार याद दिलाया कि तुमने दाल-सब्जी में खालिस घी के दो-दो बड़े चम्मच डलवाये हैं। हँसी आयी तुम्हारी बचकानी बात पर। मैं और मेरी सहेली दोनों अच्छे खाते-पीते, नौकर-चाकर रखने वाले घरों से थे। तुम्हारे ओछेपन को तुम्हारे बचपन की मज़बूरी, अभावगाथा मान लिया। उस पहले दिन वाली तुम्हारी कही बात याद आयी - तुम्हारी सौतेली माँ और दाने-दाने को मोहताज तुम। फिर तुम हमें बोटिंग के लिए ले गये। मैं, मेरी सहेली और उसकी छोटी बहन। हम सभी सामने बैठे थे। तुमने मुझसे कहा, “आइए। आपको रोइंग सिखाऊँ।" बरसों से तुम्हारे साथ बैठने के एक लम्हे बाद झटके से उठ गयी - नहीं, यह मुझसे नहीं हो पायेगा। इतनी झिझक, इतनी शर्म। बैठना कब मुमकिन था।

 

फिर तुम अपनी अच्छी नौकरी से इस्तीफा दे एडिनबरा चले गये। जाने से पहले बहुत रात गये तुम एक बार घर आये। एक दोस्त के साथ। पहली बार तुम किसी के साथ घर आये थे।

आते ही कहने लगे, "बूझिए, हम कौन-सी तस्वीर देख कर आये हैं...'जब प्यार किसी से होता है'..."

उस दिन तुम क्या कुछ खास कहने आये थे, और कह नहीं पाये थे? लड़के उन दिनों मुझे आशा पारीख कह कर छेड़ते थे और उस फ़िल्म की हीरोइन आशा पारीख थी। एक बात ज़हन में यह भी आयी, शायद यह मेरा मज़ाक उड़ाने ही आया है कि मैं पागल हूँ, मेरा लगाव एकतरफा है या कि मेरा लगाव फ़िल्मी वाकया है - झूठा और बेमायने।

एडिनबरा से तुम्हारा नये साल का ग्रीटिंग कार्ड आया। अच्छा लगा। तुम्हें उलाहने भरा खत लिखा। जाते वक़्त मिलकर भी नहीं गये और साथ में अपनी लिखी दो कविताएँ भेजीं, जो तुम्हें लेकर ही लिखी थीं।

तुम्हारा बेहद रूखा समझदारी वाला खत आया था। तुम्हारी ज़िन्दगी में तुम्हारा कैरियर ही महत्त्व रखता है और लड़कियों में उलझाव रखना-अमीर, सामर्थ्यवान लोगों के चोंचले हैं। तुम ट्यूशन करके पढ़ने वाले। ऐसी गैरजिम्मेदाराना बातों के बारे में कैसे सोच सकते हो? तुम तो इन बातों में विश्वास ही नहीं करते।

फिर तुम्हें कभी खत नहीं लिखा। समझा कि मेरा ही पागलपन था वे कविताएँ भेजना। तुमने पास रहते इतनी दूरी रखी, और दूर जाकर पास आने की सोच कितनी नामुमकिन थी और मेरी ख्वाहिश कितनी नावाज़िब।

मन के किसी कोने में यह आशा थी कि तुम आओगे और कहोगे कि मैं तुम्हें बहुत चाहता हूँ। शादी करना चाहूँगा। मैंने उस जमाने में बड़ी उदास-उदास कहानियाँ लिखीं। जिनकी हीरोइन हमेशा रिजेक्ट होती रही। बचपन का रिजेक्शन और गहरा हो गया। छोटे-बड़े कॉम्पटीशन जीत कर जुटाया कॉन्फीडेंस टूटने लगा था।

बरसों बाद तुम लौटे। डिपार्टमेन्ट में मिले। मैं अब वहाँ पढ़ा रही थी। फिर तुम्हारी शादी का कार्ड आया था। तुम्हारे नाम मुबारकबाद का टेलीग्राम भेजा। घर में खुलकर कोई बात नहीं हुई थी। छोटी सरू सब जानती थी। इसीलिए शायद उस दिन पहले मुझे सिनेमा ले गयी, फिर रेस्तरां और फिर सहेलियों के साथ घूमती रही। इधर-उधर। उस रात बिस्तर पर देर तक सिसकती रही थी।

मन ने ढेर सारे जाल बिछाये थे। मैं उसके घर नौकरानी बन जाऊँगी। वह पहचानेगा नहीं। मैं उसके पास रहूँगी। उसकी आवाज़ सुन पाऊँगी। या कि बरसों बाद वह लौटेगा, उसकी बीवी मर चुकी होगी। वह कहेगा, मुझे तुम्हारा सहारा चाहिए, और मैं सब सम्भाल लूँगी। ऐसा सब कुछ तो परियों की कहानियों में होता है। एक कविता उन दिनों लिखी थी-

मेरे घर की खुली खिड़की के नीचे से

वो हर रोज़/गुजरता है

कभी-कभार ऊपर/देख भर लेता है

मेरा सब कुछ/संवर/जाता है

उसके कोट पर

नर्गिस का फूल लगा रहता है

मुझे हर चीज़/नर्गिसी दिखाई देती है

आज फिर वो मेरे घर की खुली खिड़की

के नीचे से गुजर रहा है

साथ में कोई है।

उसकी कोट पर

किस मी क्विक/का फूल लगा है और

मेरे चारों तरफ

लम्बे-लम्बे काँटोवाले/कैक्टस

उग आये हैं।

इस बीच उस पहली मुलाकात और अब में बारह साल का अंतराल था। तुम कभी-कभार याद आये, एक सुलगती चिन्गारी की तरह। कभी कोई तुम्हारा नाम ले लेता तो जाने-अनजाने में एक हल्की-सी कचोट, हल्का-सा दर्द उभरता। वह पहले वाली बात नहीं रही थी।

बरसों पहले चोट लगी

वक़्त से दर्द/कम हुआ

खरोंच के निशान/बाकी हैं अभी,

मिट जो जायेंगे ज़रूर.../कुछ वक्त लगेगा।

फिर तुम न्यूर्यार्क में हो रही रीजनल मीटिंग में मिल गये थे अचानक। तुम्हारी बीवी तुम्हारे साथ थीं। तुम खिंचे-खिंचे रहे। तुमने मेरे घरवालों के बारे में पूछा तक नहीं। खासकर डैडी के बारे में भी नहीं। उस लम्हा में जो कुछ बचा था, अनकहा, झटके से खत्म हो गया। यह आदमी कायर तो था ही, इतना डरपोक, बीवी का गुलाम भी। हैरानी हुई; इसके बारे में सोचते-सोचते मैंने अपनी ज़िन्दगी के सात साल गुजार दिये? अब अपनी मूर्खता का अहसास हुआ कि यह किसी तरह मेरे काबिल नहीं था।

और फिर हालात ने अचानक तुम्हारे शहर में ला पटका था। तुमसे मिलने की कोई ख्वाहिश मैंने महसूस नहीं की। अपने पर गुस्सा था कि क्यों मैंने इसके लिए इतने साल गँवाये, अच्छे-अच्छों को पास फटकने नहीं दिया। तुम्हारे शहर में रहते लगभग छह महीने बीत गये थे। हमारे ही शहर में हो रही रीजनल मीटिंग में तुम फिर मिल गये थे। मुझे और दूसरे शहरों से आये पुराने हिन्दुस्तानी दोस्तों को जबर्दस्ती घर ले गये थे। बड़ा अपनापन जताया था जैसे तुम मेरे बड़े करीबी दोस्त रहे हो।

फिर तुम्हारे लगातार फ़ोन आने लगे थे कि तुम मुझे बड़ा करीबी दोस्त समझते हो। मैं तुम्हें हर बार टालती रही थी। तुम्हारे लंच के आमंत्रण को नकारती रही थी। फिर तुम एक दिन अचानक मेरे ऑफिस पहुँच गये थे। जबर्दस्ती खाने पर ले गये थे और साथ ही यह भी कह गये थे कि मैं तुम्हारी बीवी से न कहूँ पर तुम मुझे लेकर बहुत गहरे महसूसते हो, और आगे तुम मुझसे मिलते रहना चाहोगे।

मैंने तुमसे सख्ती से कहा था, “नहीं, मुझे अगर तुमसे कभी मिलना ही है तो तुम्हारी बीवी के साथ।” और फिर तुम हर दूसरे-तीसरे दिन सुबह-सुबह फ़ोन करने लगे थे। मैंने हर बार तुम्हारी बातचीत का रुख तुम्हारे बच्चों और बीवी के बारे में पूछकर ही पलट दिया था। वैसे कुछ कहने को था भी नहीं। लगा, बरसों पहले इसकी इज्ज़त की थी, तब वह मेरा फायदा उठा सकता था पर इसने नहीं उठाया और अब जब मैं इसके बारे में कुछ भी नहीं महसूसती तो क्यों अपने को गिरा रहा है मेरी नज़रों में।

यह अहसास ज़रूर कचोट रहा है मुझे, कि गोष्ठियों और साहित्य-कला में भाग लेने की इतनी बड़ी कीमत!

पर हाँ, एक बात कहूँगी - कोई मुझे क्रय नहीं कर सकता। एक लम्हे के लिए भी नहीं। न तुम, न कोई और। मैं पूरी तरह अपनी निजी संपत्ति हूँ, किसी की जागीर नहीं। सोचती हूँ, यह आदमी तो मुझे एक दिन कुचल देता।

तुम कहते हो, पिछले साल में तुम्हारी दबी भावना जब-तब सामाजिक-अवसरों पर मुझसे मिल कर उभरी है। तीव्र हुई है। मान-मर्यादा का और मेरी उदासीनता को ध्यान में रखते हुए तुमने कुछ नहीं कहा। तुम कहते हो, अब से तुम मुझे बहन के रूप में देखना चाहोगे, कोशिश करोगे। मुझे याद आती है उन लड़कियों की, जो हर नये ब्वॉयफ्रेंड को कज़िन कहती थीं, मेरी गिनती उनमें नहीं थी। मुझे गर्व है अपनी हिम्मत और सच्चाई पर कि हर जान-पहचान वाले लड़के को दोस्त कहने की हिम्मत रखी। कीमत चाहे जो चुकाई हो, कज़िन नहीं बनाया।

तुम फिर कहते हो, अब से तुम मुझे बहन के रूप में देखना चाहोगे। मन-ही-मन एक शब्द कौंधता है - कायर! बुजदिल ! और कि यह आदमी इतना कमज़ोर क्यों है?

वैसे इस किस्से में प्रेमकथा वाले सभी वाकये मौजूद हैं। लड़का-लड़की को चाहता है, पर किसी गलतफहमी की वजह से अपने प्यार का इज़हार नहीं करता। उसे नकारता है। लड़की बरसों रोती है, अपने को गलाती है। पर यह एक तरह से प्रेमकथा नहीं भी है। अपने गलत निर्णय का अहसास होता है, पर लड़का देवदास नहीं बनता, टूटता नहीं, अच्छी नौकरी करता है, और बीवी-बच्चों की देखभाल करते-करते लखपती बन गया है और करोड़पति बनने की कोशिश में लगा है।

लड़की टूटी पर पारो बन किसी बूढ़े से शादी उसने भी नहीं की। अपने रास्ते पर चली। लड़ाईयाँ लड़ीं, गिरी, सम्भली, उठी - लड़ी, गिरी, सम्भली, उठी, - लड़ी, गिरी, सम्भली, उठी - और अपना रास्ता बनाया, तय किया।

और अपनी चन्द्रमुखी से उकताये देवदास में जब पारो की चाह जगी तो पारो तो बहुत पहले देवदास से बहुत आगे निकल चुकी थी अपनी निजी लड़ाई में।

पुनश्चः

और हाँ, मेरी कहानियों की एक पंक्ति बदल जायेगी - "बरसों पहले किसी को बहुत चाहा था पर वो मुझे चाह नहीं सका।" के बदले “बरसों पहले किसी को बहुत चाहा था पर वो कायर निकला।"

साभार