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बाल कहानी - जब भुल्लन चाचा खो गए
November 13, 2019 • प्रकाश मनु

बचपन में नानी हँसकर बताया करती थीं, “ओ रे ओ निक्का, यह दुनिया रंग-रँगीली है। यहाँ किस्म-किस्म के लोग मिल जाते हैं और इत्ते मिलते हैं, इत्ते मिलते हैं कि...!” सुनकर मैं खूब जोर-जोर से तालियाँ बजाता हुआ ठिन-ठिन करके हँस पड़ता था।

पता नहीं, नानी की बात मुझे अच्छी लगती थी या उनका बात कहने का अंदाज, पर सुनकर मुझे मजा आ जाता था। लगता था, नानी ने पलक झपकते ही इस बहुरंगी दुनिया का एक खुशनुमा चित्र मेरी आँखों के आगे खींच दिया है।

पर नानी शायद एक बात बताना भूल गई थीं कि दुनिया में कुछ लोग होते हैं जो एकदम बेमिसाल होते हैं। दीन-दुनिया से अलग। अपनी मिसाल खुद, जैसे हमारे प्यारे-प्यारे भुल्लन चाचा। आप सच्ची-मुच्ची दीया लेकर पूरी दुनिया घूम आइए। आपको कोई दूसरे भुल्लन चाचा नहीं मिलेंगे।

इस पर आप चाहें तो मैं शर्त लगा सकता हूँ। इसलिए कि भुल्लन चाचा तो दुनिया में बस एक ही हो सकते हैं। और ये मेरे, हाँ जी, मेरे प्यारे भुल्लन चाचा हैं। मेरे सच्ची-मुच्ची के चाचा। इतने प्यारे कि आप इन्हें कभी-कभी छेड़ने के लिए 'चाचूजान' कहकर भी बुला सकते हैं। और 'चाचूजान' सुनकर भुल्लन चाचा पूरे दाँत फाड़कर ऐसे बुद्धूपन से हँसते हैं कि पूछो मत।

यों तो भुल्लन चाचा ठेठ गाँव के हैं। और हुल्लारीपुर गाँव भी ऐसा है, जो बड़ी दूर-दूर तक मशहूर है, वहाँ के लोगों के शरारती स्वभाव के कारण। सुना है, वहाँ लोग दूसरों को खूब बुद्धू बनाते हैं और इसमें उन्हें बड़ा मजा आता है। और कभी हुड़दंग मचाने पर आते हैं तो वो-वो आफत कर डालते हैं कि

धरती ऊपर और आसमान नीचे हो जाए। शायद इसीलिए लोगों ने उसका नाम न जाने कब से हुल्लारीपुर से हुड़दंगीपुर कर दिया है। और अब तो अगल-बगल के सभी गाँवों के लोग उसे हुड़दंगीपुर के नाम से ही जानते हैं।

तो हमारे प्यारे भुल्लन चाचा भी इसी हुल्लारीपुर, यानी हुड़दंगीपुर के हैं। पर वे हुड़दंगीपुर के होकर भी इतने बुद्धू कैसे रह गए? समझ में नहीं आता।

पापा कहते हैं, “अरे पागल, वे बुद्धू हैं नहीं, बुद्धू दिखते हैं। अंदर से तो उस्ताद हैं। और पूरे, पक्के जिद्दी। कुछ करने पर आ जाएँ, तो किए बिना नहीं मानते।”

मैंने पापा की बातों पर गौर किया। यानी, बुद्धू दिखना अलग बात है, बुद्धू होना अलग। बात मुझे पूरी तरह तो नहीं, पर थोड़ी-थोड़ी समझ में आ गई।

शुरू में जब-जब तीज-त्योहारों पर मैं और गौरी दीदी मम्मी-पापा के साथ गाँव जाते, तो भुल्लन चाचा से खूब मिलना होता था। तब उनकी बात-बात से हँसी टपकती। रस टपकता। और थोड़ा-थोड़ा बुद्धूपना भी। पर सच कहूँ तो मुझे वे भा गए। हालाँकि उन्हें अच्छी तरह जाना तब, जब वे हमारे सरोजिनी विहार वाले दिल्ली के घर में आए। इसी सरोजिनी विहार के मकान नंबर चार सौ सैंतीस, सेक्टर पंद्रह में हमारा घर है।

तब भी यही मकान था।...बात कोई पाँच साल पहले की है। तब भुल्लन चाचा गँवई माहौल से निकलकर थोड़ा शहर की हवा खाने के लिए हमारे घर आए और लगभग तीन-चार साल भर रहे थे।

तीन-चार साल...! यह कोई इतना ज्यादा समय तो नहीं होता। पर अगर भुल्लन चाचा आपके साथ हों, तो वह इत्ता सा वक्त साठ साल से ज्यादा लंबा हो जाता है। यह मुझे पता नहीं था, पर भुल्लन चाचा के साथ रहते हुए ही जाना। इतने समय में ही भुल्लन चाचा ने जो रंग जमाया, वह मेरे और गौरी दीदी के दिल से अभी तक नहीं उतरा।

तभी जाना कि भुल्लन चाचा मौज में आकर कभी-कभी किस्से भी सुनाते हैं। एक किस्सा उन्होंने हुल्लारीपुर गाँव के दिलखुश किसान हरिया का सुनाया था। बोले, “अब हुल्लारीपुर दूर-दूर तक मशहूर गाँव है, इतना तो तुम जान ही गए। सो दूसरे गाँव के लोग हुल्लारीपुर का नाम सुनते ही थोड़ा चैंक जरूर जाते हैं। शायद यही वजह है कि हुल्लारीपुर का कोई बंदा दूर किसी गाँव गया हो तो वह आसानी से अपने गाँव हुल्लारीपुर का नाम नहीं लेता!”

“सो तो ठीक, मगर हुआ क्या था? आप...आप तो किस्सा सुना रहे थे न, भुल्लन चाचा?” गौरी ने याद दिलाया।

“किस्सा, अच्छा किस्सा...!” भुल्लन चाचा हँसे। बोले, “अच्छा, तो सुनो। हुआ क्या था कि एक बार हुल्लारीपुर गाँव का हरिया किसान बगल के कसबे में किसी काम से गया। वहाँ पान की मशहूर दुकान थी तो लौटते हुए उसने सोचा कि पान तो खाते ही चलें। सो उसने पानवाले से एक बनारसी पान बनाने के लिए कहा। अब पान वाला एक ठो पान बनाने लगा, तो यों ही कुछ बात करने की गरज से बोला, कहाँ के हो दददू? इस पर दददू चुप, एकदम चुप्प...! पान वाले ने सोचा, शायद कम सुनाई देता होगा। तो उसने इस दफा थोडी और ऊँची आवाज में कहा, दददू कहाँ के हो? पर दद्दू इस पर भी चुप्प...घुड़ुप्प!

“वहाँ आसपास और भी लोग थे। उन्होंने सोचा कि शायद दद्दू को अब भी सुनाई नहीं दिया। सो उन्होंने हरिया के कान के एकदम नजदीक मुँह सटाकर जोर से कहा, कि दद्दू, जे पूछ रहे हैं कि तुम कहाँ के हो? ...पर दद्दू तो अब के भी चुप्प। आखिर में पान वाले ने चुपचाप उन्हें पान दिया। दद्दू ने झट से दो रुपए का नोट उसके हाथ में पकड़ाया और फिर जरा सा उचककर बोले, 'हुल्लारीपुर का हूँ। अब कल्लो जो करना है...!' कहते-कहते दद्दू ने हुल्लारीपुर की ओर ऐसी ताबड़तोड़ दौड़ लगा दी कि बस, घर आकर ही रुके। और फिर उनके पीछे दुकान पर हँसी-ठट्ठे का जो ज्वार उठा, उसकी तो कुछ पूछोई मत।...”

कहते-कहते खुद भुल्लन चाचा की जोर की हँसी छूट गई। फिर हँसी थमी तो बोले, “इस बात को हो गए होंगे कोई पचीस-तीस बरस। मगर वह पान वाला हुल्लारीपुर के उन दद्दू को आज तक नहीं भूला। अब भी अपने ग्राहकों को सुनाता है यह किस्सा, और सुनते ही सबकी हँसी छूट निकलती है। हँसते-हँसते सब कहते हैं, अच्छा, हुल्लारीपुर...! यहाँ तक कि कभी किसी को चिढ़ाना हो तो अगल-बगल के गाँवों के लोग पूछ लेते हैं कि भैया, तुम हुल्लारीपुर के तो नहीं हो? और सुनते ही हँसी का ऐसा रेला आता है कि बस्स, पूछोई मत...!”

भुल्लन चाचा का यह किस्सा सुनकर सच्ची-मुची हम लोग भी इतना हँसे, इतना ताबड़तोड़ हँसे कि हँसते-हँसते पेट दुखने लगा। और गौरी दीदी ने तो भुल्लन चाचा से यह किस्सा बाद में भी बहुत बार सुना। हालाँकि भुल्लन चाचा हर बार उसे कुछ नए रंग और अंदाज में सुनाया करते थे। इस कारण किस्से की चमक कभी फीकी नहीं पड़ी।

तब हम छोटे-छोटे थे। मैं सात साल का और गौरी दीदी नौ साल की। भुल्लन चाचा भी कोई खास बड़े न थे। मुझसे हद से हद सात-आठ साल बड़े होंगे। गाँव के थे और शुरू में शहर की तहजीब और तेजी से थोड़ा डरे-डरे भी रहते थे। उन्हें हमेशा लगता कि कहीं उनसे कोई ऐसी गलती न हो जाए, जिससे वे सारे लोगों के उपहास का पात्र बन जाएँ। पर इस चक्कर में जरूर कुछ न कुछ गड़बड़झाला हो जाता था और भुल्लन चाचा को बुरी तरह झेंपना पड़ता। ऐसे में उनकी शक्ल एकदम भोंदू चाटवाले के दही-बड़े जैसी हो जाती थी। बस, देखने लायक।

ऐसा ही एक चक्कर तब हुआ, जब वे शाम के समय मेरे साथ घर के पास वाले हिरना पार्क में घूमने जाना चाहते थे। मैंने उन्हें बताया, “भुल्लन चाचा, पर मुझे तो अभी कपड़े इस्तिरी करने हैं। बस, कल पहनने वाली स्कूल ड्रेस है, और दो-एक कपड़े और। झटपट प्रेस कर लूँ, फिर चलते हैं।”

सुनकर भुल्लन चाचा हैरान।

“ऐं रे निक्का, तू प्रेस करेगा, तू?” उन्होंने अचरज भरी नजरों से मुझे देखते हुए कहा। फिर पूछा, “अच्छा, तो क्या कोयले हैं घर में...?”

“कोयले!... न-न कोयले तो हैं ही नहीं। पर कोयले किसलिए...?” मैंने जानना चाहा।

“कोयले के बगैर प्रेस...? तू...तू कपड़ों पर इस्तिरी करने की बात कह रहा है ना?” उन्होंने ठुड्डी पर हाथ रखकर, आँखें पटपटाते हुए कहा।

अब के समझ में आया कि भुल्लन चाचा को क्यों ताज्जुब हो रहा है। वे सोच रहे थे, कि मैं कोयले वाली भारी-भरकम प्रेस से कपड़ों पर इस्तिरी करने जा रहा हूँ।

“अरे भुल्लन चाचा, यह बिजली की प्रेस है, बिजली की...! एकदम हलकी है।” मैंने उन्हें समझाना चाहा।

“बिजली...! प्रेस...? हलकी...! तो फिर प्रेस कैसे करती है?” भुल्लन चाचा तब इतने बुद्धू थे कि वे बुरी तरह चकरा गए। उन्हें बिल्कुल समझ में नहीं आ रहा था कि यह जरा सी प्रेस जिसमें न आँच है न कोयला, इतने सारे कपड़े कैसे इस्तिरी कर देगी? पर जब मैंने उसे गरम करके कपड़े पर प्रेस करनी शुरू की तो उन्होंने उसकी गरमी परखने की खातिर उस पर पूरी हथेली फैला दी थी...और मेरे न-न करते भी उसे छू लिया।

यह तो अच्छा हुआ कि उन्हें जल्दी अक्ल आ गई और उन्होंने झट बिजली की सी तेजी से हथेली हटा ली। पर फिर भी हाथ जरा सा झुलस गया था और उन्हें ठीक होने में दो-चार दिन लगे थे।

हालाँकि ठीक होने पर भी उनके माथे से अचरज की लकीर नहीं गई। बोले, “ओ रे ओ निक्का, गाँव में तो हम इतनी भारी इस्तिरी से प्रेस करते हैं, कि तू तो लल्ला, उसे उठा भी नहीं सकता।...मगर यहाँ तो बिजली रानी ने कैसी किरपा कर रखी है। गाँव में तो भैया ना इतनी बिजली और न ऐसी बिजली वाली प्रेस...!”

पर हमारे सरिता विहार वाले घर में रहते हुए जल्दी ही भुल्लन चाचा ने शहराती तौर-तरीके सीख लिए। थोड़े अरसे में ही शहर को अच्छी तरह जान-परख लिया। फिर तो उन्होंने ऐसा रंग जमाया, या कहना चाहिए ऐसे-ऐसे रंग जमाए कि देखने वालों को दाँतों तले उँगली दबा लेनी पड़ती थी।

शहर आने के थोड़े दिनों बाद फिल्में देखने और फिल्मी गाने याद करने में उनकी दिलचस्पी बढ़ी और वे खुद को कभी राजेश खन्ना तो कभी देवानंद समझकर इतराते। कुछ दिनों बाद तो उन्होंने अपनी सदाबहार मूँछें भी रखनी शुरू कीं, और उन्हें प्यार से हलका-हलका उमेठने भी लगे।

यानी यह वह ऐतिहासिक दौर था, जब भुल्लन चाचा के भुल्लन चाचा बनने की शुरुआत हो गई थी। और फिर तो

धीरे-धीरे उनके आसपास इतने किस्से, किस्से और महा किस्से इकट्ठे होते गए कि कोई चाहे तो पूरी एक फिल्म बना ले। इनमें भुल्लन चाचा का किरदार थोड़ा-थोड़ा बदलता भी गया। पूरब से पश्चिम...! जैसे-जैसे उनकी मूँछों में ऐंठन आई, वे पूरे भुल्लन चाचा बनते चले गए।

खैर, इन दिनों हाल यह है कि मुझे भुल्लन चाचा की होशियारी वाले तमाम रंग याद आते हैं तो उनके बुद्धूपने के भी। तो चलिए, पहले बुद्धूपने वाला किस्सा ही सुना दूँ। पर देखिए, इस पर हँसना मना है, क्योंकि भुल्लन चाचा उन दिनों नए-नए ही तो दिल्ली शहर में आए थे और उनका गँवई रंग उतरा नहीं था। किसी से बोलते, बात करते समय वे थोड़ा-थोड़ा झेंपते से थे और निगाहें चुराते थे।

तभी फँस गए बेचारे दिल्ली की चक्करदानी में...!

उफ, बेचारे भुल्लन चाचा...!!

हुआ यह कि भुल्लन चाचा को हमारे यहाँ आए कोई महीना भर ही हुआ था। अचानक एक दिन उनके दिल में आया कि बड़े दिन हो गए, जरा लंबी सैर कर आएँ। और उन्होंने झट अपने नए वाले कत्थई जूते पहनने शुरू कर दिए। यों भी वे घुमक्कड़ी के शौकीन थे और जब उनकी घूमने की तबीयत हो, तो आप कितना ही जोर लगाएँ, उन्हें घर में कैद करके नहीं रख सकते थे। उनके पैर मानो बाहर सड़क पर निकलने के लिए मचलते थे और तबीयत फड़कती थी। उस समय कोई चाहे दुनिया के सारे हाथी-घोड़ों की ताकत लगा दे, पर भुल्लन चाचा के मचलते पैरों पर काबू पाना असंभव था।

अलबत्ता पापा ने उन्हें समझाया कि ऐसी जिद ठीक नहीं, क्योंकि अकेले जाने पर खोने का खतरा है। शहर के एक छोर पर बसा सरोजिनी विहार। और सरोजिनी विहार के भी एक कोने में बसा सेक्टर पंद्रह। फिर यहाँ का सबसे बड़ा चक्कर, बल्कि घनचक्कर यह था कि सारे मकान बिल्कुल एक जैसे थे। इसलिए नए-नए आए शख्स के लिए अपने घर को सही-सही पहचानना कठिन था। और यही थी पापा की सबसे बड़ी मुश्किल।

पर भुल्लन चाचा कैसे मान जाते यह बात? बोले, “वाह भाई साहब, यह कैसे हो सकता है? मैं तो आज तक खोया नहीं।”

इस पर पापा ने फिर से समझाया, “तुम्हें पता नहीं भुल्लन, दिल्ली, पूरी भूल-भुलैया है। अरे, तुम क्या, खुद मैं चकरा जाता हूँ कभी-कभी। जबकि मुझे पूरे बीस साल हो गए यहाँ रहते-रहते। अरे भाई मेरे, चलते-चलते एक गलत सड़क पकड़ ली, तो फिर आप कहाँ के कहाँ निकलोगे कोई नहीं जानता। और कोई आपकी मदद करने आएगा, यह तो सोचना भी मत...!”

पर भुल्लन नहीं माने तो आखिर में उन्होंने एक पते की बात बताई, “बस, ठीक है भुल्लन, ठीक है। और अगर कहीं भूलो या भटको, तो बस, सरोजिनी विहार, सेक्टर पंद्रह, मकान नंबर चार सौ सैंतीस याद रखना ठीक से। वरना मुश्किल हो जाएगी।...समझ गए न?”

भुल्लन चाचा हँसकर बोले, “हाँ-हाँ, ठीक है भाईसाहब!...आप तो मुझे, लगता है, बच्चा समझते हैं। अरे, भूलूँगा कैसे? रास्ता तो मैं भूल ही नहीं सकता। मैं तो एक बार में ही रास्ता पहचान लेता हूँ। फिर भूलने का इसलिए भी सवाल नहीं है कि मैं तो बस नाक की सीध में जाऊँगा और उसी तरह वापस आ जाऊँगा। एकदम तीर की तरह जाना, तीर की तरह आना।”

“और चाहो तो तुम निक्का को भी साथ लिए जाओ।” पापा ने सलाह दी।

“अरे, निक्का...! वह कहाँ चल पाएगा मेरे साथ? बेचारा थक-थका जाएगा। मैं अकेला ही हो आता हूँ। बस यों गया और वों आया...!” कहकर भुल्लन चाचा तेज कदमों से चल पड़े और जैसा उन्होंने कहा था, ठीक वैसे ही। यानी एकदम नाक की सीध में।

दूर-दूर तक फैली सड़क का कोई आर-पार नहीं था और भुल्लन चाचा की तेजी का भी। सच में बड़ी तेज चाल चलते थे वे। हवा को मात करती चाल।

आसपास के लोग देखते तो जरा सकपका जाते। शहर में ऐसी बाँकी चाल चलने वाला भला कौन आ गया, कहाँ से आ गया...?

और भुल्लन चाचा तो जैसे नशे में थे। चलने के आनंद का नशा। वे मजे में इधर-उधर देखते हुए अपनी रौ में चलते जा रहे थे, बस चलते ही जा रहे थे। आसपास का हर दृश्य उन्हें आकर्षित कर रहा था। बार-बार मन ही मन कह उठते, “वव्वाह, देखो तो कैसी-कैसी बढ़िया-बढ़िया सड़कें हैं। आदमी फिसले तो यकदम फिसलता ही जाए।...बस, मजा ही आ गया।”

“और फिर, सड़क के चारों ओर कैसी बड़ी-बड़ी दुकानें, बड़े-बड़े बोर्ड...ऊँचे-ऊँचे बिजली के खंभे। और कारें...! इधर से उधर सर्र से दौड़तीं। लोग, मार तमाम लोग। हद्द है, भई, हद्द है...! सारी दुनिया क्या सड़क पर ही आ गई है? क्या यहाँ शहर में घरों में कोई नहीं रहता और...”

थोड़ा आगे जाकर दिमाग थोड़ा पलटा, जब उनका ध्यान इस बात की ओर गया कि अरे, यहाँ तो दूर-दूर तक हरियाली ही नहीं है। बीच-बीच में इक्का-दुक्का पेड़ हैं, मगर वे भी एकदम सूखे, मरियल से। या फिर लाल कनेर के छोटे-मोटे झाड़, जिनकी पत्तियाँ धुएँ से काली हो रही हैं। फूल भी।...धत् तेरे की!

“हाँ, ये ही चीज गड़बड़ है इन शहरों में कि जिधर देखो, पत्थर ही पत्थर नजर आते हैं। हरे-भरे पेड़ तो कम, बहुत ही कम हैं। बस, नाम लेने को।...अब बताओ तो भला, बगैर पेड़-पौधों के, हरियाली के, बंदा साँस कैसे लेगा? मालूम नहीं, इन शहराती लोगों को नींद कैसे आती है? कुछ-कुछ दम तो घुटता होगा।”

उन्होंने थोड़ा बुरा सा मुँह बनाया और सोचा, अगर उनसे शहर के डिजाइन के बारे में कभी किसी ने सलाह माँगी, तो अपनी यह बात वे जरूर जोर-शोर से कहेंगे।

फिर चलते-चलते एक चैराहा आया तो सामने वाली सड़क के किनारे उन्हें रोज गार्डन का बोर्ड नजर आ गया। पीले रंग के बोर्ड पर ऊपर गुलाबी अक्षरों में 'रोज गार्डन' लिखा था। नीचे दमकता लाल सुर्ख गुलाब। साथ ही बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था, 'जवाहर वाटिका'।

देखकर भुल्लन चाचा को उत्सुकता हुई। सोचा, “दिल्ली आए हैं तो रोज गार्डन तो देखना ही चाहिए। वरना कौन मान लेगा कि मैं दिल्ली आया भी हूँ और यहाँ बाकायदे रह रहा हूँ।”

भुल्लन चाचा ने थोड़ा उचककर काँटेदार चहारदीवारी के बाहर से झाँका तो दिल बाग-बाग हो गया। मन ही मन बोले, “वाह रे भुल्लन, वाह! इत्ते सारे रंग-रंग के गुलाब। तेरा तो जनम सार्थक हो गया रे! अरे देख तो, गुलाबों का मायालोक। कोई सुर्ख लाल, कोई गहरा गुलाबी, और कोई-कोई तो जामुनी भी। गुलाब ही गुलाब। यहाँ तक कि पीले और काले गुलाब भी नजर आ रहे हैं। वव्वाह, यह हुई न बात?”

उन्होंने इधर-उधर देखा, कहीं किसी से पूछने की दरकार तो नहीं है? शहर में तो सुना है, हर चीज पर टिकट है, हर चीज पर टिकट...! पता नहीं, यह भी कैसा झंझट कर रखा है सरकार ने। अरे भाई, गुलाब के फूल तुम्हारे सुंदर सही, पर हम दूर से इन्हें देख ही तो रहे हैं। तुम्हारा कुछ ले तो नहीं रहे?

मगर फिर लोगों को गार्डन में आते-जाते देखा, तो उनके साथ-साथ वे भी अंदर घुस गए। अंदर आकर गुलाबों की मीठी-मीठी रसभीनी खुशबू को नजदीक जाकर सूँघा, तो मन चहक उठा। और फिर खाली खुशबू ही तो नहीं। गुलाब की सुंदरता भी क्या कम है? सारी सृष्टि की सुंदरता जैसे इन गुलाबों में ही सिमट गई है।

भुल्लन चाचा ने पहले कभी दो-चार गुलाब एक साथ भले ही देखें हों, पर यहाँ तो गुलाबों की मायानगरी थी पूरी। गुलाबों से मह-मह महकती सुंदर वाटिका। देखकर सच्ची-मुच्ची पागल से हो गए वो...!

फिर अचानक उन्हें याद आ गया, ऐसे ही गुलाब तो बरसों पहले बाबा भीखूमल की बगीची में भी देखे थे। वो भी क्या कमाल था!

बस, भुल्लन चाचा तो हो गए चालू।...

“आहा, किस्म-किस्म के गुलाब...! गुलाबों का मेला। कभी बाबा भीखूमल की बगीची में देखे थे ऐसे ही बड़े-बड़े शानदार गुलाब। शायद आज से पाँच सात बरस पहले, जब दोस्तों के साथ घूमते हुए हम पत्तापुर गाँव में पहुँच गए थे। देखा, तो एकदम भौचक। आँखें जैसे निहाल हो गई हों। आज बरसों बाद फिर वैसा ही नजारा। अहा-हा, ऐसे खूबसूरत रंग-रंग के गुलाब सच्ची-मुच्ची बहुत समय बाद देखे।”

भुल्लन चाचा को यह बगीचा इतना पसंद आया कि देर तक वे एक-एक गुलाब की खूबसूरती देखते हुए मानो अपनी आँखों को शीतल करते रहे। फिर उनकी नजर बाग के पूर्वी कोने की ओर गई। यहाँ एक तरफ पीपल का पेड़ था। खूब बड़ा सा। छतनार। सच्ची-मुच्ची जैसे राजा हो। इतनी बढ़िया ठंडी छाया कि भुल्लन चाचा को अपना गाँव हुल्लारीपुर याद आ गया।

भुल्लन चाचा थोड़ा थक तो गए ही थे। ऐसे सुंदर हरे-भरे पेड़ के सहारे बैठे तो हलकी नींद सी आ गई। नींद में सपना। उन्हें लगा, लाल गुलाबों और हरियाली का एक विशाल समंदर है और वे उसमें तैर रहे हैं, तैर रहे हैं, बस तैरते ही जा रहे हैं...

सपना सुंदर था और भुल्लन चाचा बड़ी दीवानगी से उसमें बहे जाते थे। पर अचानक पेड़ पर चिड़ियों की एक शरारती टोली की कैं-कैं, चैं-चैं शुरू हुई, तो अचकचाकर जागे। और तभी समय का खयाल आया। जरूर साढ़े पाँच-छह तो बज ही गए होंगे।...

अभी तक तो भुल्लन चाचा इस कदर हरियाली के आनंद में लीन थे, जैसे किसी और ही दुनिया में जो पहुँचे हों। अब एकाएक उन्हें ध्यान आया, 'अरे, लौटना भी तो है! भैया से तो कहकर आए थे, बस अभी यों तीर की तरह गया, और वों आया। पर...यहाँ तो सुंदर-सुंदर गुलाबों ने ही नशा कर दिया।...'

खैर, भुल्लन चाचा ने रोज गार्डन से बाहर की ओर झाँका। किधर जाएँ?

पता चला, रोज गार्डन से बाहर आने के तीन या चार रास्ते हैं। अलग-अलग नाम वाले द्वार। यह रोज गार्डन है या भूलभुलैयाँ...? अलबत्ता जो रास्ता उन्हें कुछ ज्यादा जाना-पहचाना लगा, उधर कदम बढ़ा दिए। और बड़ी तेजी से बाहर की ओर चल पड़े।

कहीं मकान खोजने में दिक्कत आई तो...? रोज गार्डन से बाहर निकलते हुए पहली बार उनके दिमाग में संशय का कीड़ा रेंगा। पर उन्होंने झट हँसकर उसे रगेद दिया, “अरे ऐसा भी हो सकता है कभी...? महीने भर से तो वहीं रह रहा हूँ। फिर ठेठ गाँव का बंदा। एक बार जो गलियाँ और सड़क देख ली, उसे क्या भूल जाऊँगा इतनी जल्दी...? अंदर-बाहर का सारा नक्शा तो दिल-दिमाग में है।” और भुल्लन चाचा ने पैरों की गति और बढ़ा दी।

अब तक शाम गहराने लगी थी और अच्छा-खासा अँधेरा हो चुका था। सो भुल्लन चाचा मन ही मन थोड़ा घबराए। वे रोज गार्डन से बाहर आ तो गए। पर आगे एक और मुश्किल। यह रोज रार्डन एक बड़े से चैराहे पर है। तो वे आए किधर से थे, जाना कहाँ है...?

भुल्लन चाचा को लगा, उनका दिमाग अब काम करना बंद कर रहा है। किसी तरह दिमाग खुजाकर उन्होंने हिसाब लगाना शुरू किया कि कौन-सी सड़क पर चला जाए? हालाँकि मन अब भी निश्चिंत नहीं था। असल में उन्हें सड़क पर लगे हुए बड़े-बड़े बोर्डों का भरोसा था कि उन्हें देखते ही पहचान लेंगे। पर अब पता चला कि वे तो हर सड़क पर लगे हैं। तो पहचान कैसे हो कि वे किस सड़क से आए हैं और अब किधर लौटना चाहिए?

कुछ सोचकर और मन ही मन राम जी का नाम लेकर उन्होंने एक चैड़ी सी सड़क पकड़ ली। चाल तेज, खूब तेज। मन में रह-रह कर परेशानी की लहर सी पैदा हो रही थी, और वे चल रहे थे, चल रहे थे, बस चलते ही जा रहे थे। बार-बार उन्हें लगता, बस अभी घर पहुँचे, अभी...! बल्कि अभी-अभी उन्हें भैया की आवाज सुनाई दी थी कि “अरे भुल्लन, तुम यहाँ...? मुझे लग रहा था, तुम जरूर भटक जाओगे, इसीलिए चला आया।...खैर, कोई बात नहीं, तुम घर के आसपास ही हो...!”

पर फिर समझ में आया, यह तो मन का भ्रम है।

कुछ आगे चलते ही भुल्लन चाचा एक ऐसे सुनसान इलाके में पहुँच गए कि जी घबराने लगा। रात घिरने के साथ-साथ सन्नाटा भी बढ़ता जा रहा था। भीतर का भी, बाहर का भी।...दूर से सीटियाँ मारता सन्नाटा और बीच-बीच में सर्र से दौड़ती कारें। कोई कार बगल से शूँ करती हुई गुजरती तो दिल बैठ सा जाता था। क्या जरूरत थी उन्हें इस दिल्ली शहर में अपनी बहादुरी दिखाने की...? अकेले ना ही घूमने आते तो क्या हो जाता?

भुल्लन चाचा मन ही मन अपने आप पर भुनभुना रहे थे। अंदर ही अंदर पछता भी रहे थे। घबराहट में उन्होंने और भी तेज कदम बढ़ाने शुरू कर दिए।

पर थोड़ी देर में ही असलियत भुल्लन चाचा के आगे आ गई। समझ गए कि जल्दी के चक्कर में वे शहर से और भी दूर चले गए हैं। अब तो वे बुरी तरह घबराए। लगा, अभी यहीं चक्कर खाकर गिर जाएँगे। मारे घबराहट के वे एकदम पसीने-पसीने हो गए।

मकान नंबर चार सौ सैंतीस! सेक्टर पंद्रह। उन्होंने हमारे घर का यह पता अच्छी तरह याद किया था, पर जाने क्यों इस समय उन्हें कुछ भी याद नहीं आ रहा था। और इस समय पूछें भी तो किससे पूछें, क्या पूछें...?

आखिर उन्हें बिज्जू की तरह डरा हुआ और बदहवास देखकर एक भला सा बूढ़ा आदमी मदद के लिए आगे आ गया। भुल्लन चाचा इस दयालु अजनबी से बस इतना ही कह पाए कि “नीलू और गौरी हमारे भतीजे-भतीजी होते हैं।”

“सो तो ठीक है, पर वे रहते कहाँ हैं...?” उस बूढ़े आदमी ने पूछा। इतने में देखते ही देखते वहाँ आसपास खड़े कुछ और लोग आगे आ गए। “भई, जाना कहाँ है?” लोगों ने पूछा।

अब भुल्लन चाचा भला इसका क्या जवाब दें? बोले, “भाई, यह तो हमको नहीं पता। पर हमको जाना उनके घर है।”

सुनकर आसपास खड़े लोग हँसने लगे। बोले, “पूरा पता नहीं मालूम, तो पहुँचोगे कैसे भाई?”

एक-दो लोगों ने दिलासा देते हुए कहा, “देखो, तुम भटक गए हो तो चिंता न करो। हम तुम्हारे घर पहुँचा देंगे। पर भाई, घर का थोड़ा-बहुत पता तो होना ही चाहिए...?”

भुल्लन चाचा ने दिमाग पर जोर डालकर याद करने की कोशिश की। एकाएक उन्हें याद आ गया, “मकान नंबर चार सौ सैंतीस...! हाँ, भाई जी, बस यही नंबर है हमारे भाईसाहब के घर का। तुम हमें वहीं पहुँचा दो।”

मकान नंबर याद आने से भुल्लन चाचा ने सोचा कि अब तो राहत मिल गई। बस, वे झटपट घर पहुँच जाएँगे। पर सुनने वालों को इससे जरा भी तसल्ली नहीं हुई। एक मूँछों वाले

अधेड़ ने मूँछों में हँसते हुए कहा, “मकान नंबर की बात तो ठीक है, पर सेक्टर...?”

“सेक्टर...? यह तो याद नहीं है।” भुल्लन चाचा धीरे से बुदबुदाए।

“तो फिर घर कैसे पहुँचोगे, भैया? जानते नहीं, यहाँ तो बहुत सारे सेक्टर हैं। हर सेक्टर में मकान नंबर चार सौ सैंतीस मिल जाएगा। तो फिर कैसे पहुँचोगे अपने भाई के घर?...यह तो पता होना चाहिए कि तुम्हें किस सेक्टर के मकान नंबर चार सौ सैंतीस में जाना है...?” उसी दयालु किस्म के बूढ़े आदमी ने समझाते हुए कहा, जिसने शुरू-शुरू में भुल्लन के कंधे पर हाथ रखकर दिलासा दिया था।

“यानी चार सौ सैंतीस नंबर मकान बहुत सारे हैं...?” अब के भुल्लन चाचा चैंके।

“और का...?” साइकिल पर सवार एक नौजवान हँसा। वह मुँह में पान का बीड़ा दबाए था। खूब दाँत चमकाकर बोला, “यह दिल्ली तो भूल-भुलैया है। तुम्हारा गाँव थोड़े ही है, भाई!”

अब तो भुल्लन चाचा की रोने-रोने की तबीयत हो आई। देखकर दो-एक के मन में दया उपजी। हाथ में छोटा सा बेंत लिए फिर वही दयालु बूढ़ा आगे आ गया। उसने कहा, “क्यों बेटा, कोई और पहचान है उस जगह की, जहाँ घर है? जरा बताओ तो, याद करके!”

मगर अब पहचान क्या बताएँ भुल्लन चाचा...? बहुत सोचकर बताया कि “वहाँ से एकदम सीधी सड़क रोज गार्डन तक जाती है। हम उसी सीधी सड़क पर चल रहे थे कि जाने कब इधर-

उधर निकल गए और भटक गए?”

“कितनी लंबी होगी वह सड़क?...मतलब, कितनी देर में रोज गार्डन पहँचे थे?” उसी बूढ़े ने जानना चाहा।

आसपास के लोग भी बड़े गौर से सुन रहे थे भुल्लन चाचा और उन बूढ़े सज्जन के बीच की बातचीत कि शायद यहीं से कोई रास्ता निकल आए।

“यही कोई घंटा भर समझो।...यानी कोई चार-पाँच मील।” भुल्लन चाचा ने कुछ सोचते हुए कहा।

“बस-बस, अब अंदाजा लग जाएगा थोड़ा-बहुत।” उन बूढ़े सज्जन के चेहरे पर थोड़ी तसल्ली उभर आई।

“और कोई पहचान...?” पास खड़े एक नौजवान ने पूछा।

“वहाँ घर के पास स्कूल है। बहुत बड़ा स्कूल। वहाँ बाहर ही बहुत सारी बसें भी खड़ी थीं स्कूल की। बिल्डिंग एकदम सफेद रंग की। पर...पर उसका नाम क्या है, याद नहीं आ रहा।...नहीं-नहीं, याद आ गया...याद आ गया, मीराबाई माडर्न पब्लिक स्कूल। यही नाम लिखा है ऊपर लाल-लाल बोर्ड पर।”

“अरे यार, कहीं तुम सेक्टर पंद्रह की बात तो नहीं कर रहे हो?” फिर उसी नौजवान ने जैसे किसी निष्कर्ष पर पहुँचते हुए कहा।

“अब पता नहीं, भैया। पर अब पहुँचा सको तो जल्दी पहुँचा दो, हमारे भैया, भाभी और नीलू और गौरी के पास...!” भुल्लन चाचा गिड़गिड़ाए।

बेंत वाले बूढ़े आदमी ने कहा, “किसी के पास गाड़ी हो तो इसे घर तक छोड़ आओ। बड़ा पुन्न होगा।”

एक भला आदमी बोला, “जरा रुको, मैं अभी घर से कार लेकर आया। सामने ही घर है मेरा।”

और उसके आते ही भुल्लन चाचा की जान में जान आई।

उस शख्स ने भुल्लन चाचा को कार में बैठाकर, कार सेक्टर पंदह की ओर मोड़ी, तब उन्हें समझ में आया कि वे तो एकदम उलटे ही जा रहे थे। ऐसे ही चलते रहते तो वे सुबह तक नहीं पहुँच सकते थे। उलटा, शहर के दूसरे ही छोर पर ही पहुँच जाते।

कार तेजी से दौड़ती जा रही थी, और भुल्लन चाचा बेचारे अपने आँसुओं को रोकने की असफल कोशिश कर रहे थे।

आखिर आ ही गया भुल्लन चाचा के बड़े भाईसाहब का घर। वह घर जहाँ नीलू-गौरी थे, भुल्लन चाचा के भाई-भाभी और तमाम खुशियाँ। हालाँकि घर के सामने पहुँचकर भी भुल्लन चाचा को यकीन नहीं हो रहा था कि वे सचमुच लौट आए हैं, अपने घर लौट आए हैं।

कॉलबेल बजाने पर अंदर से पहले नीलू निकला। “अरे, भुल्लन चाचा...!” खुशी से भरी उसकी चीख सुनी तो घर के सारे प्राणी दौड़े।

सबके चेहरे पर विस्मय, “अरे, भुल्लन चाचा लौट आए...भुल्लन चाचा लौट आए...! सच्ची-मुच्ची!”

आखिर भुल्लन चाचा को घर पर छोड़कर उस शख्स ने सारी कहानी सुनाई, तो घर में हर कोई हक्का-बक्का। पापा को तो शुरू में ही आशंका थी कि ऐसा होगा।

घर आकर भुल्लन चाचा की आँखों में आँसू। मुझे और गौरी दीदी को देखते ही उनका रोना छूट गया। बोले, “भैया, हम तो खो गए थे।” कहते-कहते उनका गला भर आया।

मम्मी ने खूब पुचकारकर उनके आँसू पोंछे। बड़ी मुश्किल से भुल्लन चाचा को चुप कराया।

उसके बाद भुल्लन चाचा ने पानी पी-पीकर इस शहर को कोसना शुरू किया। बोले, “यह तो बड़ा अजीब शहर है, भई। यहाँ मकान नंबर से काम नहीं चलता।”

उस दिन भुल्लन चाचा दिल्ली तो क्या, दुनिया के सारे शहरों के खिलाफ हो गए। और हमें समझाने लगे कि देखो भाई, मैं तो भाई गाँव का बंदा हूँ और वही मुझे अच्छे लगते हैं। कभी गाँव आओ तो देखोगे कि बंदे की पहचान कहाँ-कहाँ तक है। और मेरी नहीं, हर किसी की।...वहाँ बंदा बंदे की शक्ल से पहचाना जाता है, किसी नंबर-वंबर से नहीं। बस, गाँव का नाम याद होना चाहिए। और तुम खोना भी चाहो तो खो नहीं पाओगे। कोई न कोई तो तुम्हें तुम्हारे घर पहुँचा ही जाएगा।...

फिर उनके लंबे-लंबे दिलचस्प संस्मरण चालू हो गए। एक चिट्ठी किसी दफ्तर से उनके घर आई थी। इस पर पता बस इतना था कि- भुल्लन, गाँव हुल्लारीपुर, जिला करनाल। और कैसे वह चिट्ठी फर्राटे से उनके पास पहुँची, इसका मजेदार किस्सा सुनाते हुए भुल्लन चाचा हँसने लगे।

सुनकर हम सबके चेहरे पर भी थोड़ी हँसी आई। भुल्लन चाचा की उदासी की परत कुछ तड़क सी गई। हालाँकि बीच-बीच में रह-रहकर मार खाए चेहरे के साथ वे बोल पड़ते, “हम तो सच्ची-मुच्ची खो गए थे, भैया...! लग रहा था, अब इस जनम में तो कभी वापस यहाँ आ नहीं पाएँगे। अजब है भाई, इस दिल्ली की लीला।...अब बताओ तो, मकान नंबर पूछने वाले को सरोजिनी विहार बता दिया, मकान नंबर चार सौ सैंतीस बता दिया। मगर साहब, कहते हैं कि सेक्टर बताओ, सेक्टर...वरना मकान नं चार सौ सैंतीस तो बहुत हैं यहाँ...! बताओ, क्या चक्करबाजी है ?”

पहली बार भुल्लन चाचा की यह मासूमियत देख, हम सभी की बेसाख्ता हँसी छूटी। और हमारे साथ-साथ वे खुद भी हँसने लगे।...मगर बातों का सिलसिला चालू था। लग रहा था, जब तक वे अपने साथ घटी पूरी घटना सिलसिलेवार न बता लें, उन्हें चैन नहीं पड़ेगा।...

अलबत्ता वह रात भुल्लन चाचा की कैसे कटी, इसे न कभी वे भूल पाए और न मैं। और अब उम्मीद है, आप लोग भी न भूल पाएँगे।