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और फिर अँधेरा...
June 7, 2020 • सुशांत सुप्रिय • लेख

   सुशांत सुप्रिय

प्रिय गुरमीत,

यहाँ हैवलॉक द्वीप,अंडमान के डॉल्फ़िन गेस्ट हाउस से मैंने पिछले हफ़्ते भी तुम्हें पत्र लिखा था। पर तुमने इस पते पर मेरे पत्र का जवाब नहीं दिया है। क्या तुम मुझे पत्र लिखने का अपना वादा भूल गए हो ? पिताजी बता रहे हैं कि वहाँ दिल्ली में बहुत गड़बड़ चल रही है। पिछले हफ़्ते से विश्व की सभी प्रमुख महाशक्तियाँ विनाशकारी तृतीय विश्व-युद्ध के मुहाने पर खड़ी हैं। पिताजी का कहना है कि अमेरिका और यूरोपीय देश एक ओर हैं जबकि चीन,रूस और उत्तर कोरिया दूसरी ओर हैं। चारो ओर भय और आतंक का माहौल छाया हुआ है। डाक-व्यवस्था भी बाधित हुई होगी। शायद इसीलिए तुम्हारी लिखी चिट्ठी मुझे नहीं मिली है। वहाँ हमारा दोस्त नफ़ीस कैसा है ? और जेनेलिया कैसी है ? मैं तुम्हारे और स्कूल के सभी दोस्तों के लिए चिंतित हूँ।

सच कहूँ तो मुझे पिताजी की तृतीय विश्व-युद्ध वाली बात पर पूरा यक़ीन नहीं है। हो सकता है,वहाँ दिल्ली में सब ठीक हो और तुमने आलस के मारे मुझे पत्र लिखा ही नहीं हो। हमें यहाँ अंडमान के हैवलॉक द्वीप आए हुए एक हफ़्ते से ज़्यादा समय हो गया है। तुम्हें पता है,मम्मी तो यहाँ आना ही नहीं चाहती थी। वह तो कश्मीर जाना चाहती थी,पर पिताजी हम सब को मना कर यहाँ ले आए। वैसे मेरी इच्छा शुरू से ही अंडमान के जंगलों में घूमने की थी। अब तो मम्मी को भी यहाँ के समुद्र-तट और यहाँ की हरियाली अच्छी लगने लगी है। इस बीच वहाँ दिल्ली में रितिक रोशन की नई फ़िल्म लगने वाली थी। जब मैं वापस आऊँगा और सब ठीक होगा तो हम दोनों अपने पापा-मम्मी के साथ इकट्ठे वह फ़िल्म देखने जाएँगे।

यहाँ डॉल्फ़िन गेस्ट हाउस के पास के ' बीच ' से समुद्र में सूर्योदय और सूर्यास्त बहुत सुंदर लगते हैं। पास ही मछलियों से भरी एक छोटी-सी नदी भी बह रही है। हमें बहुत मज़ा आ रहा है। हमने बहुत सारी तस्वीरें खींची हैं। जब मैं वापस दिल्ली आऊँगा तब तुम्हें ये सारी सुंदर फ़ोटो दिखाऊँगा। हमारे पड़ोस में केरल का एक परिवार ठहरा हुआ है। अंकल-आंटी के साथ एक प्यारी-सी छोटी बच्ची भी है। मैं उसके साथ खेलता हूँ।

तुम्हारी बहुत याद आ रही है। तुम कैसे हो ? मैं मोबाइल फ़ोन पर तुमसे बात करना चाहता था पर इन दिनों यहाँ कोई भी फ़ोन काम नहीं कर रहा। पोस्ट-ऑफ़िस यहाँ से दूर है। यहाँ के रसोइया माइकेल अंकल हफ़्ते में दो बार दूर के बाज़ार जा कर खाने-पीने का सामान ख़रीद लाते हैं। लौटते हुए वे डाक-घर से यहाँ की चिट्ठियाँ भी ले आते हैं। तुम्हारी चिट्ठी की प्रतीक्षा है,दोस्त।

--- तुम्हारा मित्र,

पलाश।

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प्रिय गुरमीत,

सच-सच बताओ,तुम वहाँ ठीक-ठाक हो न ? यहाँ पिताजी,केरल वाले अंकल और सारे बड़े लोग बहुत चिंतित दिखाई देते हैं। वे रेडियो पर हो रहा प्रसारण सुनते रहते हैं। बात-बात पर उनके मुँह से ' परमाणु बम ' और ' तीसरा विश्व-युद्ध ' जैसे शब्द निकलते रहते हैं। उनके बीच हमेशा अमेरिका,रूस,चीन और उत्तर कोरिया की बातें हो रही होती हैं। उन सब की बातें सुनकर मम्मी भी चिंतित रहने लगी है। पूछने पर मम्मी ने बताया कि दुनिया में परमाणु-युद्ध शुरू हो गया है। जब मैंने वापस दिल्ली लौट चलने की बात की तो मम्मी ने बताया कि विश्व-युद्ध के कारण जहाज़ और विमान सेवाएँ बंद पड़ी हुई हैं। क्या यह सच है ? तब तो हम लोग न जाने कब तक के लिए यहाँ फँस गए हैं।

आज सुबह से रेडियो पर भी कोई प्रसारण नहीं हो रहा। टी. वी . पर प्रसारण तो दो-तीन दिनों पहले ही बंद हो गया था। सुबह से मम्मी की तबीयत भी ख़राब चल रही है। पापा यहाँ अपने साथ जो दवाइयाँ लाए थे,वे सब अब ख़त्म होने वाली हैं। मैं यहाँ के माहौल में बढ़ रहे तनाव को महसूस कर सकता हूँ।

दोस्त,मैं तुम्हें एक राज की बात बताता हूँ। मेरी मम्मी को ' बेबी ' होने वाला है। कल रात मम्मी ने मुझे यह बात बताई। उन्होंने मुझे यह बताया कि मेरे इस बेबी ( भाई या बहन ) को पाँच-छह महीने के बाद भगवान जी हमारे पास भेजेंगे। मम्मी ने मुझे कहा कि अभी मैं यह बात किसी को नहीं बताऊँ। तुम भी प्लीज़ यह सीक्रेट अभी किसी से शेयर नहीं करना। गुरमीत,तुम तो जानते हो कि मुझे एक बेबी बहन चाहिए। मैं रोज़ भगवान जी से प्रे कर रहा हूँ कि ऐसा ही हो। मम्मी कहती है कि भाई हो या बहन,सेहतमंद होना चाहिए। हमारी क्लासमेट नेहा के भाई की तरह बीमार नहीं।

गुरमीत,अभी सुबह के ग्यारह ही बजे हैं,पर बाहर अँधेरा-सा छाया हुआ है। हवा भी साफ़ नहीं है। पिछले दो दिनों से हमें सूरज की रोशनी ही नहीं दिखी है। यहाँ सब बड़े लोग बहुत फ़िक्रमंद हैं। तुम सब वहाँ कैसे हो ? मैं अब भगवान जी से प्रार्थना करने जा रहा हूँ। अपने पापा-मम्मी को मेरी नमस्ते कहना।

--- तुम्हारा मित्र,

पलाश।

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प्यारे दोस्त गुरमीत,

तुम कैसे हो ?

यहाँ पिछले नौ-दस दिनों से बाहर अँधेरा छाया हुआ है। अब तो मुझे तारीख़ भी याद नहीं। जिस अँधेरे की बात मैंने अपनी पिछली चिट्ठी में की थी,अब वही अँधेरा जैसे हमेशा के लिए यहाँ छा गया है। यहाँ हमारे ठहरने की जगह पर खाना-पानी ख़त्म होता जा रहा है। इतने दिनों से यहाँ सूरज ही नहीं उगा। चारो ओर घुप्प अँधेरा है। सूरज की गर्मी के बिना ठंड बढ़ती जा रही है। बड़े लोग आपस में बातें कर रहे हैं कि परमाणु-युद्ध की वजह से धरती पर बहुत समय के लिए ' न्यूक्लिअर विंटर ' आ जाएगी और सारे जीव-जंतु और पेड़-पौधे नष्ट हो जाएँगे। हे भगवान्,अब क्या होगा ? मुझे यहाँ घबराहट हो रही है।

इस बीच हम इस जगह के बेसमेंट में शिफ़्ट हो गए हैं। पिताजी ने बताया है कि परमाणु-युद्ध की वजह से बाहर की हवा ज़हरीली होती जा रही है। चारो ओर एक कड़वा धुआँ फैला हुआ है। यह कैसा विनाशकारी युद्ध है ? नदी से आ रहा हमारा पीने का पानी भी अब बदबूदार हो गया है। उसे उबाल कर पीने के बावजूद हमें उल्टी हो रही है।

दोस्त,जब से यहाँ अँधेरा आया है,केरल वाले अंकल-आंटी की छोटी गुड़िया बीमार रहने लगी है। यहाँ पिछले कुछ दिनों से लाइट भी नहीं है। बिना बिजली के हम सब इन दिनों मोमबत्तियों के सहारे अपना समय गुज़ार रहे हैं। लेकिन मुझे डर है कि हमारी मोमबत्तियाँ भी जल्दी ही ख़त्म हो जाएँगी। तब हम क्या करेंगे ?

इस बीच हमारे रसोइया माइकेल अंकल एक दिन अँधेरे में ही बाज़ार और पोस्ट-ऑफ़िस के लिए निकले। पर वे लौट कर वापस नहीं आ पाए। पता नहीं वे कहाँ गुम हो गए।

तुम अपना ख़याल रखना,दोस्त।

--- तुम्हारा मित्र,

पलाश।

 

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प्रिय गुरमीत,

कुछ ही घंटे पहले केरल वाले अंकल-आंटी की छोटी गुड़िया की मौत हो गई। वह लगातार बहुत बीमार चल रही थी। उसके शरीर में जगह-जगह फोड़े-फुंसी उग आए थे,और उसके सारे बाल झड़ गए थे। वह सारा दिन दर्द से चीख़ती-कराहती रहती थी। यहाँ कोई डॉक्टर भी नहीं था। आज मैं बहुत दुखी और डरा हुआ हूँ और मुझे रोना आ रहा है ...

--- तुम्हारा मित्र,

पलाश।

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प्रिय गुरमीत,

कल रात मेरी मम्मी ने समय से बहुत पहले एक मरे हुए बच्चे को जन्म दिया। हम सब बहुत रोए। जानते हो,उस बेबी के हाथ-पैर ही नहीं थे। पापा ने बताया कि ऐसा दुनिया में हो रहे परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से होने वाले रेडिएशन की वजह से हुआ है। पापा ने बताया कि आने वाले कई सालों तक दुनिया के ज़्यादातर बच्चे ऐसे ही टेढ़े-मेढ़े पैदा होंगे।

पहले तो मम्मी कई घंटे तक उस मरे हुए बेबी को अपनी छाती से चिपकाए रहीं। फिर वह फूट-फूट कर बहुत रोईं। मैं भी बहुत दुखी और उदास हूँ। पापा और केरल वाले अंकल ने उस मरे हुए बेबी को बाहर अँधेरे में जा कर कहीं दफ़ना दिया। मम्मी की हालत ख़राब होती जा रही है। इस घटना से वह भीतर तक हिल गई हैं। वे अचानक ही कभी हँसने लगती हैं,कभी बेतहाशा रोने लगती हैं,तो कभी चीख़ने-चिल्लाने लगती हैं। मुझे यहाँ बहुत डर लग रहा है। पता नहीं वहाँ दिल्ली में तुम लोगों का क्या हाल है। काश यह अँधेरा जल्दी दूर हो जाता और सूरज दोबारा दिख जाता। तब सब पहले जैसा ठीक हो जाता और हम वापस दिल्ली लौट आते। मुझे तुम सब की बहुत याद आ रही है।

--- तुम्हारा मित्र,

पलाश।

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प्रिय गुरमीत,

पता नहीं मैं तुम्हें लगातार चिट्ठियाँ क्यों लिखता रहता हूँ। पता नहीं तुम इन्हें कभी पढ़ भी पाओगे या नहीं। पापा और केरल वाले अंकल कभी-कभी टॉर्च लेकर बाहर अँधेरे में जाते हैं। पापा कहते हैं कि वे तुम्हें लिखी मेरी सारी चिट्ठियाँ पोस्ट-ऑफ़िस में दे देते हैं। लेकिन अभी पोस्ट-ऑफ़िस की सारी सेवा बंद पड़ी हुई है। यहाँ खाना बनाने की गैस भी ख़त्म हो चुकी है। सब

बड़े लोग अँधेरे में ही जंगल से लकड़ियाँ काट कर लाते हैं,जिनके सहारे आग जला कर बचा-खुचा खाना पकाया जाता है।

यहाँ मम्मी और केरल वाली आंटी लगातार बीमार चल रही हैं। दोनों बदहवास हालत में अकेले में अपने-आप से न जाने क्या-क्या बातें करती रहती हैं। पिताजी और केरल वाले अंकल भी अब बाक़ी बड़े लोगों की तरह उदास और गुमसुम रहते हैं। अब मैं तुम्हें जो चिट्ठियाँ लिखूँगा,वह अपने पास ही रखूँगा। मैं नहीं चाहता हूँ कि पापा इस अँधेरे में चिट्ठियाँ पोस्ट करने दूर डाक-घर जाया करें। जब कभी हम मिलेंगे,मैं तुम्हारे नाम लिखी अपनी सारी चिट्ठियाँ तुम्हें सौंप दूँगा।

वहाँ दिल्ली में क्या हाल है ? क्या वहाँ अँधेरा छँटा और स्कूल फिर से शुरू हुआ ?अब तो मुझे इस टापू पर फँसे हुए कई हफ़्ते हो गए हैं। पता नहीं,आगे क्या होगा। तुम,जेनेलिया और नफ़ीस मुझे बहुत याद आते हो।

--- तुम्हारा मित्र,

पलाश।

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प्रिय गुरमीत,

ऐसा लग रहा है जैसे मैं बरसों से तुम सब से नहीं मिला हूँ। मैं,पापा-मम्मी और केरल वाले अंकल-आंटी -- हम सभी अब बीमार रहने लगे हैं। यहाँ पीने के लिए अब साफ़ पानी नहीं बचा है। खाने का सामान भी लगभग ख़त्म हो गया है। हम सभी लोग बेहद कमज़ोर हो गए हैं। बड़े लोग अब जंगल से लकड़ियाँ काट कर नहीं ला पा रहे हैं। हम सब दस्त और उल्टियों से पीड़ित हैं। हमारे पास अब कोई दवाई नहीं बची।

दोस्त,अब तो तुम सब से मिल पाने की उम्मीद भी कम होती जा रही है। हम यहाँ बाक़ी सारी दुनिया से कटे हुए फँसे पड़े हैं। पता नहीं बाक़ी दुनिया का क्या हाल है।

--- तुम्हारा मित्र,

पलाश।

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प्रिय गुरमीत,

पापा के मना करने के बाद भी कल मैं छिप कर के बेसमेंट से निकला और टॉर्च लेकर बाहर अँधेरे में गया। बाहर यह देखकर मैं सन्न रह गया कि यहाँ के सारे जंगल और सारी हरियाली नष्ट हो गई है। बाहर केवल उजड़ी हुई धरती की काली-भूरी मिट्टी बची है। बाहर की ज़हरीली हवा में साँस ले पाना भी मुश्किल हो रहा था। भाग कर मैं वापस बेसमेंट में लौट आया। हम इंसानों ने अपनी सुंदर धरती को नर्क बना दिया है।

--- तुम सब को याद करता,

तुम्हारा मित्र,

पलाश।

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प्रिय गुरमीत,

यह शायद तुम्हें लिखा मेरा अंतिम पत्र होगा।

कल रात से मुझे तेज बुखार हो गया है। मेरी देह में भी जगह-जगह फोड़े निकल आए हैं और मेरे सारे बाल झड़ गए हैं।

मुझे शक है कि दिल्ली भी इस युद्ध में तबाह हो गई होगी और शायद अब तुम और मेरे बाक़ी मित्र इस दुनिया में नहीं बचे होंगे। पर क्या करूँ ? तुम्हें चिट्ठी लिखना पागलपन से बचने का एकमात्र रास्ता लगता है।

बाहर अँधेरा छँटने का नाम ही नहीं ले रहा। पापा-मम्मी और केरल वाले अंकल-आंटी भी भूख और बीमारी की वजह से सूख कर काँटा हो गए हैं। दोस्त,मुझे लगता है,मेरा अंत समय आ गया है। पर मुझे मरने से डर नहीं लगता। परमाणु-युद्ध के विनाशकारी प्रभाव वाली दुनिया में बचे रहने से कहीं बेहतर है जल्दी मर जाना।

पापा बता रहे थे कि शायद कुछ सालों के बाद यह अँधेरा छँट जाए। बाहर की हवा भी तब शायद बेहतर हो जाए,हालाँकि तब तक दुनिया में कितने लोग बचे रह सकेंगे,कहना मुश्किल है। पर मुझे उम्मीद है कि शायद तब तक दुनिया में बचे रह गए कुछ लोग दोबारा एक नई दुनिया बसा सकेंगे जहाँ कभी युद्ध नहीं होंगे,चारो ओर शांति होगी और बड़ों और बच्चों को यूँ घुट-घुट कर असमय मरना नहीं पड़ेगा।

दोस्त,पापा कहते हैं कि सारे ईश्वर एक ही हैं। हम ही लोग उन्हें अलग-अलग नामों से बुलाते हैं। मुझे लगता है,मैं जल्दी ही तुम सबसे मिलने ऊपर परम-पिता परमेश्वर के पास पहुँच रहा हूँ। वहीं मिलते हैं ...

--- तुम्हारा मित्र,

पलाश।

सुशांत सुप्रिय,  इंदिरापुरम, ग़ाज़ियाबाद - 201014
मो : 8512070086
ई-मेल : sushant1968@ gmail.com