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बड़ा-सा घर
October 29, 2020 • शशि पाधा (यू.एस.ए) • लघुकथा

बाल लघुकथाएँ


शशि पाधा (यू.एस.ए),

email : shashipadha@gmail.com

बस दो ही जन थे उस कमरे में। पाँच साल का ध्रुव और पैंसठ साल की दादी माँ। दोनों अपनी-अपनी आयु के अनुसार अपने -अपने काम में लगे थे। दादी अपने घुटनों पर दर्द मिटाने की दवा लगा रही थी और ध्रुव अपने बिल्डिंग बनाने वाले खिलौनों के ब्लाक्स जोड़-जोड़कर ऊँची बिल्डिंग तैयार कर रहा था। एक के ऊपर एक, बहुत ऊँची, शायद पाँचवी मंजिल तक पहुँच गया था। नीचे कार पार्किंग भी थी। उसमें कार के स्थान पर ट्राई साइकल खड़ी हुई थी। यह था पाँच वर्ष के बच्चे का पहला वाहन। ध्रुव अक्सर कहता था कि वह बड़ा होकर बिल्डर बनेगा और बड़े-बड़े घर बनवाएगा।

आज यही देखकर दादी माँ मुस्कुराने लगी। “क्या बन रहा है?” उन्होंने यूँ ही पूछ लिया।

“बड़ी-सी बिल्डिंग। इसमें हम सब मिलकर रहेंगे। चाचा, मासी और मेरे सारे कज़िन्स। कितना मजा आएगा न दादी।” ध्रुव ने बड़े उत्साह से कहा।

“हुम्म!” दादी माँ ने ब्लाक्स की बनी बिल्डिंग पर एक सरसरी दृष्टि डाली।

आज घुटनों में कुछ ज़्यादा ही दर्द था। दवा लगाते हुए मुँह से एक कराह सी निकल गई।

ध्रुव  ने दादी की ओर देखकर बड़े भोलेपन से कहा, “ दर्द हो रहा है? ऊपर से दवा ले आइये न ।”

“न, बेटा! कोई बात नहीं, ठीक हो जाऊँगी कुछ देर में।” दादी ने धीमे से स्वर में कहा।

ध्रुव ने दादी की ओर देखा। पल भर के लिए वह चुप रहा। कुछ सोचते हुए बोला,  “आप  चिंता  मत करो, मैं सब ठीक कर दूँगा।”

मासूम ध्रुव के सांत्वना के शब्द सुनकर वह मुस्कुरा दीं। अब दर्द भी कुछ कम हो रहा था। शायद दवा ने असर करना शुरू कर दिया था या ध्रुव की सांत्वना ने। अब वह भी उसके के खेल में ध्यान लगाने लगी।

ये क्या कर रहा है ध्रुव! वह बिल्डिंग की ऊपरी  मंजिलों से ब्लाक्स क्यों निकाल रहा है? दादी माँ को उत्सुकता हुई। अधिकतर दो चार दिनों के लिए बिल्डिंग को न हटाने की हिदायत रहती है। पर आज ------?

आज तो केवल एक मंज़िल की ही बिल्डिंग बन रही थी। उसी में बहुत से कमरे जोड़े जा रहे थे। एक कार पार्क भी बन गया। धीरी-धीरे सारी ऊपर की  मंजिलों के ब्लाक्स नीचे आ गए थे।  भला आज क्या बन रहा है ?

दादी अभी इसी सोच में थी कि अचानक ध्रुव ने उनकी कुर्सी के पास आकर बड़े प्यार से कहा, ”दादी माँ ! देखिए न,अब मैंने केवल एक ही मंजिल का घर बनाया है । आपको सीढियाँ चढ़ने में दर्द होता है न। इसीलिए यह बड़ा-सा घर बनाया है। सब यहीं रहेंगे। सभी ईईईई ।”

और दादी माँ का दर्द कई मंजिलें लाँघता हुआ कहीं दूर उड़ गया।