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बात में वजन
December 18, 2019 • सुरेश उजाला • ग़ज़लें

सार्थक कथन

बात मेंवजन

 

पाँव भूमि पर

हाथ में गगन

 

कर्म से बढ़े-

ब्याज-मूलधन

 

नींव यदि सही

तो सही भवन

 

कलह की जगह

रोपिये अमन

 

कलुमयी मन

व्यर्थ हैहवन

 

हक-हकूक पर

बाँधिये कफन

 

जातिवाद को

कीजिये दफन

 

मन हिला गया

तेरा बागपन

 

प्यास-इम्तहां

ओस आचमन

 

शान्ति की डगर

राह पोखरन

 

सत्य पर अटल

साधु के वचन

 

सन्त भेष में

सैकड़ों मदन

 

हाँसले बढ़े-

क्षीण संगठन

 

प्रेम से कहो

मादरे वतन

 

देश में बढ़े

प्यार का चलन

 

चैन से आप सोते रहे

किन्तु हम लोग रोते रहे

 

हमको अपनी खबर ही नहीं-

आपका बोझ ढोते रहे

 

प्रेम का खेत बंजर यहाँ-

हल कहाँ आप जोतेरहे

 

आप वैसे बड़े नेक हैं-

किन्तु कांटे चुभाते रहे

 

जिनका दादा लुटेरा में थे-

उनके अय्याश पोते रहे

 

कामनाओं में भटका किये-

सिद्धियाँ आप खोते रहे

 

धर्म ने जो पढ़ाया पढ़ा-

धर्म के आप तोते रहे।